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रविवार, जून 03, 2012

"दो जून की रोटी" (चर्चा मंच-899)

मित्रों!
     रविवार के लिए क्रमवार चर्चा में अपनी पसंद के कुछ लिंक आपके अवलोकनार्थ दे रहा हूँ। आशा है आपको पसंद आयेंगे!
  1. बहुत मुश्किल जुटाना है, "दो जून की रोटी" 
  2. सुबह से चल निकले हैं, शाम तक पहुँच ही जायेंगे ये चाँद सितारे अपने मक़ाम तक पहुँच ही जायेंगे ...मेरे ज़ज़्बात!
  3. *मनोज कुमार*   पुस्तक परिचय-31 : सुहाग के नूपुर!
  4. कमल कुमार सिंह (नारद ) द्वारा  ब्रहमेश्वर सिंह मुखिया : आधुनिक परशुराम!
  5. कितना है नादान मनुज,यह चक्र समझ नही पाया।   "पुरानी डायरी से"
  6. कम ही जानें कम पहचानें बस्ती के इंसानों को, वक़्त मिले तो आओ जानें जंगल के हैवानों को!
  7. समझदार की भीड़ सामने एक सुमन नादान है क्या, मन्दिर मस्जिद गिरिजाघर में,  पूछो तो भगवान है क्या?
  8. डॉ टी एस दराल द्वारा- वो खिड़की जो कभी बंद , कभी खुली रहती थी...!
  9. आशार... कागज मेरा मीत है, कलम मेरी सहेली.!
  10. फ़ुरसत से मीठी यादें बांटते हुए...मनोज कुमार!
  11. स्मार्ट इंडियन द्वारा... शिव तांडव स्तोत्र...!
  12. रविकर फैजाबादी द्वारा... यह मोहन कौन, नचाये जिसको सुतली...!
  13. यशवन्त माथुर द्वारा... आपका साथ और ये 2 वर्ष ...!
  14. अपर्णा खरे द्वारा.... अब करोगे गुस्सा क्या?
  15. दोहों के आगे दोहा... मानवीय सरोकार !
  16. शाम को अकेले बैठे हुए लिख गया यह...  है बात ये ज़रा सी!
  17. 1988 की कवितायें - नींद न आने की स्थिति में लिखी कविता...!
  18. "बाबा ! वो क्या है... वो शायर नहीं रहा...!
  19. वो खुद मिल गया है मुझे...मंजिल बन कर...!
  20. आईने का भरोसा क्यों....लम्हों का सफ़र !
  21. यही दो दिन तो होते हैं, कि मैं नौकर नहीं होता....!
  22. रोटियों को बीनने को, आ गये फकीर हैं... दिल तो है लँगूर का!
  23. राम-रामं भाई... साधन भी प्रस्तुत कर रहा है बाज़ार जीरो साइज़... !
  24. लीवर डेमेज की वजह बन रही है पैरासीटामोल !
  25. गीत....तेरी मन-मोहन अखियों में अपने सपने देखा करता हूँ...!
  26. चैतन्य तुम्हारा आना जीवन में नई चेतना ले आया है...!
  27. आँख खुली हो, फिर भी पथ पर, समुचित चलना न आया... क्यों दूँ दोष विधाता को? 
  28. प्रतियोगिता... अगर आपके पास फेसबुक खाता है तो कृपया नीचे दिए लिंक पर लाइक करें!
  29. किसी का देवता किसी के लिये दानव...!
  30. लोग अपनी ही सुनाने में...लगे हैं एक हम हैं ग़म भुलाने में लगे हैं...!
  31. महानगरो में बढ़ते तलाक

  32. संतुष्टि और सम्पूर्णता पाने की व्याकुलता...!
  33. चलते -चलते.... दुआ का एक लफ्ज , और वर्षों की इबादत
  34. कार्टून:- खि‍लौनों का सच

आज के लिए केवल इतना ही!

शनिवार, जून 02, 2012

"कब आयेंगी नेह फुहारें" (चर्चा मंच-898)


मित्रों!
       शनिवार की चर्चा में आपका सबका स्वागत करता हूँ! प्रस्तुत है आपके ही शब्दों में आपकी पोस्ट की चर्चा!

खेतों में पड़ गयी दरारेंकब आयेंगी नेह फुहारें,
“रूप” न ऐसा हमको भाता। नभ में घन का पता न पाता।।

       माइक्रोसोफ्ट ने अपने नए ऑपरेटिंग सिस्टम विंडोज 8 की ओर एक और कदम बढ़ा दिया है और जारी किया है अपने इस ऑपरेटिंग सिस्टम का Windows 8 Release Preview संस्करण । तो देर किस बात की है समय के साथ चलिए और अपने पी.सी पर लगाइए विण्डो-8....! क्या इस समस्या का कोई हल है?  इक ग़ज़ल कुछ बीमार थी... मर्ज़ क्या था पता नहीं... शेर दिन-बदिन कमजोर होते जा रहे थे... तरन्नुम की जाने कितनी शीशियाँ ख़त्म हो गयी... पर कोई फ़ायदा न हुआ...!  उनकी सोच का पैनापन देखिये ...मैं तो चाँद गुलाब और झीलों पर ठहरी हूँ मगर वहाँ तो चेहरों पर भी फसल उग आती है मैं तो अभी उथले सागर में मोती ढूँढ रही हूँ मगर वहाँ तो बंजर जमीन पर भी हरियाली छाती है....! यादें भर शेष रह गईं...सपनों की चंचलता बहुत कुछ *** *सागर की उर्मियों सी *** *भुला न पाई उन्हें *** *कोशिश भी तो नहीं की |*** *बार बार उनका आना *** *हर बार कोई संदेशा लाना *** *मुझे बहा ले जाता *** *किसी अनजान दुनिया में | कर चुके तुम नसीहतें हम को ......हम तो चलते हैं लो ख़ुदा हाफ़िज़ बुतकदे के बुतों ख़ुदा हाफ़िज़ कर चुके तुम नसीहतें हम को जाओ बस नासेहो ख़ुदा हाफ़िज़ आज कुछ और तरह पर उन की सुनते हैं गुफ़्तगू ख़ुदा हाफ़िज़....!
          मुर्दे को दफन करने आए थे लेकिन मुर्दे का दिन अपना लिया...हमारे देश भारत की सब से बड़ी विशेषता यह है कि हम अनेकता में एकता का प्रदर्शन करते हैं। आज तक भारत के नागरिक परस्पर एक दूसरे से प्रेम, सद्व्यवहार, और सहानुभूति का मआमला करते हैं। "फिर से-लंबी रातें उसकी यादें" कृति- मोहित पाण्डेय"ओम" फिर से आज एकाकीपन है, फिर से रोया ये तन मन है| फिर से रात नहीं गुजरी, यादो से आंखे फिर नम है|| फिर से मैं खुद को भूल गया....! तुम मानो या नहीं ...पर कोई तो है सर्वशक्तिमान जो सबल बनाता है निर्बल को तुम्‍हारी हर आवाज़ को सुनता है पलटकर जवाब भी देता है तुम समझ पाओ या नहीं देख पाओ या नहीं पर कोई तो है ... ! तेरी हस्ती तेरी बस्ती, मेरा कोई न ठिकाना है, तू मालिक तूने ही रहना, मैंने तो आना जाना है.....! हरिगीतिका छंद देखिए-मौसम के लिए... गोरी सजी दुल्हन बनी है, नैन शर्मीले बने| लाली हया की छा रही है, हाथ बर्फीले बने|| जाना सजन के संग में है, यह विदा की रात है| इन थरथराते से लबों पर, अनकही इक बात है| विष-दन्त गिरे ,विष- भाव मरे * *विष-हीन कभी तो हो जाएँ - * *जस चन्दन स्वीकार नहीं विष* *हम चन्दन सम हो जाएँ -* * * * स्निग्ध, विनीत, हृदय की वीथी...! दूर... बेहद दूर जिन्दगी की उन जख्मी सी मुडेरों पर   तेरी याद की धुंधली सी तश्वीर में जो आंसू के धब्बे हैं ...मेरे हैं, याद कर तैने जमाने की नज़रें चुरा कर एक दिन इसको पोंछा था अपने ही आँचल से सफ़र में गुमशुदा मुझको न कहना गुमराह तुम ...!
       दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक....लगे गुरु को ठण्ड, अलावी बने सहारा - चेले चैले हो रहे, ले मुगदर का रूप | दोनों हाथों भांजते, पर सम्बन्ध अनूप | पर सम्बन्ध अनूप, परसु से भय ना लागे | त्यागा जब से कूप, गोलियां भर भर दागे | आए थे जब खाली थे हाथ न बोझ कोई कन्धों पर. ज़िंदगी की राह में सभी की खुशी और चाहतें करने पूरी बढ़ाते रहे बोझ कंधे की पोटली का. नहीं महसूस हुआ भार इस आशा में कि कर लेंगे साझा सब कंधे भार इस पोटली का. ...! दूर... बेहद दूर जिन्दगी की उन जख्मी सी मुडेरों पर....तेरी याद की धुंधली सी तश्वीर में जो आंसू के धब्बे हैं ...मेरे हैं, याद कर तैने जमाने की नज़रें चुरा कर एक दिन इसको पोंछा था अपने ही आँचल से सफ़र में गुमशुदा मुझको न कहना गुमराह तुम थीं सोच कर मुझको बताना...! अकेलापन, कितना मधुर सुहाना लगता है, ये अकेलापन कोलाहल से दूर मन भागता सा प्रतीत होता है, असख्य महल बनते बिगड़ते और धरासायी होते है, न रिश्तों खिचाव और न कोई भर्मित आस्था इक अलौकिक बंधनों से..! गिला किससे करूँ ,फरियाद भी कोई सुनता नही * *हूँ वक्त का, मुरझाया फूल ,जिसे कोई चुनता नही |* *--अकेला * समय का कालचक्र ....!!! मैं वो गुज़रे ज़माने की चीज़ हूँ जो रख के, कोने में भुला दी जाती है तब उस...!*उस किताब में उसके लिखे सारे नज़्म थे * *और साथ में गुलाब की वो आखिरी पंखुरिया * * * *सुना है आज किताब भी जल गया और पंखुरिया उसके मज़ार पर हैं ...पुस्तकें मिलीं...विगत सप्ताह दो महत्वपूर्ण पुस्तकों की मानार्थ प्रतियां प्रकाशकों की ओर से मिली.  पहली पुस्तक अनिल पुसदकरजी की क्यों जाऊं बस्तर मरने  तथा दूसरी सतीश सक्सेना जी की मेरे गीत  है .ये दोनों ही पुस्तकें जानी मानी शख्सियतों और ब्लागरों की लिखी हैं . अभी निकाय निर्वाचनों में अतिशय व्यस्तता के कारण इन्हें पढ़ तो नहीं पाया हूँ .मगर पुस्तक के आने पर उसके रैपर को खोलकर मुख्य पृष्ठ निहारने ओर एक सरसरी निगाह से पन्नों को पलटने का लोभ भला कहाँ संवरण हो पाता है . सो यह कृत्य तो सहज ही संपन्न हो गया....! ....गरीब हूँ मैं रोटी के लिए घूमता रहता हूँ , इधर उधर , पाँव छिल जाते है , रुकता नही हूँ मगर , दिल से देगा मुझे कोई उसे भगवान् उसे बहुत देगा मेरी दुआ है सभी के लिए.....L धूल अभी कल की ही बात है थोडा सा रद्दी कपडा मैंने भिगोया पानी में पोछ ( साफ़ ) डाले सारे धूल जो जमे थे मेरे घर के खिडकियों के शीशे पर...! ख्वाब की किरचें.. वक़्त ने मेरी बाहं थाम कर मेरी हथेली पर अश्क के दो कतरे बिखेर दिए मेरे सवाल पर बोला ये अश्क नहीं बिखरे ख्वाब की किरचे हे सभांल कर रखो....! पहले मजा फिर सजा ..... या फिर .....आजकल दाद , खाज , खुजली मिटाने वाली कंपनी का एक विज्ञापन मेरी आँखों के सामने बार-बार आ रहा है , विज्ञापन की एक बात बार-बार मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित ....! सिगरेट यह बला आई कहां से? क्या है इसके कानून? -*तम्बाकू निषेध दिवस पर *विशेष, सिगरेट कहां स आई ? सिगरेट बनाने की मशीन का विकास 1750 से 1800 ईस्वी के बीच हुआ....! जलधि विशाल...आज गंगा दशहरा के पर्व पर जलधि विशाल तरंगित ऊर्मि नीलांचल नाद झंकृत धरणी  कल-कल झिन्झिन झंकृत सरिता  पारावार विहारिणी गंगा  तरल तरंगिनी त्रिभुवन तारिनी  शंकर जटा  विराजे वाहिनी....! 
          मौत से कह दूंगा, रुक जा दो घड़ी, आने वाला है ज़माना प्यार का सांस में सुर सनसनाना प्यार का ज़िन्दगी है ताना बाना प्यार का मौत से कह दूंगा, रुक जा दो घड़ी आने वाला है ज़माना प्यार का...! पॉश खेल .. विशुद्ध साहित्य हमारा कुछ उस एलिट खेल की तरह है जिसमें कुछ सुसज्जित लोग खेलते हैं अपने ही खेमे में बजाते हैं ताली एक दूसरे के लिए ही पीछे चलते हैं....! कुछ तो ब्लॉगर कहेंगे, ब्लॉगरों का काम है कहना ...जी हाँ यही सच है...! शाम होते ही टल्ली हो जाता है अन्ना का गांव ... मुझे लगता था कि अब अन्ना के बारे में मैं बहुत लिख चुका हूं, बंद किया जाए ये सब, क्योंकि अन्ना और उनकी टीम की असलियत लगभग सामने आ चुकी है...! खट्टी-मीठी फेसबुक -इन्टरनेट ने आज अपनी पहुंच आम आदमी तक बना ली है | विकसित देशों में तो यह पहले ही काफी प्रचलित था , अब भारत जैसे विकासशील देशों में भी इसका प्रयोग करने वाले...! "गुण आ गये हैं नीम के देखो तो बेल में" (देवदत्त "प्रसून") -*कितनी हैं ख़ामियाँ यहाँ आपस के मेल में।* *मशगूल रिश्ते-नाते हैं छल-बल के खेल मे....! अपने लिए ***वे अपने लिए नारी की हरेक परत से गुज़रना चाहते हैं सकल पदार्थ प्यार , अनुभूतियाँ , चमत्कार ,बाज़ार , सरंक्षण , सभी कुछ अपनी सांसों में ...! तराने सुहाने....आइये आज आपको एक और सुमधुर गीत सुनवाती हूँ ! जेलर फिल्म के लिए इसे लता मंगेशकर ने गाया है ! जितने मीठे बोल हैं उतनी ही मीठी धुन भी है....! 'चीनी' , मेरी जान ,तुम कहाँ खो गयी हो ? ये कहानी महँगी हो रही शक्कर पर नहीं बल्कि महँगी हो रही 'मिठास' पर है। एक लड़की जिसका पति उसे प्यार से 'चीनी' बुलाता है, उसकी कहानी है ये...!
             इस लिंक को जरुर पढ़े....! भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जैसे ही अपने ब्लाग में बीजेपी :आडवाणी को रिटायर होने की सलाह देने वाले अंशुमान हैं कौन?....! ना खुशी, ना ग़म.... पिछले ९ सालों में उस बाज़ार के सारे भिखारी अब शक्ल से पहचाने जाने लगे हैं। वो बूढ़े दादा..जिनके पास गुदड़ियों का एक पूरा भंडार है....! कब और कैसे? आज के समय की तकनीकी ने कुछ लोगों के लिए दिन रात काम करते रहना संभव बना दिया है। तकनीकी के कारण हमें काम करने के लिए कार्यस्थल पर ही रुकना आवश्यक नहीं है...! भोजन छ्न्द :) अनजाने ही छ्न्द गढ़ गये चर्चा मीठी मीठी बहा पसीना रोटी भीगी तपती रही अंगीठी। जोर हाथ के बेलन घूमे चौकी खटपट सीखी ताल दे रही चूड़ी खनखन जिह्वा नाचे भूखी।..
आरडीएक्स द्वारा today's CARTOON 

शुक्रवार, जून 01, 2012

"साहित्य शारदा मंच, खटीमा" (चर्चा मंच-897)

एक बरस पहले ही ई -सिगरेटों ने हिन्दुस्तान में दस्तक दी है और आज इनके खिलाफ चिकित्सकों और तम्बाकू -रोधी -उत्साही कार्यकर्ताओं ने इसका मुखर विरोध किया है .अगर इन्हें चलन से बाहर नहीं किया जाता है तो कमसे कम सरकार यह तो तस्दीक करे कि अच्छी दिखने वाली ई -सिगरेटें भी फेशनेबुल कैंसर स्टिक्स ही हैं .

"रपट-रविकर जी के सम्मान में गोष्ठी"

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"रविकर" जी के सम्मान में कविगोष्ठी!
!!खटीमा (उत्तराखण्ड) 31 मई, 2012!!
साहित्य शारदा मंच, खटीमा की ओर से
धनबाद से पधारे रविकर फैजाबादी के सम्मान में
एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर साहित्य शारदा मंच
खटीमा के अध्यक्ष डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने
इन्हें अपनी 4 पुस्तकें भेट की और
मंच के सर्वोच्च सम्मान
"साहित्यश्री" से अलंकृत किया।
ब्लॉगिस्तान में इनकी सक्रियता को देखते हुए
"ब्लॉगश्री"
के सम्मान से भी सम्मानित किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता
वरिष्ठ नागरिक समिति के अध्यक्ष
सतपाल बत्तरा ने की
तथा गोष्ठी का सफल संचालन पीलीभीत से पधारे
लब्धप्रतिष्ठित कवि देवदत्त "प्रसून" ने किया।
इस अवसर पर माँ सरस्वती की वन्दना
डॉ. मयंक ने प्रस्तुत करते हुए
गोष्ठी का शुभारम्भ किया।
इसके बाद वयोवृद्ध रूमानी शायर
गुरुसहाय भटनागर ने अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत की-
"प्यार से मिलके रह लें गाँव-शहर में-
देश में हमको ऐसा अमन चाहिए।"
स्थानीय थारू राजकीय इण्टर कॉलेज में
हिन्दी के प्रवक्ता डॉ.गंगाधर राय ने
अपनी एक सशक्त रचना का पाठ किया-
"हे राम अब आओ
पंथ दिखलाओ!
राक्षसी वृत्तियाँ बढ़ रहीं हैं।
मर्यादाएँ टूट रही हैं...."
गोष्ठी के संचालक देवदत्त प्रसून ने
इस अवसर पर काव्य पाठ करते हुए कहा-
"आपस के व्यवहार टूटते देखें हैं।
नाते-रिश्तेदार टूटते देखें हैं।।
हाँ पैसों के लोभ के निठुर दबाओं से-
कसमें खाकर यार टूटते देखें हैं।।"
हेमवतीनन्दन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
खटीमा के हिन्दी विभागाध्यक्ष
डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने इस अवसर पर
गंगादशहरा पर अपनी कविता का पाठ किया-
स्कूटर पर सवार होकर
घर आई मिठास
बेरंग - बदरंग समय में
आँखों को भाया
भुला दिया गया सुर्ख रंग
यह तरबूज है सचमुच
या कि घर में

आज के दिन हुआ है गंगावतरण।"

हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर
गेंदालाल शर्मा "निर्जन" ने
अपने काव्य पाठ से गोष्ठी में समा बाँध दिया।
गोष्ठी के मुख्यअतिथि
दिनेश चन्द्र गुप्त "रविकर"
ने अपने काव्य पाठ में कहा-
"तिलचट्टों ने तेलकुओं पर,
अपनी कुत्सित नजर गड़ाई।
रक्तकोष की पहरेदारी,
नरपिशाच के जिम्मे आई।"
इस अवसर पर "रविकर" जी ने
अपने वक्तव्य में कहा-
"मेरा किसी गोष्ठी में भाग लेने का
यह पहला अवसर है और
पहली बार ही मुझे सम्मान मिला है।
इसके लिए मैं साहित्य शारदा मंच के
अध्यक्ष डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री का
हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।"

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन का आंक़ड़ा कहता है कि 1997 के मुकाबले वर्ष, 2005 तक तंबाकू निषेध कानूनों के लागू करने के बाद वयस्कों में तंबाकू सेवन की दर में 21 से 30 प्रतिशत की कमी आई थी, लेकिन इसी दौरान हाईस्कूल जाने वाले 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में तंबाकू का सेवन 60 प्रतिशत ब़ढ़ गया था।
  • अमेरिकन कैंसर सोसायटी का आंक़ड़ा है कि प्रत्येक 10 तंबाकू उपयोगकर्ता में से 9 महज 18 वर्ष की उम्र से पहले तंबाकू का सेवन शुरू कर चुके होते हैं।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि सन 2050 तक 2.2 अरब लोग तंबाकू या तंबाकू उत्पादों का सेवन कर रहे होंगे। इस आकलन से अंदाजा लगाया जा सकता है कि तंबाकू के खिलाफ कानूनी और गैर सरकारी अभियानों की क्या गति है और उसका क्या हश्र है।
निखंड घाम में !
निखंड घाम में काम करता आदमी,
पसीने को भी तरसता है ,
बंद कमरों में बैठे भद्र जन
बाहर का तापमान नाप रहे हैं ||
प्रेम सरोवर द्वारा प्रेम सरोवर
* **बिहार की स्थापना का **100** वां वर्ष** : **क्या खोया,क्या पाया** !*

अजय कुमार झा द्वारा खबरों की खबर -
सुशील कुमार शिंदे भी हो सकते हैं राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ,
अबे कितने पति होंगे राष्ट्र के , तुम लोग तो देश को पांचाली बना दिए यार ,
(रोजिन्ना कोइयो उठ के चल आ रहा है , साले कौन बनेगा करोडपति खेल रहे हो का बे , हटाओ बे ई पोस्टवा को ही खतम कर दो )
hindigen


'मरी क्यों इंतनी खुश होती है?
अभी तुझे रो रहे थे
वो क्या कम था?
जो ये भी रुलाने आ गयी.'
बड़ी बड़ी आँखें फैला कर
वह मासूम बोली -
'क्यों दादी,
मैंने कब रुलाया?

स्वप्न सुन्दर वल्लभा

पलकों तले मेरे बसा एक स्वप्न था.
जिसमें थी सोती एक सुन्दर वल्लभा.
लावण्य की सारी निधि उस पर ही थी.
वह स्वयं थी लेटे हुए निधि द्वार पर.
पुष्प-शैया पुष्प-कण से थी विभूषित.
पुष्प-वृष्टि हो रही पलकों तले नित.

डीयू के नामी कॉलेज

दिल्ली विश्वविद्यालय की पहचान उसके कॉलेजों और विभागों से हैं। दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों में फैले इनके कुछ कॉलेजों का इतिहास जितना पुराना है, उतना विश्वविद्यालय का भी नहीं है। विश्वविद्यालय की स्थापना 90 साल पहले 1922 में हुई, पर जाकिर हुसैन, हिन्दू और स्टीफंस कॉलेज एक शिक्षण संस्थान के रूप में इससे पहले से अपनी पहचान कायम किए हुए हैं। 77 कॉलेजों में स्नातक स्तर के विभिन्न कोर्सेज छात्रों में करियर की मजबूत नींव तैयार करते हैं। ऐसे में जरूरत है उन कॉलेजों को जानने की, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के आधार स्तम्भ रहे हैं।

उपालम्भों से आती है हर रिश्ते में खटास
शिकवे नहीं रख पाते मन में मिठास टूट जाए जब एक बार विश्वास
कैसे करे कोई फिर प्रेम की आस ?
होता है हर...

कृतज्ञ

ओ चारो दिशाओँ ,
द्वार सारे खोल कर रक्खे तुम्हीं ने ,
यात्रा में क्या पता
किस ठौर जा पाएँ ठिकाना.
शीष पर छाये खुले आकाश ,
उजियाला लुटाते ,
धन्यता लो !

अंधेरे चश्‍में

आंखों पर
लगा अँधेरे चश्‍में
तलाशते हैं रोशनी।
गुजरते हैं
पकड़ अंगुली गुनाह के
तंग रास्‍तों से,
करते हैं दोस्‍ती
पहन कर खद्दर
एैयाशी के गुमाश्‍तों से,
बेशुमार शिकायतों को सीने में दबाए
नफ़ीस मुस्कान को मैंने गले लगाया है ।
अपनी हज़रत को नज़र ना लग जाए
हर झरोखे पे मैंने पर्दा चढ़ाया है ।

बहारें टिकी हैं मौसम के मिज़ाज पे
मेरे बहार का ठौर मैंने तुममे पाया है ।
तुम्हारे दो पल के साथ की आरज़ू में
कितनी रातें मैंने आँखों में बिताया है ।

"रविकर की जलेबियाँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


चर्चा मंच सजा रहे, जो होकर अनुरक्त।
ब्लॉगिस्तान बना हुआ, रविकर जी का भक्त।१।
रविकर मिलने आये हैं, उनका है अनुराग।
पावन मम् कुटिया हुई, धन्य हमारे भाग।२।

कविवर मित्र दिनेश का, मिला मुझे है साथ।
रविकर के सिर पर सदा, रवि का मंजुल हाथ।३।

टिप्पणियों में कुण्डली, रच देते तत्काल।
जिससे रचनाकार का, होता हृदय निहाल।४।

असमंजस में हूँ पड़ा, कैसे दूँ सम्मान।
पुष्प-पत्र से आपका, मैं करता हूँ मान।५।
सरिता से साहित्य की, बहती अविरल धार।
कल्याणी माँ शारदे, मन के हरो विकार।६।
मंच आपको दे रहा, प्रेम-प्रीत-उपहार।
जल के छोटे बिन्दु को, करना अंगीकार।७।
नैनो में होकर चले, रविकर साथ सवार।
नानकमत्ता को चले, नानक के दरबार।८।

कूप देखकर दूध का, मन में हर्ष अपार।
नानक जी ने कर दिया, सिख का बेड़ा पार।९।

नानकमत्ता का यही, गुरद्वारा विख्यात।
उड़ते पीपल को यहाँ, दिया गुरू ने हाथ।१०।

सुबह-सुबह ही चल पड़े, वनखण्डी के द्वार।
नयी-नवेली कार में, होकर चले सवार।१२।
शिवजी के दरबार में, भक्तों की थी भीड़।
पुन्नागिरि को जा रहे, हरने अपनी पीड़।१३।
वापिस अब चलने लगे, शिवप्रसाद को पाय।
वनखण्डी के द्वार का, घण्टा दिया बजाय।१४।
आकर के तलने लगे, जलेबियों के चक्र।
कुछ तो थी सीधी-सरल, कुछ दिखती थीं वक्र।१५।