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गुरुवार, दिसंबर 13, 2012

12.12.12 बीत गया ( चर्चा - 1092 )

आज की चर्चा में आपका स्वागत है 
अनोखी तारीख बीत गई है, अब ऐसी तारीख अगली सदी में ही दिखेगी और हममें से शायद काफी उस नजारे को नहीं देख पाएंगे ।

12.12.12 के चक्कर में राष्ट्रकवि की पुण्यतिथि तो नहीं भूले ? 

इस अनोखे क्षण के साथ ही दुखद समाचार कि भारत रत्न पंडित रविशंकर जी नहीं रहे 
अब चलते हैं नियमित चर्चा की ओर 

चलो इस बात की भी बधाई दे दी जाए----

यहाँ भी हैं शुभकामनाएँ 
My Photo
बारह होती राशियाँ , बारह संख्या खास

अवलोकन 2012

नया वर्ष पूरी करे अभिलाषाएँ 
निरामिष
मीजोफोनिया - लक्षण और इलाज 

प्रतिबन्ध ही प्रतिबन्ध 
मेरा फोटो
 भूख से विह्वल ‘उस’ लड़की के हिमायती रोटी-दानवीरों को सम्बोधित! 

बूमरैंग और चाहतें 

सर्द रात की बरसात 

क्यूं मनडे नैं मारो हो 

खट्टी-मीठी, भूली बिसरी यादें 

यादों के घेरे 
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कौन है सूने हृदय में 
My Photo
लड़ते हैं, झगड़ते हैं मगर प्यार देखिये

बित्ते भर की गलतफहमी मीलों फासिला हो गया
मेरा फोटो
मेरी ख़ामोशी उन्हें अब तो सजा लगती है....
STITCH background
मेरा फोटो
रोटी पुराण 

सिलसिला 

वेकेंसियाँ 

"बेरहम संसार" 


मानवाधिकार
कोई नही सुनता पुकार
आयोग है
राजनीति का शिकार
कहने पर प्रतिबन्ध
सुनने पर प्रतिबन्ध

..
आज के लिए बस इतना ही 
धन्यवाद 
दिलबाग विर्क 
****************
कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

बुधवार, दिसंबर 12, 2012

अजब गज़ब संयोग (12-12-12)-1091


आप सबका हार्दिक स्वागत है | आज के इस खास दिन (12-12-12) को मुझे चर्चा लगाने का मौका मिला | इस दिन को यादगार बनाने ने के लिए न जाने कितने लोगों ने अपने होने वाले बच्चे के लिए शल्य प्रक्रिया द्वारा आज का दिन सुनिश्चित करवा रखा है तो कितने ही लोग आज के ही दिन शादी कर रहे हैं और भी न जाने क्या-क्या कर रहे हैं |

बारह, बारह, बारह का, अजब गज़ब संयोग |
यादगार सबके लिए, न हो कोई वियोग ||

अब शुरू करते हैं आज की चर्चा:-
थानेदार कवि
- gajendra singh
@ लाडनूं अंचल
अरे डॉक्टर यह दिल है मेरा
- RAJIV CHATURVEDI
@ Impleadment
माँ- Akash Mishra
@ || आकाश के उस पार ||

माँ जीवन की नैया है,
माँ जीवन का सार |
माँ की महत्ता जीवन में,
जैसे अपरमपार ||
क्षितिज के पार
(डॉ. माधवी सिंह)
- yashoda agrawal
@ मेरी धरोहर

मन की सीमा नहीं कोई,
वह तो है अनंत |
सुख-दुख भाग हैं चक्र के,
जिसका आदि न अंत ||
हेमन्त ऋतु के दोहे
@ अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)


कार्तिक अगहन पूस ले, आता जब हेमन्त
मन की चाहत सोचती, बनूँ निराला पन्त |

शाल गुलाबी ओढ़ कर, शरद बने हेमंत |
शकुन्तला को ढूँढता , है मन का दुष्यन्त |

कोहरा रोके रास्ता , ओस चूमती देह
लिपट-चिपट शीतल पवन,जतलाती है नेह |

ऊन बेचता हर गली , जलता हुआ अलाव
पवन अगहनी मांगती , औने - पौने भाव |
श्याम मधुशाला
- डा. श्याम गुप्त
@ एक ब्लॉग सबका

देशी हो या हो विदेशी,
दारू तो है एक जहर |
जन-जीवन ये बिखर है जाता,
साँसे जाती हैं ठहर ||
लक्ष्य पर नजर रखे
- bhuneshwari malot
@ भारतीय नारी

मेहनत और लगन से ही,
होता मंजिल हासिल |
जो सागर से डर रह जाते,
उनका अंत है साहिल ||
"झूले कैसे पड़ें बाग में?"
- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’



आँगन के सब नीम कट गये,
पेड़ आम के जले आग में।
नस्ल विदेशी उगा रहे सब,
झूले कैसे पड़ें बाग में?
बात-बात में झगड़ा-दंगा,

हुआ आदमी कितना नंगा,
समता-ममता रूठ गई है,
धुला न मन का द्वेष फाग में।
नस्ल विदेशी उगा रहे सब,
झूले कैसे पड़ें बाग में?...
दर्द का रिश्ता
- Maheshwari kaneri
@ अभिव्यंजना


बेटी एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही बहुत से अहसास मन में
उभरने लगते हैं । कुछ दर्द कुछ ममता कुछ चिन्ता कुछ डर कुछ गर्व….अगर बेटी शादीशुदा है और ससुराल में है,चाहे कितनी भी सुखी और संपन्न क्यों न हो ,फिर भी माँ की ममता का छोर भीगा ही रहता है।
Jhootha Mukadma
- madhu singh
@ Benakab


बन मुकदमा एक झूठा खुद जिन्दगी से लड़ती रही
खुद बनी अपना वकील ख़ुद से ज़िरह करती रही


ख़ुद बनी मुज़रिम इल्जाम ख़ुद पर ही लगाती रही
बेडियाँ पावों में डाले अपने, ख़ुद को तलब करती रही
सह न पाई
- Asha Saxena
@ Akanksha


देख बदहाली उसकी ,मन को लागी ठेस |
प्यारा था पहले कितना ,लोक लुभावन वेश ||

साथ समय के बदल गया ,रूप रंग वह तेज |
शरीर ढांचा रह गया ,चेहरा हुआ निस्तेज ||
दार्शनिक साँझ
- कविता विकास

@ काव्य वाटिका


क्षितिज पर ढलता सूरज
गुलाबी आसमां
नारंगी ,मटमैली किरणें
क्षीण सी ,निस्तेज
धूमिल दिशाएँ
कैसी सुन्दर साँझ ।
।। सम्मान या अभिमान ।।
- Neetu Singhal
@ NEET-NEET

उत्कृष्ट प्रतिभावान को दिया गया पुरस्कार-सम्मान न केवल प्रतिभा
को अपितु सम्मान के नाम को भी उत्कृष्ट करता है..,
इस देश की मिट्टी पोली है
- उदय वीर सिंह
@ उन्नयन

इस देश की मिट्टी पोली है
हर पौध उगाया करती है -
जन्म -मरण,उत्थान -पतन,
हर रश्म निभाया करती है -
ये पहरुवे हैं हमारे पर्यावरण के
- Virendra Kumar Sharma
@ ram ram bhai

सन्देश परक लघु कथा है .ऐसी कथा आप बा -कायदा लिख सकतें हैं बस थोड़ी सी शैली बदल दें .मसलन -वह पेड़ रास्ते को छाया देता था पक्षियों को आश्रय .घनी थी उसकी शाखाएं ,कोटर .कोटर में थे
पाइरेट होना फ़ि‍ल्‍म 'दीवार' का
@ काजल कुमार के कार्टून
आज की चर्चा यही पे समाप्त करता हूँ | 
अब प्रदीप को आज्ञा दीजिये | मिलते हैं अगले बुधवार कुछ अन्य लिंक्स के साथ |

आभार |

मंगलवार, दिसंबर 11, 2012

चलिये चर्चा धर्म निभाया जाये

चलिये चर्चा धर्म निभाया जाये कुछ लिंक्स का आनन्द लिया जाये
आज फिर मुझे मौका मिला है चर्चा लगाने का तो लीजिये आनन्द




फिर हो मिलन मधुमास में 


 जो तुम आ जाओ प्रिये ………



नाम की महिमा

बस इसी का तो सारे जगत में गुणगान है

 

 

प्रथम स्वेटर

कब बुना और कौन सा ?

 

 

जहाँ उसूल दांव पर लगे वहां उठा धनुष



उठाना ही पडेगा आखिर कब तक सहोगे?




"मानवाधिकार दिवस"--इस रस्म की भस्म आज जगह -जगह गोष्ठी -सैमीनार में चाटी जायेगी ...


 हाँ एक दिन सबके लिये सुरक्षित रखना जरूरी है 



लिखने की सार्थकता समीक्षा में है


इसमें क्या शक है 



काटजू, भारतीय और गणित

सबका अपना अपना गणित 

 

सावित्री-3

एक युगचरित्र


चुनिए अपनी पसंद के २० सर्वश्रेष्ठ गीत वर्ष २०१२ के

जरूर कोशिश करेंगे 



मधुशाला .... भाग --10 / हरिवंश राय बच्चन


निशब्द हूँ 



वाह रे कंप्यूटर !

तेरे क्या कहने !!!!!!


किधर जा रहें हैं .............क्या खो रहें हैं हम ..............

यही तो पता नहीं …………



एक पोस्ट ख़ास चिट्ठा चर्चा ब्लॉगों के लिए

ये भी ध्यान देना जरूरी है 



जब इश्क ही मेरा मज़हब बना ………

अब और क्या बचा ?

 

 

क्या आज पता चला ?

 

 

उम्र यूँ ही तमाम हो गयी

 

 

विश्व मानवाधिकार दिवस !

बस नाम के लिये है 

 

 

 पाणिग्रहण संस्कार से तनिक आगे

 

  इसी जज़्बे की जरूरत है 



शादी की सालगिरह : जो कहूंगा सच कहूंगा

  बहुत बहुत बधाइयाँ जी :)



आज की चर्चा को यहीं विराम देती हूँ और शनिवार को फिर मिलती हूँ ।

सोमवार, दिसंबर 10, 2012

"कुहासों ने घूंघट उतारा नही है" (चरचा मंच-1089)

मित्रों!
      आज की चर्चा आदरणीय "ग़ाफ़िल सर को लगानी थी! शायद नेट या बिजली की उपलब्धता नहीं रही होगी। इसलिए आपके अलोकनार्थ बहुत शीघ्रता से सोमवार की चर्चा लगा रहा हूँ। सादर!
--      

       2013 मे भारत....2013 मे भारत –वर्ष 2013 मे भारत सूर्य मे शनि व सूर्य मे बुध दशा के प्रभाव मे रहेगा सूर्य,शनि व बुध सभी भारत की कुंडली के तीसरे भाव मे स्थित हैं सूर्य चतुर्थेश होकर स्वयं से द्वादश यानि तीसरे भाव मे हैं जो देश से बाहर अधिक सफलता दर्शा रहे हैं (विभिन्न मुद्दो,मसलो व खेलो मे भारत व भारत वासी विदेशो मे इस पूरी दशा मे बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और करेंगे )शनि नवमेश- दशमेश होकर अस्त अवस्था मे स्वयं से षष्ठ व सप्तम स्थित हैं जो कार्यो मे प्रतियोगिता द्वारा सफलता एवं विदेश संबंधी व्यापार से लाभ दर्शा रहा हैं (सरकार एफ डी आइ लागू कर ही चुकी हैं अभी ऐसे और भी विदेश व्यापार संबंधी विधेयक...बस यूँ ही....*बहोत कुछ जो दिल के बहोत करीब रहा,* *मुठ्ठी से रेत की तरह बस यूँ ही रिसता रहा,* * * *कदम बढ़ते रहे, कभी तेज़, कभी भारी,* *ज़ख्म कभी भरता रहा, कभी रिसता रहा * * *ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !... मेरे ठाकुर ! मेरे राम ! कित छिपे हो घनश्याम , मन तडपे हैं पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम केसी हैं विपदा ये तुम ही जानो श्याम ओ मन बसिया , श्वासों के मालिक घड़ी हैं कैसी अजीब बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी ! ओ मेरे राम ! श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ.....हमारे तुम्हारे दरमियाँ एक दूरी थी,,,,मकसद बड़ा था मगर कद छोटा था हमारा उस दूरी को न नाप पाने की मजबूरी थी हमें मिलने से रोक सकता था ज़माना कुछ ख्वाहिशें थीं पर बीच में गुरूरों की खाई गहरी थी पर घुल -घुल कर हम हवाओं में घुल चुके थे प्यार की खुशबू हर खाई खलिश की लांघ जाती है उस और से आती हवा मेरे आँचल पे ठहरी थी .....फिर से कोई नेहरू और कोई मोहम्मद अली जिन्ना पैदा हो जाएगा......भारत पाक एकीकरण -नहीं कभी नहीं,,,,''भारत पाक का एकीकरण कश्मीर समस्या का एकमात्र हल -एम्.काटजू '' सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश से ऐसी बयानबाजी की उम्मीद शायद नहीं की जा सकती किन्तु ये शब्द सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के ही हैं जो उन्होंने दक्षिण एशिया मीडिया आयोग के भारतीय चैप्टर की ओर से आयोजित संगोष्ठी के संबोधन में कहे . भारत पाक का विभाजन ब्रिटिश हुकूमत की ''बाँटो और राज करो ''की नीति के तहत हुआ किन्तु कश्मीर राज्य कोई समस्या था ही नहीं इसे समस्या बनाया पाकिस्तान ने .कश्मीर के महाराजा हरीसिंह की तटस्थ नीति की अवहेलना करते हुए पाकिस्तान का कश्मीर को.......''दोस्त आपकी ही हूँ ''* * *मुस्कुराने को कहूँ तो मुस्कुरा भी दीजिये ;* *हाल जो पूछूं तुम्हारा ;गम सुना भी दीजिये ,* *मैं नहीं उनमें से कोई ;* *आये और आकर चल दिए ,* *मैं जो आऊं घर तुम्हारे * *ठहराने की जहमत कीजिये....!

      रूप संवारा नहीं,,,कुहासों ने घूंघट उतारा नही है, अभी मेरे प्रियतम का इशारा नहीं है! किरणों का रथ लगता थम गया, सूरज ने अभी पूरब निहारा नही है! चारो दिशाओं में धुंधलके है फैले, पूनम के चाँद को गंवारा नहीं है.........मुझे वह मूल्य चाहिए....जो मैंने चुकाया है, तुम्हारे ज्ञान प्राप्ति हेतु, हे! अमिताभ; मुझे वह मूल्य चाहिए! क्या पर्याप्त नहीं थे वो चौदह वर्ष! कि पुनः त्याग दिया सपुत्र! तुम तो मर्यादा पुरुष थे हे पुरुषोत्तम ! मुझे वह मूल्य चाहिए! और हे जगपालक ! मेरा पतिव्रता होना भी बन गया अभिशाप! और देव कल्याण हेतु; भंग कर दिए स्व निर्मित नियम ! हे जगतपति ! मुझे वह मूल्य चाहिए.....

दिल ना जाने कितनी बार टूटा है..... तुम हमसे मोहब्बत का मतलब पूछ रहे हो हसरतों की उम्मीद में रोता रहा है तुम हमसे मंजिल का पता पूछ रहे हो आइना भी अब हमें पहचानता नहीं तुम हमारे घर का पता पूछ रहे हो तन्हाई अब हमारा घर कब्रिस्तान हमारी मंजिल तुम हमसे जीने का मकसद पूछ रहे हो.....मेरे सब सपने उसमे ही रहते हैं...माना कि शब्दों का दामन छूटा है, माना अल्फाजों का धागा टूटा है. माना कुछ पल बीत गए बिन छंदों के, माना नाम नहीं लिखे खग वृन्दों के. लेकिन यह न सोचो सच कुछ बदला है, रिश्तों का वो आसमान अब धुंधला है. कुछ कोहरे मौसम के छाये हैं तो क्या! कुछ पल गीत नहीं गा पाए हैं तो क्या! यादों की बरसात कहाँ कब थमती है? वो प्यारी सी बात कहाँ कब थमती है?.....नब्वे फीसद भरतवासी बेवकूफ....*वित खुले बाजार की जय जय कार फिर भी कारोबारी माहौल से निराश रतन टाटा तो काटजू को नब्वे फीसद भरतवासी बेवकूफ नजर आते है!* आर्थिक सुधारों पर राजनीति का असर नहीं होता क्योकि राजनीति और खुला बाजार दोनों बहिष्कार और अस्पश्यता के सिद्दांतों पर ​​आधारित है। संसदीय हरी झंडी मिलकर निवेशक बल्ले बल्ले हैं और कारपोरेट हित में तमाम कानून बदल दिये जा रहे हैं। फिरभी रतन ​​टाटा हताश हैं, तो इसका खास तात्पर्य होना चाहिए। दूसरी ओर,जस्टिस काटजू राजनीति के राम जेठमलानी की तरह सनसनीखेज​ ​ बयानबाजी के पारंगत होते जा रहे हैं। उनके ताजा बयान पर बवाल होना तय है। दोनों खबरों को मिलाकर देखा जाये तो ....सच का मुंह स्वर्ण से ढंका हुआ है.....पटना प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्मोत्सव जनता को अपने नायक और खलनायक के पहचान का विवेक देता है प्रतिरोध का सिनेमा: प्रणय कृष्ण चौथा प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्मोत्सव 7 से 9 दिसंबर तक आयोजित हुआ। जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने इस फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए काफी सुचिंतित और प्रभावशाली वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि इषोपनिषद् में कहा गया है कि सच का मुंह स्वर्ण से ढंका हुआ है। आज भी साम्राज्यवाद और पूंजी की सत्ता तथा उसके दलाल शासक वर्ग ने सच को स्वर्ण से ढंक रखा है.....बचपन को बचपन रहने दो.....मत छीनो बच्चों का बचपन, बचपन को बचपन रहने दो. मत बोझ बढ़ाओ बस्तों का, बच्चों का बचपन रहने दो. बढ़ गया है बोझ किताबों का, भागे पीछे न तितली के. पेड़ों पर कभी न झूला झूले, न चखे स्वाद हैं इमली के. हो गए प्रकृति से दूर बहुत, कार्टून जगत में रहें मस्त. अनजान हैं छुपा छुपाई से, विडियो गेमों में रहें मस्त. अनजान हैं उगते सूरज से......माँ तो माँ है ...मैंने देखा तुम मुस्कुरा रही हो देख रही हो हर वो रस्म जो तुम्हारी सांसों के जाने के साथ ही शुरू हो गयी थी समझ तो तुम भी गयीं थीं अब ज्यादा देर तुम्हें इस घर में नहीं टिका सकेंगे हम अंतिम संस्कार के बहाने बरसों से जुड़ा ये नाता कुछ पल से ज्यादा नहीं सहा जाएगा कुछ देर तक दूर से आने वालों का इंतज़ार अंतिम दर्शन फिर चार कन्धों की सवारी समय के बंधन में बंधे सौंप आएंगे तुझे अग्नि के हवाले तेरे शरीर के पूर्णत: चले जाने का इंतज़ार भी न कर सकेंगे जिंदगी लौट आएगी धीरे धीरे पुरानी रफ़्तार पे मुझे पता है तुम तब भी मुस्कुरा रही होगी ...फेर लेते हैं नज़र जिस वक़्त बेटे और बहू......!

         वालमार्ट के पास है दो ही विकल्प , रुकेगा या लूटेगा......इतिहास गवाह है भारत में जितने भी विदेशी आये है उनके पास केवल दो ही विकल्प थे : उन्होंने या देश को लूटा है या फिर यही पर बस गए है ! मुग़ल शासको ने देश में आक्रमण किया लेकिन उनकी नीति देश को लुटाने की कभी नहीं थी, उन्होंने यही बसकर अपने परिवार के साथ जीवन यापन किया ! लेकिन वाही यदि हम अंग्रेजो के शाशन काल में नजर डाले तो विपरीत था , उन्होंने देश में आना इसलिए उचित समझा क्योंकि हम सोने की चिड़िया थे और हमें खोखल करना उनका लक्ष्य था जो उन्होंने किया और बाद में किसी अंग्रेज शासक ने ये भी लिख दिया की हम तो मुठ्ठी भर लोग आये थे भारत से एक् पत्थर ही कफी था हमें भागने के लिए, लेकिन अब .......पुराने रिश्ते -पुराने लोग.....पता नहीं ये योग है या संयोग -- आज प्रो. सरोजकुमार जी के यहाँ जाना हुआ माँ को लेकर( कल वादा जो कर लिया था)...फ़िर वे और माँ बीते दिन याद करते रहे ,और मैं सुनती रही........याद करते-करते बताया कि केमेस्ट्री पढ़ने आते थे पिताजी के पास ......तभी उन्होंने माँ से पूछा मिसेस देसाई से कभी बात हुई या नहीं आपकी ? एक ही आँगन था आपका...माँ ने बताया कि एक बार हुई करीब २०-२२ साल पहले ..और अचानक उन्होंने मिसेस देसाई को फोन लगाया और उनसे कहा मेरे यहाँ कौन आया है ,पता है?आपकी पडोसी...फ़िर माँ से बात करवाई ,उन्होंने फोन नम्बर देने को कहा और माँ ने फोन मुझे पकड़ा दिया...मैंने नमस्कार कहा और वे बोली ......यादों की महकती शाम ………अनुगूँज की गूँज बहुत देर तक सुनाई देती रहेगी ………सबने मिलना जो था फ़र्गुदिया के कार्यक्रम अनुगूँज मे अनामिका जी, वन्दना ग्रोवर, मुकेश मानस, अंजू शर्मा, असद ज़ैदी, अरुण कुमार शुक्ल, डाक्टर सुनीता कविता जी का कविता पाठ था जिसमें हम सबने शिरकत की और एक खुशनुमा शाम का आनन्द उठाया सरिता दास के साथ संजू तनेजा अपने स्टाइल में :) राजीव तनेजा जी कार्यक्रम की संचालिका और आयोजन कर्ता शोभा मिश्रा जी के साथ संचालिका के पद को गरिमा देती शोभा जी का संचालन बेहद खूबसूरत रहा वन्दना ग्रोवर जी का कविता पाठ शाम को महका गया क्षणिकाओं से शुरु होकर हास्य से भी मिलवा गया पंजाबी कुडी ने रंग खू्ब जमा ...अवैध चुनावी चन्दा ही भ्रष्टाचार की असल जड़ है.....राजनितिक पार्टियों को चंदे के रूप में मिलने वाला धन ही भ्रष्टाचार कि असल वजह है ! आज देश में तेरह सौ बावन पार्टियां चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत हैं और खुद चुनाव आयोग भी यह मानता है कि इनमें से कई पार्टियां तो केवल टेक्स छूट लेने-देने और कालेधन के इस्तेमाल के लिए ही बनी हुयी है ! लेकिन चुनाव आयोग के सिमित अधिकार उन पार्टियों के लिए रक्षा कवच बने हुए हैं ! किसी जमाने में देश की सबसे बड़ी पार्टी के कोषाध्यक्ष के बारे में यह कहावत चलती थी “न खाता न बही,जो केसरी कहें वही सही” अब यह बीमारी केवल एक ही पार्टी में नहीं है ! आज ज्यादातर पार्टियां अपने राजनैतिक खजाने का सच बताने से बचती नजर आती ... * शब्दों के तो अर्थ खो गए*...... इंद्र धनुष का रंग उड़ गया , भाव सभी जल दुराचार हो गए शब्दों के तो खाल नुच गए ,रिश्ते खुद में ही व्यभिचार हो गए खो गया अर्थ भाई का अब , अब भाई ? ड्रामे के किरदार हो गए है पता आज इसका सबको , भाई ही जिश्म के दावेदार हो गए कहते तो हैं वो पिता तुल्य है, पिता शब्द निर्वसन हो गए शब्द फिर रहे अर्थ खोजते रिश्ते सब खुद ही व्यापार हो गए.....किसने लिखे सबसे ज़्यादा कमेंट?
          जलाओ मशाल कि... रौशनी हो,* *अभिशप्त प्रलेखों को फूंकने का* *हौसला रखो ....।* * **जलती मशाल में तेल कितना है ,* *कम पड़े तो देह की चर्बी जलाने का,* *फैसला रखो .....। * * **हर तूफान से गुजरने का आता है हुनर,* *तूफान रचने वालों से, तूफान का * *रास्ता पूछो .....।* * **करवटें बदल लेने से ,रात ख़तम नहीं होती* *चैन की नींद आये काँटों पर,* *जूनून से वास्ता रखो ..पिछले हफ़्ते इक रात गुरु वृहस्पति यानि Jupiter मिलने आए थे हम सबसे !
*हौसला रख कर कदम आगे धरो।*** *फासले इतने तो मत पैदा करो।।*** *चाँद तारों से भरी इस रात में**,*** *मत अमावस से भरी बातें करो....!
         अन्त में कुछ कार्टून.....!
आज के लिए बस इतना ही....L

रविवार, दिसंबर 09, 2012

“आइये, कुछ बातें करें!” (चर्चा मंच-१०८८)

मित्रों!
सभी पाठकों और ब्लॉगरों को “मयंक” शास्त्री का नमस्कार! प्रस्तुत हैं रविवार के लिए कुछ रचनाधर्मियों की पोस्टों के लिंक!
एफ डी आई लागू करने में बुराई नहीं
मित्रों मेरा स्‍पष्‍ट मानना रहा है कि खुदरा व्‍यापार में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश राष्‍ट्र के लिए विनाशकारी है, मेरी ऐसी धारणा के अनेकानेक कारण रहे हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख निम्‍न प्रकार से हैं, 1. मेरी सबसे बड़ी आशंका यह है कि बड़े विदेशी व्‍यापारी आकर हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को तहस नहस कर सकते हैं, इसका कारण यह कि 51 फीसदी विदेशी निवेश के कारण आधिपत्‍य विदेशी कम्‍पनियों का ही रहेगा, जाहिर है *विदेशी कम्‍पनियां यहां जनकल्‍याण हेतु नहीं वरन मुनाफाखोरी के लिए ही आ रही हैं…
लिखने को बेकरार
*-* लिखने को बेकरात लेखनी रुक न पाएगी पुरवैया के झोंकों सी बढती जाएगी सर्द हवा के झोंकों का अहसास कराएगी जब कभी गर्मीं होगी प्रभाव तो होगा मौसम के परिवर्तन की अनुभूति भी होगी बारिश की बूंदाबांदी कभी भूल न पाएगी वे सारे अनुभव उन बूंदों के स्पर्श को सब तक पहुंचाएगी | यहाँ वहाँ जो हो रहा छुंअन उसकी महसूस होगी प्रलोभन भी होगा पर वह बिकाऊ नहीं है बिक न पाएगी | अपने निष्पक्ष विचारों का बोध कराएगी यही है धर्म उसका जिस पर है गर्व उसे वह है स्वतंत्र अपना धर्म निभाएगी | आशा
(क) ..सत्ता जीती संसद हारी ,
ऍफ़ डी आई के मुद्दे पर लोकसभा में जो कुछ भी हुआ ,तथा 'सपा 'और 'बसपा 'ने जो कुछ किया उस पर टिपण्णी करने की तो देश को कोई ज़रुरत नहीं है ,पर जो कुछ इस देश ने महसूस किया है उस पर विचारक कवि डॉ .वागीश मेहता की ये पंक्तियाँ पठनीय हैं : सत्ता जीती संसद हारी , हारा जनमत सारा है , चार उचक्के दगाबाज़ दो , मिलकर खेल बिगाड़ा है . प्रस्तुति :वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा )

(ख)...सेहतनामा

अमरीकियों की लार्ज पोर्शन खाने की आदत उन्हें मोटापे की और ले जा रही है अब धीरे धीरे स्माल पोषण की और आ रहे हैं .प्लेट का साइज़ भी छोटा किया जा रहा है .मिशिगन अमरीका मोटापे की राजधानी हैं . अब पता चला है लार्ज पोर्शन कम खाने की आदत डालने से निरंतर ऐसा ही करते जाने से खून में घुली चर्बी का स्तर कम हो जाता है .खासकर महिलाओं के मामले में यह मोटापे को और बढ़ने से रोकने में कारगर रहा है .इसी के साथ इनके लिए दिल की बीमारियों की ज़द में आने के खतरे का वजन भी कम होता जाता है . 

-तुमने स्वीकारा अपना प्रेम
और छोड दिया एक प्रश्न मेरी तरफ़ …
मेरी स्वीकार्यता मेरे जवाब का इंतज़ार
तुम्हारे लिये शेष रहा ……
BIKANER- Desnok Karni Mata's Rats Temple बीकानेर- दशनोक करणी माता का चूहे वाला मन्दिर

रामदेवरा बाबा के यहाँ से जब चले तो शाम का समय हो रहा था। उस समय बीकानेर के लिये कैसी भी मतलब सवारी गाड़ी या तेजगति वाली एक्सप्रेस गाडी भी नहीं मिलने वाली थी। इस कारण हमने बीकानेर जाने के लिये बस से आगे की यात्रा करने की ठान ली। वहाँ से बीकानेर १५० किमी से ज्यादा दूरी पर है। यहाँ आते समय जिस बस अड़डे पर उतरे थे हम वहीं पहुँच गये, वहाँ जाकर मालूम हुआ कि इस समय यहाँ से बीकानेर की बस मिलनी मुश्किल है अगर आपको बीकानेर जाने वाली बस पकड़नी है तो आपको लगभग एक किमी आगे हाईवे पर जाना होगा। हाईवे से होकर जानेवाली बसे जैसलमेर/पोखरण से सीधी बीकानेर चली जाती है। हम सीधे पैदल ही हाई-वे पहुँच गये...
सात ताल , उत्तराखंड का सफर
yatra (यात्रा ) मुसाफिर हूं ..............


अब नम्बर था सातताल का क्योंकि मुझे केवल सवा घंटा हुआ था और मै भीमताल और नौकुचियाताल दोनो जगह देख चुका था । 
मैं वापस भीमताल पहुचा और वहां पर एक आदमी से रास्ता पूछा सातताल का 
उसने बताया कि यहां से भुवाली वाले रास्ते पर चलते रहो आगे जाकर एक तिराहा आयेगा जिससे थोडा आगे चलते ही तुम्हे बोर्ड लिखा मिल जायेगा । 
मैने यही किया और यहां पर आगे चलकर एक तिराहा आया 
और उससे थोडा लगभग दो या तीन किलोमीटर चलकर ही रास्ता कट रहा था सातताल के लिये..
घुघूतीबासूती
आदमियों की सम्भाल
पति को अकेले छोड़ बिटिया के पास जाना है उससे पहले कामवाली को उनके योग्य खाना बनाना सिखाना है लो सोडिअम, लो फैट, लो ग्लाइसिमिक इन्डैक्स, लो कार्बोहाइड्रेट के...

रूप-अरूप

दि‍संबर के दि‍न...बस वे दि‍न सर्दियों के दि‍न....कोहरे-कुहासों के दि‍न...गुनगुनी धूप की गर्माहट लि‍ए गुजरे यादों के दि‍न...वे दि‍न...बस वे दि‍न...
" जीवन की आपाधापी "
हाँ .. हाँ ... हाँ .... मैं भ्रष्टाचारी हूँ ( व्यंग्य ) ........>>> संजय कुमार
जब देखो , जहाँ देखो , जिसे देखो आज मेरे पीछे हाँथ धोकर नहीं बल्कि नहा -धोकर पीछे पड़ा है ! कहीं मेरे खिलाफ जुलुस निकाले जाते हैं तो कहीं नारे लगाये जाते हैं...

न दैन्यं न पलायनम्

मन है, तनिक ठहर लूँ - मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ । बैठ मिटाऊँ क्लेश, रहा जो शेष, सहजता भर लूँ ।। देखो तो दिनभर, दिनकर संग दौड़ रही, यश प्रचण्ड बन...
अजित गुप्ता का कोना
राजा के दरबारियों की वर्दी 
एक युवा किसान था, अपने गाँव में खेती करता था और अपने माता-पिता के साथ प्रसन्‍नतापूर्वक रह रहा था। एक बार गाँव में राजा आए, उनके साथ उनका पूरा लाव-लश्‍कर ..

खामोश दिल की सुगबुगाहट...shekhar suman...

ये सर्दियां और तुम्हारे प्यार की मखमली सी चादर... -आज मौसम ने फिर करवट ली है, ज़रा सी बारिश होते ही हवाओं में ठण्ड कैसे घुल-मिल जाती है न, ठीक वैसे ही जैसे तुम मेरी ज़िन्दगी के द्रव्य में घुल-मिल गयी हो......
An Indian in Pittsburgh - पिट्सबर्ग में एक भारतीय *

कितना पैसा कितना काम - आलेख -
*(अनुराग शर्मा)* वेतन निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है। भारत में एक सरकारी बैंक की नौकरी के समय उच्चाधिकारियों द्वारा जो एक बात बारम्बार याद दिलाई जाती थी...
ब्लॉग"दीप"

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इस ब्लॉग में संकलन के लिए मैंने ब्लोग्स को विभिन्न श्रेणियों में बांटा है । 
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मास्टर्स टेक टिप्स

WinRar फुल वर्जन सोफ्टवेयर डाऊनलोड करें 
शीर्षक : उम्मीदों को छोड़ो -  हकीकत को मानो ।
पथ को पहचानो।
उस पथ पर चलाना सीखो ।
खुद की उमीदो को छोड़ो ।
बात मानो तो , खुद को पहचानो…
Tech Prévue · तकनीक दृष्टा
Google Adsense Approval के बारे में आवश्यक बातें -RequirementsGoogle Adsense मुफ़्त है, यह आनलाइन आमदनी का एक सरल तरीक़ा है


फैंसी एनीमेटिड बटन अपने ब्लॉग पर कैसे स्थापित करें ]आज की पोस्ट में पेश है कूल फैंसी ऐनीमेटिड .
सैमसंग ने भारत में जारी की विण्डोज़ ८ टचस्क्रीन अल्ट्राबुक – सीरीज ५ अल्ट्रा टच -
एटिव स्मार्ट पीसी तथा स्मार्ट पीसी प्रो के साथ सैमसंग ने भारत में सीरीज ५ अल्ट्रा टच नामक विण्डोज़ ८ अल्ट्राबुक भी लॉञ्च की है….।
म्हारा हरियाणा

तलाश ...इस मन की -आज दिन में आमिर खान ,रानी मुखर्जी और करींना कपूर खान अभिनीत तलाश फिल्म देखी ,फिल्म अच्छी थी ,धीमी गति से चलती हुई सी 
वटवृक्ष

शूर्पणखा:एक शोध!(हास्य रस)- पक्ष मौन का भी पक्ष शोर का भी पक्ष आतंक का भी ..... शोध उर्मिला,मानवी है तो शूर्पनखा भी !!!
बोलता सन्नाटा
अमर प्रेम
 सूरज अब तू अपने घर जा साँझ लगी ढलने मैं भी धीरे-धीरे पहँुचँू घर आँगन अपने। सुबह सवेरे फिर आ जाना उसी ठिकाने पर पंक्षी जब नीड़ों से निकलें फैला अपने पर तब ...
कागज मेरा मीत है, कलम मेरी सहेली......

त्रिवेणी - सुनकर चौंक से गये हैं कान  *रस हवाओ में घोल रहा है.. *जाने किस दर्द में परिंदा बोल रहा !
ठाले बैठे
उस पीर को परबत हुए काफ़ी ज़माना हो गया – नवीन
हैं साथ इस खातिर कि दौनों को रवानी चाहिये, पानी को धरती चाहिए धरती को पानी चाहिये, ऐ जाने वाले कुछ अलग तस्वीर देता जा, तेरी सब कुछ भुलाने के लिए कुछ तो निशानी चाहिए...

"मेरे भाव मेरी कविता"
कुछ अलग कर देखे
तमन्ना मन में है यह उठी, खुद से रूबरू हो कर आज, एक खूबसूरत ख्वाब देखे,
 निगाहों से धोखे खाए कई, मगर आज निगाहों से ही, एक धोखा कर कर देखें..

मेरे मन की

खुशनुमा मौसम... 
*फ़िर सुहाना मौसम आया है हर ओर बहुत खूबसूरत नजारा है खुश्बू से मैं जान पाई हूँ इस मौसम को अहसास पाई हूँ तुम्हारा साथ था तो…
Mausam

सूखे पत्ते - कई साल पहले एक सपना देखा था जो टूट गया लेकिन उसके टुकड़े अबतक दिल में धंसे हुए हैं। ये टुकड़े ऐसे ही है जैसे की कोई बम का गोला फटे आपके बगल में और…
मेरी कविता
संकलन-1
जब जागो तुम नींद से,
जानो तभी सवेरा है ।
जाग के भी गर आँख बंद,
चारों तरफ अँधेरा है ।।
तुम जो आये है खिला,
मन का ये संसार… ।
परिकल्पना

मौन को सुरक्षित कर लिया
*छीनना तुमने अपना अधिकार बना लिया*
*पर यथासंभव मैंने अपने मौन को सुरक्षित कर लिया
*यह मौन - मेरा अस्तित्व मेरा व्यक्तित्व है..
एफडीआई पर जनतंत्र हार गया राजनीति के सामने !!
शंखनादएफडीआई पर संसद में जिस तरह की राजनितिक कलाबाजियां दिखाई गयी उसको देखकर जनता के मन में नेताओं के प्रति जो अविश्वास का भाव था उसमें और इजाफा ही हुआ है ! उसको देखकर ऐसा लगा कि जनता के सरोकार इन राजनितिक पार्टियों के लिए कोई मायने नहीं रखते हैं और इनकी राजनीति जनता के सरोकारों से ज्यादा जरुरी है ! देशहित की बड़ी बड़ी बातें इनके लिए केवल कहने भर को रह गयी है जबकि इनके व्यवहार से ऐसा लगता है कि इनके निजी हित देश हित से भी बड़े हो गये हैं !! जिन पार्टियों ने संसद में एफडीआई का विरोध किया उन्ही ने एफडीआई के विरुद्ध संसद में मतदान नहीं किया तो जनता कैसे मान लें कि वो पार्टियां विरोध में है ..
आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद 
असफल तो अपराध .
कानूनी ज्ञान

*आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध .* * * * * * भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०९ कहती है -''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा ओर उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''* सम्पूर्ण दंड सहिंता में ये ही एक ऐसी धारा है जिसमे अपराध के होने पर कोई सजा नहीं है ओर अपराध के पूर्ण न हो पाने पर इसे करने वाला सजा काटता है.ये धारा आज तक न्यायविदों के गले से नीचे नहीं उतरी है क्योंकि ये ही ऐसी धारा है जिसे न्याय की कसौटी पर खरी नहीं कहा जा सकता है
मैं इतना सोच सकता हूँ - 10
My Poems - meri kavitayen...
51 मैं अंधों को दिखाकर रास्ता संतुष्ट होता हूँ
मगर इन स्वस्थ आँखों की व्यथा पर रुष्ट होता हूँ
नहीं उपलब्ध साधन साध्य फिर भी व्योम छूना है
मैं इतना सोच सकता हूँ नहीं संतुष्ट होता हूँ 52
मैं अक्सर रात को उठ बैठकर सपने सुलाता हूँ
भरी आँखों से सारी स्रष्टि की रचना भुलाता हूँ
मेरी हर थपथपाहट पर वो सपना मुस्कराता है…
आह्वान ...
दिल की बातें
चलो उठो उठाओं फावड़े खोदो कब्र कुछ जिन्दा लाशों को दफनाना हैं । धरती का बोझ कुछ कम करना हैं ।
सिराज-उद- दौलाह और मीर कासिम की इस हार के मायने? -एक तुलनात्मक लेखा-जोखा !
अंधड़ !
क्या सचमुच अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के बैनर तले प्लासी और बक्सर का युद्ध एक बार पुन: जीत लिया है?सवाल कुछ लोगो के लिए मामूली सा, कुछ के लिए गंभीर और कुछ के लिए हास्यास्पद भी हो सकता है, किन्तु अठारह्वीं सदी (सन 1754-1764)और इक्कीसवी सदी( सन 2004-2014) के इन दो महत्वपूर्ण युद्धों के बीच मुझे तो अनेक समानताएं नजर आ रही है…
हे आमिर! उल्लू नहीं है पब्लिक
चौराहा

*ज़रूरी सलाह बनाम खीझ* *- चण्डीदत्त शुक्ल* *आमिर खान साहेब नहीं आए।* बुड़बक पब्लिक उन्हें `तलाश' करती रही। सिर्फ पब्लिक नहीं, बांग्ला मिजाज़ में कहें तो भद्रजन भी। पुलिसवाले और लौंडे-लपाड़ियों के अलावा, शॉर्ट सर्विस कमीशन टाइप पत्रकार, रिक्शा-साइकिल-मोटरसाइकिल स्टैंड वाले भी। चौंकिएगा नहीं, शॉर्ट सर्विस बोले तो कभी-कभार ये धंधा कर लेने वाले
बात न करो

इस  वीराने  में  बस्ती   बसाने   की   बात   न  करो, 
समुन्दर में कागज की कस्ती चलाने की बात न करो!
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"दोहे-समझ गया जनतन्त्र"

दाँव-पेंच के खेल को, समझ गया जनतन्त्र।।
लोकतन्त्र के पर्व में, असर करेगा मन्त्र।१।

सभी दलों के सदन में, थे प्रतिकूल विचार।
संसद में फिर भी हुई, लोकतन्त्र की हार।२।...
अन्त में देखिए कुछ कार्टून!
Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून

कार्टून :- FDI का साइड इफ़ेक्‍ट

गुड़ हुए गुलफ़ाम हुए, फि‍र भी न तमाम हुए

कार्टूनिस्ट-मयंक खटीमा (CARTOONIST-MAYANK)

"जय हो FDI..." (कार्टूननिस्ट-मयंक)
*परदेशी-परदेशी जाना नहीं!* * *
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Indian Cartoon, Cartoon on Indian Politcs: BAMULAHIJA
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FDI का ऊंट पर असर -