मित्रों!
आज की चर्चा आदरणीय "ग़ाफ़िल सर को लगानी थी! शायद नेट या बिजली की उपलब्धता नहीं रही होगी। इसलिए आपके अलोकनार्थ बहुत शीघ्रता से सोमवार की चर्चा लगा रहा हूँ। सादर!
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2013 मे भारत....2013 मे भारत –वर्ष 2013 मे भारत सूर्य मे शनि व सूर्य मे बुध दशा के प्रभाव मे रहेगा सूर्य,शनि व बुध सभी भारत की कुंडली के तीसरे भाव मे स्थित हैं सूर्य चतुर्थेश होकर स्वयं से द्वादश यानि तीसरे भाव मे हैं जो देश से बाहर अधिक सफलता दर्शा रहे हैं (विभिन्न मुद्दो,मसलो व खेलो मे भारत व भारत वासी विदेशो मे इस पूरी दशा मे बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और करेंगे )शनि नवमेश- दशमेश होकर अस्त अवस्था मे स्वयं से षष्ठ व सप्तम स्थित हैं जो कार्यो मे प्रतियोगिता द्वारा सफलता एवं विदेश संबंधी व्यापार से लाभ दर्शा रहा हैं (सरकार एफ डी आइ लागू कर ही चुकी हैं अभी ऐसे और भी विदेश व्यापार संबंधी विधेयक...बस यूँ ही....*बहोत कुछ जो दिल के बहोत करीब रहा,* *मुठ्ठी से रेत की तरह बस यूँ ही रिसता रहा,* * * *कदम बढ़ते रहे, कभी तेज़, कभी भारी,* *ज़ख्म कभी भरता रहा, कभी रिसता रहा * * *ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !... मेरे ठाकुर ! मेरे राम ! कित छिपे हो घनश्याम , मन तडपे हैं पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम केसी हैं विपदा ये तुम ही जानो श्याम ओ मन बसिया , श्वासों के मालिक घड़ी हैं कैसी अजीब बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी ! ओ मेरे राम ! श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ.....हमारे तुम्हारे दरमियाँ एक दूरी थी,,,,मकसद बड़ा था मगर कद छोटा था हमारा उस दूरी को न नाप पाने की मजबूरी थी हमें मिलने से रोक सकता था ज़माना कुछ ख्वाहिशें थीं पर बीच में गुरूरों की खाई गहरी थी पर घुल -घुल कर हम हवाओं में घुल चुके थे प्यार की खुशबू हर खाई खलिश की लांघ जाती है उस और से आती हवा मेरे आँचल पे ठहरी थी .....फिर से कोई नेहरू और कोई मोहम्मद अली जिन्ना पैदा हो जाएगा......भारत पाक एकीकरण -नहीं कभी नहीं,,,,''भारत पाक का एकीकरण कश्मीर समस्या का एकमात्र हल -एम्.काटजू '' सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश से ऐसी बयानबाजी की उम्मीद शायद नहीं की जा सकती किन्तु ये शब्द सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के ही हैं जो उन्होंने दक्षिण एशिया मीडिया आयोग के भारतीय चैप्टर की ओर से आयोजित संगोष्ठी के संबोधन में कहे . भारत पाक का विभाजन ब्रिटिश हुकूमत की ''बाँटो और राज करो ''की नीति के तहत हुआ किन्तु कश्मीर राज्य कोई समस्या था ही नहीं इसे समस्या बनाया पाकिस्तान ने .कश्मीर के महाराजा हरीसिंह की तटस्थ नीति की अवहेलना करते हुए पाकिस्तान का कश्मीर को.......''दोस्त आपकी ही हूँ ''* * *मुस्कुराने को कहूँ तो मुस्कुरा भी दीजिये ;* *हाल जो पूछूं तुम्हारा ;गम सुना भी दीजिये ,* *मैं नहीं उनमें से कोई ;* *आये और आकर चल दिए ,* *मैं जो आऊं घर तुम्हारे * *ठहराने की जहमत कीजिये....!
रूप संवारा नहीं,,,कुहासों ने घूंघट उतारा नही है, अभी मेरे प्रियतम का इशारा नहीं है! किरणों का रथ लगता थम गया, सूरज ने अभी पूरब निहारा नही है! चारो दिशाओं में धुंधलके है फैले, पूनम के चाँद को गंवारा नहीं है.........मुझे वह मूल्य चाहिए....जो मैंने चुकाया है, तुम्हारे ज्ञान प्राप्ति हेतु, हे! अमिताभ; मुझे वह मूल्य चाहिए! क्या पर्याप्त नहीं थे वो चौदह वर्ष! कि पुनः त्याग दिया सपुत्र! तुम तो मर्यादा पुरुष थे हे पुरुषोत्तम ! मुझे वह मूल्य चाहिए! और हे जगपालक ! मेरा पतिव्रता होना भी बन गया अभिशाप! और देव कल्याण हेतु; भंग कर दिए स्व निर्मित नियम ! हे जगतपति ! मुझे वह मूल्य चाहिए.....
दिल ना जाने कितनी बार टूटा है..... तुम हमसे मोहब्बत का मतलब पूछ रहे हो हसरतों की उम्मीद में रोता रहा है तुम हमसे मंजिल का पता पूछ रहे हो आइना भी अब हमें पहचानता नहीं तुम हमारे घर का पता पूछ रहे हो तन्हाई अब हमारा घर कब्रिस्तान हमारी मंजिल तुम हमसे जीने का मकसद पूछ रहे हो.....मेरे सब सपने उसमे ही रहते हैं...माना कि शब्दों का दामन छूटा है, माना अल्फाजों का धागा टूटा है. माना कुछ पल बीत गए बिन छंदों के, माना नाम नहीं लिखे खग वृन्दों के. लेकिन यह न सोचो सच कुछ बदला है, रिश्तों का वो आसमान अब धुंधला है. कुछ कोहरे मौसम के छाये हैं तो क्या! कुछ पल गीत नहीं गा पाए हैं तो क्या! यादों की बरसात कहाँ कब थमती है? वो प्यारी सी बात कहाँ कब थमती है?.....नब्वे फीसद भरतवासी बेवकूफ....*वित खुले बाजार की जय जय कार फिर भी कारोबारी माहौल से निराश रतन टाटा तो काटजू को नब्वे फीसद भरतवासी बेवकूफ नजर आते है!* आर्थिक सुधारों पर राजनीति का असर नहीं होता क्योकि राजनीति और खुला बाजार दोनों बहिष्कार और अस्पश्यता के सिद्दांतों पर आधारित है। संसदीय हरी झंडी मिलकर निवेशक बल्ले बल्ले हैं और कारपोरेट हित में तमाम कानून बदल दिये जा रहे हैं। फिरभी रतन टाटा हताश हैं, तो इसका खास तात्पर्य होना चाहिए। दूसरी ओर,जस्टिस काटजू राजनीति के राम जेठमलानी की तरह सनसनीखेज बयानबाजी के पारंगत होते जा रहे हैं। उनके ताजा बयान पर बवाल होना तय है। दोनों खबरों को मिलाकर देखा जाये तो ....सच का मुंह स्वर्ण से ढंका हुआ है.....पटना प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्मोत्सव जनता को अपने नायक और खलनायक के पहचान का विवेक देता है प्रतिरोध का सिनेमा: प्रणय कृष्ण चौथा प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्मोत्सव 7 से 9 दिसंबर तक आयोजित हुआ। जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने इस फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए काफी सुचिंतित और प्रभावशाली वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि इषोपनिषद् में कहा गया है कि सच का मुंह स्वर्ण से ढंका हुआ है। आज भी साम्राज्यवाद और पूंजी की सत्ता तथा उसके दलाल शासक वर्ग ने सच को स्वर्ण से ढंक रखा है.....बचपन को बचपन रहने दो.....मत छीनो बच्चों का बचपन, बचपन को बचपन रहने दो. मत बोझ बढ़ाओ बस्तों का, बच्चों का बचपन रहने दो. बढ़ गया है बोझ किताबों का, भागे पीछे न तितली के. पेड़ों पर कभी न झूला झूले, न चखे स्वाद हैं इमली के. हो गए प्रकृति से दूर बहुत, कार्टून जगत में रहें मस्त. अनजान हैं छुपा छुपाई से, विडियो गेमों में रहें मस्त. अनजान हैं उगते सूरज से......माँ तो माँ है ...मैंने देखा तुम मुस्कुरा रही हो देख रही हो हर वो रस्म जो तुम्हारी सांसों के जाने के साथ ही शुरू हो गयी थी समझ तो तुम भी गयीं थीं अब ज्यादा देर तुम्हें इस घर में नहीं टिका सकेंगे हम अंतिम संस्कार के बहाने बरसों से जुड़ा ये नाता कुछ पल से ज्यादा नहीं सहा जाएगा कुछ देर तक दूर से आने वालों का इंतज़ार अंतिम दर्शन फिर चार कन्धों की सवारी समय के बंधन में बंधे सौंप आएंगे तुझे अग्नि के हवाले तेरे शरीर के पूर्णत: चले जाने का इंतज़ार भी न कर सकेंगे जिंदगी लौट आएगी धीरे धीरे पुरानी रफ़्तार पे मुझे पता है तुम तब भी मुस्कुरा रही होगी ...फेर लेते हैं नज़र जिस वक़्त बेटे और बहू......!
वालमार्ट के पास है दो ही विकल्प , रुकेगा या लूटेगा......इतिहास गवाह है भारत में जितने भी विदेशी आये है उनके पास केवल दो ही विकल्प थे : उन्होंने या देश को लूटा है या फिर यही पर बस गए है ! मुग़ल शासको ने देश में आक्रमण किया लेकिन उनकी नीति देश को लुटाने की कभी नहीं थी, उन्होंने यही बसकर अपने परिवार के साथ जीवन यापन किया ! लेकिन वाही यदि हम अंग्रेजो के शाशन काल में नजर डाले तो विपरीत था , उन्होंने देश में आना इसलिए उचित समझा क्योंकि हम सोने की चिड़िया थे और हमें खोखल करना उनका लक्ष्य था जो उन्होंने किया और बाद में किसी अंग्रेज शासक ने ये भी लिख दिया की हम तो मुठ्ठी भर लोग आये थे भारत से एक् पत्थर ही कफी था हमें भागने के लिए, लेकिन अब .......पुराने रिश्ते -पुराने लोग.....पता नहीं ये योग है या संयोग -- आज प्रो. सरोजकुमार जी के यहाँ जाना हुआ माँ को लेकर( कल वादा जो कर लिया था)...फ़िर वे और माँ बीते दिन याद करते रहे ,और मैं सुनती रही........याद करते-करते बताया कि केमेस्ट्री पढ़ने आते थे पिताजी के पास ......तभी उन्होंने माँ से पूछा मिसेस देसाई से कभी बात हुई या नहीं आपकी ? एक ही आँगन था आपका...माँ ने बताया कि एक बार हुई करीब २०-२२ साल पहले ..और अचानक उन्होंने मिसेस देसाई को फोन लगाया और उनसे कहा मेरे यहाँ कौन आया है ,पता है?आपकी पडोसी...फ़िर माँ से बात करवाई ,उन्होंने फोन नम्बर देने को कहा और माँ ने फोन मुझे पकड़ा दिया...मैंने नमस्कार कहा और वे बोली ......यादों की महकती शाम ………अनुगूँज की गूँज बहुत देर तक सुनाई देती रहेगी ………सबने मिलना जो था फ़र्गुदिया के कार्यक्रम अनुगूँज मे अनामिका जी, वन्दना ग्रोवर, मुकेश मानस, अंजू शर्मा, असद ज़ैदी, अरुण कुमार शुक्ल, डाक्टर सुनीता कविता जी का कविता पाठ था जिसमें हम सबने शिरकत की और एक खुशनुमा शाम का आनन्द उठाया सरिता दास के साथ संजू तनेजा अपने स्टाइल में :) राजीव तनेजा जी कार्यक्रम की संचालिका और आयोजन कर्ता शोभा मिश्रा जी के साथ संचालिका के पद को गरिमा देती शोभा जी का संचालन बेहद खूबसूरत रहा वन्दना ग्रोवर जी का कविता पाठ शाम को महका गया क्षणिकाओं से शुरु होकर हास्य से भी मिलवा गया पंजाबी कुडी ने रंग खू्ब जमा ...अवैध चुनावी चन्दा ही भ्रष्टाचार की असल जड़ है.....राजनितिक पार्टियों को चंदे के रूप में मिलने वाला धन ही भ्रष्टाचार कि असल वजह है ! आज देश में तेरह सौ बावन पार्टियां चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत हैं और खुद चुनाव आयोग भी यह मानता है कि इनमें से कई पार्टियां तो केवल टेक्स छूट लेने-देने और कालेधन के इस्तेमाल के लिए ही बनी हुयी है ! लेकिन चुनाव आयोग के सिमित अधिकार उन पार्टियों के लिए रक्षा कवच बने हुए हैं ! किसी जमाने में देश की सबसे बड़ी पार्टी के कोषाध्यक्ष के बारे में यह कहावत चलती थी “न खाता न बही,जो केसरी कहें वही सही” अब यह बीमारी केवल एक ही पार्टी में नहीं है ! आज ज्यादातर पार्टियां अपने राजनैतिक खजाने का सच बताने से बचती नजर आती ... * शब्दों के तो अर्थ खो गए*...... इंद्र धनुष का रंग उड़ गया , भाव सभी जल दुराचार हो गए शब्दों के तो खाल नुच गए ,रिश्ते खुद में ही व्यभिचार हो गए खो गया अर्थ भाई का अब , अब भाई ? ड्रामे के किरदार हो गए है पता आज इसका सबको , भाई ही जिश्म के दावेदार हो गए कहते तो हैं वो पिता तुल्य है, पिता शब्द निर्वसन हो गए शब्द फिर रहे अर्थ खोजते रिश्ते सब खुद ही व्यापार हो गए.....किसने लिखे सबसे ज़्यादा कमेंट?
जलाओ मशाल कि... रौशनी हो,* *अभिशप्त प्रलेखों को फूंकने का* *हौसला रखो ....।* * **जलती मशाल में तेल कितना है ,* *कम पड़े तो देह की चर्बी जलाने का,* *फैसला रखो .....। * * **हर तूफान से गुजरने का आता है हुनर,* *तूफान रचने वालों से, तूफान का * *रास्ता पूछो .....।* * **करवटें बदल लेने से ,रात ख़तम नहीं होती* *चैन की नींद आये काँटों पर,* *जूनून से वास्ता रखो ..पिछले हफ़्ते इक रात गुरु वृहस्पति यानि Jupiter मिलने आए थे हम सबसे !
*हौसला रख कर कदम आगे धरो।*** *फासले इतने तो मत पैदा करो।।*** *चाँद तारों से भरी इस रात में**,*** *मत अमावस से भरी बातें करो....!
अन्त में कुछ कार्टून.....!
आज के लिए बस इतना ही....L