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बुधवार, दिसंबर 03, 2014

"आज बस इतना ही…" चर्चा मंच 1816

आज बस इतना ही…2 दिसंबर, 2014

तन्हाई से निकल तो नज़र आएगी दुनिया।
वरना अकेला मेले में कर जाएगी दुनिया।... 

रमेश तैलग
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kunwarji's 


पी.सी.गोदियाल "परचेत" 



नुक्‍कड़ 


श्यामल सुमन 

विशाल चर्चित


vijay kumar sappatti 


डॉ. जेन्नी शबनम 


Naveen Mani Tripathi 


बदल गए हम कितने
बदला नहीं इक अहला एहसास 
ताउम्र समंदर पास बैठा रहा 
मगर बुझी न 'श्लोक' की प्यास... 
मधु सिंह : इश्क मेरा रूहानी है 
इश्क   मेरा   रूहानी है 
राहे- ख़ुदा    कहानी है 

बन बैठा मैं रब का बंदा
रब ही मेरी कहानी है... 

बेनक़ाब
दयार -ए -दिल की रात में 

दयार -ए -दिल की रात में, चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ , वह शक्ल तो दिखा  गया

जुदाइयों  के ज़ख्म, दर्द-ए -ज़िंदगी ने भर दिए
तुम्हे भी नींद  गयी , हमें भी सब्र   गया... 
अज़ीज़ जौनपुरी : 
तेरी खुशबू तेरा हुश्ने ज़माल रखता हूँ 

ज़िगर  में  अपने जब्ते- नाल रखता हूँ  
   तेरी खुशबू तेरा हुश्ने  जमाल रखता हूँ 

   तेरी दोशीजगी हमें जीने नहीं देती 
   और मैं हूँ के जीने का मज़ाल  रखता हूँ... 



मील के पत्थर कभी इस रह-गुज़र के देखना ... 
लोग मिल जाएंगे फिर मेरे शहर के देखना 
दूर तक तन्हा मिलेगी रेत रेगिस्तान की 
फल मगर मीठे मिलेंगे इस शजर के देखना... 
स्वप्न मेरे...........परDigamber Naswa


मंगलवार, दिसंबर 02, 2014

"चरैवेति-मेरा एक गीत, स्वर अर्चवा चावजी"; चर्चा मंच 1815

lokendra singh


siddheshwar singh 




Yashwant Yash 



Satish Saxena 



vandana gupta 



Randhir Singh Suman 



ज्योति-कलश 



सोमवार, दिसंबर 01, 2014

"ना रही बुलबुल, ना उसका तराना" (चर्चा-1814)

मित्रों।
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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सिसकियाँ सुलग रही 

पतंग सी उड़ती आकाश में 
पल में कटी धरा पे आन गिरी 
बंद कमरों में दीवारों से टकराती 
सिसकियाँ सुलग रही.. 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi
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तल्खी और तकल्लुफ 

जो आज दिखी असहमति नहीं अभिव्यक्ति मात्र है 
आज तक सारा नियंत्रण अभिव्यक्ति पर ही रहा 
असहमति विद्यमान तो थी सदा-सर्वदा ही 
पर रोकी जाती रही... 
Smart Indian 
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पुराने खत 

इस बार तो हद कर दी तुमने, 
अपने पुराने खत वापस मांग लिए, 
पर ऐसी कई चीज़ें हैं, 
जो न तुम मांग सकती हो, 
न मैं दे सकता हूँ... 
कविताएँ पर Onkar 
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भटकाव 

आख़िर मैं पहुँच ही गया 
जहाँ पर राह ख़त्म हो ज़ाती है 
यहाँ पर न शहर है न गाँव है 
आकाश का धरती की ओर 
बस कुछ झुकाव है... 
तात्पर्य पर कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र 
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सँवारो जितना 

ये जुल्फ बिखर जाती हैं... 
उन्नयन  पर udaya veer singh 
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रिश्तों की परिभाषा ! 

स्वार्थ ने अपने को पराया कर दिया। 
बस एक रिश्ता आज भी जिन्दा है उसी तरह 
वो रिश्ता है दर्द का रिश्ता... 
hindigen पर रेखा श्रीवास्तव 
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"नमन शैतान करते है"

मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।
बहुत आभार है उसकाबहुत उपकार है उसका,
दिया माटी के पुतले कोउसी ने प्राण प्यारा है... 
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*इश्क़ इक खूबसूरत अहसास ....* 

तुमने ही तो कहा था 
मुहब्बत ज़िन्दगी होती है 
और मैंने ज़िन्दगी की तलाश में 
मुहब्बत के सारे फूल 
तेरे दरवाजे पर टाँक दिए थे... 
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नारी की सोच 
नारी की सोच
सागर- सी गहरी

फिर भी वो बेचारी... 
त्रिवेणी
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"खुलूस से कह राम और रहीम" 

अल्लाह निगह-ए-बान हैवो है बड़ा करीम।
जातिधरम से बाँध मतमौला को ऐ शमीम।।

बख्शी है हर बशर कोउसने इल्म की दौलत,
इन्सां को सँवारा हैदे शऊर की नेमत,
क्यों भाई  को भाई से जुदा कर रहा फईम।
जातिधरम से बाँध मतमौला को ऐ शमीम...