मित्रों!
बीत रहा है साल पुराना, कल की बातें छोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारो, सम्बन्धों को जोड़ो।।
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आओ दृढ़ संकल्प करें, गंगा को पावन करना है,
हिन्दी की बिन्दी को, माता के माथे पर धरना है,
जिनसे होता अहित देश का, उन अनुबन्धों को तोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारो, सम्बन्धों को जोड़ो।।
उच्चारण धूप के दर से होकर चली जो हवा
क्या बताएगी वो चांदनी का पता
वो ही सावन है "वर्षा" वही है घटा
फिर भी मौसम ये लगने लगा है नया
कभी सपने दिखाता है मनमोहक
कि आँखें ही चौंधियाँ जाएँ
और कभी आश्वस्त करता है
पहुँचा ही देगा मंजिल पर
- जिंदादिली ( कविता )
- तालियों की गड़गड़ाहट
और
पेट की भूख
कर देती है मजबूर
चाहे रो के जियो
चहे हँस के जियो
चाहे डर के जियो
चाहे जिन्दादिली से जियो ।
चराग़-ए-आरज़ू
जलाये रखना,
उम्मीद आँधियों में
बनाये रखना।
अब क्या डरना
हालात की तल्ख़ियों से,
आ गया हमको
बुलंदियों का स्वाद चखना।
Ravindra Singh Yadav, हिन्दी-आभा*भारत
- "उलझन-सुलझन"
जिंदगी कभी-कभी उलझें हुए धागों सी हो जाती है,जितना सुलझाना चाहों उतना ही उलझती जाती है। जिम्मेदारी या कर्तव्यबोध,समस्याएं या मजबूरियों के धागों में उलझा हुआ बेबस मन। ऐसे में दो ही विकल्प होता है या तो सब्र खोकर तमाम धागों को खींच-खाचकर तोड़ दे....उलझन खुद-ब-खुद सुलझ जाएगी...
- “शीत ऋतु”

(This image has been taken from google) गीली सी धूप मेंफूलों की पंखुड़ियांअलसायी सीआँखें खोलती हैं ।ओस का मोती भीगुलाब की देह परथरथराता साअस्तित्व तलाशता है ।- मंथन, मीना भारद्वाज
चाल ढाल में, कुछ अदृश्य स्पर्श
देह में रहते हैं कोशिकाओं तक
अवशोषित, वो भूल जाते
हैं मुक्त उड़ान, बस
रहना चाहते
हैं अपनों
के
नज़दीक यथावत शिकस्ता हाल
में








