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मंगलवार, अक्टूबर 27, 2020

"तमसो मा ज्योतिर्गमय "(चर्चा अंक- 3867)

स्नेहिल अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में 

आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 

(शीर्षक आदरणीय शांतनु सान्याल जी की रचना से )
ॐ तमसो मा ज्योतिर्गमय।
     ॐ   असतो मा सद्गमय।
    ॐ  मृत्योर्मामृतं गमय ॥
हे माँ 
मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
 मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥
इसी प्रार्थना के साथ चलते हैं 
आज की कुछ खास रचनाओं की ओर.......
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ग़ज़ल "कठिन बुढ़ापा होता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)
बहता जल का सोता है 
हाथ-हाथ को धोता है 
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फूल कहाँ से पायेगा वो 
जो काँटों को बोता है 
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तमसो मा ज्योतिर्गमय - -
नक्षत्रों का महोत्सव ख़त्म हो चुका,
छायापथ में खो गए सभी जाने
अनजाने तारों के उजाले,
दिगंत की दहलीज़
में कौन देता
है जीर्ण
हाथों
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"ज्योत्सना का रात पर पहरा लगा सा है"

ज्योत्सना का रात पर , पहरा लगा सा है ।

आसमां का रंग भी , उजला-उजला सा है ।।


पत्तियों  में खेलता ,एक शिउली का फूल ।

डालियों के कान में ,कुछ कह रहा सा है ।।

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अभिलाषा

मन दीये में नेह रुप भरुँ  
बैठ स्मृतियों की मुँडेर पर।
समर्पण बाती बन बल भरुँ 
समय सरित की लहर पर।
प्रज्वलित ज्योति सांसों की 
बन प्रिय पथ पर पल-पल जलूँ।
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इस वर्ष का दशहरा


 कोविद नाईनटीन का रावण

 जला दशहरा मैदान में

पर ज्यादा लोग देख नहीं

 पाए इस आयोजन को |

घर से ही दुआ की

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विजय सभी की जब चाहें हम

आज दशहरा है, हजारों वर्षों से असत्य पर सत्य की विजय
 का प्रतीक यह पर्व मानव को जीने का सही पथ दिखाता आ रहा है। रावण के दस सिर उसके अहंकार के प्रतीक हैं
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४९६. रावण का क़द

वे हर साल दशहरे पर 

रावण का पुतला जलाते हैं,

पर अगले साल उन्हें

बड़े क़द का रावण चाहिए,

वे ख़ुद नहीं जानते 

कि वे चाहते क्या हैं,

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श्रृंगार रस में कैसे लिखूँ

तन के घट भरा स्वांस रस

रत्ती रत्ती घटता जाये

संघर्षों की तीक्ष्ण आंच में

हुआ वाष्पन उड़ता जाये।

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लड़की होने के नाते- 
जिंदगी आसान नहीं है मेरे लिए 


 शहर के बीचो -बीच बना हॉल लोगों से भरा हुआ है, कुछ वक्ता  थे और  कुछ सुनने वाले ।  आलम यह था कि हर किसी को बोलना था लॉकडाउन में बहुत दिनों तक नहीं सुने जाने से हर शख्स परेशान था। किसी न किसी को अपनी कहानी को सुनने वाले की तलाश थी । 
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प्रीति सिंह का बेस्ट सेलिंग उपन्यास है 

अंग्रेजी भाषा की भारतीय साहित्यकार एवं उपन्यासकार प्रीति सिंह का बेस्ट सेलिंग उपन्यास है  जी हां, अंग्रेजी भाषा की भारतीय साहित्यकार एवं उपन्यासकार प्रीति सिंह का आज जन्‍मदिन है। 
प्रीति सिंह 26 अक्‍टूबर 1971 के दिन अंबाला (हरियाणा) में पैदा हुई थीं।
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आंवले का मुरब्बा बनाने का आसान तरीका


आंवले का मुरब्बा बनाने का इतना आसान तरीका कि
 जिसे जानकर आप कहेंगे कि काश, ये तरीका पहले पता होता! 
क्योंकि पारंपरिक तरीके से आंवला मुरब्बा बनाने में 

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आज का सफर यही तक

आप सभी स्वस्थ रहें ,सुरक्षित रहें।
कामिनी सिन्हा

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सोमवार, अक्टूबर 26, 2020

'मंसूर कबीर सरीखे सब सूली पे चढ़ाए जाते हैं' (चर्चा अंक- 3866)

शीर्षक पंक्ति : आदरणीय  जी। 


सादर अभिवादन। 

           सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है ।

आज की चर्चा का आंरभ करते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय

 जी की रचना की कुछ पंक्तियों से-

जो झूठे ज़ालिम अहमक हैं
मसनद पे बिठाए जाते हैं
मंसूर कबीर सरीखे सब
सूली पे चढ़ाए जाते हैं
क्यूं दीन-धरम की खिदमत में
नित लाश बिछाई जाती हैं
नफ़रत वहशीपन खूंरेज़ी
घुट्टी में पिलाई जाती हैं


आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ रचनाएँ-

 --

दोहे 
"हुआ दशानन पुष्ट" 
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लीलाएँ बाधित हुई, जला नहीं लंकेश।
चारों ओर बुराई का, जीवित है परिवेश।।
--
मुख पर हैं मुखपट्टियाँ, भीतर से है दुष्ट।
कोरोना के काल में, हुआ दशानन पुष्ट।।
--
जो झूठे ज़ालिम अहमक हैं
मसनद पे बिठाए जाते हैं
मंसूर कबीर सरीखे सब
सूली पे चढ़ाए जाते हैं
क्यूं दीन-धरम की खिदमत में
नित लाश बिछाई जाती हैं
--

विजयोत्सव

मान्या व मेधा, पहाड़ो पर निवास करने वाले परिवार की बेटियाँ थीं। मान्या से लगभग पंद्रह महीने छोटी मेधा सगी बहन थी। दोनों बहनें सम क्षमता से सम कक्षाओं को उत्तीर्ण करती मल्टीनेशनल कम्पनी में संग-संग कार्यरत थीं। माता-पिता, परिवार–समाज को चौंकाती दोनों बहनें शादी नहीं करने का अटल फैसला सुना दी थी। कम्पनी में शनिवार व रविवार को अवकाश रहने के कारण शुक्रवार की शाम दोनों अपने माता-पिता के पास गाँव चली जातीं और सोमवार को पौ फटने के साथ अपने निवास पर वापस आ जातीं।

--

चुभन

चल कर ना मिलो, मिल के तो चलो!
हाँ, पर यहाँ, मिल के बिसरने का चलन है!
सर्द रिश्तों में, कंटक सी चुभन है!
तो, रिश्ते भूल के, क्यूँ सो रहे हो तुम?

यूँ, खो न देना, सिमटते पलों को तुम!
--
ऐ लड़कियों!   
तुम सब जाओ अपने-अपने दड़बों में   
अपने-अपने परों को सम्हालो   
एक दूसरे को अपने-अपने चोंचों से लहूलुहान करो!   
कटना तो तुम सबको है, एक न एक दिन   
अपनों द्वारा या गैरों द्वारा   
सीख लो लड़ना, ख़ुद को बचाना, दूसरों को मात देना   
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात   
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध!  

--

जादूगर का पता - -

खुलते ही गन्धकोष आते
हैं अनगिनत चाहने
वाले, कौन
कहाँ
ले जाए ख़्वाबों की गीली मिट्टी, - -
क्या पता तुम्हें है मालूम,
उस जादूगर कुम्हार
का ?

--

संस्कृत साहित्य के उद्धारक

चूँकि संस्कृत भाषा सामान्य व्यवहार में प्रचलित नहीं थी इसलिए संस्कृत में लिखे गए उस साहित्य को ऐसी भाषा में अनुवाद किया जाना आवश्यक था जो शासक वर्ग की भाषा हो और जिसे शासित वर्ग भी सीखता हो । 500 साल पहले तत्कालीन शासक अकबर ने इस संबंध में अल्प प्रयास किया था । 200 साल पहले अंग्रेजी शासन के समय में यह कार्य वृहद पैमाने पर हुआ । उस समय प्राचीन भारतीय साहित्य का अधिकतर अनुवाद कार्य अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच में विदेशी विद्वानों के द्वारा किया गया । इस लेख में इन्हीं कार्यों का संक्षिप्त विवरण देने का प्रयास किया गया है ।

-- 

कब आओगे राम

राम जानकी
सतयुगी आदर्श
पूज्य आज भी
करता जग
हृदय से वन्दना
राम राज्य की !
--

सबकी परवाह में जब खुद को भूल जाती हूँ
अपनी परवाह मेंं तुझको करीब पाती हूँ
तुझे फिकर मेरी फिर और क्या चाहना है मुझे
तेरी ही ओट पा मैं   मौत से टकराती हूँ

--

दावानल

जल-जल के भीग रही जल में
जलन -तपन जलजला रही
जलती-जलती जल मैं रही
पर ज्वाला जल की न खो रही
--

 “18 वीं शताब्दी‎ में चिनाब नदी के किनारे एक कुम्भकार के घर सुन्दर‎ सी लड़की का 

जन्म हुआ जिसका नाम “सोहनी” था । पिता के बनाए‎ मिट्टी‎ के बर्तनों पर वह सुन्दर‎  सुन्दर‎ आकृतियाँ उकेरती । पिता-पुत्री के बनाए‎ मिट्टी‎ की बर्तन दूर  दूर‎ तक लोकप्रिय‎ थे ।

--

मसला कुत्ते की टेढ़ी पूँछ

हर किसी की 
कम से कम 
एक पूँछ तो होती है 
किसी की जागी होती है 
किसी की सोई होती है 
पीछे 
होती है इसलिये 
खुद को दिख नहीं पाती है 
--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर फिलेंगे 
आगामी अंक में 
@अनीता सैनी 'दीप्ति'