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शनिवार, अक्टूबर 31, 2020

'शरद पूर्णिमा' (चर्चा अंक- 3871 )

शीर्षक पंक्ति : आदरणीय   जी।


सादर अभिवादन। 
शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

आश्विन मास की शरद पूर्णिमा का हमारे सांस्कृतिक जीवन में विशेष महत्त्व है।

शरद पूर्णिमा की रात्रि में चाँद का पूर्णाकार  भव्य नज़र आता है। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर पकाकर खुले आसमान के नीचे छत पर रखी जाती है क्योंकि इस रात अमृत वर्षा होती है, बाद में इस खीर का प्रसाद रूप में श्रध्दापूर्वक सेवन किया जाता है।

@अनीता सैनी 'दीप्ति' 


आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ रचनाएँ-

--दोहे "शरद पूर्णिमा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शरद पूर्णिमा पर हँसा, खुलकर आज मयंक।
गंगा जी के नीर की, दूर हो गयी पंक।।
--
फसन घरों में आ गयीकृषक रहे मुसकाय।
अपने मन के छन्द कोरचते हैं कविराय।।

--


चंद माहिय

मन से मन डोर कसी  

ऐसी लगन लागी

छवि उसकी नैनन बसी

--

सखि ! उनको पाषण न कहना |

सखि ! उनको पाषाण न कहना |

इन चंचल नयनों से छिप कर ,

वह मेरे मन में रहते हैं 

मेरी सिसकी , मेरी आहें ,

सब चुपके चुपके सहते हैं |

तुम मेरे नयनों से छिपने को उनका अभिमान न कहना |

--


धनाढ्य धनराशि से नहीं


दीपक बोलता नहीं, उसका
प्रकाश पूर्ण  देता  है  परिचय
धनाढ्य धनराशि से नहीं
कर्तृत्व निर्धारित करती निश्चय

--का सखि साजन?--कहमुकरी-1

नयन समावे,मन हरसावेविचार नगरी,राज सजावेबात पराई,लागे अपनाका सखि साजन?ना सखि सपना।--
दुःख

घर बनाने वाले ने बनाया घर
पूरे होश-ओ-हवास में
लगाए दरवाज़े और खिड़की
सजाये अंटियां पर कँगूरे
शान-ओ-शौक़त के
बनाया छोटा-सा बगीचा

बचपन से सपनों का सफर शुरू होता है और कहीं न कहीं जब तक जीते है चलता रहता है । इन सपनों के कई रास्ते ऊबड़ खाबड़ भी होते है कुछ इतने चिकने और सरल की कब इनसे होते हम मंजिल तक पहुँच जाते है पता नही चलता और कम समय में ही वो सब कुछ पा लेने वाले कुछ भग्यशाली लोगों में शुमार हो जाते है।
--
 अपने
गुलाबी
और कभी रंग बिरंगे डैनो से
तैरते और गलफड़ों से
पानी के बुलबुले छोड़ते हुए
मछलियाँ
आराम से तैरती रहती हैं

आस्तीनों में छुपी तलवार है
और कहता है के मेरा यार है
 
गर्मियों की छुट्टियाँ भी खूब हैं
रोज़ बच्चों के लिए इतवार है

आते हैं बादल
हुलसती है धरती 
और हरी हो जाती है।
--
एक दशहरा ऐसा भी हो
जल जाए हर कलुष हृदय से,
अहंकार का मुकुट गिरे फिर
भूमि पर श्री राम के शर से !
--
बुढ़ापे को रिवर्स तो 
नहीं किया जा सकता 
पर हाँ 
चिड़चिड़े,सनकी,खूसट 
बुढा/बूढ़ी होने से 
खुद को 
बचाया जा सकता है 

--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर फिलेंगे 
आगामी अंक में 
@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

सोमवार, अक्टूबर 26, 2020

'मंसूर कबीर सरीखे सब सूली पे चढ़ाए जाते हैं' (चर्चा अंक- 3866)

शीर्षक पंक्ति : आदरणीय  जी। 


सादर अभिवादन। 

           सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है ।

आज की चर्चा का आंरभ करते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय

 जी की रचना की कुछ पंक्तियों से-

जो झूठे ज़ालिम अहमक हैं
मसनद पे बिठाए जाते हैं
मंसूर कबीर सरीखे सब
सूली पे चढ़ाए जाते हैं
क्यूं दीन-धरम की खिदमत में
नित लाश बिछाई जाती हैं
नफ़रत वहशीपन खूंरेज़ी
घुट्टी में पिलाई जाती हैं


आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ रचनाएँ-

 --

दोहे 
"हुआ दशानन पुष्ट" 
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लीलाएँ बाधित हुई, जला नहीं लंकेश।
चारों ओर बुराई का, जीवित है परिवेश।।
--
मुख पर हैं मुखपट्टियाँ, भीतर से है दुष्ट।
कोरोना के काल में, हुआ दशानन पुष्ट।।
--
जो झूठे ज़ालिम अहमक हैं
मसनद पे बिठाए जाते हैं
मंसूर कबीर सरीखे सब
सूली पे चढ़ाए जाते हैं
क्यूं दीन-धरम की खिदमत में
नित लाश बिछाई जाती हैं
--

विजयोत्सव

मान्या व मेधा, पहाड़ो पर निवास करने वाले परिवार की बेटियाँ थीं। मान्या से लगभग पंद्रह महीने छोटी मेधा सगी बहन थी। दोनों बहनें सम क्षमता से सम कक्षाओं को उत्तीर्ण करती मल्टीनेशनल कम्पनी में संग-संग कार्यरत थीं। माता-पिता, परिवार–समाज को चौंकाती दोनों बहनें शादी नहीं करने का अटल फैसला सुना दी थी। कम्पनी में शनिवार व रविवार को अवकाश रहने के कारण शुक्रवार की शाम दोनों अपने माता-पिता के पास गाँव चली जातीं और सोमवार को पौ फटने के साथ अपने निवास पर वापस आ जातीं।

--

चुभन

चल कर ना मिलो, मिल के तो चलो!
हाँ, पर यहाँ, मिल के बिसरने का चलन है!
सर्द रिश्तों में, कंटक सी चुभन है!
तो, रिश्ते भूल के, क्यूँ सो रहे हो तुम?

यूँ, खो न देना, सिमटते पलों को तुम!
--
ऐ लड़कियों!   
तुम सब जाओ अपने-अपने दड़बों में   
अपने-अपने परों को सम्हालो   
एक दूसरे को अपने-अपने चोंचों से लहूलुहान करो!   
कटना तो तुम सबको है, एक न एक दिन   
अपनों द्वारा या गैरों द्वारा   
सीख लो लड़ना, ख़ुद को बचाना, दूसरों को मात देना   
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात   
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध!  

--

जादूगर का पता - -

खुलते ही गन्धकोष आते
हैं अनगिनत चाहने
वाले, कौन
कहाँ
ले जाए ख़्वाबों की गीली मिट्टी, - -
क्या पता तुम्हें है मालूम,
उस जादूगर कुम्हार
का ?

--

संस्कृत साहित्य के उद्धारक

चूँकि संस्कृत भाषा सामान्य व्यवहार में प्रचलित नहीं थी इसलिए संस्कृत में लिखे गए उस साहित्य को ऐसी भाषा में अनुवाद किया जाना आवश्यक था जो शासक वर्ग की भाषा हो और जिसे शासित वर्ग भी सीखता हो । 500 साल पहले तत्कालीन शासक अकबर ने इस संबंध में अल्प प्रयास किया था । 200 साल पहले अंग्रेजी शासन के समय में यह कार्य वृहद पैमाने पर हुआ । उस समय प्राचीन भारतीय साहित्य का अधिकतर अनुवाद कार्य अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच में विदेशी विद्वानों के द्वारा किया गया । इस लेख में इन्हीं कार्यों का संक्षिप्त विवरण देने का प्रयास किया गया है ।

-- 

कब आओगे राम

राम जानकी
सतयुगी आदर्श
पूज्य आज भी
करता जग
हृदय से वन्दना
राम राज्य की !
--

सबकी परवाह में जब खुद को भूल जाती हूँ
अपनी परवाह मेंं तुझको करीब पाती हूँ
तुझे फिकर मेरी फिर और क्या चाहना है मुझे
तेरी ही ओट पा मैं   मौत से टकराती हूँ

--

दावानल

जल-जल के भीग रही जल में
जलन -तपन जलजला रही
जलती-जलती जल मैं रही
पर ज्वाला जल की न खो रही
--

 “18 वीं शताब्दी‎ में चिनाब नदी के किनारे एक कुम्भकार के घर सुन्दर‎ सी लड़की का 

जन्म हुआ जिसका नाम “सोहनी” था । पिता के बनाए‎ मिट्टी‎ के बर्तनों पर वह सुन्दर‎  सुन्दर‎ आकृतियाँ उकेरती । पिता-पुत्री के बनाए‎ मिट्टी‎ की बर्तन दूर  दूर‎ तक लोकप्रिय‎ थे ।

--

मसला कुत्ते की टेढ़ी पूँछ

हर किसी की 
कम से कम 
एक पूँछ तो होती है 
किसी की जागी होती है 
किसी की सोई होती है 
पीछे 
होती है इसलिये 
खुद को दिख नहीं पाती है 
--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर फिलेंगे 
आगामी अंक में 
@अनीता सैनी 'दीप्ति' 



शनिवार, अक्टूबर 24, 2020

'स्नेह-रूपी जल' (चर्चा अंक- 3864 )

शीर्षक पंक्ति : आदरणीया अनंता सिन्हा जी  


सादर अभिवादन। 

शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

स्नेहरूपी जल एक अथाह महासागर है जिसमें जीवन के सुखद एहसास समाहित होते है।स्नेह के बग़ैर जीवन नीरस लगता है।स्नेहरूपी जल की बूँदें जीवन को नया अर्थ प्रदान करतीं हैं। जीवन मूल्यों के ख़ज़ाने में स्नेह का महत्त्व सर्वाधिक है जिसे यथासंभव बरबाद होने से बचाना चाहिए तभी स्नेहरूपी जल प्रेम और सद्भावना की फ़सल को सिंचित करता रहेगा।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ रचनाएँ-

--

  बालकविता 
"हो हर बालक राम"
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो करता है अच्छे काम।
उसका ही होता है नाम।।
--
मर्यादा जो सदा निभाता।
उसको राम पुकारा जाता।
--
परस्पर स्नेह की अमृत- धारा,
 इस  जग में जहाँ बह जायेगी। 
क्षमा, दया और करुणा ,
वहाँ स्वतः चली आएगी। 
--
सूरज से अपेक्षा 
धूप दे पर लू नहीं

बादल से अपेक्षा 
पानी दे पर बाढ़ नहीं

हवा से अपेक्षा 
ठंडक दे पर आंधी नहीं

रास्ते से अपेक्षा 
मंजिल दे पर छाले नहीं 
--
यह कोरोना
सकल जगत का
अक्ष भिगोना।
--
यह एक विडंबना ही है कि आज सब लोग विरोधाभासों के बीच जी रहे हैं।अक्सर लोग दूसरों को सच्चाई और साफ़गोई की नसीहत देते हैं परंतु उन्हें स्वयं चापलूसी पसंद आती है।ऐसा भी देखने में आता है कि लोग ख़ुद तो किसी से बातचीत का तरीक़ा नहीं जानते परंतु दूसरों को बातचीत करने के सलीक़े पर ज़ोरदार भाषण देते हैं।
--
मैं तो नहीं रहने वाली ताउम्र यहां 
आप 
क्या आप रहने वाले हैं
हमेशा के लिए यहां
नहीं ना
तो फिर इतनी चिंता किस
बात की
अरे खुल कर जियो
मौज में रहो
--
नीलम सा नभ उस पर खाली डोलची लिये 
स्वच्छ बादलों का स्वच्छंद विचरण
अब  उन्मुक्त  हैं कर्तव्य  भार से 
सारी सृष्टि  को जल का वरदान 
मुक्त हस्त दे आये सहृदय 
अब बस कुछ दिन यूं ही झूमते घूमना 
--

नादान बन अब प्रश्न पे
इल्जाम तराशी न कर,

ये नहीं फरेब मेरा..
लकीरें पीटना ही
सबब बना ..
क्या देश का मेरा?
घोटाले, घटनाएं तो हर बार
फिर ये कैसी चीख पुकार..
 तलाश रहे..
--
दौर-ए-महफ़िल इस बात ,पे ग़ौर किया कीजे
ज्यादा खुलकर भी न,हुजूर लोगों से मिला कीजे।
क्या पता कब कौन कैसे,दुश्मनी हासिल करे
दोस्ती में भी कुछ फाँसले,दरम्यान रखा कीजे।
--
पलटी किस्मत जब
स्वप्न राख ढेरी।
चुभते कंटक से
राह खड़े बैरी।
आज तोड़ते सब
चुभती जो टहनी।
--
करता हूँ इन्तजार
फूलों की डालियों पर
उसके बैठने का,
फिर
करता हूँ
सहज दिखने का
सजग प्रयास.
धीरे-धीरे
चपलता से
चुपचाप
जाता हूँ
उसके बिलकुल करीब
पंखों से
पकड़ लाता हूँ उसे
--
  कैसे आऊँ पास तुम्हारे मैली हुई चुनरिया |
      तन मन सब डूबे अंसुअन में ,
  भीज भीज कर सब रंग छूटे |
    उलझ उलझ बैरी काँटों में ,
    जगमग किरण सितारे टूटे |
--

आज का सफ़र यहीं तक 
फिर फिलेंगे 
आगामी अंक में 
@अनीता सैनी 'दीप्ति'