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सोमवार, अगस्त 29, 2022

'जो तुम दर्द दोगे'(चर्चा अंक 4536)

सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 

शीर्षक व काव्यांश आदरणीया डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा जी की रचना ' सुनो ज़िंदगी!' से 

 क्यूँ सोचते हो

जो तुम दर्द दोगे

तो बिखर जाऊँगी

ये जान लो

धुल के आँसुओं से

मैं निखर जाऊँगी ।

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-  

--

उच्चारण: ग़ज़ल "दर्द का मरहम लगा लिया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) 

दुनिया में जुल्म-जोर केदेखें हैं रास्ते,
सदियाँ लगेंगी उनकोभुलाने के वास्ते,
जख्मों में हमने दर्द कामरहम लगा लिया।
सारे जहाँ का दर्दजिगर में बसा लिया।।
--
सुनो ज़िन्दगी !
तुम एक कविता
मैं बस गाती चली
रस -घट भी
प्रेम या पीडा़ -भरा
पाया , लुटाती चली ।
--
तपकर तीव्र तपिश में
अपने सम्मोहनयोद्धा की 
सभा से लौटे
हारे-थके पंछी
कुछ देर के लिए 
छायादार वृक्षों की शरण में
ठहर गए हैं
--

हर बार की तरह

इस बार भी लगता है 

एक कोशिश और यह

बस..,

भरभरा कर गिरने ही वाली है 

मगर कहाँ..,

--

उधेड़-बुन: हमें दुख हुआ है कितना 

हमें दुख हुआ है कितना 

ये हम नहीं जानते

मगर देख नहीं पाते

तुम्हारा विनाश

--

विश्वमोहन उवाच : छंदहीन कविता 

भाव भी भारी, अंतर्मुख हैं,

बाहर भी  वे निकल न पाते।

लटके-अटके गले में रहते,

वापस उनको निगल न पाते।

--

कविताएँ : ६६३. उसकी खाँसी 

जो दे दो,पहन लेती है,

जो खिला दो,खा लेती है, 

जहाँ ले जाओ,चली जाती है, 

जहाँ छोड़ दो, रह जाती है. 

--

 जीना अभी बाकी है 

वक्त को करने दो अपनी मनमानी,
मेरा वक्त आना अभी बाकी है,
कर रहे है सवाल मुझसे जो 
उन सबको जवाब देना अभी बाकी है।
--
 परमानेंट मौज ले रहे, 
काम अपना थोप कर
संविदा कर्मी पिस रहे 
परमानेंट की धौंस पर
--
ऐसे में आजादी के लिए दिल-ओ-जान से समर्पित क्रान्तिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत और उनके गुर्गों से जूझने के लिए अनेकानेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था ! उसी में एक थी हथियारों की जरुरत ! हथियार भी ऐसा जो शक्तिशाली भी हो और छुपाया भी जा सके ! काफी सोच-विचार के बाद जर्मनी में बनी माउजर पिस्तौल माफिक पाई गई ! पर उस सस्ते के जमाने में भी उसकी कीमत 75 रुपये थी जो चोरी-छुपे खरीदने पर तीन सौ रुपये में मिलती थी ! तीन सौ रूपये की कीमत इसी से आंकी जा सकती है कि उस समय एक रुपये का 20 सेर दूध, दो सेर शुद्ध घी, 30 सेर गेहूँ तथा सोना 20 रुपये का एक तोला था ! पर जरुरत थी तो हथियार लेना ही था ! वह भी सशक्त !
--
धन-धान्य से परिपूर्ण पंडित जी के घर में उनकी चौबाइन ख़ुद को और अपने बच्चों को, रूखा-सूखा खिलाने कोऔर उल्टा-सीधा पहनाने को, मजबूर हुआ करती थीं क्यों कि उनके पतिदेव कस्टेम्परों से दान में मिले  दान में मिले कपड़े, मिठाइयाँ फल,दक्षिणा में मिले कपड़े, मिठाइयाँ, फल, मेवे आदि को घटी दरों पर कीर्ति नगर की विभिन्न दुकानों पर बेच कर, खाली हाथ लेकिन भरी जेब, ले कर ही घर में प्रवेश करते थे.
-- 
आज का सफ़र यहीं तक 
@अनीता सैनी 'दीप्ति'  

रविवार, अगस्त 28, 2022

"साथ नहीं है कुछ भी जाना"(चर्चा अंक 4535)

 सादर अभिवादन

रविवार की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

(शीर्षक और भुमिका आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से)

धन संचय की होड़ लगी है,
साथ नहीं है कुछ भी जाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।
*****
साथ कुछ भी नहीं जाना
ये तो सब जानते हैं
पर मानते नहीं
और ज्यादा और ज्यादा के होड़ में लगे रहते हैं
शास्त्री सर की इस प्रेरक शब्दों पर मंथन करते हुए चलते हैं आज की कुछ खास रचनाओं की ओर...
******

गीत "साथ नहीं है कुछ भी जाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिन दूनी औ रात चौगुनी,
बढ़ती जातीं अभिलाषाएँ।
देश-काल के साथ बदलतीं,
पाप-पुण्य की परिभाषाएँ।
धन संचय की होड़ लगी है,
साथ नहीं है कुछ भी जाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

********

वीर शहीदों के नाम

त्याग दिया हर सुख जीवन का

मृत्यू को भी गले लगाया,

कैसे धुर दीवाने थे वे 

शुभ देश प्रेम को अपनाया !


******

छिपा रूस्तम

इतने बुजुर्ग को मिल जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य की बात है इनके साथ आये सभी युवा इनके गाँव के हैं। इनमें से कोई बुजुर्ग के घर का अपना नहीं है।" परिचारिका ने कहा।

थोड़ी देर में बुजुर्ग के घर से लोग आ गए।

"यह दस हजार रुपया रख लीजिए, पुलिस को सूचना नहीं दीजिएगा..," बुजुर्ग के घर से आये युवक ने कहा।

******


सत्य का होता दमन


ज्ञान के भी नेत्र फूटे

        पाप सिर चढ़ बोलता

       नीतियां सब ताक ऊपर

        कौन किसको तोलता

      स्वार्थ जिससे पूर्ण हो बस

         ये करें उसको नमन

         घुल गया..............।।

*******



बैरी बदरवा

गोइंड़े ठाढ़े बदरऊ न बरसैं ।
हमरी अटरिया पे झाँकि दिखावें
हमहीं बुनियाँ को तरसें ॥
गोइंड़े ठाढ़े बदरऊ न बरसैं ॥

*******

पगड़ीघर में मेहमानों की आवाजाही बढ़ गई है। कार्यक्रम की रूपरेखा बन रही है कौन जाएगा कैसे जाएगा क्या करना है कैसे करना है जैसी चर्चाएं जोरों पर हैं । चाचा ससुर उनके बेटे देवर दोनों बेटे दामाद सभी समूह में बैठकर जोरदार तरीके से शानदार कार्यक्रम की योजना बनाते और फिर एक एक से अकेले अलग-अलग खर्च पानी की चिंता में दूसरे के दिये सुझाव की खिल्ली उड़ा कर उसे खारिज करते। समूह में दमदारी से सब करेंगे अच्छे से करेंगे के दावे खुद की जेब में हाथ डालने के नाम पर फुस्स हो जाते*******


वो शाम उलझी हुई थी
ये रात बिखरी पड़ी है
मैं सुबह को समेटूँगा कैसे
सूरज रूका पड़ा है

उलाहने देता वो समंदर
कभी ना रुकती वो नदी
बस मैं ही ठहरा हूँ
हिमालय का साथी बनके

********

राजनीति की लाइफलाइन है पाखंड

जैस अच्छी सेहत का राज अच्छे खान-पान और नियमित व्यायाम में छुपा है वैसे ही  नेताजी की सफलता का राज पाखंड सुबह-शाम में छुपा है। उनका आदर्श वाक्य ही यह है कि काम कम करो लेकिन पाखंड ज्यादा करो क्योंकि पाखंड ही वो 'देव' है जिसकी शरण में जाए बगैर न कोई नोटिस करता है और न ही कोई आमंत्रित करता है! 

*****

चलते-चलते आईए आपको मुम्बई लोकल ट्रेन के सफर पर ले चलते हैं

एक संस्मरण मेरी कलम से 


"मुंबई की लोकल ट्रेन"

तो हम कहना ये चाहते हैं कि -मुंबई महानगर की जीवन रेखा "मुंबई की लोकल ट्रेन" ये सिर्फ एक सवारी गाड़ी नहीं है जो यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक किफायती सफर कराती है बल्कि ये पटरियों पर दौड़ता हुआ एक शहर है। जिसमे सफर करना और सहयात्रियों के साथ निभाना भी एक कला है। यदि आप इस कला से वाकिफ नहीं है तो आपके लिए सफर दुस्कर ही नहीं होगा बल्कि एक दुःस्वप्न साबित होगा। 

 एक दिन मैंने भी किया था इस "मुंबई लोकल ट्रेन" में ऐसा सफर जो भुलाये नहीं भूलती।  

*******

*******आज का सफर यहीं तक, अब आज्ञा देआप का दिन मंगलमय होकामिनी सिन्हा 















शनिवार, अगस्त 27, 2022

"सभ्यता पर ज़ुल्म ढाती है सुरा" (चर्चा अंक-4534)

 चर्चा मंच के सभी पाठकों को स्नेहिल अभिवादन!

मित्रों! देखिए शनिवार की चर्चा में कुछ अद्यतन लिंक।

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गीत "सभ्यता पर ज़ुल्म ढाती है सुरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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ज़िन्दगी को आज खाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।
--
उदर में जब पड़ गई दो घूँट हाला,
प्रेयसी लगनी लगी हर एक बाला,
जानवर जैसा बनाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।। 

उच्चारण 

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हाँ वो सच्चे वीर थे 

वो रक्षक रणवीर थे ! 
हाँ वो सच्चे वीर थे 
हाँ वो सच्चे वीर थे ! 

Sudhinama 

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मैं #रचनाओं को अपनी ! 

इमेज गूगल साभार

 मैं #रचनाओं को अपनी, एक #तमाशा बनाता हूं । मचलती हुई मीडिया की, दरों दीवार पर चिपकाता हूं। 

मेरी अभिVयक्ति 

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सुगम गीता (द्वितीय अध्याय 'प्रथम भाग') 

मृत या मरणासन्न पर, आह नहीं पण्डित भरे।
शोक-योग्य दोनों नहीं, बात ज्ञानियों सी करे।।१।।
उल्लाला 

तुम मैं या ये भूप सब, वर्तमान हर काल में। 
रहने वाले ये सदा, आगे भी हर हाल में।।२।। 
उल्लाला 

तीन अवस्था देह को, जैसे होती प्राप्त। 
देही को तन त्यों मिले, मोह हृदय क्यों व्याप्त।।३।। 

Nayekavi वासुदेव अग्रवाल नमन

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नियति के हवाले 

राग दरबारी के सुर में सुर मिलाते हुए, रंगीन प्यालों में भर कर
असत्य का विष पी रहे हैं सभी ।

अग्निशिखा 

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क्या लिखूं क्या नहीं 

बारम्बार  लिखना लिखाना 

फिर खोजना क्या नवीन लिखा 

पर निराशा में डूब जाना 

कुछ  नया न लगा नए लेखन में | 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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जीवन उत्सव 

क्यो तकते राह उत्सवों की
क्यो साल भर बैठ 
इंतजार करते जन्मदिन का
क्यो नहीं मनाते हम हर एक दिन को
क्यो नहीं सुबह मनाते
क्यो शामें उदास सी गुजार देते 

मेरे मन का एक कोना 

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पाकिस्तान के संकट का क्या हमें फायदा उठाना चाहिए? 

भारत और पाकिस्तान ने इस साल एक साथ स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे किए हैं। पर दोनों के तौर-तरीकों में अंतर है। भारत प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है, और पाकिस्तान दुर्दशा के गहरे गड्ढे में गिरता जा रहा है। जुलाई के अंतिम सप्ताह में पाकिस्तान सरकार ने देश चलाने के लिए विदेशियों को संपत्ति बेचने का फैसला किया है।  जिज्ञासा 

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जीवन का सुख सारा बचपन प्यारा-न्यारा-दुलारा बचपन
नहीं था चिंता कोई फिकर-गम
अल्हड़पन में डूबा निडर मन
मां की ममता पिता का डर
जिद्दी बन हठ करता मगर
दादी मां की कहानी सुनकर
दौड़ते गलियों में सब दिनभर 
BHARTI DAS 

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बकरी पाती खात है ताकी काढ़ी खाल। जे नर बकरी खात हैं, ताको कौन हवाल।। #कबीर 

Moral of the story 
जब बेगुनाह की खाल उतार ली जाती है तो 
गुनाहगार का क्या हश्र होगा!!!!

नया सवेरा 

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टीस.... 

फिर सिमट गये ख्वाब सारे, 
उम्र की दराज़ मे।  

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एक यादगार यात्रा 

दौड़ने दो खुले मैदानों में,

इन नन्हें कदमों को जनाब

जिंदगी बहुत तेज भगाती है,

बचपन गुजर जाने के बाद

बचपन की वो यादें अब भी आती हैं

रोते में अब भी वो हँसा जाती हैं|  अज्ञात... 

यह पंक्तियां न जाने किसकी लिखी हैं पर इन पंक्तियों के भाव जैसा मन कई बार बचपने और उन यादों जगह पर ले जाता है जहां पैदा हुई और कुछ बचपन बीता। 

कुछ मेरी कलम से  kuch meri kalam se ** 

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कठोपनिषद में बालक नचिकेता ये देखकर हैरान हो जाता है ,क्यों उसके पिता विश्वजीत यज्ञ में ऐसी गायें दान में दे रहें हैं जो अपने हिस्से का चारा खा चुकीं हैं ,दूध दे चुकी हैं पानी पी चुकीं हैं और जिन्हें दान में देने से मेरे पिता को अपयश ही मिलेगा। आज

कठोपनिषद में बालक नचिकेता ये देखकर हैरान हो जाता है ,क्यों उसके पिता विश्वजीत यज्ञ में ऐसी गायें दान में दे रहें हैं जो अपने हिस्से का चारा खा चुकीं हैं ,दूध दे चुकी हैं पानी पी चुकीं हैं और जिन्हें दान में देने से मेरे पिता को अपयश ही मिलेगा। आज दूध दही का खाना हरा भरा हरियाणा का नारा देने वाला हरियाणा गौ वंश की दुर्दशा को असहाय निहार रहा है जब के दूध देने में असमर्थ बे -सहारा गौ- वंश शहर की सड़कों पर डेरा डाले हुए अहर्निस नागर सुरक्षा के लिए ट्रेफिक के लिए ख़तरा बन रहा है।  



कबीरा खडा़ बाज़ार में 

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How to describe people in English? हर व्यक्ति अपने आप में अलग होता है। हर एक की अपनी-अपनी विशेषताएं होती हैं। अंग्रेज़ी में तरह-तरह की खूबियो वाले व्यक्तियों के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग होता है। कुछ की लिस्ट यहाँ दी जा रही है। कुछ और शब्दों की लिस्ट बाद में। आप अपनी प्रतिक्रिया देकर बता सकते हैं कि आपको हमारा यह प्रयास कैसा लगा। किसी और टॉपिक कुछ जानकारी चाहते हैं तो उसके बारे में भी बता सकते हैं। 

वोकल बाबा 

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ग़म का कारोबार नहीं करते ( आधी अधूरी कहानी ) डॉ लोक सेतिया 25 साल की उम्र में ज़िंदगी से सामना हुआ तो कुछ महीनों में दोस्ती रिश्ते अपनापन की वास्तविकता समझ आ गई थी , हर कोई मुझे इस्तेमाल करना चाहता था और कोई कीमत नहीं समझ कर खरीदार बन कर मुझे पाना चाहता था बदले में देना कुछ भी नहीं चाहता था । 

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कहानी- पूर्वाग्रह 

घर के सामने बीएमडब्ल्यू के रुकने की आवाज सुनकर छोटे भाई शरद ने आश्चर्यचकित होकर मुझे आवाज लगाई,"शिल्पा दी, देखो तो अपने यहां बीएमडब्ल्यू से कौन आ रहा है?"  
"अपने यहां और बीएमडब्ल्यू से? सपना तो नहीं देख रहा है तू?" 

आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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