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गुरुवार, जनवरी 05, 2023

'पहले लिफ़ाफ़े एक जैसे होते थे' (चर्चा अंक 4633)

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से। 

 सादर अभिवादन। 

जनवरी माह की द्वितीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आइए पढ़ते हैं चंद चुनिंदा रचनाएँ-

सामायिक विषयों, ज्वलंत मुद्दों पर आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी का सृजन अनवरत गतिमान है। देश,समाज के समक्ष मुद्दों पर पढ़िए उनका संदेशपरक सृजन-

गीत "ताना-बाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कैसे तन और मन हो निर्मल,
मैली गंगा की धारा,
कंकरीट की देख फसल को,
कृषक बन गया बे-चारा,
*****
जीवट की राह संघर्षों से भरी है किंतु सफलता ख़ुशियों की उम्र बढ़ा देती है। आशा लता सक्सेना जी की रचना भाव गाम्भीर्य से ओतप्रोत है-

राह कंटकों से भरी


वे कोशिश में सफल हुए

मैंने असफलता का मुंह देखा

जब भी अन्देखा किया उन का

मुझे ही कष्ट भोगना पड़ा|

*****

हालातों से उत्पन्न तल्ख़ियों को बयां करते ओजस्वी गीत का रसानंद लीजिए जिसे रचा है आदरणीय सतीश सक्सेना जी ने-

अरे चीथड़ों कब जागोगे -सतीश सक्सेना

तुमको धांसू न्यूज़ सुनाकर

प्रेस मीडिया नोट कमाये !'

तुमको भरमाने की खातिर

चोर को साहूकार बताये !

*****

आदरणीय ओंकार जी की कविताओं के विषय नितांत मौलिक होते हैं। अनदेखे अति सामान्य समझे जाने वाले विषय पर भी गंभीर बात हो सकती है-

६८९. व्हाट्सप्प पर शुभकामनाएं

तुमने भी वही मैसेज भेजा,

जो किसी और ने भेजा था,

पहले लिफ़ाफ़े एक जैसे होते थे,

अब मैसेज एक जैसे होते हैं. 

*****

आदरणीय शांतनु सान्याल जी ने काव्य की बड़ी सुंदर रसधारा बहा दी है जिसमें रसिक पाठक भाव विभोर होकर गोते लगाते हैं-

प्रणय पथिक - -

सर्दियों में धूप हमें बड़ी प्यारी लगती है। आदरणीया डॉ.(सुश्री) शरद सिंह जी रचना ने मनमोहक बिंब प्रस्तुत किए गए हैं-

 कविता नहीं मालूम था डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मुझे नहीं मालूम था

कि धूप

मेरे हाथ से

फिसल कर

शीत में

बदल जाएगी,

*****

सामाजिक परिवेश में अनेक विसंगतियाँ व्याप्त हैं। आदरणीया साधना वैद जी का दृष्टिकोण पढ़िए उनकी कहानी में-

लगाम

विवाह के बाद तो घरपरिवारशहरगलीमोहल्ला सब बदल जाते हैं ! शादी के बाद कुछ छूट भी मिल जाती है ! हमारी गिनती भी बड़ों में होने लगी ! सोचा अब तो नियंत्रण की यह तलवार सर से हट ही जायेगी ! 

*****

पढ़िए आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी की  एक  मर्मस्पर्शी लघुकथा जो रिश्ते की तल्ख़ी बयान करती  हुई हमारी संवेदना को झकझोरती है - 

खाई से जुड़ा दो पहाड़

"तितलियाँ नहीं दीमक कहिएजिन्हें गुनना नहीं बस... सहायिका को जमीन खरीदकर उसपर घर बनवाकर देने के बाद वो कहती है कि क्या ईंट निकालकर खायें!"

*****

ज्वलंत विषयों पर सारगर्भित लेख प्रस्तुत करते हैं आदरणीय प्रमोद जोशी जी-

जजों की नियुक्तियों से जुड़ा विवाद

उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर में रेलवे की जमीन पर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के विरोध में चार हजार से ज्यादा परिवार सड़कों पर आ गए हैं। इनमें ज्यादातर मुस्लिम परिवार है। यह विवाद 2007 से चल रहा है और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने का आदेश पारित किया है। अतिक्रमण हटाए जाने का विरोध करने वालों ने धरने और रास्ता जाम का सहारा लिया है।
*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


14 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर समीक्षा के साथ अच्छी चर्चा प्रस्तुत की है आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी ने। एतदर्थ बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करें।

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  2. सराहनीय रचनाओं से सजा चर्चा अंक!

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  3. शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार
    श्रमसाध्य प्रस्तुति हेतु साधुवाद

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  4. पठनीय सूत्रों का संकलन । आभार आदरणीय।

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  5. बढ़िया लिंक दिये आपने, आभार रचना पसंद करने के लिए रवींद्र जी

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  6. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  7. बहुत ही सुन्दर सूत्रों से सुसज्जित आज की चर्चा ! अपनी पोस्ट की लिंक यहाँ देख कर अपार हर्ष हुआ ! आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार रवीन्द्र जी ! सादर वन्दे ! सभी मित्रों एवं पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएं !

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  8. मुग्ध करता अंक, सभी को नव वर्ष की अनगिनत शुभकामनाएं, मुझे शामिल करने हेतु हृदय तल से असंख्य आभार आपका । सभी रचनाएँ असाधारण हैं ।

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  9. बहुत ही सुन्दर रचना संकलन

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  10. एक से बढ़कर एक प्रस्तुति !

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  11. बहुत सुन्दर संकलन रचनाओं का |मेरी रचना को शामिल करने के लिए धन्यवाद |

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