फ़ॉलोअर



यह ब्लॉग खोजें

: चर्चाकारः रवीन्द्र सिंह यादव एवं डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
: चर्चाकारः रवीन्द्र सिंह यादव एवं डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, अगस्त 10, 2020

'रेत की आँधी' (चर्चा अंक 3789)

सादर अभिवादन। 
सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

यूपीएससी 2019 
परीक्षा परिणाम आया 
अपनी-अपनी ज़ात के 
सफल अभ्यर्थियों का 
सोशल मीडिया पर 
जातिवादियों ने 
जमकर जश्न मनाया।

-रवीन्द्र सिंह यादव 

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
--
"मात्रिक छन्दों के बारे में कुछ जानकारियाँ"  
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

(क) ह्रस्व (लघु)-वर्ण मात्रा-गणना की प्रमुख इकाई है। लघु वर्ण एक मात्रिक होता हैयथा-अकिकु। लघु का चिह्न।’ है। दो लघु वर्ण मिलाकर एक गुरु के बराबर माने जाते हैं। इसके नियम इस प्रकार हैं-संयुक्ताक्षर स्वयं लघु होते हैं।चन्द्रबिन्दुवाले वर्ण लघु या एक मात्रावाले माने जाते हैंयथा-हँसनाफँसना आदि में हँफँ।ह्रस्व मात्राओं से युक्त सभी वर्ण लघु ही होते हैंजैसेकिकु आदि।हलन्त-व्यंजन भी लघु मान लिए जाते हैंजैसे-अहम्स्वयम् में म्(ख) दीर्घ (गुरु)-दीर्घ वर्ण ह्रस्व या लघु की तुलना में दुगनी मात्रा रखता है। दीर्घ वर्ण के लिए ” चिह्न प्रयुक्त होता है। मात्रिक छन्दों में मात्रा की गणना से सम्बन्धित दीर्घ वर्ण सम्बन्धी नियम इस प्रकार हैं     संयुक्ताक्षर से पूर्व के लघु वर्ण दीर्घ होते हैंयदि उन पर भार पड़ता है। जैसेदुष्टअक्षर में दु’ और । यदि संयुक्ताक्षर से नया शब्द प्रारम्भ हो तो कुछ अपवादों को छोड़कर उसका प्रभाव अपने पूर्व शब्द के लघु वर्ण पर नहीं पड़ताजैसे–’वह भ्रष्ट’ में ’ लघु ही है।
--
My Photo
युग-युग के दुष्पाप शमित हो, रहे शुभम् 
सुकृति-सुमति से पूरित हो तन-मन जीवन 
कुलांगार कर क्षार ,भाल   चंदन धर दो 
राष्ट्र-पुरुष का माथ तिलक से मंडित हो ,
मनुज लोक में पुण्य-श्लोक संचारो!
--
My Photo
रेत की आँधी–
दर्जी हट्टी में खड़े
नंगे पुतले।
--
'मोह'
My Photo
 इस सम्प्रभुता का परित्याग कर स्वयं का अस्तित्व खो जाता है कहीं । 'मैं' हम में बदल कर विशद बने तो बेहतर है लेकिन कई बार अत्यधिक मोह का भाव सुकून की जगह पराश्रय का भाव भी पैदा कर देता है..,जरा इस विषय पर भी गौर करना ।"
       मोह को सीमाओं में बाँध कर  सहजता और निर्लिप्तता के साथ बात का समापन कर वह एक सन्यासी की तरह आगे
बढ़‎ गई ।
शायद सांसारिक व्यवहारिकता से थक कर ।
--
 न जाने क्यों कई सरहद से घर नहीं लौटते 
कई बाढ़ के बहाव में बह जाते हैं दूसरी दुनिया में 
कई प्लेन क्रेश में दम तोड़ देते हैं  
कई बम विस्फोट में राख का ढ़ेर बन जाते हैं  
कई नौकरी न मिलने पर फंदे से लटक जाते हैं 
क़लम उनके पंख लिखना चाहती है उड़ाना चाहती है 
--
उम्मीदों से भरा...

महीना अगस्त का मानों उम्मीदों से भरा 
शिकस्त चाहे उस या फिर इस पार ज़रा  
वैसे भी कलियों के आने से खुश है गुलदान 
फूल खिले न न खिले उम्मीद रहती है बनी 
हादसे कई हो जाते हैं फिर भी आँधिंयों से
--
कहीं नहीं गए पि‍ता.... 
यहीं तो है
उनकी टोपी, उनका लोटा
चश्मा-घड़ी, हैंगर में टंगे शर्टऔर हिसाब वालाबरसों पुराना टीन का संदूक भी....
हर जगह बाक़ी हैउनकी ऊँगलियों का स्पर्शछत, सीढ़ियाँ और कमरे सेआती है आवाज़...उनकी गंध फैली है समूचे घर मेंवो कहीं नहीं गएपापा यहीं हैं, हमारे पास ।
--
दोस्त कुछ अपने से, कुछ पराए से 

जो साथ हैं उनके साथ दोस्ती अपने उच्चतम स्तर के साथ और भी गहराती जा रही है. जो छोड़कर चले गए, जिनके लिए हम दोस्त नहीं हैं उनके लिए बुरा सोच भी नहीं सकते क्योंकि वे कल तक तो हमारे मित्र रहे हैं. हमारे लिए तो वे आज भी मित्र हैं. ऐसे भटके हुए मित्रों के लिए हमारी कामना फिर भी यही है वे जहाँ रहेंखुश रहें भले हमसे दूर रहें. बस भटकें नहींगलत कदम न उठाएँ.
--
कुछ अशआर यूँही..... 
एहसास अंतर्मन के
कर दिए जबसे जज़्बात मिरे,मैंने दफ़न
ज़िक्र मेरा भी सयानों की तरह होता है ...
इल्ज़ाम ए मोहब्बत से बरी है मुजरिम
इश्क़ उसका तो बयानों की तरह होता है ....
--
करम का लेखा 

चढ़ी सुनहरी ऐनक आँखों
कर्म धूप का तेज न देखा।
हाथ पसारे आज खड़ा जब
रोया देख करम का लेखा।
टूटी किश्ती लिए भँवर में
जीवन अपना आज डुबोया।
छप्पर....…........ खोया।
--
दीप पुंज ले बढ़ते जाए 
BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN
आओ करें प्रकाशित जग को, दीप पुंज ले बढ़ते जाएं शांत पवन या भले आंधियां टूटे ना लौ जल जल जाए कितना भी शातिर वो तम हो लौ से तेरी बच ना पाए अंधियारे को चीर नित्य ज्यों सूरज सब को राह दिखाए कितनी रातें काल सरीखी ग्रसें उसे और सुनहरी किरण लिए जगमग हो आए हों
--
घोसला ..डॉ. अनुपमा गुप्ता 

वह ढेर, सारे तिनकों का
बहुत सारी मेहनत
और अखंडित लगन से
बनाती है एक घोसला
जिसमें पालती है
अपने दुधमुहों को
और मांगती है दुआ
कि उनके अपने बच्चे
न भूलें, यह घोसला
--

कैसे निजात पाऊँ

मन भाता कोई नहीं है
 नहीं किसी से प्रीत  
है दुनिया की रीत यही
 हुई बात जब  धन की |
सर्वोपरी जाना इसे
 जब देखा भाला इसे
भूले से गला यदि फंसा
 बचा नहीं पाया उसे |
--
आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 
रवीन्द्र सिंह यादव

सोमवार, मार्च 09, 2020

महके है मन में फुहार! (चर्चा अंक 3635)

सादर अभिवादन के साथ  
आप सबको होली की बधाई हो।
मित्रों!
आज होलीकोत्सव है। 
होली का त्यौहार रंगों का त्यौहार या रंग पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार को फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. होली के दिन होलिका दहन का पूजन होता है। इसी दिन गाँव के किसान अपनी फसल के नये दाने अग्नि को चढ़ाते हैं. होलिका की अग्नि में नये अन्न चढ़ाने के बाद ही किसान नया अन्न खाना शुरू करता हैं। प्राचीन काल में होली केवल फूलों से या फूलों से बने रंगों से ही खेलने का प्रचलन था. परंतु आधुनिक समय में रंगों एवं गुलाल से होली खेली जाती है। इस दिन घरों में विभिन्न पकवान बनते हैं जैसे गुझिया, मठरी आदि। रंगों के इस त्यौहार में लोग गिले-शिकवे भूलकर एक दूसरे को गले लगाते है और खूब मस्ती करते हैं। यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का भी प्रतीक माना जाता है।
आजकल पूरे संसार में कोरोना नामक खतरनाक वायरस का प्रकोप फैला हुआ है। 
इसलिए मेरा सभी लोगों से बलपूर्वक विनम्र आग्रह है कि 
घर के बाहर जाकर समूह में होली न खेलें 
इस वर्ष गले न मिलें अपितु हाथ जोड़कर अपने-अपने ढंग से अभिवादन करें।
होलीगीत  
"महके है मन में फुहार! चलो होली खेलेंगे"  

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   
*****  
चाहती हैं स्त्रियां 
मेरी फ़ोटो
स्त्रियां चाहती हैं
देश दुनियां में 
केवल सुख भोगती स्त्रियों का 
जिक्र न हो
जिक्र हो 
उपेक्षा के दौर से गुजर रहीं स्त्रियों का
रोज न सही 
महिला दिवस के दिन तो 
होना चाहिए--- 
 *****
नारी 
सरिता सम नारी रही,अविरल रहा प्रवाह।
जन्म मरण दो ठौर की ,बनती रहीं गवाह ।
बनती रहीं गवाह,इन्हीं से जीवन कविता ।
सदा करें सम्मान ,रहे निर्मल ये सरिता । 
 *****
My Photo
कुछ हैवानों के कारण हम सभी परेशान हैं   
कुछ हममें भी राक्षस है, कुछ तुममें भी राक्षसी है   
हमें परखना होगा, हम सब को चेतना होगा   
हमें एक दूसरे का साथ देना होगा।   
हमें चलना है, हमें साथ जीना है   
हम पूरक हैं   
ओ साथी !   
आओ, हम कदम से कदम मिला कर चलें !  
 *****
वो जो इतवार के एक दिन का आधिकारिक अवकाश मिलता है मुझे कहो, अपनी कहूँ या फिर सुनूँ उनकी.. या फिर से वही करूँ.. जो सदा से करती आई हूँ - घर के रोजमर्रा के काम या छः दिन के दफ़्तर के कामकाज से छुटकारा पा.. करूँ वो.. जो अच्छा लगता है मुझे बस, केवल एक दिन पर अगर मैं भी अपना इतवार मनाऊँ, तो क्या... वे कहना छोड़ देंगे - "जो औरतें बाहर काम करती हैं वे घर भी तो संभालती हैं।
*****
जीने दो मुझे भी
अस्तित्त्व है जो मेरा खत्म न करो
कोख में खत्म करने से तो डरो।
कोशिश होगी मेरी कि
मैं नाम तुम्हारा रोशन कर दूंगी।
*****

लालसा 

रंगीन,श्वेत-स्याह
तस्वीरों में 
जीवन की
उपलब्लियों की 
छोटी-बड़ी
अनगिनत गाथाओं में
उत्साह से लबरेज़
आत्मविश्वास के साथ
मुस्कुराती 
बेपरवाह स्त्रियाँ 
मन के पाखी पर Sweta sinha  
*****

महिला दिवस 

आशाओँ के दीप जले हैँ ,  
आगे-आगे कदम बढ़ेँ हैँ ।  
कहीँ गर्व से ऊँचा मस्तक,  
कहीँ झिड़कियाँ खूब पड़ी हैँ... 
*****

कलयुग की द्रोपदी..... 

नीतू ठाकुर 'विदुषी' 

एक निवेदन सुनो द्रोपदी,  
मार्ग श्रेष्ठ दिखलायेंगे।  
कलयुग बना कृष्ण की बेड़ी,  
कैसे तुम्हें बचायेंगे... 
*****

बरसाइये प्रेम रंग होली में 

मन के वातायन पर जयन्ती प्रसाद शर्मा  
*****

नारी किरदार 

बलबीर सिंह राणा 'अडिग '  
*****

नारी 

कुंडलिनी
1)
वनिता ,नव्या ,नंदिनी, निपुणा बुद्धि विवेक ।
शिवा,शक्ति अरु अर्पिता ,नारी रूप अनेक ।
नारी रूप अनेक, रहे अविरल सम सरिता ।
सकल जगत का मान,सृजनकारी है वनिता ।... 
काव्य कूची पर anita _sudhir 
*****

मेरा आधिकारिक अवकाश 

~Sudha Singh 
*****

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:  

महिलाओं को खुद की कद्र करना सीखना होगा!! 

*****

होली गीत :  

ए सखी आयो कन्हाई री ... 

उड़त अबीर गुलाल
रंग भयो रतनार
पकड़ लयी कलाई री
ए सखी आयो कन्हाई री .... 
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव  
*****
नारी ईश की अद्भुत कृति 
पल में ही वो वंदित होतीक्षण में ही वो कामना पूर्तिनारी ईश की अद्भुत कृति....सुख विभावरी की छलना सीसुरभित अंचल की गरिमा सीशीतल झरनों की अनुभूतिनारी ईश की अद्भुत कृति.... 
*****

रंग 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
*****

कविता २ 

एक वक्त था जब
महकते थे फूल बहुत
ऋतुएं आबाद होती थी
लय की बात होती थी
संगीत झरते थे अल्फ़ाज़ डूबते थे
हीर रांझे सा इश्क़ पिरोये
मैं नाचती थी कि मेरी एड़ियों की थाप से
कागज़ फट जाया करता था
ऐसी बिछड़न थी समाई कि
गीले पन्ने हाथ की छुअन से चिपकते थे
स्याही फैलने तक मेरे वजूद का अहसास था... 
*****

नारी का तुम सम्मान करो।  

A Poem on International Women's Day. 

नर हो तो तुम एक काम करो,
कभी ना उनका अपमान करो,
सृष्टि की सर्वोत्तम रचना है जो,
उस नारी का तुम सम्मान करो।
©नीतिश तिवारी।
*****
आज के लिए बस.... *****