फ़ॉलोअर



यह ब्लॉग खोजें

गुरूवासरीय चर्चा-पं.डी.के.शर्मा "वत्स" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गुरूवासरीय चर्चा-पं.डी.के.शर्मा "वत्स" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, नवंबर 04, 2010

गुरूवासरीय चर्चा( महज चन्द लिंक्स)

नमस्कार/सलाम/सतश्रीअकाल/जयहिन्द !!!

सबके जीवन में प्रकाश हो,व्यवहार एवं कर्म की पवित्रता हो,ह्रदय में मधुरता का वास हो, इस मंगलकामना के साथ चर्चा मंच के सभी पाठकों को दीपोत्सव की अनन्त शुभकामनाऎँ!!!

गुरूवासरीय चर्चा में आप सभी पाठकों का हार्दिक स्वागत है. आज की चर्चा में आपको न तो कोई टीका न टिप्पणी और न ही कोई रामकहानी सुनने को मिलने वाली है……मिलेंगें सिर्फ चन्द लिंक्स…बस!

क्योंकि तुम अरुंधती नहीं हो मेरी बहन

क्या आप इरोम शर्मीला को जानते हैं? नहीं, आप अरुंधती रॉय को जानते होंगे और हाँ आप ऐश्वर्या राय या मल्लिका शेहरावत को भी जानते होंगे, आज(2 नवंबर) शर्मीला के उपवास के १० साल पूरे हो गए उसके नाक में जबरन रबर का पाइप डालकर उसे खाना खिलाया जाता है, उसे जब नहीं तब गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जाता हैं,वो जब जेल से छूटती है तो सीधे दिल्ली राजघाट गांधी जी की समाधि पर पहुँच जाती है और वहां फफक कर रो पड़ती है,कहते हैं कि वो गाँधी का पुनर्जन्म है…..

बेनकाब बेशराब(मनीष जोशी)

उफ़-आह रंग साज़ हैं, लुब्बे लुबाब में
बेलौस बांटते हैं सिफ़र, दो के आब में
नीचे सिफ़र दिया, यही ऊपर की सल्तनत
ऐसा बयाँ इस साल भी, लिक्खा किताब में
कैसा बयान था, वहाँ किसका मकान था
चल बाँट लें बन्दर के नांईं, सब हिसाब में

रौशन हो सबका आंगन भी !(स्वराज्य करूण)

न तरसे कोई दो वक्त की थाली के लिए ,
दुआ करें हम सब की खुशहाली के लिए !
हो गाँव अपने गीतों से गुलज़ार हमेशा ,
खेतों में दूर-दूर तक हरियाली के लिए !
शहरों की भीड़ में भी हर कोई लगे अपना ,
ऐसा तो कोई हो चमन माली के लिए !

संगीत और श्रृंगार(बृजेन्द्र सिँह)

जब मिलती थीं उनसे नज़रें
सातों सुर खिल जाते मन में,
जो अधकच्चे रह जाते थे
वो तड़पाते फिर सपनों में..
इस मन पगले ने ढूँढा है
तुमको हर कवि की कविता में,
संयोग में वो रस मिला नहीं
जो है वियोग की सरिता में..

एक ग़ज़ल(तिलकराज कपूर)

वायदा है मैं तिमिर से हर घड़ी टकराउँगा
स्‍नेह पाया है जगत से रौशनी दे जाउँगा।
कौन हूँ मैं बूझ पाओ तो मुझे तुम बूझ लो
लौ पुराना प्रश्‍न है जो मैं नहीं सुलझाउँगा।
बात जब मेरी हुई तो तेल बाती की हुई
मैं रहा जिस पात्र में गुणगान उसके गाउँगा।

गुल्लक(डॉ वर्तिका नन्दा)

हवा रोज जैसी ही थी
लेकिन उस रोज हुआ कुछ यूं
कि हथेली फैला दी और कर दी झटके से बंद
हवा के चंद अंश आएं होंगे शायद हथेली में
गुदगुदाए
फिर हो गए उड़नछू वहीं, जहां से आए थे

 

1.अबकी दिवाली ना जाए खाली

2.दीवाली और आज के रावण के दस रूप

3.कुछ मोहब्बत के दीये...वक़्त के निशान...और पैगाम.......

4.उत्सव-दर्शन

5.“आओ दीवाली मनाएँ प्यार से!”

6.उल्फ़त के दीप दिल में जलाओ तो बात है-

7.हर आँगन बिखरे आलोक

8.शुभकामनाये आप सभी को----- दुआ हमारे लिए भी करियेगा

9.ये कैसी दीपावली है?

10.मनायें उत्सवों का स्नेह सम्मेलन

11.चलो अपने आँगन मे दिवाली मनाये इस बार !