सुधि पाठकों!
बुधवार की चर्चा में
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
ग़ज़ल
"सुहानी न फिर चाँदनी रात होती"
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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दोहे
"माता के दोहे"
( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )
माता के नव रूप का ,राधा करे बखान ।
माता हमको दीजिए , रिद्धि सिद्धि का दान।।
मां की सेवा में रहे ,हम सब ही तल्लीन ।
कृपा अगर हो मातु की, रहे न कोई दीन...
RADHA TIWARI
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तुम कह दो...
एस.के. गुडेसर 'अक्षम्य'
प्रेम की नदी का जहाँ से उद्गम होता है
मेरे उस हृदय के अन्तःपुर पर -
हक़ तुम्हारा है
तू जो चाहे कर मेरे साथ
मुझे आँख मूँद कर स्वीकार है...
मेरी धरोहर पर
yashoda Agrawal
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एक ग़ज़ल समआत फरमाएँ-

जाने क्या कुछ नहीं कहा मुझको
वो समझता है जाने क्या मुझको
उसकी नज़रें अजब तराजू हैं
दोनों पलड़ों में है रखा मुझको...
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आजाद हिन्द की टोपी पहन,
कांग्रेस पर वार कर गए मोदी

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बकवास करना भी
कभी एक नशा हो जाता है
अपने लिखे को
खुद ही पढ़ कर
अन्दाज कहाँ आता है

उलूक टाइम्स पर
सुशील कुमार जोशी
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वृन्दावन ...
लोहे के घर से एक संस्मरण

बेचैन आत्मा पर
देवेन्द्र पाण्डेय
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अब बदल गई पारो
देवदास की ‘पारो’
शरतचंद्र चटोपाध्याय के उपन्यास देवदास ने बॉलीवुड ही नहीं हिंदुस्तानी प्रेमियों के लिए जैसे एक चरित्र गढ़ दिया। यूं तो लैला मजनूं, सीरी फरहाद जैसे प्रेम प्रतीक जोड़ियां पहले से विद्यमान हैं। लेकिन शरतचंद्र के उपन्यास का नायक देवदास तमाम उदास और भटके हुए प्रेमियों का नायक बन जाता है। बल्कि इससे भी आगे देवदास प्रेमियों का दिल लगा मुहावरा भी है कि जैसे- अरे क्या देवदास जैसी हालत बना ली है, देवदास बने क्यों फिर रहे हो, ओ देवदास आइने में अपनी सूरत तो देखो आदि...
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जानिए सबरीमला मंदिर
क्यों सबकी आंखों में खटक रहा है?

Virendra Kumar Sharma
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सविता भार्गव की कविताएँ

समालोचन पर
arun dev
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The Karmic Principle ,
Planetry Positions
and Impressions
(Sanskars)
जो ब्रह्मांडे सो पिण्डे
Virendra Kumar Sharma
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गूगल मैप्स की ये ट्रिक
आप जरुर आजमाना चाहेंगे।

दिनेश प्रजापति
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प्रयागराज ' अशुद्ध प्रयोग ' है
रमेश जोशी

क्रांति स्वर पर
विजय राज बली माथुर
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देर मेरी ही तरफ़ से हुई है
दीपावली के मुशायरे हेतु,
क्षमा के साथ दीपावली के
तरही मुशायरे का
तरही मिसरा प्रस्तुत है
पंकज सुबीर
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ग़ज़ल
मुस्कुरा कर बुला गया है मुझे
एक बच्चा रिझा गया है मुझे
साँस में जागी संदली खुशबू
कोई देकर सदा गया है मुझे...
वाग्वैभव पर
Vandana Ramasingh
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खुशी तो हड़बड़ी में थी
खुशी तो हड़बड़ी में थी,
घरी भर भी नहीं ठहरी।
मगर गम को गजब फुरसत,
करे वो मित्रता गहरी।।
उदासी बन गयी दासी
दबाये पैर मुँह बाये
सुबह तक तो गिने तारे,
कटे काटे न दोपहरी...
रविकर
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जिसकी लाठी
उसकी भैंस की तरह
हुआ करते थे
कभी चौराहों पर झगडे
तो कभी सुलह सफाई
वक्त की आँधी
सब ले उड़ी
आज बदल चुका है दृश्य ...
vandana gupta
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सहज अभिव्यक्ति लिए
सतरंगी विमर्श

परिसंवाद पर
डॉ. मोनिका शर्मा
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हाइकू
१.
कलकल सी
अविरल बहती
धार नदी की ...
कलकल सी
अविरल बहती
धार नदी की ...
झरोख़ा पर
निवेदिता श्रीवास्तव
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रिश्तों की पाठशाला ...
(1)
आपको पता है न. उसने जीवन भर हमारे साथ कितना बुरा व्यवहार किया. कभी हमारी तो क्या बच्चों की शक्ल तक नहीं देखी. कभी होली दिवाली नमस्कार करने जैसा भी नहीं. फिर भी हम सब भुलाकर रिश्ता निभाते रहे.
हाँ. बात तो आपकी सही है. हमारे साथ भी उसका यही व्यवहार था.
पर उस दिन उसकी गलती थी. कितना भारी , सुख और दुख दोनों का ही समय था. एक दिन के लिए भी जिस बेटी को स्वयं से अलग नहीं किया, वह हमसे इतनी दूर जाने वाली थी. तब उसने पूरा माहौल खराब किया. आधी रात में सड़क पर हंगामा किया. नये बन रहे रिश्तों के सामने ... .
हाँ. बात तो आपकी सही है. हमारे साथ भी उसका यही व्यवहार था.
पर उस दिन उसकी गलती थी. कितना भारी , सुख और दुख दोनों का ही समय था. एक दिन के लिए भी जिस बेटी को स्वयं से अलग नहीं किया, वह हमसे इतनी दूर जाने वाली थी. तब उसने पूरा माहौल खराब किया. आधी रात में सड़क पर हंगामा किया. नये बन रहे रिश्तों के सामने ... .








