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शनिवार, फ़रवरी 04, 2012

"काश मैं बदल सकता वक़्त" (चर्चा मंच-779)

मित्रों!
शनिवार की चर्चा के लिए
मेरी पसन्द के लिंक देखिए!
मेरा परिचय यहाँ भी है!
आज मेरा जन्मदिन है!
दिल के मतदान की तिथि १४ फरवरी नजदीक है ,
हफ्तों पहले लडके और लड़कियां यूद्ध स्तर पर तैयारी पे लगे हैं,
कोई इन्टरनेट से प्रचार कर रहा है,.....
अगर हो सके तो प्यार के फूल खिलाना
जिससे महक सके घर आंगन
अगर ऐसा संभव न हो तो कम - से -
कम बचना नफरत की दीवार उठाने से ...
आखिर ये दिन आ गया , बहुत दिनों के बाद ।
टूट गया क्रम हर का , चखा जीत का स्वाद ।।..
कभी भी कोई भी आत्मसम्मान वाला देश और उसके देशवासी अपने देश को लूटने , अपनी बहन बेटी के बलात्कार करने वाले और हर तरह के व्यभीचारी आक्रमणकर्ताओं के द्वारा लिखा इतिहास स्वीकार नही कर सकते......तो फिर हम लोगो को क्या हो गया है जो हम महाराणा प्रताप को कायर और अकबर को महान बोलते है?....अकबर को महान बोलने वाले लोग यहाँ पर देखे...की कैसे हम लोगो से सच को छुपा कर आज तक गुलाम बना कर रखा गया है...
क्या अकबर महान था ?
अनुराग अनंत के ब्लॉग पर उनकी रचना पढ़ कर
जो मन में भाव उठे ..
उनको आपके साथ बाँट रही हैं ..
मुस्कुराती तस्वीर
लोमड़ी और सारस की काव्य-कथा पढ़िए
बच्चों का कोना में!
- गहरे दोस्त लोमड़ी सारस, रहते थे एक नदी किनारे.
कहा लोमड़ी ने सारस से, खाने पर घर आओ हमारे.
सूट, बूट और टाई पहन कर,
सारस घर से निकला सजकर..,..
ज़ेर-ए-लब भी हम शिकायत कर ना सके
दर्द-ए-दिल कागज़ पर हम रचते रहें*
*वे खुश होकर पढ़ते, तारीफ़ करते रहे ...
दिग्विजय सिंह ने 'लाटूर के भूकंप' और
'जापान की सुनामी' के लिए भी 'RSS' को जिम्मेदार ठहराया।
जय हो ! झक्की दिग्गी!
गाड़ी छुक-छुक चल रही, तेइस घंटे लेट ।
चौदह को निश्चित करे, वेलेन्टाइन डेट
कलमदान
- *सूरज न मुख करियो मेरी ओर* * बसंती हो जाऊँगी...*
* रंग बसंत ,राग बसंत ,रुत बसंत *
* बसंत ही में ढल जाऊँगी *
* फिर ओढ़ बसंती चुनरी *
* मन ही मन इठलाऊँगी...
वो एक बेचैन सी सुबह थी,
आस पास लोगों की भीड़...
कई सारे अपने से चेहरे,
जैसे सभी से एक न एक बार मिल चुका हूँ कहीं,
बस अपने आप को ....
अबके आना तो चराग़ों की हंसी ले आना
जब मेरा मन उदास होता है
तो उदासी चाहती है कि, शब्द उसे गले लगा लें...!
कोई मौन दयालु हो जाए और,
वाणी को वहीँ से श्रोत मिले ऐसा श्रोत-
जिसमें शब्द तो हों पर...
जीवन का वरदान!
.कृष्ण लीला .........भाग 36
इक दिन मोहन मन -मोहिनी रूप बनाये
यमुना किनारे खेलने गए
किरीट कुंडल पहने उपरना ओढ़े
लकड़ियाँ हाथ में लिए
पीताम्बर डाले सखा के
कंधे पर हाथ धरे खड़े थे...
मुम्बई दो छोरों का शहर है

इनका शुभ नाम है - चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद,
इनकी Industry है Non - Profit
और ये
Occupation से हो चुके हैं - सेवा निवृत्त ।
नूतन मनहरण.... किरण से
त्रिभुवन को जगा दो
निहारूं तुम्हारे आँखों पर आये
अपार करुणा को नमन है
निखिल चितचारिणी धरित्री को
जो नित्य नृत्य करे --
पहाड़ उसे बुला रहे
अश्रुपूरित नयनों से
वह देखती अनवरत
दूर उस पहाड़ी को
जो ख्वावगाह रही उसकी
आज है वीरान
कोहरे की चादर में लिपटी
किसी उदास विरहनी सी ...
*कलियों फूलों पर मंडराया।।***
*यह गुंजन करता उपवन में।***
*गीत सुनाता है गुंजन में।।***
*कितना काला इसका तन है।***
*किन्तु बडा ही उजला मन है.......
चेहरा -
राधा जिसकी तारीफ करते लोग थकते नही,
चाहे वो उसके रिश्तेदार हो,
आस- पडोस के लोग हों या उसके मित्र ।
सभी कहते जिस घर जायगी,
वो बहुत ही भाग्यवान होगा । मगर ...
विश्वास-अविश्वास-विश्वास
सर्द रात फटे हुए कपड़ों में सर घुटनों में छुपाए
सिसकियाँ ले कर आंसू बहा रही थी
सर्दी में काँप रही थी
उस पर मेरी दृष्टि पडी
रोने का कारण जानने की...
काश मैं बदल सकता वक़्त
गुज़रते हुए देखें हैं, साल कई;
गुज़रते हुए देखें हैं, लोग कई.
पर दर्द असहनीय और गहरा देखा;
जब बेटे को पिता के कंधों पर जाता देखा.
काल से पूछता हूँ,....
जागो सखी, जागो बसंत आ गया .........
अवनी के कण-कण में.
अपरमित उल्लास है छाया
जागो, जागो .... जागो सखी,
जागो बसंत आ गया .....
बसंत कब घबराता है
हाथों में फूलों को लेकर
जब तुम मुस्काती हो
तब सावन मुस्काता है ।
नयनों में काजल भरकर
जब पलकें गिराती हो
तब भादों शरमता है .....
विडम्बना
एक तरफ बनाकर देवी,
पूजते हैं हम नारी को,
भक्ति भाव दर्शाते हैं,
बरबस सर नवाते हैं,
माँ शारदे के रूप में
कभी ज्ञान की देवी बताते हैं..
_________________


बेसुरम का यह भी एक सुर- ये बलात्कारी डॉक्टर!!
बेसुरम्‌
________________


अन्त में देखिए
ये कार्टून!

शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2012

सौन्दर्य दर्शन और गाडी चालन : चर्चा मंच 778

छपते-छापते

Have you ever seen a snake in this pose..!!!

(1)
पिट्सबर्ग में एक भारतीय *

पर 

गन्धहीन - कहानी

शरद ऋतु की अपनी ही सुन्दरता है।

रेस्त्राँ में ठीक सामने बैठी रूपसी ने कितने दिल तोड़े हों, किसे पता।
देख भी लें तो पहचानेंगे कैसे?
कभी उस दृष्टि से देखने की ज़रूरत ही नहीं समझते हम।
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो, जहाँ उम्मीद हो उसकी वहाँ नहीं मिलता।
~ नक़्श लायलपुरी
कथा व चित्र: अनुराग शर्मा 
खैर,
सो तय हुआ कि ऐसे पौधे लगाये जायें जो रंगीन हों, सुन्दर भी हों, परंतु हों गन्धहीन।

(2)
164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nआप सभी पाठकों को नमन करते हुए अनामिका एक बार फिर हाज़िर है आपके समक्ष कथासरित्सागर की एक और कथा लेकर.  कथासरित्सागर की कहानियों में अनेक अद्भुत नारी चारित्र भी हैं और इतिहास प्रसिद्द नायकों की कथाएं भी हैं.मूल  कथा में अनेक कथाओं को समेट लेने की यह पद्धति रोचक भी है और जटिल भी.  ये  कथाएं आप सब के लिए हमारी भारतीय परंपरा को नए सिरे से समझने में सहायक होंगी.

(3)
मेरा फोटोअनुपमा त्रिपाठी जी को पढ़ना सदैव एक सुखद और आध्‍यात्मिक अनुभूति लिए होता है। वे एक कवियत्री तो हैं ही, साथ ही संगीत साधक भी हैं। इसीलिए वो कहती हैं – संगीत और कविता एक ही नदी की दो धाराएं हैं -- इनका स्रोत एक ही है, किंतु प्रवाह भिन्‍न हो जाते हैं।”  
कैसा उन्‍माद
कण-कण पर छाया
हुलक-हुलक.....पुलक-पुलक
हुलक-पुलक.....पुलक-हुलक
लहराती गीत गाती है धरा


(4)

आ जाओ ना-----

झरोखा पर 


कई दिनों से ढूंढ़ रही हैं
मेरी नजरें उनको

(5)
पर
हाँ ....बुरी औरत हूँ मैं मानती हूँ...... क्यूँकि जान गयी हूँ अपनी तरह अपनी शर्तों पर जीना नहीं करती अब तुम्हारी बेगारी दे देती हूँ तुम्हारी हर गलत बात का जवाब नहीं मानती आँख मूँद कर तुम्हारी हर बात सिर्फ तुम...

 और 

40,वीं वैवाहिक वर्षगाँठ... पर

Anniversary Scraps and Graphics
02/02/1972


"सच्चा-सच्चा प्यार कीजिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 
प्रेम-प्रीत के चक्कर में पड़,
सीमाएँ मत पार कीजिए।
वैलेन्टाइन के अवसर पर---

कुछ-संकेत   
पे =सोने पे सुहागा ;  
ताके=सिंहावलोकन
रही =पथ का राही
फर्ज =मनसा वाचा कर्मणा 
भाग =जीवन की आपाधापी  
करे=मिसफिट  
धीरज =कासे कहूँ 
खात्मा=कर्मनाशा

गुरुवार, फ़रवरी 02, 2012

आया ऋतुराज ( चर्चा मंच - 777 )

आज की चर्चा में आप सबका हार्दिक स्वागत है 
ऋतुराज बसंत ने दस्तक दे दी है . मौसम सुहाना हो गया है मीठी-मीठी धूप खिलने लगी है . कोयल की कुहू-कुहू सुनने लगी है. ब्लोगर भी रंग चुके है इस सुहाने रंग में 
तीन कविताएं
My Image
अपना वजूद बताओ 

तेज वेब ब्राउजर

नेह की वो परिभाषा 

रोटी या किताब ?

हमने तो अपनी अक्ल लुटाई 

जाने क्यों ----???

पेड़ न्यूज -- पुराना खेल नई चाल 

यादों का सैलाब ---- मेरे जज्बात 
My Photo
घात किसने लगाया ...... मछली या समंदर 

एक कप क़ॉफी और ख्याल
 
रुग्ण समाज में फलक का हश्र  
ज्ञान दर्पण : विविध विषयों का ब्लॉग
रामा रामा कैसा ये गजब हो गया 

मोहे पिया बिन चैन ना आवे री

अंत में एक सूचना ------ ताशकंद में होगा पांचवां अंतराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन 

आज के लिए इतना ही 
धन्यवाद 
दिलबाग विर्क 

बुधवार, फ़रवरी 01, 2012

चर्चा-मंच : ७७६: तो कल ही उड़ गया??

बजरंगबली का नाम लेके आज की पहली चर्चा राजकुमार जी की एक पुरानी रचना भैंस पे लैपटॉप   से शुरू कर रहा हूँ . आगे पढ़े दवे जी का  माय लोर्ड  और  दुबे और आपकी कहानी  . 





जी हाँ वोट बेचने का मौसम जिसमे  कस्टमर सर्विस  बेस्ट है .
 घास   खाने वाले   गधा  का वफादार  होना खुली आँखों का एक सपना है .

आज के लिए इतना ही .. 

सादर 

कमल