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मंगलवार, अप्रैल 02, 2019

"चेहरे पर लिखा अप्रैल फूल होता है" (चर्चा अंक-3293)

मित्रों!
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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अप्रैल फूल 

छत्तीसगढ़ निवासी, देश के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार श्री वीरेंद्र सरल के सानिध्य से अनायास खिला एक फूल - “अप्रैल फूल” एक अप्रैल को रेडियो सिलोन से एक गीत प्रसारित होता था - एप्रिल फूल बनाया,तुमको गुस्सा आयातो मेरा क्या कसूर, जमाने का कसूरजिसने दस्तूर बनाया….. इस गीत को सुनने से तीन प्रकार का ज्ञान मिलता है। पहला यह कि अप्रैल फूल “बनाया” जाता है। ये अलग बात है कि कैसे बनाया जाता है इसकी रेसिपी इस गीत से पता नहीं चलती। दूसरा यह कि यह फूल गुस्सा पैदा करता है। इस फूल का बायोलॉजिकल नाम पता नहीं चल पाने के कारण गुण-धर्म भी खोजे नहीं जा सके हैं। तीसरा और महत्वपूर्ण ज्ञान यह कि कोई न कोई इस दस्तूर का जन्मदाता है जो कसूरवार है...

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शर्ट के टूटे बटन में रह गए ... 

प्रेम के कुछ दाग तन में रह गए

इसलिए हम अंजुमन में रह गए
सब तो डूबे चुस्कियों में और हम
नर्म सी तेरी छुवन में रह गए... 
दिगंबर नासवा 
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612.  

प्रकृति  

(20 हाइकु) 

डॉ. जेन्नी शबनम  
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सफेद बैंगन 

Anita  
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मूर्ख दिवस पर --  

समझदारी की बातें 

Jyoti Khare 
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सेवा धर्म निभायेगा जो 

*चुनावों* का मौसम है, सभी दल अपनी अपनी उपलब्धियों को गिना रहे हैं और तरह-तरह के वायदों से मतदाताओं को लुभाने का प्रयत्न कर रहे हैं. पांच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने के बाद यदि कोई नेता अपने क्षेत्र में पुनः वोट मांगने जाता है तो उसका काम ही यह तय करता है, वह इस बार जीतेगा या नहीं... 
Anita 
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बिकाऊ -  

अज्ञेय 

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खोयी आँखें लौटीं:
धरी मिट्टी का लोंदा
रचने लगा कुम्हार खिलौने।
मूर्ति पहली यह... 
रवीन्द्र भारद्वाज  
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सोमवार, अप्रैल 01, 2019

"वो फर्स्ट अप्रैल" (चर्चा अंक-3292)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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वाकया 2013 का है।  
उस समय मेरे पिता श्री घासीराम जी की आयु 90 वर्ष की थी।  
90 साल की उम्र में भी वे अपने दैनिक कार्य स्वयं ही करते.. 
उच्चारण पर रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 

समय धार पर चलता जीवन 

मोह माया में फंसा है जीवन इस की यही कहानी  
सिसकता रहा हृदय नही मिटती बेईमानी... 
Anita saini  
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शीर्षकहीन 

Leena Malhotra  
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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की  

दो कविताएँ 

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पेड़ों के झुनझुने,
बजने लगे;
लुढ़कती आ रही है
सूरज की लाल गेंद।
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई... 
रवीन्द्र भारद्वाज 
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ग़ज़ल 

शिक्षा नसीब होती, कहना जरूर आता  
गर धूर्तता भी’ होती, छलना जरूर आता... 
कालीपद "प्रसाद" 
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