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सोमवार, अप्रैल 26, 2021

'यकीनन तड़प उठते हैं हम '(चर्चा अंक-4048)

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अमृता तन्मय जी की रचना से। 

 सादर अभिवादन 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

त्राहि-त्राहि में फँसा है संसार 

बढ़ता जाता लाशों का अंबार,

ऐ करोना! तुम क्यों आते हो 

मानवता को सताने बार-बार?

#रवीन्द्र_सिंह_यादव 


आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित चुनिंदा रचनाएँ- 

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यकीनन तड़प उठते हैं हम ......

जुनूं हमसे न पूछिए हुजूर कि हमसे क्या-क्या हुआ है ताउम्र
उलझे कभी आसमां से तो कभी बडे़ शौक़ से ज़मींदोज़ हुए 
अपनी ही कश्ती को डूबो कर साहिल से इसकद उतर आए हम
अब आलम यह है कि इब्तदाए-इश्क का गुबार भी देखते नहीं

--

शून्य दृष्टि - -

अंतरतम को बेध जाती है जीवन की

शून्य दृष्टि, निर्मम नियति के
आगे सभी हैं आज बहुत
ही लाचार, चारों
तरफ टूटते
सांसों
के मध्य मानवता करती है हाहाकार,

--

"त्रिवेणी"

ईर्ष्या और रंजिश के भाव...

फसल के रुप में उगते तो नहीं ।


बस अमरबेल से पल्लवित हो जाते हैं ।

--

५५८.वसंत


कहने को तो यह वसंत है,
पर मुर्दनी छाई है सब तरफ़,
शाख़ें लदी हैं फूलों से,
मगर ख़ुशबू ग़ायब है,
दवाओं की बू आती है उनसे. 

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टूटता पुरुष दंभ

पर तुम थे, बस, दो बातों के भूखे,
स्नेह भरे, दो प्यालों के प्यासे,
आसां था कितना, तुझको अपनाना,
तेरे उर की, तह तक जाना,
कुछ भान हुआ, अब यह मुझको!
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तिल तिल कर मिटी हस्ती मेरी 
कभी इस पर विचार न किया
जब तक सीमा पार न हुई
तरह तरह की अफवाएं न उड़ी|
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पतझर का यह मौसम है   
सूखे पत्तों की भाँति चूर-चूरकर   
हमारे अपनों को   
एक झटके में वहाँ उड़ाकर ले जा रहा है   
जहाँ से कोई नहीं लौटता, 
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एक वक़्त ऐसा भी होता था 
जब सुबह का इंतज़ार रहता 
अब डर लगता है के सुबह हो 
तो जाने क्या खबर सुन ने मिले 
ज़िन्दगी अप्रत्याशित हो चली है 
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यह शोक का समय है
नागरिक तो पहले मरे हैं
उनसे पहले मरी है
नैतिकता और मानवता
अस्पतालों में
दवाई की दुकानों पर 
गोदामों और 
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इन ग‍िद्ध पत्रकारों से आत्मग्लान‍ि की उम्मीद न करें
नकारात्मक पत्रकार‍िता का यह आलम कोरोना से जूझते आमजन को तो छोड़ि‍ए स्वयं पत्रकारों के ल‍िए शर्मनाक स्थ‍ित‍ि पैदा कर चुका है क्योंक‍ि रवीश कुमार ने जहां फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा ”लखनऊ बन गया है लाशनऊ, धर्म का नशा बेचने वाले लोगों को मरता छोड़ गए।” यहां योगी आद‍ित्यनाथ को ”धर्म का नशा बेचने वाले” ल‍िखा गया जबक‍ि जापानी इंसेफेलाइट‍िस जैसी बच्चों की संक्रामक बीमारी का सफाया करने वाले योगी आद‍ित्यनाथ की प्रत‍िबद्धता असंद‍िग्ध है।
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आज बस  यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 

रविवार, अप्रैल 25, 2021

"धुआँ धुआँ सा आसमाँ क्यूँ है" (चर्चा अंक-4047)

सादर अभिवादन ! 

रविवार की प्रस्तुति में आप सभी विज्ञजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ! आदरणीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

जी के अस्वस्थ होने के कारण  मैं मीना भारद्वाज

उपस्थित हूँ आज की चर्चा प्रस्तुति के साथ ।

 आज की चर्चा की शीर्षक

पंक्ति आदरणीया जिज्ञासा सिंह जी की रचना से ली गई है ।

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आइए अब बढ़ते हैं आज के अद्यतन सूत्र की ओर-


हरसिंगार के फूल-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

करने में उपकार को, नहीं मानता हार।

बाँट रहा है गन्ध को, सबको हर सिंगार।।

--

केसरिया टीका लगा, हँसता हरसिंगार।

अमल-धवल ये सुमन है, कुदरत का उपहार।।

--

नतमस्तक होकर सदा, करता है मनुहार।

धरती पर बिखरा हुआ, लुटा रहा है प्यार।।

***

बदला बदला सा शहर

ये धुआँ धुआँ सा आसमाँ क्यूँ है

छुप रहे लोग सब यहाँ वहाँ क्यूँ है


जिसके दीए की लौ दूर तलक जाती थी

यूँ अंधेरे में डूबा हुआ वो जहाँ क्यूँ है


सुना था यहाँ कभी रात नहीं होती है

उजाला ढूंढ़ता अपने निशाँ क्यूँ है

***

कुछ पल ठहर पथिक

कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


 सिक्कों की खनक शोहरत की चमक छोड़ 

मन को दे कुछ पल विश्राम  तुम 

न दौड़ बेसुध, पथ अंगारों-सा जलता है

मृगतृष्णा न जगा बेचैनी दौड़ाएगी

धीरज धर राह शीतल हो जाएगी।

***

हाइकु

जीवन शुष्क

ना कोई आकर्षण

बदरंग है


कष्टों की बेल  

आसपास पसरी

स्वप्न अधूरा

**

जीनियस

मुदर्रिसी के दौरान अल्मोड़ा में एक से एक जीनियस विद्यार्थियों से मेरा पाला पड़ा था. 


इन में से कुछ विभूतियाँ तो चाह कर भी भूली नहीं जा सकती हैं. 

ऐसी ही एक हस्ती थी एम. ए. के हमारे एक पहलवान विद्यार्थी की. 

पहलवान क्लास में मेरे लेक्चर्स के समय थोड़े-थोड़े अंतराल पर कहता रहता था -

'गुरु जी, नोट्स लिखा दीजिए. आपका लेक्चर हमारे पल्ले नहीं पड़ता.'

***

बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : व्यंजन-परंपरा

डाॅ. शरद सिंह

बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट के क्रम में इस बार ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा कर रही हूं बदलती व्यंजन-परंपरा की ।

कोरोना आपदा के पहले भोपाल एक माॅल के ‘फूडजोन’ में यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ था कि वहां पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों का भी एक ‘काॅर्नर’ है। उसके बाद झांसी के में भी बुंदेली फूड जोन काॅर्नर देखने को मिला। 

***

वासन्ती प्रभात 

जन्म और मृत्यु के मध्य 

बाँध लेते हैं हम कुछ बंधन

जो खींचते हैं पुनः इस भू पर 

भूमिपुत्र बनकर न जाने कितनी बार बंधे हैं 

अब पंच तत्वों के घेरे से बाहर निकलना है

***

आत्महत्या: मेरा कोई नहीं है, इसलिए...

दोस्तों, आज मैं उन लोगों से बात करना चाहती हूं, जिनके दिल में आत्महत्या (suicide) करने का ख्याल बार-बार आता है। जो सोचते है कि इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है...मैं किसके लिए जिऊं?...शायद आप सोच रहे होंगे कि आज मैं ये कौन से फालतु विषय पर बात कर रही हूं? दोस्तों, आत्महत्या फालतू विषय नहीं है। 

***

कई मोर्चों पर लड़ता आदमी

ये वह दौर है जब एक सामान्य आदमी कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है, जूझ रहा है, खुद ही उलझ और सुलझ रहा है। बात करें उस अपने से लड़ते और सवाल करते आदमी की। भयभीत है क्योंकि महामारी फैली हुई है, घर से निकलना जरुरी है क्योंकि घर कैसे चले, पेट कैसे पले और बच्चों की पढ़ाई की गाड़ी कैसे खिंचे। 

***

आत्मा

आत्मा को ललकारती

चीत्कारों को अनसुना

करना आसान नहीं होता ...


इन दिनों सोचने लगी हूँ

एक दिन मेरे कर्मों का

हिसाब करती

प्रकृति ने पूछा कि-

महामारी के भयावह समय में

तुम्हें बचाये रखा मैंने

***

खून के हैं जो रिश्ते , मिटेंगे नहीं

तुम कहते रहोगे वो सुनेंगे नहीं

अब तुम्हारे ही तुमसे मनेंगे नहीं


इक कदम जो उठाया सबक देने को

चाहकर भी कदम अब रुकेंगे नहीं


जा चुका जो समय हाथ से अब तेरे

जिन्दगी भर वो पल अब मिलेंगे नहीं

***

 स्वर्गीय माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" की स्मृतियों को नमन - डॉ. वर्षा सिंह

माना यह दुनिया है फानी

सबकी लगभग एक कहानी

किन्तु ये मन है नहीं मानता

सुनना चाहे मां की बानी


आएं कितनी "वर्षा" ऋतुएं

बुझे न मन की ज्वाला

***

घर पर रहें..सुरक्षित रहें..

आपका दिन मंगलमय हो...फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"



शनिवार, अप्रैल 24, 2021

'मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे'(चर्चा अंक- 4046)

सादर अभिवादन। 

शनिवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

आज प्रस्तुति की शीर्षक पंक्ति व काव्यांश 
स्मृति शेष श्री सुमित्रा नन्दन पंत जी की कविता "
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,"कविता से लिया गया है ।

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल-फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा
बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक
बाल-कल्पना के अपलर पाँवडे बिछाकर
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था।

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
 --

दोहे "पुस्तक दिवस" 

पाठक-पुस्तक में हमें, करना होगा न्याय।
पुस्तक-दिन के सार्थक, होंगे तभी उपाय।।
--
होगा जब नियमित नहीं, पुस्तक से सम्वाद।
तब तक पुस्तक का दिवस, नहीं रहेगा याद।।
--
यह धरती कितना देती है! धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्व को
बचपन में स्वार्थ, लोभ-वश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ
--
हे सूरज! मेरी पृथ्वी की रक्षा तुम करना  
कोरोना के इस संकट में दुख सारे हरना
शिथिल हो चले जीवन बंधन को थामे रहना
प्राणवायु से हर मानव के जीवन को भरना
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छायाओं के पीछे भागे 

जब सच से ही मुख मोड़ लिया, 

जीवन का जो सहज स्रोत था  

शुभ नाता उससे तोड़ लिया !

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चंद साँसों के लिए

चंद साँसों के लिए
तड़पते लोग

कैसे जीतेंगे ये जंग
जब लाशों के ढेर पर
लालची मुर्दे
बनाते सपनों के महल

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बाधाएं और जीवन

बाधाएं और जीवन

 चलते आगे पीछे

 इस तरह पास  रहते

 मानो हैं  सहोदर कभी न बिछुड़ेगे |

जब जीवन में अग्रसर होने की

 खुशी आनी होती है

बाधाएं पहले से ही  खडी होतीं

व्यवधान डालने को |

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ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो दुःख और रोग से अछूता रहता है

ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो दुःख और रोग से अछूता रहता है 

थोड़ी देर का सुख बहुत लम्बे समय का पश्चाताप होता है 
एक बार कोई अवसर हाथ से निकला तो वापस नहीं आता है 

दूध बिखरने के बाद रोने-चिल्लाने से कोई फायदा नहीं होता है 

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वक़्त के कत्लखाने में-22

हो रहा है 

वही सब कुछ अनचाहा 

जो न होता 

तो यूँ पसरा न होता 

दिन और रात के चरम पर 

दहशत और तनाव का 

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मुखौटे

 चेहरों 

का 

अपना कोई 

समाज नहीं होता।

चेहरे 

समाज होकर

गढ़ते हैं

कोई

वाद।

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कठपुतली

ज़िन्दगी के खेल भी निराले हैं 

अब ज़िंदा हैं तो मौत आनी है 

रात है तो दिन को भी होना है 

रोने वाला कभी हँसता भी है 

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प्रश्न

 एक गाँव में एक जगह बहुत भीड़ दिखाई दे रही थी।

"ऐ रामू सुन ई भीड़ काहे की है..?"दीना ने पूछा।

"काका कोई नेता जी अपनी रैली लेकर इधर ही आ रहे हैं। लगता है चुनाव होने वाले हैं...?"

"अच्छा तू भीड़ में मत जइयो.. हमने सुना भीड़ में कोरोना होता है।तोये वायरस लग जाएगो..!"

"हओ काका.. नहीं जायेंगे..!"

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ग्रामीण क्षेत्र में ऑनलाइन शिक्षा

मैं बड़ा प्रयास कर रहा हूँ लेकिन जहाँ मैं हूँ वहाँ ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था दूर की कौड़ी है। अव्वल तो मेरे पास ही संसाधन कम हैं। मैं संसाधन जुटा लूँ और व्हाट्सएप्प वीडियो इत्यादि से काम चला लूँ तो अधिकाँश बच्चों के पास एंड्राइड फोन नहीं हैं। फोन है तो डेटा नहीं है बड़ी मुश्किल से तो 49 रूपये में 28 दिन की इनकमिंग कराई है

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कोविड

वो फरवरी का महीना था....मौसम इश्क़ से सराबोर था । फागुन की मस्ती फि़जाओं में रंगों के साथ घुलने की तैयारी में थी। कोरोना का भय लगभग खत्म सा हो चुका था। सभी अपनों से गले भी मिलने लगे थे। हाँ....मास्क अभी भी चेहरों पर थे पर अपनों की नजदीकियों के साथ। फरवरी की जाती हुई ठंड दिल में सुकून को पसरने दे रही थी। उसी वक्त घर में एक सदस्य को कोरोना के लक्षण दिखाये दिये, जाँच करवाई और अनुमान सही निकला ...कोविड पॉजिटिव। ताबड़तोड़ घर के सभी सदस्यों ने कोविड टेस्ट करवाया। पाँच लोग पॉजिटिव आये। मैं और शगुन (बेटी) नेगेटिव थे जबकि शगुन के पॉजिटिव आने के पूरे चांसेज थे क्योकि वो उन सभी के लागातार संपर्क में थी । हमारे घर पर हम तीन लोगो में से सिर्फ पति ही पॉजिटिव थे

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आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
आगामी अंक में 

@अनीता सैनी 'दीप्ति