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शुक्रवार, सितंबर 17, 2021

"लीक पर वे चलें" (चर्चा अंक- 4190)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी प्रबुद्धजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ! 

आज की चर्चा का शीर्षक श्री सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की लेखनी से निसृत कविता "लीक पर वे चलें"  से हैं -   

लीक पर वे चलें जिनके

चरण दुर्बल और हारे हैं,

हमें तो जो हमारी यात्रा से बने

ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

--

इसी कवितांश के साथ बढ़ते हैं आज के चयनित सूत्रों की ओर -

"उत्तराखण्ड के कर्मठ मुख्यमन्त्री मान. पुष्कर सिंह धामी का जन्मदिन"

मधुर वाणी-शिष्टता से

जो दिलों में छा गया।

देवताओं की धरा को,

मुख्यसेवक भा गया।


वाटिका सुमनों ने मिलकर फिर सजाई,

जन्मदिन की आपको पुष्कर बधाई।।

***

मन्दिर जिसे समझ रहे हैं

मन्दिर जिसे समझ रहे हैं आप प्यार का

मलबा है भाई सा’ब! वो मेरी दीवार का


मीना बाजार के भरोसे आ तो गये आप

भीतर नजारा देखिये मछली बजार का


पूजा की थालियों को अभी फेंकिये नहीं

वे खौफ खा रहे हैं उसी अन्धकार का

***

विकलित चित्त

    ”ग्वार की भुज्जी हो या सांगरी की सब्ज़ी, गाँव में भोज अधूरा ही लगता है इनके बिन।”


महावीर काका चेहरे की उदासी को शब्दों से ढकने का प्रयास करते हैं और अपने द्वारा लाई सब्ज़ियों की बड़बड़ाते हुए सराहना करने लगते हैं।

***

लेखनी चलती रहनी चाहिए .......

अनुज्ञात क्षणों में स्वयं लेखनी ने कहा है कि -

लेखनी चलती रहनी चाहिए 

चाहे ऊँगलियां किसी की भी हो 

अथवा कैसी भी हो

  

चाहे व्यष्टिगत हो 

अथवा समष्टिगत हो 

चाहे एकल हो 

अथवा सम्यक् हो

***

किताब के पन्नों का जंगल

दूर

कहीं कोई

जीवन

अकेला खड़ा है।

जंगल

अब विचारों में

समाकर

किताब के पन्नों

पर

***

ममतामयी हृदय

ममतामयी हृदय पर

अंकुरित शब्दरुपी कोंपलें 

काग़ज़ पर बिखर

जब गढ़ती हैं कविताएँ 

सजता है भावों का पंडाल 

प्रेम की ख़ुशबू से

***

हठी लिप्सा

घटाटोप घनघोर अंधेरा,

विरसता की छाया है।

अब जाके इस जड़ ‘विश्व’ का,

खेल समझ में आया है।


नहीं रुकना है यहाँ किसी को,

जो आया, उसे जाना है।

ठहरने की हठी यह लिप्सा,

मन को बस भरमाना है।

***

चाह और प्रेम

प्रेम पंख देता है 

उड़ने को तो सारा आकाश है 

विश्वास की आंच में 

इसे पकना होता है 

और समर्पण की छाँव में 

पलना होता है

***

तुमसे प्रेम करते हुए-(१)

उस स्वर की अकुलाहट से बींधकर

मन से फूटकर नमी फैल गयी थी

रोम-रोम में

जिसके 

एहसास की नम माटी में

अँखुआये थे 

अबतक तरोताज़ा हैं

साँसों में घुले

प्रेम के सुगंधित फूल ।

***

आवारा मसीहा शरत चंद्र थे नारी मन और भारतीय समाज के कुशल चितेरे

शरत चंद्र ने अपना जीवन एक खानाबदोश की तरह जिया था। जीवन के कई वर्ष उन्होंने बिहार और रंगून में काटे थे। अपनी लेखनी और अपने व्यवहार के चलते उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का प्रयास किया था। शायद यही कारण था कि लेखक विष्णु प्रभाकर ने उन्हें आवारा मसीहा कहा था।

***

टाइल्स पर के सिलेंडर/जंग के दाग कैसे साफ़ करें?

जहां हम सिलेंडर रखते है, वहां की टाइल्स पर अक्सर सिलेंडर के बहुत ही जिद्दी दाग पड़ जाते है। दाग टाइल्स की रंगत और चमक दोनों ही ख़राब कर देते है। ये दाग आसानी से नहीं निकलते। लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि ''आपकी सहेली'' आपको बता रही है बहुत ही आसान उपाय जिससे टाइल्स पर के सिलेंडर/जंग के दाग चुटकियों में साफ़ हो जायेंगे।

***


अपना व अपनों का ख्याल रखें…,

आपका दिन मंगलमय हो...

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"




       


शुक्रवार, अगस्त 07, 2020

"राम देखै है ,राम न्याय करेगा" (चर्चा अंक-3786)

सादर अभिवादन !
शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी का
हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ।
आज की चर्चा का शुभारंभ स्मृतिशेष भवानीप्रसाद मिश्र जी की लेखनी से निसृत "मैं क्यों लिखता हूँ' के अंश से-

जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था
तब काग़ज़ काग़ज़ था
मैं मैं था
और कलम कलम
मगर जब लिखने बैठा
तो तीन नहीं रहे हम
एक हो गए
***
आज की चर्चा में आपके अवलोकनार्थ विभिन्न ब्लॉगस्  से
चयनित कुछ लिंक्स प्रस्तुत हैं  -
***
बीत गया सावन सखे, आया भादौ मास।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी, है बिल्कुल अब पास।।
--
दोपायो से हो रहे, चौपाये भयभीत।
मिल पायेगा फिर कहाँ, दूध-दही नवनीत।।
***
अगली बार गाँव गया,
तो छिप के सुनूंगा 
गाँववालों की बातें,
चुरा लूँगा उनमें से 
कुछ कविताएँ 
और थोड़ी-सी कहानियाँ.
***
मेरा और चश्मे का संबंध बहुत ही पुराना है। बालपन में ही इसने मेरे कानों का सहारा ले मेरी नाक पर कब्जा जमा लिया था। शुरुआत में तो काफी तनातनी रही ! मिजाज में धमाचौकड़ी तेज होने के नाते कोई भी चश्मा नाक पर ज्यादा देर कब्जा जमाए नहीं रख पाता था ! एक-दो पखवाड़े में एक चश्में का शहीद होना निश्चित था।
***
    रात्रि का दूसरा प्रहर बीत चुका था, किन्तु विभु आँखें बंद किये करवटें बदलता रहा। एकाकी जीवन में वर्षों के कठोर श्रम,असाध्य रोग और अपनों के तिरस्कार ने उसकी खुशियों पर वर्षों पूर्व वक्र-दृष्टि क्या डाली कि वह पुनः इस दर्द से उभर नहीं सका है।
***
सदियों से ये संघर्ष चला
आज धर्म फिर विजय हुआ।
अयोध्या की छवि अति सुंदर
खुशी लहर ने हृदय छुआ।
राम पधारेंगे अब अँगना
सारा शहर सजाएंगे।
***
टूट रही साँसों की डोरी
बिखर रहा सब ताना-बाना।

भूल-भुलैया में खोए सब
चमक चाँदनी भरमाती है
बिना शोर के टूटे लाठी
घाव नए देकर जाती है
***
कांता घरों में बर्तन व सफाई का काम कर के अपना गुजारा चला रही थी, वो तो भला हो सरिता मैडम का जो पिंकी की पढ़ाई और उसकी फीस में मदद कर देती थीं, कांता बाई देर से आई तो सरिता उसे डांटते हुए बोली ये कोई समय है आने का . 
***
जो दुश्मन है कभी तुमको नहीं अपना कहा करते,
ये कलयुग है यहॉं अपने नहीं अपने हुआ करते ।

कभी मैंने किसी का भी बुरा चाहा नहीं अब तक,
मगर किस्मत ने हाथों में लिखी ठोकर तो क्या करते ।
***
जब चंदा ने तारों ने मेरी कथा सुनी 
जब उपवन की कलियों ने मेरी व्यथा सुनी 
जब संध्या के आँचल ने मुझको सहलाया 
जब बारिश की बूँदों ने मुझको दुलराया ।
***
छोटी-छोटी उलझनों में खोया मन 
देख ही नहीं पाता स्वयं को 
हृदय कमल पर केवल ब्रह्मा ही तो नहीं विराजते 
जो खोजने निकल पड़ते हैं निज मूल 
और भेंट होती है उनकी नारायण से
***
भारत के सांस्कृतिक इतिहास में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जीवन -गाथा अनुपम और अतुलनीय है। प्राचीन काल में उनके । महान जीवन संग्राम पर  महाकवियों द्वारा  कई रामायणों की रचना की गयी है । अलग -अलग समय में ,अलग -अलग भाषाओं में अनेक रचनाकारों ने  भगवान श्रीराम की कीर्ति -कथा को  अपने -अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।
***
वह एक डरावनी रात थी। दूर से फौजी जूतों की पास आती ध्वनि, पूरे मोहल्ले में मृत्यु का आतंक फैला रही थी। देश के तानाशाह ने एक नया फरमान जारी किया था। एक विशेष समुदाय के लोगों को खोज खोजकर कोण्सेंट्रेशन कॅम्पस में ठूँसा जा रहा था।
***
जैसे दुनिया कहेगी - भगवान देख रहा है, ईश्वर न्याय करेगा, धर्मराज के द्वार जाना है इत्यादि।
लेकिन हरियाणा मे कहेंगे ―
राम देखै है,
राम न्याय करेगा,
राम के घर जाना है,
राम से डर।
***
इजाजत दें...फिर मिलेंगे..
आपका दिन मंगलमय हो..
🙏 🙏
"मीना भारद्वाज"
***

शुक्रवार, जून 26, 2020

सागर में से भर कर निर्मल जल को लाये हैं। (चर्चा अंक-3744)

सादर अभिवादन ।
शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी विद्वजनों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ।
आज की प्रस्तुति का शुभारंभ रामधारी सिंह दिनकर जी की कलम से निसृत "हुंकार" के अंश से - 
--
अल्हड़ वही, ठेलकर धाराओं को जो प्रतिकूल चले,
तूफानों से लड़े सदा, झोंके-झोंके पर फूल चले।
यों तो अंचल पकड़ धार का सिन्धु सभी पा जाते हैं,
स्वर्ग मिलेगा उसे, खोजता जो गंगा का मूल चले।।
***
अब चर्चा आज के चयनित सूत्रों की-
--
सागर में से भर कर निर्मल जल को लाये हैं।
झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।
--
गरमी ने लोगों के तन-मन को झुलसाया है,
बहुत दिनों के बाद मेघ ने दरस दिखाया है,
जग की प्यास बुझाने को ये छागल लाये हैं।
झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।
***
समय की दीवार पर दरारें पड़ चुकीं थीं
सिमटने लगा था जन-जीवन
धीरे-धीरे इंसान अपना संयम खो रहा था 
  मानव अपने हाथों निर्धारित 
किए समय को नकार चुका था
तभी उसने देखा अतीत कराह रहा था
***
संध्या की सतरंगी चूनर में
टाँकने के लिये लाखों सितारे
चन्द्रमा ने अपने हाथों से
गगन में बिखेर दिये हैं ,
और अनुरक्त प्रियतमा ने
वो सारे सितारे पुलक-पुलक कर
अपनी पलकों से दामन में
समेट लिये हैं !
***
हमारी देश की धरती,कहानी वीर की कहती।
सपूतों से भरा आँगन, लिए माँ भारती रहती।
लगाती ये गले सबको,सिखाती प्यार की भाषा।
बड़ी पावन धरा मेरी, कभी गलती नहीं सहती।
***
कालिदास के जीवन से दो बातों की गहन शिक्षा मिलती है… पहली तो ये कि पथ कितना भी दुर्गम हो, गन्तव्य तक पहुंचना असम्भव नहीं. दूसरी शिक्षा यह कि मौन व्याकुलता और विकलता से परे एक ऐसी शक्ति है जो किसी के भी मनोभावों को कई अर्थ में प्रवाहमान रख सकता है. हम किसी के मौन को अपना गुरु मान लें और सकारात्मक सोच पर चलना प्रारम्भ कर दें तो अजेय रह सकते हैं.
सुनना यदि श्रेष्ठ है तो मौन की अनुभूति श्रेष्ठतम.
***
गहन अंधकार में स्वयं को 
एकाकार करती
पश्चिम की
नीम की डालियों से 
धीरे-धीरे फिसलकर स्याह मकान के
आँगन में उतरते चाँद को
एकटुक निहारती
वह उदास औरत...।
***
एक इंसान है 
जो आशंकाओं से घिर गया है 
करोना-वायरस के मकड़जाल में 
फँस गया है
युवा-मन भविष्य की तस्वीर पर 
असमंजस से भर गया है 
अवसर की आस में 
थककर आक्रोश से भर गया है। 
***
ऐ 'हर्ष' ऐसी दुनियाँ में कैसे जियेगा अब,
दिल में बसा जहान वो शमशान कर गया ।


ये ज़ुल्म ये हया ओ सज़ा उसने दी मुझे,
अब सोचता हूँ वो मुझे इंसान कर गया ।
***
महादेव का इक नाम भी तो है "नील-लोहित "। जब महादेव ने विषपान किया, विष और तेज़ ताप से उनका रंग ऐसा पड़ने लगा - नीला रंग लाल बैंगनी छटा लिए और 'नील-लोहित  ' कहाये
हर हर महादेव!
आँखें बंद कर मन में ज़ोर से गूंजा ये स्वर। ....
***
नीव उठाते वक़्त ही
कुछ पत्थर थे कम 
तभी हिलने लगा
निर्मित स्वप्न निकेतन 
उभर उठी दरारें भी व
बिखर गये कण -कण 
***
बेटे,
इस बार आओ,
तो गाँव में ही रहना,
मेरे साथ, हमारे साथ,
कभी मत जाना शहर,
कोरोना ख़त्म हो जाय, तो भी।
***
याद रखें जिस दिन हमें हृदय की तुला पर वजन करना आ जाएगा, उन छात्राओं का धातु निर्मित पचास के सिक्के वाला पलड़ा भारी मिलेगा । हम करेंसी से 'इंसान' बन जाएँगे। वे व्यापारी से संत बन जाएँगे,बिल्कुल गुरु नानक देव की तरह हम खरा सौदा कर पाएँगे।
***
यूँ तो हजारों खड़े हैं कतारों में 
उसके द्वार वही जाता है 
जिसे वह बुलाता है !
लाख प्रमाण दिए प्रह्लाद ने 
नास्तिक पिता नकारे जाता है !
जल को अधरों से लगाते हम हैं 
पर अपनी प्यास तो वही जगाता है !
***
उधर नुक्कड़ दुकान वाले सेठ जी दुखी मन से खुश थे लक्ष्मी माता को अगरबत्ती लगाते  हुए मन में खोया पाया का हिसाब ,के कहीं बैग पकड़ा जाते तो माल से ज़्यादा जीएसटी लगता धन्धें की सारी पोल खुल जाती बदनामी अलग।
***
शब्द-सृजन-27 का विषय है- 
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(किसी भी विधा में) आगामी शनिवार (सायं 5 बजे) 
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आपका दिन शुभ  हो,फिर मिलेंगे...
🙏🙏
"मीना भारद्वाज"
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