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मंगलवार, जुलाई 05, 2011

समय के देवता -- ऐसे भी दिन आयेंगे , हाय ....साप्ताहिक काव्य मंच –53… चर्चा मंच …566

नमस्कार , हाज़िर हूँ एक बार फिर मंगलवार को साप्ताहिक काव्य मंच ले कर ..अक्सर सोचती हूँ कि यह तो आपको पता ही है कि मंगलवार है  और मुझे आना ही है इस मंच को ले कर फिर क्यों लिख देती हूँ कि फिर से हाज़िर हूँ …शायद इस लिए कि मन में कहीं यह तो नहीं खटकता कि आ गयी हूँ तो झेलिये … या फिर कहीं मन में यह भावना तो नहीं कि शायद आप मेरा इंतज़ार कर रहे हों …खैर  अब आप इंतज़ार खत्म कीजिये या झेलिये ..बस मन में भावना कोमल रखियेगा … और भावना का सीधा रिश्ता मन से है तो आज की चर्चा भी प्रारम्भ करते हैं कोमल मन से …
मेरा परिचय डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी ले कर आए हैं --कोमल  मन
सुख में मुस्काता-दुख में आहत होकर रोता है
पत्थर के तन में भी कोमल-कोमल मन होता है

मन के उपवन में सजती है अरमानों की डोली
केशर की क्यारी में फिर क्यों काँटों को बोता है
 मेरा फोटो रश्मि प्रभा जी  पैसे की तुलना भावनाओं से करती हुई कह रही हैं ---ऐसे भी दिन आयेंगे , हाय
ओह !
पैसे में बड़ा वजन होता है
रिश्ता कोई भी हो
पर इसके विपरीत -
प्यार में होता है सुकून
घर नहीं फाइव स्टार होटल का एहसास
लम्बी सी कार
एक नहीं दो चार ...
  मनोज ब्लॉग पर पढ़िए  एक नवगीत ---समय के देवता
समय के देवता!
थोड़ा रुको,
मैं तुम्हारे साथ होना चाहता हूं।
तुम्हारे पुण्य-चरणों की
महकती धूल में
आस्था के बीज बोना चाहता हूं।
मेरा फोटो मुदिता गर्ग  कहने को तो कहती हैं कि न शायर हूँ और न ही लेखिका …पर  इतनी खूबसूरत गज़ल लायीं हैं कि कहना पड़ता है कि गज़ब लिखा है --
रूह को जानना  नहीं आसाँ

तू मुझे आज़मायेगा कब तक !
रस्म-ए-दुनिया ,निभाएगा कब तक !
छीन कर ख़्वाब, मेरी पलकों से
अपनी नींदें , सजाएगा कब तक !
मेरा फोटो प्रतिभा सक्सेना जी शिप्रा की लहरें पर गहन चिंतन कर लायी हैं --जोड़ घटा 
जीवन में कितने दुख हैं ,
जीवन में कितने सुख हैं,
जोड़ घटा कर देख ज़रा ,थोड़ा सा अंतर होगा .
My Photo मृदुला प्रधान जी का मन उड़ान भर रहा है  लंबी और ऊँची --
मन पंख बिना
जब रातों की परछाईं पर,
पूनम का चाँद
चमकता है,
उजली किरणों के साये में,
तारों का रूप
दमकता है,
My Photo  योगेन्द्र मौदगिल जी की एक बहुत प्यारी रचनाप्यार के प्रतीक ढूँढना ..
जब भी कोई लीक ढूंढना.
प्यार के प्रतीक ढूंढना.
जि़न्दगी है लंबा सफ़र,
साथ ठीक-ठीक ढूंढना.
मेरा फोटो विजय रंजन जी की पढ़िए क्षणिकाएँ ..एक से बढ़ कर एक क्षणिकाएँ
मेरे पाँव खुद ब खुद-
तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
My Photo  गीता पंडित जी अपना काव्यात्मक परिचय दे रही हैं --मंजीरे मन के बजते जब जब राग सुनाती मन की कोयल, और अलगनी पर अंतर की भाव - भाव टंग जाता कोमल, नर्तन करती मन की सरगम शब्द स्वयं आकर कुछ कहते, छंद - छंद में अंतर्मन के मुसका जाती कविता उस पल|.. नए बिम्बों से सजी उनकी रचना पढ़िए --जाने क्यों
तुम से ही चहकी मन चिड़िया
कलरव था मन की डाली,
जाने क्यूँ - कर काट ले गया,
बरगद को पल का माली,
मेरा फोटो इस्मत ज़ैदी जी की एक खूबसूरत गज़ल पेश हैहम भी , तुम भी ...
ऐसी गुज़री है कि हैरान हैं हम भी ,तुम भी
आज फिर बे सर ओ सामान हैं हम भी ,तुम भी
क्यों है इक जंग ज़माने में अना की ख़ातिर
जबकि दो दिन के ही मेहमान हैं हम भी , तुम भी
My Photo डा० सविता जी अपने ब्लॉग पर एक खूबसूरत रचना लायी हैं --तुम
पल-छिन जिनको 
देखा करती 
भांप लिया 
मन के तारों ने 
आँखों से मैंने 
देख लिया है 
तुम हो वही.
My Photo आनंद विश्वास जी की खूबसूरत रचना -
मैंने  जाने  गीत  विरह   के,  मधुमासों  की   आस  नहीं  है.
कदम कदम पर मिली विवशता , सांसो में विश्वास  नहीं है.
छल से छला गया है जीवन,
आजीवन  का था समझोता.
लहरों  ने  पतवार  छीन ली,
नैय्या  जाती   खाती  ग़ोता.
My Photo एस० एम० हबीब कहानी बता रहे हैं --कैदी की ज़ुबानी --
मैं क़ैद हूँ.... !!
ज़मीन के नीचे
तहखाने में....
जिसकी नींव लेकर
ऊपर,एक उन्नत भवन
बना दिया गया है,
My Photoयशवंत माथुर  बता रहे हैं आज कल के मौसम के बारे में … एक गहन अभिव्यक्ति के साथ --बरसात का मौसम
कभी जो सरपट दौड़ा करते थे
नज़रें झुकाए जा रहे हैं
दिखा रहे हैं करतब
तरह तरह के
  Chandra Bhushan Mishra Ghafil चन्द्र भूषण गाफिल जी खूबसूरत नज़्म ले कर आए हैं इस बारचांदनी भी जलाया करती है ...
यूँ शबो-रोज़ आया करती है,
याद उसकी रुलाया करती है।
वो मुसाफ़िर हूँ मैं जिसे अक्सर;
चाँदनी भी जलाया करती है।।
Anupamaअनुपमा पाठक  बहुत दिनों बाद लौटी हैं … और लिख रही हैं अपने मन के भाव कुछ इस प्रकार ---
दीया जलाना हम भूल गए ..
व्यस्तताओं के बीच
अपनों से मिलना भूल गए!
जीवन चलता ही रहा
बस जीना हम भूल गए!
मेरा फोटो रेखा श्रीवास्तव जी मना रही हैं --जीत का जश्न--  एक गरीब और विकलांग बच्चे की जीत का जश्न कुछ इस तरह मनाया हमने की आँखें तो भरी ही कुछ कलम भी कह उठी।
राहों में बिछे
काँटों की चुभन
औ'
पैरों से रिसते लहू
से निकली
घावों की पीड़ा,
हौसलों की राह में
रोड़े बन जाती है?
My Photo  श्याम कोरी “ उदय “ जी की गज़ल ---कफ़न का टुकड़ा
गर नहीं लड़ा मैं आज भयंकर तूफानों से
कल छोटी फूंको से भी मैं गिर सकता हूँ !
है कद-काठी मेरी, आज भले छोटी ही सही
पर जज्बातों के तपते तूफां लेकर चलता हूँ !
My Photo  डा० कविता किरण की खूबसूरत नज़्म पेश है --वही रात रात का जागना
वही रोना इक-इक बात पर
तकिये से मुंह को ढांपकर
सर रख के अपने हाथ पर
खाली हवाओं को ताकना !
मेरा फोटो और चर्चा के अंत में …परेशान हैं वंदना जी कि आखिर चवन्नी पीड़ा है क्या ? --पढ़िए उनकी हास्य रचना –=
क्यों इतना शोर मचाया है
हमको ना इतना समझ ये आया है
चवन्नी की विदाई का क्यूँ
इतना शोर मचाया है
ये तो दुनिया की रीत है
आने वाला कभी तो जायेगा
फिर ऐसा क्या माजरा हुआ
जैसे किसी आशिक का जनाजा हुआ
आशा है आपकी पसंद के कुछ परिचित और कुछ अपरिचित चेहरे प्रस्तुत कर पायी होऊँगी .आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा उर्जा प्रदान करती हैं … जाते जाते एक नज़र राजभाषा हिंदी  ब्लॉग पर चंद अशआर   पर भी डालना न भूलें …. संगीता स्वरुप

मंगलवार, जून 28, 2011

मिलता है इनाम आजकल गुर्ग आशनाई में …..साप्ताहिक काव्य मंच –52 ..चर्चा मंच --559

नमस्कार , आपके समक्ष हाज़िर हूँ एक बार फिर साप्ताहिक काव्य मंच ले कर ..दिल्ली में मानसून ने दस्तक दे दी है ..मौसम खुशगवार है उस पर रचनाकारों की खूबसूरत रचनाएँ बारिश का आनंद दुगना कर रही हैं ..आप भी हर तरह के रस का आनंद उठाइए .. लेकिन ठहरिये ….. ऐसा न कीजियेगा कि रस का आनंद तो उठा लिया और फिर चल दिए … ज़रा गौर फरमाइयेगा … इसी लिए आज की चर्चा का प्रारम्भ कर रही हूँ डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी की रचना से …
मेरा परिचय डा० रूप चन्द्र शास्त्री जी अपनी गज़ल में स्वार्थी ज़माने की बात ले कर आए हैं --चूस मकरंद भंवरे किनारे हुए

सारी कलियों को खिलना मयस्सर नहीं
सूख जातीं बहुत मन को मारे हुए
कितने खुदगर्ज़ आये-मिले चल दिये
मतलबी यार सारे के सारे हुए
My Photo शिखा वार्ष्णेय इस बार अनेक नए बिम्बों से सजा कर लायी हैं कुछ क्षणिकाएँ --

कभी कोई लिखने बैठे
कहानी तेरी मेरी
तो वो दुनिया की
सबसे छोटी कहानी होगी
जिसमें सिर्फ एक ही शब्द होगा
"परफेक्ट ".
मेरा फोटो मनोज कुमार जी  की एक बहुत भाव प्रधान रचना पढ़िए --मेरा जीवन एकाकी

ये     मेरा       जीवन     एकाकी।
कट      जाए    जीवन    एकाकी।
नित - नित नूतन रूप तुम्हारा, देखूं      मैं       तो    हारा - हारा।
कभी   उर्वशी,    कभी    मेनका,   लगो परी तुम इन्द्र सभा की।
कट      जाए    जीवन    एकाकी।
clip_image001 मनोज ब्लॉग पर पढ़िए श्याम नारायण मिश्र जी का यह नवगीत
तुमने की होगी बयार
        आंचल से पोंछकर पसीना,
                आ गया आषाढ़ का महीना।
My Photo पारुल जी बस कर रही हैं एक गुज़ारिश ---कर दो .........
ख़ामोशी भी दो पल जी ले
बात कोई आहिस्ता कर दो !
कोई रहे न मुझ सा तन्हा
तन्हाई को शीशा कर दो !
My Photo  सह जीविता   कैसे हो ..इसके बारे में बता रहे हैं अर्यमन चेतस पांडे -
स्वकीयता और परकीयता -
पारस्परिक वैलोम्य में अवगुण्ठित दो भाव,
एक-दूसरे की वैयक्तिकता की गरिमा का
सम्मान करते हुए,
अपनी शुचिता की मर्यादा में रहते हुए
My Photo अपर्णा मनोज भटनागर जी एक गहन विषय ले कर आई हैं --
अपनी मुक्ति के लिए 
मुझे नहीं देखना था आकाश का विस्तार 
नहीं गिनने थे तारे 
नहीं देखनी थी अबाध नदी की धाराएं 
या पर्वत की ऊंची होती चोटी.
न ही देखना था सागर का ज्वार  .
My Photo रंजू भाटिया जी सुहावने मौसम में कर रही हैं --इंतज़ार
रिमझिम बरसी
बारिश की बूंदे
खिले चाहत के फूल
और नयी खिलती
कोपलों सी पातें
और न जाने
कितनी स्वप्निल शामें
मेरा फोटो निवेदिता जी लायी हैं नारी की पीड़ा को उकेरती एक सशक्त रचना --
ये कैसी विडम्बना है ,
ये कैसा उद्वेलन है .......
अपने प्रश्नों के ही घेरे में ,
क्षत-विक्षत अंतर्मन है !
कैसे परिचय दूँ ? नहीं-नहीं
ये कैसी आप्त पुकार है ,
क्या दूँ अपना परिचय !
मेरा फोटो राजीव भरोल जी ले आए हैं एक खूबसूरत गज़ल -हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं
जहाँ कहीं हमें दाने दिखाई देते हैं,
वहीँ पे जाल भी फैले दिखाई देते हैं.
मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.
My Photo  सिद्धार्थ जी अपनी रचना में एक भिखारिन की धनाढ्यता का वर्णन कर रहे हैं -
मृदुल  मुस्कान ओढ़े
हाथ फैलाती है
खोटे सिक्के
खुश होकर झनझनाती है
...मय्सर नहीं जिसे
किरण की एक बूंद
ओस मल-मलकर
वो रोज नहाती है
मेरा फोटो अजय कुमार झा  लाये हैं --
कुछ टूटे फूटे बिखरे आखर .. इन बिखरे आखरों में कितनी गहनता है यह पढने के बाद ही पता चलेगा -
उदासियों को लपेट के , इन पनियाली आंखों से ,
अक्सर कई शामें गुज़ारा करते हैं .....हमें यकीं है उनकी मौत का , फ़िर भी,
वहीं जाकर , उन्हें रोज़ पुकारा करते हैं ....
My Photo माहेश्वरी कनेरी जी ज़िंदगी की जद्दोजहद को कुछ इस प्रकार लिख रही हैं --
क्यों कभी इतनी हैरान परेशान सी लगती है जिन्दगी   ?
कभी तो गहन अनुभूति लिए तृप्त सी लगती है जिन्दगी
क्यों कभी मुट्ठी में रेत सी फिसलती ,दिखती है जिन्दगी   ?
कभी ढलती संध्या भी, भोर की किरन सी दिखती है जिन्दगी
My Photo नीलेश जी क्या लिख रहे हैं ज़रा देखिये ---खत लिख रहा हूँ
उनके  दिए कुछ  वक़्त लिख रहा हूँ 
दो   पल    में ही  जन्नत लिख रहा हूँ  !!
ये किसको फिकर है कि कल हो न हो

दिल-ओ-जान से आज ख़त लिख रहा हूँ !!
My Photoनवनीत पांडे जी इस बार लाये हैं
दो कविताएँ-- संवाद   और तुम्हारा मौन
तुम!
और तुम्हारा मौन..
मैं!
और मेरा मैं..
दोनों के बीच
एक अर्थहीन अर्थ
My Photo दीपाली “ आब “ की एक खूबसूरत गज़ल पढ़िए ..
वो न आए पर उनकी याद आए
वो न आये तो उनकी याद आए
जी न जाए, तो क्या जिया जाए..
हसरतें आँसुओं में घुलने लगीं,
ख्वाब मेरे सभी जो मुरझाए..
नींद में कितने खौफ शामिल हैं,
हम भी देखेंगे, नींद आ जाए..
My Photo अनुपमा जी लायी हैं आध्यात्मिक भावनाओं को अपनी इस रचना में ---
या ठान लूँ मन ही मन में  ..
खिलना कमल को है कीचड़ में ..
तब तो सहेजना  होगी ...
कंपकपाती वो ज्योत मन की ..
कभी  कभी  बुझने  सी  लगाती  है  जो -
My Photo देवेन्द्र पांडे जी बनारस के बारे में कुछ बता रहे हैं … बहुत अच्छा शहर है क्या ?
बड़ी तारीफ करते हो
बहुत अच्छा शहर है क्या !
ये गंगा घाट की नगरी
ये भोले नाथ की नगरी
यहां आते ही धुल जाते
सभी के पाप की गठरी
जहां हो स्वर्ग की सीढ़ी
कहीं ऐसा शहर है क्या !
ज्ञानवती सक्सेना जी की कविता ले कर आई हैं साधना वैद जी ..कृष्ण से अनुनय
एक बार बस एक बार
इस भारत में प्रभु आ जाओ !
सोते से इसे जगा जाओ ,
भूलों को राह दिखा जाओ ,
बिछडों को गले लगा जाओ ,
गीता का ज्ञान सिखा जाओ !
हे नाथ यहाँ आकर के फिर
अर्जुन से वीर बना जाओ !
Sri Prakash Dimri श्री प्रकाश डिमरी जी की रचनाएँ पढ़िए ---सुनो शिशिर  और सुनो बसंत
हिम कँवर ...
जब तुम बरसाते
कम्पित विहग ..
कहाँ चले जाते ..!!!???
सुख की डोली में मगन
My Photo दिनेश जी “रविकर “ की एक सशक्त रचना पढ़िए --
मन में अतीत की याद लिए फिरते हैं
निज अंतर में उन्माद लिए फिरते हैं
उन्मादों में अवसाद लिए फिरते हैं
अंदर ही अन्दर झुलस रही है चाहें

मनमे अतीत की याद लिए फिरते है
My Photo सत्यम शिवम भावनाओं के सागर में गोते खाते हुए एक रचना लाये हैं --
कब से तुझे बचाता रहा ऐ जिंदगी मेरी,
क्या था पता इक दिन मुझे ही छोड़ देगी तू कही!
बरसात से,धूप-छाँव से,
नफरत के घिनौने भाव से!
हरदम तुम्हे दूर रखता था,
सुख के सिवा तू कुछ ना चखता था!
My Photo मृदुला हर्षवर्धन जी प्रेम की अद्वितीय व्याख्या कर रही हैं --प्रणय
जब धरती पर पहला फूल खिला था
उस क्षण से ही प्रणय जन्मा था
प्रेम ने जब जन्म लिया
तब नहीं थी कहीं भी समता
पहला नाम दिया भावों को
कहा उसे 'माँ की ममता'

मेरा फोटो डा० वर्षा सिंह कर रही हैं
प्यार की गुजारिशें
बूँद बूँद बारिशें
                  जाग रही ख्वाहिशें

                  घुल रहीं हवाओं में
                  प्यार की गुजारिशें
वाणी शर्मा जी आज कल गज़ल की पाठशाला जाती हैं  और वहीं से लायीं हैं एक खूबसूरत गज़ल ---
मिलता है इनाम आजकल गुर्ग आशनाई में
पशोपेश में थमी थी साँसें उसकी गली से गुजरते
मुश्किल था बच निकलना पासबाने नजर से

क्या बुरा था जो लिया इलज़ाम बदशलूकी का
हासिल कब क्या हुआ था उसे तोहफगी से
..क्षमा जी द्वारा बनाये गए इस भित्ति चित्र  के साथ ही एक कोमल भावों को समेटे  एक खूबसूरत रचना पढ़िए --
वो राह,वो सहेली...
पीछे छूट चली,
दूर  अकेली  चली  
गुफ्तगू, वो ठिठोली,
पीछे छूट चली...
मेरा फोटो चर्चा के समापन पर असीमा जी गहन भावों को समेटे ले आई हैं कुछ क्षणिकाएँ

रात सो रही है...
मैं जाग रही हूं...
गोया बे-ख्वाब मेरी आंखें
और मदहोश है जमाना...
आज बस इतना ही , फिर मिलते हैं अगले मंगलवार को इसी मंच पर एक नयी चर्चा के साथ … नमस्कार …संगीता स्वरुप

मंगलवार, जून 21, 2011

वो बादल , वो हवा वो बूंदों की रिमझिम ..साप्ताहिक काव्य मंच –51..चर्चा मंच – 552

नमस्कार , हाज़िर हूँ मंगलवार की साप्ताहिक काव्य चर्चा ले कर ..रामलीला मैदान की लीला का ज़िक्र कुछ कम हो चला है … लेकिन क्या सच ही ये प्रसंग भुला देने लायक है ..नेताओं का कहना है कि जनता की याददाश्त कमज़ोर होती है और आने वाले सालों में जब चुनाव होंगे तब तक जनता भूल जायेगी यह सब …पर जब आम जनता जैसे हम और आप यह कहते हैं तो अफ़सोस होता है , यानि कि हम ही स्वयं को कह रहे हैं कि हमारी याददाश्त कमज़ोर है ..खैर ..कल के नवभारत टाईम्स में यह आंकड़े आए थे ..आपके समक्ष रख रही हूँ … 5  लाख करोड़ कम हुई स्विस बैंकों की दौलत --- 2009 में यह रकम  1,30,00,000  करोड़ रूपये के करीब  थी जो 2010 में 1,26,00,000 करोड़ रूपये जमा थे ..अब इसमें भारत के सही आंकड़े उपलब्द्ध नहीं हैं …अरे ! मैं भी काव्य मंच पर क्या ले बैठी … तो ..आज शुरू करते हैं चर्चा  इसी भ्रष्टाचार पर लिखी एक सशक्त रचना से ..
मेरा परिचय डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी  हर विषय पर खूबसूरत गीत और कविता लिखते रहे हैं …आज हमारे देश के कर्णधार नेता देश को कैसे खोखला कर रहे हैं उस पर उनकी एक सार्थक रचना पढ़िए --कीट निकम्में
जिनको सौंपी पहरेदारी,
वो करते हैं चोरी-जारी,
खाकर करते नमक हरामी,
खुले आम करते गद्दारी,
चाँदी-सोना लूट लिया सब,
खम्बों पर धर दिये मुलम्मे।
सबको कुतर रहे भीतर घुस,
घुन बनकर कुछ कीट निकम्मे।
मेरा फोटो रश्मि प्रभा जी शब्दों को कहाँ कहाँ से ढूँढ कर ला रही हैं और बना रही हैं ---
शब्द लहराकर हर तरफ जाते हैं
कोई रख देता है उसे रोटी में
कोई मटकी में
कोई बुहारकर निकाली गई धूल में
कोई टांग देता है कंदील संग
रात के अँधेरे में !
शब्द छुप जाते हैं
झांकते हैं दरवाज़े की ओट से
मनोज ब्लॉग पर श्याम नारायण मिश्र जी का एक ओजस्वी नवगीत  ..जिसको कवि ने  किसको समर्पित किया है यह जानने के लिए पढ़ें --गीत मेरे अर्पित  हैं
ख़ून की उबालों को,
क्रांति की मशालों को
गीत मेरे अर्पित हैं

तोतली जुबानों पर
दूनिया-पहाड़ों के
अंक जो चढाते हैं
My Photo

 शिखा वार्ष्णेय जी की खूबी है कि कहीं से भी प्रेरणा ले कर ज़िंदगी के कथ्य को कह देती हैं … एक कविता बुर्के में महिला को देख कर लिखी थी और आज पक्षियों के बारे में पढते हुए … आप भी पढ़िए पक्षियों से मिलती प्रेरणा को –-

कहते हैं उड़ान परों से नहीं 

हौसलों से होती है 
पर क्या हौसला ही काफी है. 
हौसले के साथ तो उड़ता है बादल भी 
पर कहलाता है आवारा.
  दिगंबर नासवा जी ऐसे रिश्तों की बात कर रहे हैं जो मृतप्राय: हो गए हैं , लेकिन यादें हैं कि हर पल चली आती हैं --रिश्ता
जिस दिन
हमारे रिश्ते की अकाल मृत्यु हुई
कुकुरमुत्ते की तरह तुम्हारी यादें
सर उठाने लगीं
कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे
मेरा फोटो
अनिता निहलानी जी की रचना ---
कवि को कौन चाहिए जग में
एक सुहृदय पाठक ही तो,
कोई तो हो जग में ऐसा
जो समझे उसकी रचना को !
My Photo  श्यामल सुमन जी एक बेहतरीन गज़ल लाये हैं --


कौन मुझसे पूछता अब किस तरह से जी रहा हूँ
प्यास है पानी के बदले आँसुओं को पी रहा हूँ
जख्म अपनों से मिले फिर दर्द कैसा, क्या कहें
आसमां ही फट गया तो बैठकर के सी रहा हूँ
My Photo 
बाबुषा  ने अपनी क्षणिकाओं का नाम दिया है -----बकवास --- पार्ट – 7   जब भी पढ़ती हूँ उनके गहन अर्थ में डूब जाती हूँ …

ज़्यादातर स्त्रियों की
नहीं होतीं ,
आँखें ,कान या नाक -
वे होती हैं
मात्र ;
गहरी -अंधी सुरंगें !
My Photo सोनल रस्तोगी जी कह रही हैं कि किसी पर भी आक्षेप लगाना कितना सरल है मिथ्या देव
सहज है ना
थूक देना किसी पर
आक्षेप लगाना

अकर्मण्य होने पर
कहना तू व्यर्थ है
जीवन बोझ है तेरा
My Photo ऋचा  लायीं है तेरी खामोशी के सुर
"साउंड एनर्जी" का तो समझ आता है
पर तुम्हारी ख़ामोशी के सुर कैसे गूंजा करते हैं
यूँ अविराम... अविरल... हर पल...
मेरी धड़कन में...
किस सप्तक के सुर हैं ये
कि कोई और नहीं सुन पाता इन्हें
तुम्हारे दिल से निकलते हैं
और मेरे दिल को सुनाई देते हैं बस
मेरा फोटो  राम कृष्ण गौतम कटु सच्चाई को कुछ यूँ कह रहे हैं --

हम तो यूं ही जिए जा रहे थे

ज़िंदगी में दो घड़ी मेरे पास न बैठा कोई
और आज सब मेरे पास बैठे जा रहे थे

कोई तोहफा न मिला आज तक मुझे "गौतम"
मगर आज सब फूल ही फूल दिए जा रहे थे
My Photo दिनेश राय द्विवेदी जी की रचना पढ़िए --

ख़ौफ तारी था उसका

उस के नाम से डरा कर, माताएँ
सुलाती थीं अपने बच्चों को
उस के शहर का रुख़ करने की खबर से
खड़े हो जाते थे रोंगटे
शहरवासियों के
My Photo  वंदना जी ले आई हैं एक खूबसूरत गज़लवो बादल , वो हवा , वो बूंदों की रिमझिम
उसके आँगन में बरसता हुआ मैं सावन
वो कोई भीगता हुआ  सा  गुलाब जैसे


मैं आँखों में उसकी महकता हुआ  गुल
वो मेरी पलकों पे शबनम ओ आब जैसे
My Photo शांतनु सान्याल जी का ज़िंदगी के बारे में क्या फलसफा है ..ज़रा पढ़िए --मुख़्तसर ज़िन्दगी,
कहाँ से आतीं हैं,
कराहों में डूबी ये आवाज़ें -
कि ज़िन्दगी बेमानी हुई जाती है,
कहाँ कोई फिर आईना है
टूटा, कि अक्श है मेरा
फिर बिखरा हुआ,
मेरा फोटो साधना वैद जी अपनी चाहतों के बारे में बता रही हैं --पानी पर लिखी तहरीरें

पानी पर लिखी तहरीरों की तरह
मेरी चाहतों का वजूद भी
कितना क्षणिक,
कितना अस्थाई है ,
मेरा फोटो डा० निधि टंडन जी बारिश के साथ अपने मन के दृश्य भी दिखा रही हैं --
बादल हैं ये काले काले
या मेरी आँखों का काजल बिखरा है
इस सावन में तुझे याद करते-करते .
My Photo सी० के० देवेन्द्र जी की क्षणिकाएँ पढ़िए -

तेरी बेवफाई, दो आंसू, सुरमा, टुकड़े

सुरमा
सुबह से सूरज
कहीं नज़र नहीं आया
तुमने आँखों में
सुरमा लगा लिया था क्या..!!!
My Photo  मनीष जोशी जी एक गज़ल उनके  हरी मिर्च ब्लॉग पर --जि...जी ... विषा
जो ग़म पूछें उन्हीं से हाल, वो कुछ यूं बताए हैं.
जहां तुम थोक में मिलते, वहीं से ले के आए है.
बलाएं भी बिरादर इस तरह, संग राह है प्यारे,
पनाहों में पता चलता, कहर पहले से आए हैं.
मेरा फोटो कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा जी की एक समसामयिक गज़ल पढ़िए --
हो समय प्रतिकूल तब वक्त भी ठहर जाता है .
हो समय प्रतिकूल तब वक्त भी ठहर जाता है ,
वक्त[सत्ता]के सम्मुख जन-तन्त्र बे-बस नजर आता है ,
मन में तमन्ना रखते हैं जमाने को बदलने की ,
पर ये जान देने का ही रास्ता नजर आता है ,
My Photo अब तो दिल्ली में भी मानसून आने को है ..और सुषमा आहुति जी भी कुछ इसी बारे में कह रही हैं --ये बारिश की  बूंदें
ये ठण्डी हवाये ये बारिश की बूँदे
जरा देखा इन्हे गौर से तो,
इनमे अक्स तुम्हारा दिखने लगा...!
My Photo हरीश भट्ट जी की एक बहुत मनमोहक रचना पढ़िए
जब ओढ़ लिया  इंकार  स्वयं में
तुम तो पल में संक्षिप्त हो गए
फिर मैं कैसे विस्तृत हो जाता

मैं दिया सरीखा मन मंदिर का
और वेद वाक्य का अनुवाहक
तुम मौन निवेदन क्रमशः में
फिर मैं कैसे, झंकृत हो जाता
मेरा फोटो देवेन्द्र गौतम जी की एक खूबसूरत गज़ल --ताज़गी की एक इबारत
ताजगी की एक इबारत और क्या.
मेरी बस इतनी सी चाहत और क्या.
बैठे-बैठे लिख रहा होगा खुदा
हम सभी लोगों की किस्मत और क्या.
मेरा फोटो  सुरेश यादव जी  बहुत ही संवेदनशील रचनाएँ लाये हैं मेरी संवेदनाएं , ज़मीं और विश्वास
तुम्हारी कविता में
बहुत बार
हथेलियों के बीच…
मरी तितलियों का रंग उतरता है
बहुत बार
घायल मोर का पंख
तुम्हारी कविता में रंग भरता है
मेरा फोटो वंदना गुप्ता जी चेतावनी दे रही हैं कि गर तुम चाहो तो मैं खुद के वजूद को बदल लूँ ..पर फिर वापस यह रूप नहीं ले पाउंगी ..क्यों किआसमां रोज  नहीं बदलता लिबास
तुम चाहते थे ना जीयूँ तुम्हारी तरह
लो आज तोड दीं सारी श्लाघायें
ढाल लो जिस सांचे मे चाहे
दे दो मनचाहा आकार
मगर फिर बाद मे ना कहना
 राजभाषा हिंदी ब्लॉग पर ज्वलंत समस्या को उठाती एक रचना पढ़िए ..रचयिता सृष्टि की
माँ के गर्भ में साँस लेते हुए
मैं खुश हूँ बहुत
मेरा आस्तित्व आ चुका है
बस प्रादुर्भाव होना बाकी है।
मैं माँ की कोख से ही
इस दुनिया को देख पाती हूँ
आज बस इतना ही , आशा है आज की चर्चा आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी … आपके सुझाव और प्रतिक्रियाओं का सदैव इंतज़ार रहता है … फिर मिलते हैं अगले मंगलवार को साप्ताहिक काव्य मंच पर ..तब तक के लिए दीजिए आज्ञा … नमस्कार --संगीता स्वरुप