| नमस्कार , हाज़िर हूँ एक बार फिर मंगलवार को साप्ताहिक काव्य मंच ले कर ..अक्सर सोचती हूँ कि यह तो आपको पता ही है कि मंगलवार है और मुझे आना ही है इस मंच को ले कर फिर क्यों लिख देती हूँ कि फिर से हाज़िर हूँ …शायद इस लिए कि मन में कहीं यह तो नहीं खटकता कि आ गयी हूँ तो झेलिये … या फिर कहीं मन में यह भावना तो नहीं कि शायद आप मेरा इंतज़ार कर रहे हों …खैर अब आप इंतज़ार खत्म कीजिये या झेलिये ..बस मन में भावना कोमल रखियेगा … और भावना का सीधा रिश्ता मन से है तो आज की चर्चा भी प्रारम्भ करते हैं कोमल मन से … |
डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी ले कर आए हैं --कोमल मन सुख में मुस्काता-दुख में आहत होकर रोता है पत्थर के तन में भी कोमल-कोमल मन होता है मन के उपवन में सजती है अरमानों की डोली केशर की क्यारी में फिर क्यों काँटों को बोता है |
| ओह ! पैसे में बड़ा वजन होता है रिश्ता कोई भी हो पर इसके विपरीत - प्यार में होता है सुकून घर नहीं फाइव स्टार होटल का एहसास लम्बी सी कार एक नहीं दो चार ... |
समय के देवता! थोड़ा रुको, मैं तुम्हारे साथ होना चाहता हूं। तुम्हारे पुण्य-चरणों की महकती धूल में आस्था के बीज बोना चाहता हूं। |
रूह को जानना नहीं आसाँ तू मुझे आज़मायेगा कब तक ! रस्म-ए-दुनिया ,निभाएगा कब तक ! छीन कर ख़्वाब, मेरी पलकों से अपनी नींदें , सजाएगा कब तक ! |
जीवन में कितने दुख हैं , जीवन में कितने सुख हैं, जोड़ घटा कर देख ज़रा ,थोड़ा सा अंतर होगा . |
मृदुला प्रधान जी का मन उड़ान भर रहा है लंबी और ऊँची -- मन पंख बिना जब रातों की परछाईं पर, पूनम का चाँद चमकता है, उजली किरणों के साये में, तारों का रूप दमकता है, |
जब भी कोई लीक ढूंढना. प्यार के प्रतीक ढूंढना. जि़न्दगी है लंबा सफ़र, साथ ठीक-ठीक ढूंढना. |
विजय रंजन जी की पढ़िए क्षणिकाएँ ..एक से बढ़ कर एक …क्षणिकाएँ मेरे पाँव खुद ब खुद- तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते, आज कल मुझे मंदिर जाने की – आदत सी हो चली है। |
गीता पंडित जी अपना काव्यात्मक परिचय दे रही हैं --मंजीरे मन के बजते जब जब राग सुनाती मन की कोयल, और अलगनी पर अंतर की भाव - भाव टंग जाता कोमल, नर्तन करती मन की सरगम शब्द स्वयं आकर कुछ कहते, छंद - छंद में अंतर्मन के मुसका जाती कविता उस पल|.. नए बिम्बों से सजी उनकी रचना पढ़िए --जाने क्यों तुम से ही चहकी मन चिड़िया कलरव था मन की डाली, जाने क्यूँ - कर काट ले गया, बरगद को पल का माली, |
इस्मत ज़ैदी जी की एक खूबसूरत गज़ल पेश है …हम भी , तुम भी ... ऐसी गुज़री है कि हैरान हैं हम भी ,तुम भी आज फिर बे सर ओ सामान हैं हम भी ,तुम भी क्यों है इक जंग ज़माने में अना की ख़ातिर जबकि दो दिन के ही मेहमान हैं हम भी , तुम भी |
डा० सविता जी अपने ब्लॉग पर एक खूबसूरत रचना लायी हैं --तुम पल-छिन जिनको देखा करती भांप लिया मन के तारों ने आँखों से मैंने देख लिया है तुम हो वही. |
आनंद विश्वास जी की खूबसूरत रचना -मैंने जाने गीत विरह के, मधुमासों की आस नहीं है. कदम कदम पर मिली विवशता , सांसो में विश्वास नहीं है. छल से छला गया है जीवन, आजीवन का था समझोता. लहरों ने पतवार छीन ली, नैय्या जाती खाती ग़ोता. |
एस० एम० हबीब कहानी बता रहे हैं --कैदी की ज़ुबानी -- मैं क़ैद हूँ.... !! ज़मीन के नीचे तहखाने में.... जिसकी नींव लेकर ऊपर,एक उन्नत भवन बना दिया गया है, |
यशवंत माथुर बता रहे हैं आज कल के मौसम के बारे में … एक गहन अभिव्यक्ति के साथ --बरसात का मौसम कभी जो सरपट दौड़ा करते थे नज़रें झुकाए जा रहे हैं दिखा रहे हैं करतब तरह तरह के |
| यूँ शबो-रोज़ आया करती है, याद उसकी रुलाया करती है। वो मुसाफ़िर हूँ मैं जिसे अक्सर; चाँदनी भी जलाया करती है।। |
दीया जलाना हम भूल गए .. व्यस्तताओं के बीच अपनों से मिलना भूल गए! जीवन चलता ही रहा बस जीना हम भूल गए! |
रेखा श्रीवास्तव जी मना रही हैं --जीत का जश्न-- एक गरीब और विकलांग बच्चे की जीत का जश्न कुछ इस तरह मनाया हमने की आँखें तो भरी ही कुछ कलम भी कह उठी। राहों में बिछे काँटों की चुभन औ' पैरों से रिसते लहू से निकली घावों की पीड़ा, हौसलों की राह में रोड़े बन जाती है? |
श्याम कोरी “ उदय “ जी की गज़ल ---कफ़न का टुकड़ा गर नहीं लड़ा मैं आज भयंकर तूफानों से कल छोटी फूंको से भी मैं गिर सकता हूँ ! है कद-काठी मेरी, आज भले छोटी ही सही पर जज्बातों के तपते तूफां लेकर चलता हूँ ! |
डा० कविता किरण की खूबसूरत नज़्म पेश है --वही रात रात का जागना वही रोना इक-इक बात पर तकिये से मुंह को ढांपकर सर रख के अपने हाथ पर खाली हवाओं को ताकना ! |
और चर्चा के अंत में …परेशान हैं वंदना जी कि आखिर चवन्नी पीड़ा है क्या ? --पढ़िए उनकी हास्य रचना –= क्यों इतना शोर मचाया है हमको ना इतना समझ ये आया है चवन्नी की विदाई का क्यूँ इतना शोर मचाया है ये तो दुनिया की रीत है आने वाला कभी तो जायेगा फिर ऐसा क्या माजरा हुआ जैसे किसी आशिक का जनाजा हुआ |
| आशा है आपकी पसंद के कुछ परिचित और कुछ अपरिचित चेहरे प्रस्तुत कर पायी होऊँगी .आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा उर्जा प्रदान करती हैं … जाते जाते एक नज़र राजभाषा हिंदी ब्लॉग पर चंद अशआर पर भी डालना न भूलें …. संगीता स्वरुप |



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चर्चा के समापन पर
