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रविवार, अगस्त 07, 2011

रविवासरीय (07.08.2011) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर से हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ।

आज की चर्चा शुरु करते हैं।

--बीस-

देश में पहली बारःएम्स ने किया हाथ का रीइंप्लांटेशन

कुमार राधारमण

नई दिल्ली एम्स देश का पहला ऐसा स्वास्थ्य संस्थान बन गया है जिसने बांह का रीइंप्लांटेशन करने में सफलता प्राप्त की है। कैंसर टयूमर से जूझ रहे पांच वर्षीय रेहान के हाथ काटने तथा उसकी जगह आर्टिफिशियल हाथ लगाने की बजाए एम्स के डाक्टरों ने उसके बांह को काटकर अलग कर दिया और कोहनी से हथेली वाले भाग को कंधे से जोड़ कर उसे उसका हाथ लौटा दिया है।

अद्भुत ! किसी चमत्कार से कम नहीं। इस रोचक और अद्भुत जानकारी को अवश्य पढ़ें।


--उन्नीस
—

हरएक आँख में नमी

Kusum Thakur

clip_image001 जहाँ पानी भी अमृत है, बोल कडवे क्यों

गंग की धार भी थमी इस खूबसूरत जहाँ में

सिसकते लोग मगर पूजते पत्थर

भावना की है कमी इस खूबसूरत जहाँ में

बदल रहे समय का स्पष्ट प्रभाव दर्शाती ग़ज़ल!


--अट्ठारह
—

... और कंकड़ी पर पहाड़ गिर पड़ा!!!

बी एस पाबला

1620370598.940.594409490मुझे रोजाना दसियों लिंक ईमेल में मिलते हैं जिसे पढ़ने का और फिर टिप्पणी करने का निवेदन/ आग्रह होता है। निश्चित तौर परअधिकतर साथी यही चाहते होंगे कि उनकी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे। जब भी कोई नया ब्लॉग मिलता है एक बार अवश्यउस पर ध्यान देता हूँ और अपनी रुचि के अनुसार पाए जाने पर आगे भी पढ़े जाने हेतु सुरक्षित कर लेता हूँ।

सतर्क करती पोस्ट! कहीं लेने के देने न पड़ जाए।


--सत्रह
—

लोकतंत्र में सुधार चाहिए!

रेखा श्रीवास्तव

clip_image002अब लोक को ही जागरूक होना पड़ेगा, तभी तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ये जागरूकता हस्तांतरितहोगीऔर फिर आज नहीं तो कल आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ समाज और सरकार मिल सकेगी । एककाले कारनामों से रहित और लोकहित के लिए सोचने वाली सरकार।

वर्तमान परिदृश्य में इस विचार मंथन के द्वारा किसी नई राह की तलाश है।


--सोलह—

आयु बोध

रचना

clip_image003 आयु बोध
कौन कब और किसे करा पाया हैं
क्या आयु से बोध हमेशा ही आ जाता हैं
क्या "जी" और 'आदरणीय' कहने से
हर क़ोई हर किसी को
उसकी आयु योग्य आदर दे पाता हैं

कविता के अनूठे बिम्ब प्रभावित करते हैं।


--पन्द्रह
—

नया गूगल क्रोम दो नयी खूबियों के साथ

नवीन प्रकाश

clip_image004 गूगल क्रोम इंटरनेट ब्राउजर का नया स्थिर संस्करण जारी हो गया है नया Google Chrome 13.0.782.107 ।
इसमें दो नयी खूबियाँ जोड़ी गयी है Instant Pages और Print Preview । Instant Pages

बहुत उपयोगी पोस्ट।


--चौदह
—

संवेदनाओं की घास

संगीता स्वरुप

clip_image005 मन की घनेरी

घास पर

मेरी सोच के  

कदमों से  ,

पगडंडियाँ तो

बन जाती हैं

अनायास ही ,

क्यों कि

आँख बंद कर भी

सोच चलती रहती है

बार बार की सम्वेदनाओं की धिसाई से वहां व्यवहार की पगडंडी तो बन जाती है पर फ़िर वहां सम्वेदनाओं की घास नहीं उगती!!
अद्भुत बिंब संयोजन!!


--तेरह
—

"झंडा ऊंचा रहे हमारा", किसने इस गीत की रचना की ?

गगन शर्मा

clip_image006 यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलुसों, प्रभात फेरियों के अवसर पर गाया जाने लगा और जब 1938 में हरिपुरा के ऐतिहासिक कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ध्वजारोहण करते ही वहां पांच हजार लोगों ने देश के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति में भाव-विभोर हो इसे गाया तो इसे राष्ट्रीय झंड़ा गीत होने का गौरव भी मिल गया।

एक महत्वपूर्ण पोस्ट। इस तथ्य की जानकारी के साथ पूरा गीत भी दिया गया है। ज़रूर पढ़ें।


--बारह
—

तथ्य की परिक्षण-विधि -अनेकांतवाद

सुज्ञ

clip_image008 सत्य तथ्य पर पहुँचने के लिए के लिए हमें वक्ता के कथन का आशय (अभिप्राय) समझना आवश्यक हो जाता है। आशय समझने के लिए यह समझना आवश्यक हो जाता है कि वक्ता ने कथन किस परिपेक्ष्य में किया है किस अपेक्षा से किया है। क्योंकि हर कथन किसी न किसी अपेक्षा से ही किया जाता है।

इस आलेख के बारीक विश्‍लेषण गहरे प्रभावित करते हैं।


--ग्यारह
—

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी

Suman

clip_image009 भारतीय छात्र आन्दोलन का संगठित रूप 1828 में सबसे पहले कलकत्ता में एकेडमिक एसोसिएसन के नाम से दिखाई देता है, जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियों द्वारा की गई। एकेडमिक एसोसिएसन देश का पहला छात्र संगठन था जिसने सामंतवाद विरोधी, स्वतंत्रता, प्रगति और आधुनिकता जैसे विचारों के प्रचार-प्रसार का काम किया।

इतिहास के पन्नों से लाकर पेश किया गया है एक शोधपूर्ण आलेख का पहला भाग।


--दस
—

ग़ज़लगंगा.dg: हर वक़्त कोई रंग हवा में.......

देवेंद्र गौतम

clip_image010 अब तू खुदा-परस्त नहीं खुद-परस्त बन

जी
ने के वास्ते यहां खुद को निहाल रख.

जिसकी मिसाल ढूँढनी मुमकिन न हो सके

हम सब के सामने कोई ऐसी मिसाल रख.

सुंदर ग़ज़ल!


--नौ
—

शायद उनके परिवार में किसी को Cancer नहीं हुआ...

POOJA..

clip_image011 कुछ ही दिनों में हम अपना स्वतंत्रता-दिवस मानाने वाले हैं... यानी एक और साल आज़ादी के नाम...

वाकई हम कुछ ज्यादा ही आज़ाद हो गए हैं... किसी को कुछ भी बोलने की आज़ादी ही नहीं, बल्कि बुरा, गन्दा, ख़राब और घटिया बोलने में हम पीछे नहीं हटते...

सर्थक चिंतन, विचारोत्तेजक पोस्ट।


--आठ
—

लौहपथगामिनी

आकल्‍प

clip_image012

रेल से यात्रा एक सुखद अहसास है। हम अपने जीवन में इतनी तेजी से भागते जाते हैं कि छोटे-छोटे अहसास लगभग चूक ही जाते हैं और जिन्दगी एक सुहाने सफर की कथा बनने से विपरीत समय काटने और बोझ से लदे आदमी की आकृति गढ़ने लगती है। जिन्दगी के ठहरने का अहसास हो तो गति का आनंद कुछ और ही है।

सुंदर संस्मरणात्मक लेख।


--सात
—

clip_image013

गेस्ट रूम में रही वो, सालों परदा तान ||

रविकर

clip_image014 पाली-पोसी प्राण सा,  माता सदा सहाय |

दो किलो का बचपना, सत्तर का हो जiय |

सत्तर का होकर करे, पत्थर-दिल सा काम |

दुर्बल वृद्धा का करे,  जीना   वही   हराम ||

अम्मा थी तब मलकिनी, आज हुई अनजान |

गेस्ट रूम में रही वो,   सालों परदा तान ||

बेहतरीन दोहे। सार्थक, विचारोत्तेजक।


--छह
—

नैतिक रूपांतरण की जरुरत है ....

Suman

clip_image015 इस बोध कहानी से यही लगता है आँख पर जो लोभ और लालच क़ी धूल पड़ी है उसे हटाने के लिये नेताओं का नैतिक होना बहुत जरुरी है ! तभी देश क़ी जनता का कल्याण होगा और देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी !

बहुत अच्छी कहानी के माध्यम से बताया ..आँखों पर जमी धूल तो हटती नहीं और दूसरों की आँख में धूल झोंक देते हैं नेता!


--पांच
—

इक था बचपन...बचपन के प्यारे से दोस्त भी थे...

rashmi ravija

clip_image016 ब्लॉग ,गुजरे लम्हों को याद करने का एक बहाना सा बन गया है...सारे संस्मरण गुजरी यादों के सागर ही तो हैं....जिनमे डूबना-उतराना मुझे कुछ ज्यादा ही भाता है.

सभी का बचपन अमूमन इस तरह के वाकयों से दो चार होता रहता है।


--चार
—

यदि मौन बड़ा तो लेखन-प्रवचन क्यों?

Dr.J.P.Tiwari

clip_image017 चिन्तक, कवि और कलाकार,
निभाता है, अपना लोक धर्म.
अपनी अनुभूतियाँ बताते - बताते,
हो जाता है स्वयं, एक दिन -'मौन'.
और इस प्रकार, प्रलय से सृष्टि,
और सृष्टि से प्रलय का ,
पूरा एक चक्र, कुशलता से दुहरा जाता है.

कभी मौन ही सब समस्‍या को सुलझा लेती है .. कभी समस्‍याओं को सुलझाने के लिए लेखन प्रवचन आवश्‍यक होता है .


--तीन
—

मॉंनसून स्कैम - पार्ट २

शिवकुमार मिश्र

clip_image018 पेश है कोलकाता के आकाश में छाने वाले बादलों को कंट्रोल करने वाले देवता की प्रेस कांफ्रेंस.
पत्रकार आ चुके हैं. देवता के सेक्यूरिटी गार्ड चाहते थे कि पत्रकार अपने जूते कांफ्रेंस हाल से बाहर उतार कर अन्दर घुसें. देवता ने मना कर दिया. बोले; "पत्रकार भी अपने हैं और जूते भी अपने ही हैं. जो अपने हैं उनसे कैसा खतरा? जूते समेत ही इन्हें अन्दर जाने दो."

एक मज़ेदार व्यंग्यात्मक प्रस्तुति।


--दो
—

साहित्य और संग्रहण

प्रवीण पाण्डेय

clip_image019 हर व्यक्ति संग्रह करता है, आवश्यक भी है, कोई अत्याधिक करता है, कोई न्यूनतम रखता है। पशुओं में भी संग्रहण का गुण दिखता है, जीवन में अनिश्चितता का भय इस संग्रह का प्रमुख कारण है।

कम्पयूटर टैक्नोलोजी की प्रगति चौंकाने वाली है शायद ही विज्ञानं ने किसी और क्षेत्र में इतनी तेजी से तरक्की की हो .... लेख इसी बात को बताता है।


--एक--


बुखार में प्रेम कवितायें

शरद कोकास

clip_image020 अछा लगता है

गिरती हुई बर्फ में ख
ड़े

पेड़ की तरह काँपना

जड़ों से आग लेना

शीत का मुकाबला करना

अच्छा लगता है

ठिठुरते हुए
मुसाफिर का

गर्म पानी के
चश्मे की खोज में

यात्रा जारी रखना ।

सारगर्भित, विचारोत्तेजक कविता।

आज बस इतना ही!

अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

तब तक के लिए हैप्पी ब्लॉगिंग!!

शनिवार, अगस्त 06, 2011

बेशर्मी मोर्चे से मेंढको कि टर्र टर्र तक का सफ़र


Picture 114चर्चाकार :यह ब्लॉगजगत एस एम् मासूम के नाम से जानता है और अमन के पैग़ाम के नाम से पहचानता भी है. सामाजिक सरोकारों से जुड़ कर काम करना अच्छा लगता है . समाज में अमन और  शांति बनी रहे यही दुआ हर समय करता हूं.  बेशर्मी मोर्चे के ख़त्म होते ही रमजान की मुबारकबाद का दौर शुरू हो गया और नागपंचमी पे पर श्रद्धालुओं की उमड़ी  भीड़.
imageखरगोश रुपी उड़नतश्तरी से आज सुबह सुबह ताज़ा माल उतरा है और उसमें भरी हैं ज्ञान कि बातें जिसमें लिखा है " हम भारतीय जब देश के बाहर हो तो एक बात के लिए यह खासियत और दिखा जाते हैं कि जब किसी दूसरे देश के शहर में जायेंगे, तो खाने के लिए सबसे पहले भारतीय रेस्त्रां तलाशने लगते हैं. भले ही भारत में इटालियन पिज़्ज़ा, बर्गर, चाईनीज़, ग्रीक खाने के पीछे भागें और मित्रों के बीच अपना स्टेन्डर्ड जमाये जायें मगर देश के बाहर निकलते ही भारतीय रेस्त्रां की तलाश शुरु
14मैं तो समझता था केवल मेंढक टर्र टर्र करते हैं और वो भी बरसात मैं लेकिन अनवर जमाल साहब ने बताया कुंवे के मेंढको के बारे मैं ,बड़ी मजेदार टर्र टर्र थी  कहीं यह मेंढक दिल्ली मैं  बेशर्मी मोर्चा ना निकालने  लगें.
imageकल अचानक ब्लॉगजगत के डंडे से मुलाक़ात हो गयी डर भी लगता था कहीं सर पे पड़ ना जाए. लेकिन पुराणी प्यार भरी उनसे मुलाक़ात याद आ गए ,हिम्मत बढ़ी उनसे बाद नमस्कार पूछा आज कल क्या चल रहा है? जवाब आया पंगई, दंगई,,लुच्चई, नंगई। आप भी देख लें बेह्तारीक व्यंगकार और लेखक का कमाल
zeal-2डॉ दिव्या अक्सर अपने अस्ल मूड मैं आ जाती हैं और फिर जो कहती हैं दिल से कहती हैं बाकी तो समझे वाली बात है ,इस ब्लॉगजगत मैं सब कुछ चलता है. " इस बार केवल कहा ही नहीं बल्कि ???? अनवर जमाल के मेंढको वाले कुवे को चूने से भर के बंद करने कि कोशिश कि है.  " कहती हैं मुलाकातियों का गुट बन जाता है , जिसमें अन्य ब्लॉगर्स उपेक्षित रहते हैं ! उनके लेखन का कोई सम्मान नहीं और उनसे किंचित द्वेषपूर्ण व्यवहार भी होता है ! " आप भी लुत्फ़ उठाएं.
http://2.bp.blogspot.com/_YAqjmbtXvAQ/TLhafWHy7KI/AAAAAAAAFmQ/unpfmBhHOjE/S220/yahoo.jpgकुमार राधारमण जी देखिये योग से कब्ज दूर करने के तरीके बता रहे हैं. और कब्ज़ का कारण रात मैं देर से सोना इत्यादि हुआ करता है जो संभव है बहुत से ब्लोगरों को होता भी हो. आप भी सीख लें योग और रात मैं देर से जागें फिर भी रहे तंदरुस्त
khush2खुशदीप सहगल जैसी महान  शक्सियत से कौन वाकिफ नहीं लेकिन मुझे लगता है कि उनके घर से दफ्तर जाने वाले रास्ते मैं कहीं पागलखाना अवश्य पड़ता है .कल देखा मेढको कि टर्र टर्र से परेशान भाई पहुँच गए पागलखाने वहाँ के सबसे समझदार पागल  से मिलने.  और जो देखा ओसे आप भी पढ़ें. अभी पागलखाने से निकले ही थे कि पड़ गए चक्कर मैं  गर्लफ्रेंड के और आप भी देखें कितने का चूना लगा और किसको?
आशु जी समझा  रहे हैं कि अगर संसार आपको दुःख का कारण लगने लगे, तो याद रखना संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं | अगर कांटें इकट्ठे किये हैं तो दिखाई तो पड़ेंगे " ब्लॉगजगत से परेशान लोगों को इस बात पे अवश्य ध्यान  देना चाहिए
imageउत्तराखंड से शंकर फुलारा जी  आज कल परेशान हैं वी ईई पी लोगों से और टेंशन लेने का नहीं लल्लू .......... देने का ! कहते कहते खुद ही टेंशन ले बैठे और उठाया सवाल क्या हमने कोई पाप किये हैं. आप भी देखीं क्या आप ने  कोई पाप तो नहीं किया फिर ??/ 
imageचन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’  को दुनिया से  ग़ाफ़िल’ हरगिज़ ना समझें चर्चा करते करते अचानक उन्हें महसूस हुआ कि आग लगायी लोगों ने  ,नज़र लगाई  लोगों ने . सुन के उनकी फ़रियाद  मैं भी पहुंचा , बात उनकी सही लगी बस फिर क्या था पहुँच दिया आप सभी तक .
imageरेखा जी दुनिया के सामने कुछ लाना चाहती हैं मैंने भी सोंचा नेक काम मैं सहयोग दूं. आप  बभी पढ़ें और सहयोग दें. रेखा जी कहती हैं की सबसे पहले मैं क्षमा चाहती हूँ क्योंकि ये पोस्ट मैंने कई ब्लोग्स पर डाली हैं क्योंकि ऐसी घटनाएँ सबके सामने आनी चाहिए। जरूरी नहीं है कि मेरा ब्लॉग सभी कि दृष्टि में हो।

imageविकीलीक्स द्वारा स्विस बैंकों के भारतीयों की पहली सूची जारी की गई

सुरेश  चिपलूनकर  जी ने दिखाई पूरी लिस्ट लालू से ले के भालू तक सभी के नाम शामिल


imageमदन मोहन बाहेती घोटू जी की हिम्मत तो देखिये फरमा  रहे हैं कि "हाँ, हम भ्रष्ट हैं! आपको क्या कष्ट है?
imageइस सप्ताह ब्लॉगजगत और ब्लागरों के व्यवहार, गुट ,लेखनी और इसके भविष्य कि चिंता करते बहुत से लोग देखे गए. बावजूद सामने से दिखने वाले प्रेम के यहाँ के ब्लोग्गेर्स इस आभासी दुनिया के तौर तरीके से बहुत अधिक संतुष्ट नहीं दिखते. शास्त्री जी को तो लगता है कि हम चाहे जंगली होते, पौधे होते लेकिन होते आपस मैं प्रेम बांटने वाले. उच्च विचार और मैं सहमत.
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सकता है.अभी छ माह पूर्व तक बापू-बाज़ार क्या है,क्यों है  कुलपति प्रो सुन्दरलाल जी की प्रेरणा से  कुल तीन बापू-बाज़ार आयोजित किये जा चुके हैं जिसे समाज के लोंगों नें बहुत आशा और सम्मान के साथ आत्मसात किया है.
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सतीश सक्सेना जी की हंसी कभी बेवजह नहीं हुआ करती. बड़ी बेहतरीन बात कह रहे हैं आप भी देखें. भाई हँसना हो तो सच्ची हंसी ही हंसें :)
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वैसे तो भ्रष्टाचार केवल भ्रष्टाचार होता है यह कहीं भी किया जा रहा हो. आज धार्मिक ठेकेदारों पर प्रेम रस की जगह गज़ब ढा  रहे हैं शाहनवाज़ साहब.   क्या इसका हल धार्मिक लोगों से दूरे है? इस सवाल का जवाब अवश्य तलाशें?
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रतन सिंह जी देखिये इतिहास की किताब से के तोहफा आप के लिए ले हैं?
बाईजीराज झालीजी की एक दासी थी रामप्यारी जो बहुत होशियार थी वह मुसाहिबों के संदेश बाईजीराज तक पहुंचाते पहुंचाते इतनी होशियार हो गयी कि वह राजकार्य में दखल देने लग गयी| बाईजीराज ने उसे अपनी बडारण(मुख्य दासी) बना लिया|बाईजीराज कोई भी कार्य उसकी सलाह के बिना नहीं करती थी|पर्दा प्रथा के कारण बाईजीराज झालीजी के बाहर नहीं निकलने के चलते वह बाईजीराज झालीजी की आँख,कान बन गयी थी
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शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

कैसे भूल जाऊं ? चर्चा-मंच-597


 (1)

नई क़लम - उभरते हस्ताक्षर

रुंधे हुए गले का जवाब

वो पाक माहे रमज़ानसुबह सादिक का वक़्त
खुद के वक़्त की परवाह किये बगैर
सहरी के लिए मुझको जगाना
दिन भर के इंतज़ार के बाद
वो मुबारक वक्ते अफ्तारी
हर रोज मिरे लिए कुछ मीठा भेजना
कैसे भूल जाऊं-

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी"
(2)
" 21वीं सदी का इंद्रधनुष "

babanpandey

राह में हैं कटीले कंकड़ ,तो क्या चलना बंद कर दूँ
ख़बरें छपी है फरेब की ,तो क्या पढना बंद कर दूँ ....//

मैं झूठ का तड़का नहीं लगाता, सच की दाल में
उन्हें बुरा लगता है ,तो क्या लिखना बंद कर दूँ ...//
My Photo
 विषयाधिप = शासक   विषा = कडुवी-तरोई   विषयांत= देश की सीमा

(3)
"यादें"
अगर ख़ुशी कम लगे जहाँ में
ग़मों की पढ़कर किताब देखो
गिला जो तुमको हो गर किसी से
लूटे दिलों का हिसाब देखो
My Photo
New Delhi, Delhi, India
कुछ तो ऐसा करें ज़माने में वक़्त लग जाए हमें भुलाने में
विष-विस्फोट करता घूमे,
दर्दनाक  मंजर  पर  झूमे |
आयातित-विष का भंडारी
मौत भरी है इसके फू-में  ||
वारदात पर हाथ मींजिये,
नाग-देवता माफ़ कीजिये ||
 विष्कलन = आहार
(5)
'विचार प्रवाह'
शब्द भावनाओं की अभिव्यक्ति है...जिनसे उलझना मेरे जीवन का हिस्सा है...कुछ साहित्य से जुडाव लिखने को प्रेरित करता है , कुछ भागती हुई जिन्दगी.....इसी अहसास के साथ अपनी जीवन यात्रा के विचार प्रवाह को आप सब के सामने रख रही हूँ..

काश !

काश !
तुम भी वही होते
जो मै हूँ ....
माफिया मर्फ़िया सा घातक
पुश्तों का  बड़-पापी पातक |
अपना हित साधे ये  प्राणी 
जन-संसाधन का है बाधक ||
इनको सारी जगह दीजिये,
नाग-देवता माफ़ कीजिये ||
जैसे जैसे पेट बढ़ रहा 
वैसे-वैसे रेट बढ़ रहा |
उन्नत विष का दंड मंगाया,
बेकसूर बे-मौत मर रहा ||
 छटे-छ्टों की छटा देखिये ,
नाग-देवता माफ़ कीजिये ||
  Arvind Mishra  सर्प संसार (World of Snakes)
 

 (7)

मौत की उम्मीद

 

Khuda Khair kare

 




दलितों का संस्कृत


 (11)
एक गीत अनोखा लायी हूँ... - Open Books Online





(14)

चैतन्य का कोना

मेरा फोटो
चैतन्य शर्मा
Jaipur, India, Calgary ,Canada
मैं चैतन्य एक बहुत समझदार बच्चा हूँ | माँ को कभी परेशान नहीं करता | मुझे पोलर बीयर बहुत अच्छे लगते हैं | मुझे डांस करना और माँ को मनाना बेहद पसंद है | स्कूल में भी मुझे सब बहुत पसंद करते हैं | बस! मुझे माँ की एक बात बिल्कुल समझ नहीं आती | मस्ती करो तो परेशान होकर कहती है की चुपचाप बैठो| चुप बैठता हूँ तो परेशान होकर कहती है क्या हुआ ?

डिज़नीलैंड..... एक मैजीकल वर्ल्ड !

"अन्तर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

एक पादप साल का,
जिसका अस्तित्व नही मिटा पाई,
कभी भी,समय की आंधी ।
ऐसा था,
हमारा राष्ट्र-पिता,महात्मा गान्धी ।।
कितना है कमजोर,
सेमल के पेड़ सा-
आज का नेता ।
जो किसी को,कुछ नही देता ।।
दिया सलाई का-
मजबूत बक्सा,
सेंमल द्वारा निर्मित,एक भवन ।
माचिस दिखाओ,और कर लो हवन ।
आग ही तो लगानी है,
चाहे-तन, मन, धन हो या वतन।।
यह बहुत मोटा, ताजा है,
परन्तु,
सूखे साल रूपी,गांधी की तरह बलिष्ट नही,
इसे तो गांधी की सन्तान कहते हुए भी......-
(15)
जज़्बात جذبات Jazbaat

निभा लेता हूं

हज़रात, आदाब
एक शेर देखिए
 चलो तकदीर दोनों आज़माकर देख लेते हैं
मिलाता है हमें किसका मुक़द्दर देख लेते हैं
[2.JPG]


(17)
हम सब एक हैं ….डॉ नूतन गैरोला
मने कभी इंसान की हड्डी को देखा है
कही भी जा दिखेगी हड्डी होती सिर्फ सफ़ेद है
क्या बोलती है वो
मैं हिंदू हूँ, मै मुस्लिम हूँ या कि ईसाई और सिख?
कभी पानी ना मिलेगा तो जानोगे प्यास होती है क्या? 
[niti.bmp]


यहाँ ऐसा होता है तो क्यों होता है मेरे देश में ,विदेश में ख़ास कर अमरीका में यह सवाल नहीं उठता है .वहां एम् एससी फिजिक्स के बाद बेशक आप एम् बी बी एस कर लो ,कुछ और कर लो -पढो जो दिल करे , करो रचनात्मक जो दिल----
[CRW_6198.jpg]
 

 

भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियाँ - एक परिचर्चा

आँच-79
भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियाँ - एक परिचर्चा
आचार्य परशुराम राय


मेरा फोटो(21)

Bullah main ki jana main kaun

लघुकथा - 4

सरकारी नौकरी  

'' घर नहीं चलना , टाइम हो चुका है .'' - मेरे साथी ने मुझसे कहा . मैंने इस कार्यालय में आज ही ज्वाइन किया था .शायद इसीलिए उसने मुझे याद दिलाना चाहा था .
'' मेरी घड़ी पर तो अभी दस मिनट बाकी हैं .'' - मैंने घड़ी दिखाते हुए कहा .
'' वो तो मेरी घड़ी पर भी हैं ."
'' फिर ? ''


अगले शुक्रवार प्रवास पर हूँ , झाँसी, लखनऊ, फ़ैजाबाद और १८ को वापस धनबाद ||  - रविकर   

शुभ - विदा

गुरुवार, अगस्त 04, 2011

"कोई पूर्ण नहीं होता " चर्चा मंच - 596

 आज की चर्चा में आप सबका हार्दिक स्वागत है 

चलते है सीधे चर्चा की ओर

सबसे पहले पद्य रचनाएं 

गद्य रचनाएं 
   
 जाते -जाते देखिए कुछ तस्वीरें और कहिए ओह! माय गोड़

                             आज की चर्चा में बस इतना ही .

                                         धन्यवाद 
                                           दिलबाग विर्क

बुधवार, अगस्त 03, 2011

"क्या ग़ज़ब देखा" (चर्चा मंच-595)

 मित्रों!
 बुधवासरीय चर्चा में एक बार फ़िर आप सब का स्वागत है । चर्चा शुरू करने के पहले मैं फ़िर आप सब से आह्वान करता हूं कि देश में चल रहे संक्रमण काल में अपनी लेखनी को राजनैतिक अव्यवस्था पर केंद्रित रखें । जरूरी नहीं कि आपकी सोच सरकार के विरूद्ध ही हो पर जनता के सामने दोनो पक्षों की कमियां और खूबियां  रखने का काम लेखक का ही होता है । मुख्यधारा की मीडिया के सरकार और कारपोरेट हाउस के धनबल मे बह जाने के कारण समाज को जगाने की जिम्मेदारी  इंटरनेट पर लिखने वालों पर आ गई है ।
                                                      तलवारों को लहराने दो                            
                                                      बाणो को चल जाने दो
                                                      अब न हो इश्क गिले शिकवे
                                                       कलम को आग लगाने दो 
 चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’  साहब ने बताया  क्या बताऊँ के क्या ग़ज़ब देखा   आज संसद मे  कांग्रेस का स्लट वाक  हो रहा था नीरेन्द्र नागर साहब का कहना था कि साहब  बेशर्म और ढीठ सरकार से यही उम्मीद थी!  । प्रमोद जोशी जी ने कहा संसदीय व्यवस्था को प्रभावी बनाना भी हमारी जिम्मेदारी है   । स्वराज्य करूण जी ने कहा मांगते  क्यों नही जवाब    पूछो -पूछो कौन हैं वो ?  जो देश को लूट रहा है । कुंवर प्रीतम जी ने कहा बापू, लो अवतार आज फिर वही पुराने वेश में  तभी होगा हमारा उद्धार ।एम सिंह जी ने तीखा तड़का  लगाया चकित क्‍यों हैं सिब्‍बल साहब    जिस दिन देश  मे शिक्षा फ़ैल जायेगी 100 % लोगो की राय आपके खिलाफ़ हो जायेगी । ललित शर्मा जी ने झाड़ू लगाओ का नारा लगा दिया अथ सम्मार्जनी कथा --- ललित शर्मा  बोलने लगे कचरे को देश से बाहर फ़ेंकना ही सही है । उनकी कथा पढ़ हमे बहुत गुस्सा आया झाड़ू का इतिहास लिखा और उस झाड़ू से सदियों से पिटते आये पतियो का नाम ही न लिया । हमने पत्नि पीड़ित संघ की ओर से उन्हे नोटिस दे दिया है । कल तक भूल ना सुधारी तो ब्लाग गंज में उनके खिलाफ़ अनशन किया जायेगा । खुशदीप  सहगल जी ने कहा कहीं बाहर नही भेजना है भाई तिहाड़ ही सही है  कुछ चले गए, कुछ जाने को तैयार... हैं  । हिमांशु राय जी ने कहा भाई , सदियो से शोषण का इतिहास है पढ़ लीजिये बन्दर नामा  । शास्त्री जी का एंगल अलग था “आजादी की वर्षगाँठ तो एक साल में आती है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)   उस दिन को खुशी का त्योहार मनाओ न कि विरोध का ।अविनाश वाचस्पति जी  शीला के शब्‍दों की जवानी     मे चुनावी नारों की हकीकत बता रहे हैं । वहीं धनंजय जी चाँद दिखा मे बड़ी ही कसी हुई लेखनी मे इफ़्तेखार की दावत मे भी सियासत का घिनौना चेहरा दिखा रहे हैं । आज साहित्यिक दृष्टी से एक ही लेख का चयन किया है सृजन और समाज ..............केवल राम  । जिसे छोड़ते न बना हलांकि मन यही था केवल समसामयिक रचनाओं को शामिल करुं पर ऐसी शानदार लिखावट छोड़ते न बनी । आखिर मे भगवान शिव के  सावन महिने मे जाट देवता (संदीप पवाँर)    चलो श्रीखण्ड महादेव की ओर (पिंजौर से जलोढी जोत) भाग 3    को पढ़ना मतलब बिना टिकट महादेव दर्शन और पुण्य लाभ । समापन विद्या जी के   गाजर का हलवा     से । 
 पुनश्च -          जिन्हे भी चर्चामंच मे चर्चाकार बन सहयोग प्रदान करने की इच्छा हो टैस्ट चर्चा मंच: "सूचना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")    वे यहां क्लिक कर आगे की जानकारी ले सकते हैं ।