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Sunday, August 07, 2011

रविवासरीय (07.08.2011) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर से हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ।

आज की चर्चा शुरु करते हैं।

--बीस-

देश में पहली बारःएम्स ने किया हाथ का रीइंप्लांटेशन

कुमार राधारमण

नई दिल्ली एम्स देश का पहला ऐसा स्वास्थ्य संस्थान बन गया है जिसने बांह का रीइंप्लांटेशन करने में सफलता प्राप्त की है। कैंसर टयूमर से जूझ रहे पांच वर्षीय रेहान के हाथ काटने तथा उसकी जगह आर्टिफिशियल हाथ लगाने की बजाए एम्स के डाक्टरों ने उसके बांह को काटकर अलग कर दिया और कोहनी से हथेली वाले भाग को कंधे से जोड़ कर उसे उसका हाथ लौटा दिया है।

अद्भुत ! किसी चमत्कार से कम नहीं। इस रोचक और अद्भुत जानकारी को अवश्य पढ़ें।


--उन्नीस


हरएक आँख में नमी

Kusum Thakur

clip_image001 जहाँ पानी भी अमृत है, बोल कडवे क्यों

गंग की धार भी थमी इस खूबसूरत जहाँ में

सिसकते लोग मगर पूजते पत्थर

भावना की है कमी इस खूबसूरत जहाँ में

बदल रहे समय का स्पष्ट प्रभाव दर्शाती ग़ज़ल!


--अट्ठारह


... और कंकड़ी पर पहाड़ गिर पड़ा!!!

बी एस पाबला

1620370598.940.594409490मुझे रोजाना दसियों लिंक ईमेल में मिलते हैं जिसे पढ़ने का और फिर टिप्पणी करने का निवेदन/ आग्रह होता है। निश्चित तौर परअधिकतर साथी यही चाहते होंगे कि उनकी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे। जब भी कोई नया ब्लॉग मिलता है एक बार अवश्यउस पर ध्यान देता हूँ और अपनी रुचि के अनुसार पाए जाने पर आगे भी पढ़े जाने हेतु सुरक्षित कर लेता हूँ।

सतर्क करती पोस्ट! कहीं लेने के देने न पड़ जाए।


--सत्रह


लोकतंत्र में सुधार चाहिए!

रेखा श्रीवास्तव

clip_image002अब लोक को ही जागरूक होना पड़ेगा, तभी तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ये जागरूकता हस्तांतरितहोगीऔर फिर आज नहीं तो कल आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ समाज और सरकार मिल सकेगी एककाले कारनामों से रहित और लोकहित के लिए सोचने वाली सरकार।

वर्तमान परिदृश्य में इस विचार मंथन के द्वारा किसी नई राह की तलाश है।


--सोलह—

आयु बोध

रचना

clip_image003 आयु बोध
कौन कब और किसे करा पाया हैं
क्या आयु से बोध हमेशा ही आ जाता हैं
क्या "जी" और 'आदरणीय' कहने से
हर क़ोई हर किसी को
उसकी आयु योग्य आदर दे पाता हैं

कविता के अनूठे बिम्ब प्रभावित करते हैं।


--पन्द्रह


नया गूगल क्रोम दो नयी खूबियों के साथ

नवीन प्रकाश

clip_image004 गूगल क्रोम इंटरनेट ब्राउजर का नया स्थिर संस्करण जारी हो गया है नया Google Chrome 13.0.782.107
इसमें दो नयी खूबियाँ जोड़ी गयी है Instant Pages और Print PreviewInstant Pages

बहुत उपयोगी पोस्ट।


--चौदह


संवेदनाओं की घास

संगीता स्वरुप

clip_image005 मन की घनेरी

घास पर

मेरी सोच के  

कदमों से  ,

पगडंडियाँ तो

बन जाती हैं

अनायास ही ,

क्यों कि

आँख बंद कर भी

सोच चलती रहती है

बार बार की सम्वेदनाओं की धिसाई से वहां व्यवहार की पगडंडी तो बन जाती है पर फ़िर वहां सम्वेदनाओं की घास नहीं उगती!!
अद्भुत बिंब संयोजन!!


--तेरह


"झंडा ऊंचा रहे हमारा", किसने इस गीत की रचना की ?

गगन शर्मा

clip_image006 यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलुसों, प्रभात फेरियों के अवसर पर गाया जाने लगा और जब 1938 में हरिपुरा के ऐतिहासिक कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ध्वजारोहण करते ही वहां पांच हजार लोगों ने देश के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति में भाव-विभोर हो इसे गाया तो इसे राष्ट्रीय झंड़ा गीत होने का गौरव भी मिल गया।

एक महत्वपूर्ण पोस्ट। इस तथ्य की जानकारी के साथ पूरा गीत भी दिया गया है। ज़रूर पढ़ें।


--बारह


तथ्य की परिक्षण-विधि -अनेकांतवाद

सुज्ञ

clip_image008 सत्य तथ्य पर पहुँचने के लिए के लिए हमें वक्ता के कथन का आशय (अभिप्राय) समझना आवश्यक हो जाता है। आशय समझने के लिए यह समझना आवश्यक हो जाता है कि वक्ता ने कथन किस परिपेक्ष्य में किया है किस अपेक्षा से किया है। क्योंकि हर कथन किसी न किसी अपेक्षा से ही किया जाता है।

इस आलेख के बारीक विश्‍लेषण गहरे प्रभावित करते हैं।


--ग्यारह


लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी

Suman

clip_image009 भारतीय छात्र आन्दोलन का संगठित रूप 1828 में सबसे पहले कलकत्ता में एकेडमिक एसोसिएसन के नाम से दिखाई देता है, जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियों द्वारा की गई। एकेडमिक एसोसिएसन देश का पहला छात्र संगठन था जिसने सामंतवाद विरोधी, स्वतंत्रता, प्रगति और आधुनिकता जैसे विचारों के प्रचार-प्रसार का काम किया।

इतिहास के पन्नों से लाकर पेश किया गया है एक शोधपूर्ण आलेख का पहला भाग।


--दस


ग़ज़लगंगा.dg: हर वक़्त कोई रंग हवा में.......

देवेंद्र गौतम

clip_image010 अब तू खुदा-परस्त नहीं खुद-परस्त बन

जी
ने के वास्ते यहां खुद को निहाल रख.

जिसकी मिसाल ढूँढनी मुमकिन न हो सके

हम सब के सामने कोई ऐसी मिसाल रख.

सुंदर ग़ज़ल!


--नौ


शायद उनके परिवार में किसी को Cancer नहीं हुआ...

POOJA..

clip_image011 कुछ ही दिनों में हम अपना स्वतंत्रता-दिवस मानाने वाले हैं... यानी एक और साल आज़ादी के नाम...

वाकई हम कुछ ज्यादा ही आज़ाद हो गए हैं... किसी को कुछ भी बोलने की आज़ादी ही नहीं, बल्कि बुरा, गन्दा, ख़राब और घटिया बोलने में हम पीछे नहीं हटते...

सर्थक चिंतन, विचारोत्तेजक पोस्ट।


--आठ


लौहपथगामिनी

आकल्‍प

clip_image012

रेल से यात्रा एक सुखद अहसास है। हम अपने जीवन में इतनी तेजी से भागते जाते हैं कि छोटे-छोटे अहसास लगभग चूक ही जाते हैं और जिन्दगी एक सुहाने सफर की कथा बनने से विपरीत समय काटने और बोझ से लदे आदमी की आकृति गढ़ने लगती है। जिन्दगी के ठहरने का अहसास हो तो गति का आनंद कुछ और ही है।

सुंदर संस्मरणात्मक लेख।


--सात

clip_image013

गेस्ट रूम में रही वो, सालों परदा तान ||

रविकर

clip_image014 पाली-पोसी प्राण सा,  माता सदा सहाय |

दो किलो का बचपना, सत्तर का हो जiय |

सत्तर का होकर करे, पत्थर-दिल सा काम |

दुर्बल वृद्धा का करे,  जीना   वही   हराम ||

अम्मा थी तब मलकिनी, आज हुई अनजान |

गेस्ट रूम में रही वो,   सालों परदा तान ||

बेहतरीन दोहे। सार्थक, विचारोत्तेजक।


--छह


नैतिक रूपांतरण की जरुरत है ....

Suman

clip_image015 इस बोध कहानी से यही लगता है आँख पर जो लोभ और लालच क़ी धूल पड़ी है उसे हटाने के लिये नेताओं का नैतिक होना बहुत जरुरी है ! तभी देश क़ी जनता का कल्याण होगा और देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी !

बहुत अच्छी कहानी के माध्यम से बताया ..आँखों पर जमी धूल तो हटती नहीं और दूसरों की आँख में धूल झोंक देते हैं नेता!


--पांच


इक था बचपन...बचपन के प्यारे से दोस्त भी थे...

rashmi ravija

clip_image016 ब्लॉग ,गुजरे लम्हों को याद करने का एक बहाना सा बन गया है...सारे संस्मरण गुजरी यादों के सागर ही तो हैं....जिनमे डूबना-उतराना मुझे कुछ ज्यादा ही भाता है.

सभी का बचपन अमूमन इस तरह के वाकयों से दो चार होता रहता है।


--चार


यदि मौन बड़ा तो लेखन-प्रवचन क्यों?

Dr.J.P.Tiwari

clip_image017 चिन्तक, कवि और कलाकार,
निभाता है, अपना लोक धर्म.
अपनी अनुभूतियाँ बताते - बताते,
हो जाता है स्वयं, एक दिन -'मौन'.
और इस प्रकार, प्रलय से सृष्टि,
और सृष्टि से प्रलय का ,
पूरा एक चक्र, कुशलता से दुहरा जाता है.

कभी मौन ही सब समस्‍या को सुलझा लेती है .. कभी समस्‍याओं को सुलझाने के लिए लेखन प्रवचन आवश्‍यक होता है .


--तीन


मॉंनसून स्कैम - पार्ट २

शिवकुमार मिश्र

clip_image018 पेश है कोलकाता के आकाश में छाने वाले बादलों को कंट्रोल करने वाले देवता की प्रेस कांफ्रेंस.
पत्रकार आ चुके हैं. देवता के सेक्यूरिटी गार्ड चाहते थे कि पत्रकार अपने जूते कांफ्रेंस हाल से बाहर उतार कर अन्दर घुसें. देवता ने मना कर दिया. बोले; "पत्रकार भी अपने हैं और जूते भी अपने ही हैं. जो अपने हैं उनसे कैसा खतरा? जूते समेत ही इन्हें अन्दर जाने दो."

एक मज़ेदार व्यंग्यात्मक प्रस्तुति।


--दो


साहित्य और संग्रहण

प्रवीण पाण्डेय

clip_image019 हर व्यक्ति संग्रह करता है, आवश्यक भी है, कोई अत्याधिक करता है, कोई न्यूनतम रखता है। पशुओं में भी संग्रहण का गुण दिखता है, जीवन में अनिश्चितता का भय इस संग्रह का प्रमुख कारण है।

कम्पयूटर टैक्नोलोजी की प्रगति चौंकाने वाली है शायद ही विज्ञानं ने किसी और क्षेत्र में इतनी तेजी से तरक्की की हो .... लेख इसी बात को बताता है।


--एक--


बुखार में प्रेम कवितायें

शरद कोकास

clip_image020 अछा लगता है

गिरती हुई बर्फ में ख
ड़े

पेड़ की तरह काँपना

जड़ों से आग लेना

शीत का मुकाबला करना

अच्छा लगता है

ठिठुरते हुए
मुसाफिर का

गर्म पानी के
चश्मे की खोज में

यात्रा जारी रखना ।

सारगर्भित, विचारोत्तेजक कविता।

आज बस इतना ही!

अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

तब तक के लिए हैप्पी ब्लॉगिंग!!

19 comments:

  1. आज की चर्चा में बहुत अच्छे लिंकों को चयन किया है आपने!
    --
    आभार!

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  2. बहुत बढिया .. महत्‍वपूर्ण लिंक्‍स !!

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  3. बड़े अच्छे लिनक्स संकलित किये आपने.... सुंदर चर्चा के लिए आभार

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  4. कुछ नए लिंक के लिए धन्यवाद

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  5. अच्छे लिंकों को चयन .

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  6. ज्ञानवर्धक लिंक्स के लिए आभार .

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  7. याद रखने के लिए हार्दिक आभार।

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  8. अच्छी चर्चा , आभार

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  9. अच्छे लिंक मिले धन्यवाद।

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  10. sarthak charcha-achchhe links se saji charcha .aabhar

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  11. सुन्दर लिंक चयन्।

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  12. सुन्दर सूत्र पिरोयें हैं।

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  13. सभी सुधिजनों का आभार।

    लगता है मेरी चर्चा अब लोगों की अपेक्षाओं पर खड़ी नहीं उतर रही सो १५ अगस्त के बाद इस मंच से स्वतंत्र हो जाना चाहूंगा।

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  14. मनोज कुमार जी,
    दरअसल छोड़ने की इच्छा जितनी सघन होगी कसकर पकड़ने की इच्छा और भी संकल्प लेने लगेगी। हम इस बात से तो निश्चिन्त है कि यह अच्छा काम आप नहीं छोड़ने वालेकृ
    और आप हमें निराश भी न करना...
    आपका.......

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  15. बहुत बढ़िया सूत्र मिले...
    आनंद दाई चर्चा...
    आभार...

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  16. आपकी चर्चा का ज़वाब नहीं सर! छोड़ने की बात कहकर दुःखी न करें प्लीज...हम सब तो अभी नौधुआ हैं आपका साथ सम्बल प्रदान करता है।

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