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चर्चाकार : मनोज कुमार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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रविवार, अगस्त 14, 2011

हैप्पी ब्लॉगिंग!

नमस्कार मित्रों!
मैं मनोज कुमार इस दौर की अपनी अखिरी चर्चा के साथ हाजिर हूं। आज कोई नम्बरिंग नहीं। कुछ बातें और कुछ लिंक्स बस …! इसके बाद कुछ विश्राम के बाद फिर आऊंगा। (शालिनी कौशिक जी के सुझाव पर परिवर्तन)



पिछले एक साल से अधिक से (अप्रैल 2010) इस मंच से जुड़ा रहा। तब से अब तक ब्लॉगजगत में कितना सारा परिवर्तन आ चुका है। इन दिनों किन्हीं विशेष परिस्थितियों के कारण मंच को अधिक समय नहीं दे पाता था। विगत कुछेक महीनों से शास्त्री जी निवेदन कर रहा था कि मुझे कुछ समय के लिए इस दायित्व से मुक्त किया जाए। पर उनकी भी कुछ विवशता थी। अंततोगत्वा कुछेक नए साथियों के इस मंच से जुड़ जाने के बाद से चर्चा मंच को एक नई ताज़गी और बल मिला है, और मुझे …। चिट्ठाजगत आदि के हट जाने के बाद से इस तरह के मंच की आवश्यकता को बड़ी शिद्दत से महसूस किया जाने लगा। मंच ने अपनी निरंतरता को बनाए रखा। नए साथियों से गुजारिश है कि वे इसकी गरिमा को बनाए रखेंगे और पाठकों से विनती है कि वे इसके बल को!

एक एक चर्चा को बनाने में चर्चाकार को कितनी मेहनत करनी होती है इसका अंदाज़ा तभी होगा जब आप एकाध चर्चा करके देखें।



विशेष क्या लिखूं … आप सबों को स्वाधीनता दिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं।

आइए कुछ लिंक्स की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करें



जनक्रांति या भ्रांति?????

जन-जन संप्रभु

यह पवित्र तिरंगा सिर्फ और सिर्फ हमलोगों का है

आजादी के मायने

आजादी के मायने

A I S F का प्लेटिनम जुबली समारोह

हे कवि बजाओ...

फिर से ज़िन्दगी गुनगुनाने लगे

आजाद भारत की प्रमुख समस्याएं

नय पद्धति – अनेकान्त

खुले फिरते गुनहगारों के लश्कर मुल्क में मेरे

मेरी बहना -हाइकु और ताँका

मुझसे क्या भूल हुई , जो ये सजा मुझको मिली ?

तेरी रक्षा का प्रण बहना रग-रग में राखी दौडाई

मैं कहीं 'कवि' न बन जाऊं...खुशदीप

सुना है आज रक्षाबंधन है

शानदार रही बम्बईया – 'कथा'

रक्षा बन्धन

आम आदमी का स्‍वप्‍न : एक बंगला बने न्‍यारा

सतह के नीचे' की हलचल

विलिस्टन फिश की वसीयत

पवित्र रिश्ता

जयोस्तुते जयोस्तुते

राखी का त्यौहार : कृष्ण कुमार यादव

मुसाफिर चल अब,रुक मत , छल-छल करती है हल-चल......!!

बारिश में त्वचा की देखभाल

श्रीखण्ड महादेव की ओर (काली कुंड-भीम डवार) भाग 7

ये है ताऊ के जीवन का असली राज

वननोट और आउटलुक

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास( चौथा और अन्तिम भाग):- अवश्य पढ़ें

भाई-बहन के निश्छल स्नेह के कुछ अनमोल पल

एक अनंत पाप कथा

बस इतना ही।
जय हिंद!!

रविवार, अगस्त 07, 2011

रविवासरीय (07.08.2011) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर से हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ।

आज की चर्चा शुरु करते हैं।

--बीस-

देश में पहली बारःएम्स ने किया हाथ का रीइंप्लांटेशन

कुमार राधारमण

नई दिल्ली एम्स देश का पहला ऐसा स्वास्थ्य संस्थान बन गया है जिसने बांह का रीइंप्लांटेशन करने में सफलता प्राप्त की है। कैंसर टयूमर से जूझ रहे पांच वर्षीय रेहान के हाथ काटने तथा उसकी जगह आर्टिफिशियल हाथ लगाने की बजाए एम्स के डाक्टरों ने उसके बांह को काटकर अलग कर दिया और कोहनी से हथेली वाले भाग को कंधे से जोड़ कर उसे उसका हाथ लौटा दिया है।

अद्भुत ! किसी चमत्कार से कम नहीं। इस रोचक और अद्भुत जानकारी को अवश्य पढ़ें।


--उन्नीस


हरएक आँख में नमी

Kusum Thakur

clip_image001 जहाँ पानी भी अमृत है, बोल कडवे क्यों

गंग की धार भी थमी इस खूबसूरत जहाँ में

सिसकते लोग मगर पूजते पत्थर

भावना की है कमी इस खूबसूरत जहाँ में

बदल रहे समय का स्पष्ट प्रभाव दर्शाती ग़ज़ल!


--अट्ठारह


... और कंकड़ी पर पहाड़ गिर पड़ा!!!

बी एस पाबला

1620370598.940.594409490मुझे रोजाना दसियों लिंक ईमेल में मिलते हैं जिसे पढ़ने का और फिर टिप्पणी करने का निवेदन/ आग्रह होता है। निश्चित तौर परअधिकतर साथी यही चाहते होंगे कि उनकी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे। जब भी कोई नया ब्लॉग मिलता है एक बार अवश्यउस पर ध्यान देता हूँ और अपनी रुचि के अनुसार पाए जाने पर आगे भी पढ़े जाने हेतु सुरक्षित कर लेता हूँ।

सतर्क करती पोस्ट! कहीं लेने के देने न पड़ जाए।


--सत्रह


लोकतंत्र में सुधार चाहिए!

रेखा श्रीवास्तव

clip_image002अब लोक को ही जागरूक होना पड़ेगा, तभी तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ये जागरूकता हस्तांतरितहोगीऔर फिर आज नहीं तो कल आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ समाज और सरकार मिल सकेगी एककाले कारनामों से रहित और लोकहित के लिए सोचने वाली सरकार।

वर्तमान परिदृश्य में इस विचार मंथन के द्वारा किसी नई राह की तलाश है।


--सोलह—

आयु बोध

रचना

clip_image003 आयु बोध
कौन कब और किसे करा पाया हैं
क्या आयु से बोध हमेशा ही आ जाता हैं
क्या "जी" और 'आदरणीय' कहने से
हर क़ोई हर किसी को
उसकी आयु योग्य आदर दे पाता हैं

कविता के अनूठे बिम्ब प्रभावित करते हैं।


--पन्द्रह


नया गूगल क्रोम दो नयी खूबियों के साथ

नवीन प्रकाश

clip_image004 गूगल क्रोम इंटरनेट ब्राउजर का नया स्थिर संस्करण जारी हो गया है नया Google Chrome 13.0.782.107
इसमें दो नयी खूबियाँ जोड़ी गयी है Instant Pages और Print PreviewInstant Pages

बहुत उपयोगी पोस्ट।


--चौदह


संवेदनाओं की घास

संगीता स्वरुप

clip_image005 मन की घनेरी

घास पर

मेरी सोच के  

कदमों से  ,

पगडंडियाँ तो

बन जाती हैं

अनायास ही ,

क्यों कि

आँख बंद कर भी

सोच चलती रहती है

बार बार की सम्वेदनाओं की धिसाई से वहां व्यवहार की पगडंडी तो बन जाती है पर फ़िर वहां सम्वेदनाओं की घास नहीं उगती!!
अद्भुत बिंब संयोजन!!


--तेरह


"झंडा ऊंचा रहे हमारा", किसने इस गीत की रचना की ?

गगन शर्मा

clip_image006 यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलुसों, प्रभात फेरियों के अवसर पर गाया जाने लगा और जब 1938 में हरिपुरा के ऐतिहासिक कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ध्वजारोहण करते ही वहां पांच हजार लोगों ने देश के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति में भाव-विभोर हो इसे गाया तो इसे राष्ट्रीय झंड़ा गीत होने का गौरव भी मिल गया।

एक महत्वपूर्ण पोस्ट। इस तथ्य की जानकारी के साथ पूरा गीत भी दिया गया है। ज़रूर पढ़ें।


--बारह


तथ्य की परिक्षण-विधि -अनेकांतवाद

सुज्ञ

clip_image008 सत्य तथ्य पर पहुँचने के लिए के लिए हमें वक्ता के कथन का आशय (अभिप्राय) समझना आवश्यक हो जाता है। आशय समझने के लिए यह समझना आवश्यक हो जाता है कि वक्ता ने कथन किस परिपेक्ष्य में किया है किस अपेक्षा से किया है। क्योंकि हर कथन किसी न किसी अपेक्षा से ही किया जाता है।

इस आलेख के बारीक विश्‍लेषण गहरे प्रभावित करते हैं।


--ग्यारह


लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी

Suman

clip_image009 भारतीय छात्र आन्दोलन का संगठित रूप 1828 में सबसे पहले कलकत्ता में एकेडमिक एसोसिएसन के नाम से दिखाई देता है, जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियों द्वारा की गई। एकेडमिक एसोसिएसन देश का पहला छात्र संगठन था जिसने सामंतवाद विरोधी, स्वतंत्रता, प्रगति और आधुनिकता जैसे विचारों के प्रचार-प्रसार का काम किया।

इतिहास के पन्नों से लाकर पेश किया गया है एक शोधपूर्ण आलेख का पहला भाग।


--दस


ग़ज़लगंगा.dg: हर वक़्त कोई रंग हवा में.......

देवेंद्र गौतम

clip_image010 अब तू खुदा-परस्त नहीं खुद-परस्त बन

जी
ने के वास्ते यहां खुद को निहाल रख.

जिसकी मिसाल ढूँढनी मुमकिन न हो सके

हम सब के सामने कोई ऐसी मिसाल रख.

सुंदर ग़ज़ल!


--नौ


शायद उनके परिवार में किसी को Cancer नहीं हुआ...

POOJA..

clip_image011 कुछ ही दिनों में हम अपना स्वतंत्रता-दिवस मानाने वाले हैं... यानी एक और साल आज़ादी के नाम...

वाकई हम कुछ ज्यादा ही आज़ाद हो गए हैं... किसी को कुछ भी बोलने की आज़ादी ही नहीं, बल्कि बुरा, गन्दा, ख़राब और घटिया बोलने में हम पीछे नहीं हटते...

सर्थक चिंतन, विचारोत्तेजक पोस्ट।


--आठ


लौहपथगामिनी

आकल्‍प

clip_image012

रेल से यात्रा एक सुखद अहसास है। हम अपने जीवन में इतनी तेजी से भागते जाते हैं कि छोटे-छोटे अहसास लगभग चूक ही जाते हैं और जिन्दगी एक सुहाने सफर की कथा बनने से विपरीत समय काटने और बोझ से लदे आदमी की आकृति गढ़ने लगती है। जिन्दगी के ठहरने का अहसास हो तो गति का आनंद कुछ और ही है।

सुंदर संस्मरणात्मक लेख।


--सात

clip_image013

गेस्ट रूम में रही वो, सालों परदा तान ||

रविकर

clip_image014 पाली-पोसी प्राण सा,  माता सदा सहाय |

दो किलो का बचपना, सत्तर का हो जiय |

सत्तर का होकर करे, पत्थर-दिल सा काम |

दुर्बल वृद्धा का करे,  जीना   वही   हराम ||

अम्मा थी तब मलकिनी, आज हुई अनजान |

गेस्ट रूम में रही वो,   सालों परदा तान ||

बेहतरीन दोहे। सार्थक, विचारोत्तेजक।


--छह


नैतिक रूपांतरण की जरुरत है ....

Suman

clip_image015 इस बोध कहानी से यही लगता है आँख पर जो लोभ और लालच क़ी धूल पड़ी है उसे हटाने के लिये नेताओं का नैतिक होना बहुत जरुरी है ! तभी देश क़ी जनता का कल्याण होगा और देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी !

बहुत अच्छी कहानी के माध्यम से बताया ..आँखों पर जमी धूल तो हटती नहीं और दूसरों की आँख में धूल झोंक देते हैं नेता!


--पांच


इक था बचपन...बचपन के प्यारे से दोस्त भी थे...

rashmi ravija

clip_image016 ब्लॉग ,गुजरे लम्हों को याद करने का एक बहाना सा बन गया है...सारे संस्मरण गुजरी यादों के सागर ही तो हैं....जिनमे डूबना-उतराना मुझे कुछ ज्यादा ही भाता है.

सभी का बचपन अमूमन इस तरह के वाकयों से दो चार होता रहता है।


--चार


यदि मौन बड़ा तो लेखन-प्रवचन क्यों?

Dr.J.P.Tiwari

clip_image017 चिन्तक, कवि और कलाकार,
निभाता है, अपना लोक धर्म.
अपनी अनुभूतियाँ बताते - बताते,
हो जाता है स्वयं, एक दिन -'मौन'.
और इस प्रकार, प्रलय से सृष्टि,
और सृष्टि से प्रलय का ,
पूरा एक चक्र, कुशलता से दुहरा जाता है.

कभी मौन ही सब समस्‍या को सुलझा लेती है .. कभी समस्‍याओं को सुलझाने के लिए लेखन प्रवचन आवश्‍यक होता है .


--तीन


मॉंनसून स्कैम - पार्ट २

शिवकुमार मिश्र

clip_image018 पेश है कोलकाता के आकाश में छाने वाले बादलों को कंट्रोल करने वाले देवता की प्रेस कांफ्रेंस.
पत्रकार आ चुके हैं. देवता के सेक्यूरिटी गार्ड चाहते थे कि पत्रकार अपने जूते कांफ्रेंस हाल से बाहर उतार कर अन्दर घुसें. देवता ने मना कर दिया. बोले; "पत्रकार भी अपने हैं और जूते भी अपने ही हैं. जो अपने हैं उनसे कैसा खतरा? जूते समेत ही इन्हें अन्दर जाने दो."

एक मज़ेदार व्यंग्यात्मक प्रस्तुति।


--दो


साहित्य और संग्रहण

प्रवीण पाण्डेय

clip_image019 हर व्यक्ति संग्रह करता है, आवश्यक भी है, कोई अत्याधिक करता है, कोई न्यूनतम रखता है। पशुओं में भी संग्रहण का गुण दिखता है, जीवन में अनिश्चितता का भय इस संग्रह का प्रमुख कारण है।

कम्पयूटर टैक्नोलोजी की प्रगति चौंकाने वाली है शायद ही विज्ञानं ने किसी और क्षेत्र में इतनी तेजी से तरक्की की हो .... लेख इसी बात को बताता है।


--एक--


बुखार में प्रेम कवितायें

शरद कोकास

clip_image020 अछा लगता है

गिरती हुई बर्फ में ख
ड़े

पेड़ की तरह काँपना

जड़ों से आग लेना

शीत का मुकाबला करना

अच्छा लगता है

ठिठुरते हुए
मुसाफिर का

गर्म पानी के
चश्मे की खोज में

यात्रा जारी रखना ।

सारगर्भित, विचारोत्तेजक कविता।

आज बस इतना ही!

अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

तब तक के लिए हैप्पी ब्लॉगिंग!!

रविवार, जुलाई 31, 2011

रविवासरीय (31.07.2011) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर से हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ।

आज महान साहित्यकार प्रेमचंद जी का जन्मदिन है। उन्हें नमन करते हुए आज की चर्चा शुरु करते हैं।

                               

--बीस-

तसल्ली

kavita verma

clip_image001 अरे बेटा यहाँ आ भैया को चोट लग जायेगी. कहते हुए मांजी ने मिनी को अपनी गोद मे खींच लिया. मम्मी के पास भैया है ना ,थोडे दिनो मे वो मिनी के पास आ जायेगा,उसके साथ खेलेगा, मिनी उसे राखी बान्धेगी . मांजी के स्वर मे पोते के आने की आस छ्लक रही थी.नेहा को भी बस उसी दिन का इन्त्जार था.

आपने भारतीय परिवेश व मानसिकता को बड़े ख़ूबसूरत और संतुलित रूप से पन्ने पर उतारा है।

                               

 


                               --उन्नीस


एक गहरा वजूद - असीमा भट्ट

रश्मि प्रभा...

clip_image002 जिंदगी से मुझे कोई शिकायत - नहीं . कुछ भी नहीं . I love it. My life is beautifull.

बहुत कुछ खोया है .... बहुत कुछ पाया है . अब तो बात जिद्द पे आ गई है - अब तो जिंदगी से सूद समेत वापस लेना है और उसे भी देना पड़ेगा .

ब्लॉगर से मिलवाने का यह एक अच्छा प्रयास है और उनके द्वारा व्यक्त विचार भी बहुत अच्छे हैं।


                             --अट्ठारह


स्वार्थी दुनिया

दीप्ति शर्मा

clip_image003पंक्षियो की कौतुहल आवाज़ से मेरी आँख खुली | मौसम सुहावना था | पवन की मंद महक दिवाना बना रही थी | बाहर लॉन मै कई पंक्षी चहक रहे थे मौसम का आनंद लेने के लिए मैने एक चाय बनायीं और पीने लगी |

प्रेरक प्रसंग!


                              --सत्तरह


Safe Mode काम नहीं कर रहा? ठीक कीजिये आसानी से

नवीन प्रकाश

clip_image004 Safe Mode एक जरुरी और उपयोगी विकल्प है विंडोज में, इसमें आपका कंप्यूटर सीमित सुविधाओं के साथ शुरू होता है पर आपको आपके कंप्यूटर की समस्याओं के समाधान के लिए एक सुरक्षित तरीके से शुरू करने देता है ।

नवीन जी हमेशा काम की जानकारी देते रहते हैं।

                       
                                --सोलह—

आत्मग्लानि.......

Suresh Kumar

clip_image005 समय तेरी उपयोगिता को, कभी मैं आंक ना पाया,

तू मेरे घर में बैठा था, तुझे मैं झाँक ना पाया,

मेरे जीवन में तेरा मुल्य, समझ ये आ गया मुझको,

तू इश्वर है, विधाता है, मन में रख लिया तुझको,

ये जीवन तुझपे अर्पण हो, अब मैने ठानी है,

ये मेरी आत्मग्लानि है,ये मेरी आत्मग्लानि है...

कवि --- सरल और सहज मुहावरे में इस कठिन समय को कविता में साधते हैं।


                                 --पन्द्रह


अंग्रेजी के वर्चस्व पर लगेगी लगाम

शिक्षामित्र

संघ लोक सेवा आयोग की यह पहल उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में चयन की उम्मीद रखने वाले प्रतिभागी अब अपनी मातृभाषा में मौखिक साक्षात्कार देने के लिए स्वतंत्र हैं। अब तक यूपीएससी की नियमावली की बाध्यता के चलते जरूरी था कि यदि परीक्षार्थी ने मुख्य परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखा है तो साक्षात्कार भी अंग्रेजी में देना होगा। जाहिर है, आयोग के इस फैसले से ऐसे प्रतिभागियों को राहत मिलेगी जो अंग्रेजी तो अच्छी जानते हैं लेकिन इसके संवाद संप्रेषण व उच्चारण में उतने परिपक्व नहीं होते, जितने महंगे और उच्च दज्रे के कॉन्वेंट स्कूलों से निकलकर आए बच्चे होते हैं।

बहुत अच्छी खबर है।


                              --चौदह


बिजली फूँकते चलो, ज्ञान बाटते चलो

प्रवीण पाण्डेय

सूर्य पृथ्वी के ऊर्जा-चक्र का स्रोत है, हमारी गतिशीलता का मूल कहीं न कहीं सूर्य से प्राप्त ऊष्मा में ही छिपा है, इस तथ्य से परिचित पूर्वज अपने पोषण का श्रेय सूर्य को देते हुये उसे देवतातुल्य मानते थे, संस्कृतियों की श्रंखलायें इसका प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।

ऊर्जा संरक्षण पर प्रेरक आलेख।


                                 --तेरह


बाम-इस्लाम और समोसा कूटनीति !

पी.सी.गोदियाल "परचेत"

clip_image007 जब मानव समाज में नगण्य कर्मावलम्बी परजीवी प्राणी क्रूरता, धृष्टता, झूठ और छल-कपट के बल पर अपनी आजीविका चलाने हेतु अज्ञान और अचिंतन के अन्धकार से भ्रमित निर्धन, शोषित और बौद्धिक कंगाल वर्ग के समक्ष खुद को उसका हितैषी और ठेकेदार प्रदर्शित कर, भय एवं ईश्वर के नाम से दिग्भ्रमित करने हेतु नए- नए तरीके खोजता है

एक विचारोत्तेजक आलेख।


                              --बारह


दिखा देता अँधेरे से कोई लड़ता दिया उसको

कुँवर कुसुमेश

clip_image008 भटकने लग गया जों आदमी राहे-मुहब्बत से.

अदब की रोशनी शायद दिखा दे रास्ता उसको.

'कुँवर'ख़ुद पर भरोसा और मौला पर भरोसा रख,

भरोसा जिसको मौला पर है मौला देखता उसको.

जिंदगी की सूक्ष्म सच्चाइयां ग़ज़ल में खूबसूरती से बयां हो रही है।


                                --ग्यारह


महिला अपराधों की राजधानी दिल्ली और दबंग अपराधी

अभिषेक मिश्र

clip_image009 निःसंदेह हम 100% अपराध तो नहीं रोक सकते मगर कम से कम इस शौकिया कवायद को रोकने की 1% सार्थक कोशिश तो कर ही सकते हैं, अन्यथा 'वीकेंड स्पेशल' ये खबरें मीडिया की हेडलाइंस और 'ब्रेकिंग न्यूज' ही बनती रहेंगीं.

सशक्त, विचारोत्तेजक आलेख।


                                 --दस

अन्ना को मना है.

Kirtish Bhatt,

clip_image010

तीखा कटाक्ष!


                                  --नौ


सुक्खू चाचा की अंतिम थाली

Nirmesh

clip_image011 सुन सुक्खू चचा को लगा कि जैसे

काठ मार गया

गिरते गिरते उन्होंने दीवाल थाम लिया

बोले सहूईन एहे त दू चार घर बचा रहा

जेकर हमका असरा रहा

जिनगी हत गयल ई पिसे वाली मशिनिया से

कै
से जियल जाई हमअन से

इस कविता में जीवन के विरल दुख की तस्‍वीर है, इसमें समाई पीड़ा पारंपरिक कारीगरों की दुख-तकलीफ है।


                                  --आठ


मनचाहे सपनों को

डा० व्योम

मनचाहे सपनों को
कोख में दबा
बंजारे दिन
हो गए हवा

नवगीत अभिधेयात्मक एवं व्यंजनात्मक शक्तियों को लिए हुए है।


                                 --सात

clip_image012

एक्सपॉयर दवाईयों को आप कैसे फैंकते हैं?

डा प्रवीण चोपड़ा

clip_image013कुछ दिन पहले की बात है मेरे बेटे ने मेरे से अचानक पूछा कि पापा, आप इस्तेमाल किये हुये ब्लेडों का क्या करते हो, उस का कारण का मतलब था कि उन को आप फैंकते कहां हो? …मैं समझ गया... मैं उस को कोई सटीक सा जवाब दे नहीं पाया....लेकिन मुझे इतना पता है कि वह भी इन्हें घर के कचरेदान में कभी फैकना नहीं चाहेगा।

एक उपयोगी पोस्ट – अवश्य पढ़ें।


                                   --छह


पढ़ाई और फिटनेस

कुमार राधारमण

जंक फूड के चलन ने सभी युवाओं की सेहत प्रभावित की है लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स कुछ ज्यादा हैं। दूसरे शहरों से आए युवा इसका शिकार और ज्यादा होते हैं।

एक काम की बात बताती उपयोगी पोस्ट।

                                 --पांच

११ साल का मेहंदीवाला

अरुण चन्द्र रॉय

clip_image014 व्यस्त रहता है

उत्सवो, तीज त्योहारों पर

सावन के सोमवार को

राखी से पहले

धनतेरस के दिन

करवा चौथ पर रहती है

उसकी भारी पूछ

इस कविता में जीवन के जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस कविता में न तो जनवादी तेवर है और न प्रबल कलावादी आग्रह।


                                  --चार


सार्वजनिक स्थान पर हम भारतीय यूँ ही नहीं थूकतें हैं ...

veerubhai

clip_image015 भारतीय द्वारा थूकना गंदगी को बढ़ाना नहीं हैं ,थूकना सफाई का दर्शन हैं ,वह अन्दर की सुवास को बनाये रखने के लिए बाहर की ओर थूकता है ।थूक एक प्रतिकिर्या है बाहर फैली गंदगी के प्रति .भारत में चारों तरफ़ धूल मिटटी और गंदगी का डेरा है .बाहर के मुल्कों में (विकसितदेशों में) पर्यावरण और आपके आस पास का माहौल एक दम से साफ़ सुथरा रहता है इसलियें भारतीय वहाँ थूक नहीं पाते .यह कहना है

व्यंग्यकार ने थूक के माध्यम से मन की उमंगे, जीवट, जोश के साथ-साथ सामाजिक विद्रूपदाओं, विसंगतियों एवं विवशताओं तथा मानव-मानव में भेद की भावनाओं पर खुलकर कलम चलाई है।


                                    --तीन


सुना है आँखों से निःसृत शंखनाद को

रश्मि प्रभा...

clip_image016चाँद के गांव से

किरणों के पाजेब डाल

जब सूरज निकलता है

तब चिड़ियों के कलरव से

मैं मौन आरती करती हूँ

बिम्बों का अद्भुत प्रयोग! कवयित्री अपना ही पुराना प्रतिमान तोड़ते नजर आती हैं। यह कविता लोक जीवन के यथार्थ-चित्रण के कारण महत्‍वपूर्ण है।


                                   --दो


'बहादुर कलारीन' - बिखरी हुई, भटकी हुई.

समीक्षक- मुन्ना कुमार पांडे

हबीब साहब के रंगकर्म को नजदीक से जाने वाले यह बखूबी जानते हैं कि बहादुर कलारिन भले ही चरणदास चोर जितना मशहूर न हुआ हो पर यह नाटक हबीब तनवीर के दिल के काफी करीब था |

एक बेहतरीन समीक्षा!


                                 --एक--

दक्षिणी सूडान की स्वतंत्रता और स्त्री शक्ति

डॉ. शरद सिंह

clip_image017 आंधी-तूफान के बाद खिलने वाली सुनहरी धूप की भांति दक्षिणी सूडान कीस्वतंत्रता एक लंबे गृहयुद्ध के बाद हासिल हुई है। गृहयुद्ध के दौरान पुरुषों ने बढ़-चढ़ कर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ी और बड़ी संख्या में हताहत हुए। इसका सबसे अधिक दुष्परिणाम झेला स्त्रियों ने। अपनों के मारे जाने का दुख और शेष रह गए जीवितों के प्रति जिम्मेदारी का संघर्ष। इन सबके बीच अनेक स्त्रियों को बलात्कार जैसी मर्मांतक पीड़ा से भी गुजरना पड़ा।

गहन विचारों से परिपूर्ण शोधपूर्ण आलेख। आलेख के बारिक विश्‍लेषण गहरे प्रभावित करते हैं। स्त्री-शक्ति के महत्व और ताकत का आपने बहुत सुंदर उदाहरण पेश किया है।


आज बस इतना ही!



अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।


तब तक के लिए हैप्पी ब्लॉगिंग!!

रविवार, जुलाई 24, 2011

रविवासरीय (24.07.2011) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर से हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ।
                                    

--बीस--



तूफ़ान का सपना

Dorothy

clip_image001

आसुओं में
छिपी नमी
जो बरसती है
बारिश की
भीनी भीनी
फ़ुहार बनकर
और बंजर जमीं में भी
बिछ जाती है
हरियाली की मखमली चादर
नवाकुरों कोपलों
और कलियों का
पालना बनकर


                               --उन्नीस


अर्धांगिनी की अर्थव्यवस्था

ZEAL

clip_image002

स्वाभिमान के साथ जीने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए ! स्त्रियाँ यदि नौकरी कर रही हैं तो आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं , कांफिडेंट होती हैं , परिवार का सहयोग भी करती हैं और अपने कमाए हुए धन को अपनी मर्जी के अनुसार खर्च करके अपना पर्सनल स्पेस भी सुरक्षित रखती हैं !


                              --अट्ठारह


नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil'

clip_image003

तेरे बग़ैर गीत तो गाये कभी-कभी।  


पर हर्फ़ कोई छूट सा जाये कभी-कभी॥

मिस्ले-सराय, दिल में तो आये तमाम लोग,
मेह्मान कोई चाँद भी आये कभी-कभी।


                             --सत्तरह


अब तंबाकू की साधारण पैकिंग करेंगी जादू

डा प्रवीण चोपड़ा

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भारत में भी इस तरह के पैकिंग नियम बनाये जाने की सख्त ज़रूरत है लेकिन यह ध्यान रहे कि कहीं चबाने वाला तंबाकू इन नियमों की गिरफ्त से न बच पाए क्योंकि वह भी इस देश में एक खतरनाक हत्यारा है।


                              --सोलह—

जात तो पूछो साधो की ....

निर्मल गुप्त

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संत कबीर ने नसीहत दी थी -जात न पूंछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान \मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान.
मेरे शहर में म्यान की समुचित शिनाख्त के बिना सर्वश्रेष्ठ तलवार का भी कोई मोल नहीं होता.बिना बढ़िया रेपर के यहाँ कोई माल नहीं बिका करता.


                                    --पन्द्रह


चोरी

संदीप शर्मा

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यह आदत तो मुझे बचपन से ही लग गई थी। जब मां दाल-चावल के डिब्बों में अपने बचे हुए पैसे छुपाया करती थी। मां को खुद नहीं मालूम होता था कि किस डिब्बे में उसने कितने पैसे छुपाए हैं। मैं चुपके से रसोई में जाकर दाल का डिब्बा खोल लेता। अंदर हाथ डालने पर कई पैसे हाथ में आते।


                                --चौदह


तिलक और आजाद

Vijai Mathur

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बाल गंगा धर 'तिलक'और पं.चंद्रशेखर आजाद की जयन्ति २३ जूलाई पर श्र्द्धा -सुमन 


                              --तेरह


"ग़ज़ल-...आज कुछ लम्हें चुराने हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

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सुहाते ही नहीं जिनको मुहब्बत के तराने हैं

हमारे मुल्क में ऐसे अभी बाकी घराने हैं

जिन्हें भाते नहीं हैं, फूल इस सुन्दर बगीचे के

ज़हन में आज भी ख्यालात उनके तो पुराने हैं


                                   --बारह


बोलती आँखें-हाइकु

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- समीकरण
टिका है संबंधों का
समझ पर ।

***

होती हैं बातें
मौन रह कर भी
बोलती आँखें।


                              --ग्यारह


पीड़ा होगी....

अरुण कुमार निगम

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शहनाई की मधुर रागिनी , रचो महावर


और हथेली पर मेंहंदी की रांगोली दो

दीवाली कर लो तुम अपने वर्तमान को

और अतीत की स्मृतियों को अब होली दो.


                                 --दस


 

पण्डित चन्द्रशेखर 'आजाद' - जन्म दिवस पर अमर शहीद का जीवन परिचय

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चन्द्रशेखर आज़ाद हमेशा सत्य बोलते थे। एक बार की घटना है आजाद पुलिस से छिपकर जंगल में साधु के भेष में रह रहे थे तभी वहाँ एक दिन पुलिस आ गयी। दैवयोग से पुलिस उन्हीं के पास पहुँच भी गयी। पुलिस ने साधु वेश धारी आजाद से पूछा-"बाबा!आपने आजाद को देखा है क्या?" साधु भेषधारी आजाद तपाक से बोले- "बच्चा आजाद को क्या देखना, हम तो हमेशा आजाद रहते‌ हें हम भी तो आजाद हैं।"


                                  --नौ


प्रेम गीत -यही रंग है

जयकृष्ण राय तुषार

clip_image011यही रंग है

जिसे उर्वशी और


मेनका ने था पाया ,

यही रंग है

जिसे जायसी ,ग़ालिब

मीर सभी ने गाया ,

बिना अनूदित

सब पढ़ लेते इसको

अनगिन भाषाओँ में |


                                   --आठ

विदा की गरिमा

मंजु मिश्रा

मैं अब कभी,


किसी को, सौ बरस

जीने का आशीष

नहीं दूँगी !

यह आशीष नहीं

एक अभिशाप है,

एक सजा, जो

काटे नहीं कटती.


                                   --सात

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सूरज के साथ-साथ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ

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वह सत्तर साल का बूढा
दूध के साथ भर जाता है
भगौनी में ढेर सारी ऊर्जा
और उल्लास भी ।
सुनहरी धूप सा
एक विश्वास भी...।


                                 --छह


आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध .

शालिनी कौशिक

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"भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०९ कहती है -''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा ओर उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''


                                     --पांच


तोड़ महलिया बना रहे

प्रवीण पाण्डेय

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मानव ने पर अंधेपन में,

अपनी तृष्णा का घट भरने,

सकल प्रकृति को साधन समझा,

ढाये अत्याचार घिनौने,


                                    --चार


ज़िंदगी के कुछ होलसेल किस्से

निखिल आनंद गिरी

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सिर्फ शब्दों की तह लगाना

नहीं है कविता,..


वाक्यों के बीच

छोड़ देना बहुत कुछ

होती है कविता...


                                 --तीन


रात में अक्सर - डॉ नूतन डिमरी गैरोला

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रात में अक्सर
जब शिथिल हो कर
गिर जाती है थकान
शांत बिस्तर में
रात उंघने लगती है तब
पर तन्हाइयां उठ कर जगाने लगती हैं
और कानाफूसी करती है कानों में
नीलाभ चाँद देर रात तक
खेला करता तारों से|


                                  --दो


छः ग़ज़लें -कवि डॉ० विनय मिश्र

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मौसम से हरियाली गायब

जीवन से खुशहाली गायब

ईयरफ़ोन हुआ है गहना

अब कानों से बाली गायब

ईद खुशी की आये कैसे

होली गुम दीवाली गायब

उतरा है आँखों का पानी

औ चेहरे  की लाली गायब


                                   --एक--

किश्तों के सहारे

नवीन रांगियाल

हम तस्वीरें नही

मांस और खूं भी नहीं

जादूगर तुम भी नहीं

मैं भी नहीं


पर जादू है कुछ

जिस से सांस आती है

सांस जाती है


तुम बस मेरा मिजाज लौटा देते हो

साल दर साल किश्तों की तरह

और में जिन्दा रहता हूँ

तुम्हारी चुकाई हुई उन किश्तों के सहारे

आज बस इतना ही!


अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

तब तक के लिए हैप्पी ब्लॉगिंग!!