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शनिवार, दिसंबर 08, 2012

विचारों का रेला आदमकद हो गया है

आज की चर्चा में आपका स्वागत है ………देखिये लिंक्स की भरमार है ………आज थोडा परिचय साथ है ताकि आपको पोस्ट का पता चले उसमें अन्दर क्या है उम्मीद है पसन्द आयेगा ये अन्दाज़ भी ………

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (6)

इसमें क्या शक है ………
अलग अलग भावों का दिग्दर्शन कीजिये ………

एक लकीर ने विभाजित कर दिया  एक देश को 
खीच के सरहद ,कर दिए हिस्से, जमीन के साथ इंसानों के भी,
कर भाई को भाई  से जुदा,
बना दिया भगवान को यहाँ इश्वर वहां खुदा   

अब चाहे लकीर हो या गंगा का तट  ………विचारों का रेला आदमकद हो गया है

एक गंगा !
चांदनी बिछती थी जिस पर,
कुछ काल पहले ........... आज धुंधली हो गयी है.
हो भले ही,
मैल तुझमें,
आरती हर रोज होती,
एक आशा मन बसी ........... तुम साफ़ होगी.
दिन फिरें,
है यही  दरकार ........... ए सरकार ! मेरे.

 व्यक्तित्व - सदा की कलम से

मिलिये जरूर ………… एक विशिष्ट हस्ती से

 पिछले लगभग दो दशक से हिन्‍दी में निरंतर लेखन करते हुए इनके अब तक दो  उपन्यास, एक काव्य संग्रह, दो गजल संग्रह, दो संपादित पुस्तक और एक ब्लॉगिंग का इतिहास प्रकाशित हो चुकी हैं आप सिर्फ कुशल रचनाकार ही नहीं बल्कि ब्‍लॉगजगत के प्रति आपका योगदान सराहनीय व सम्‍माननीय भी है आपने अथक परिश्रम से एक मिसाल भी क़ायम की है एक प्रसिद्ध ब्‍लॉग विश्‍लेषक के रूप में, यह मैं ही नहीं आप सब भी जानते हैं इतना आसान काम नहीं है विश्‍लेषण करना यदि एक या दो व्‍यक्ति होते अथवा होती गिनती की कोई सीमा पर यहां तो अनगिनत ब्‍लॉगर मेरे जैसे व्‍यक्ति का एक नज़रिया कह रही हूँ

 जानना जरूरी है ………एक दीर्घ फ़ैले व्यास को

 लगता ही नहीं कि कोई दुरूह साहित्य पढ़ रहा है कोई! कहीं कहीं पर आध्यात्म और दर्शन का पुट भी देखने को मिलता है जब वो ओशो की तरह जीने की कला छोड़कर कहने लगते हैं कि मैं मृत्यु सिखाता हूँ. उपन्यासिका के कुछ अंश दिल को छू जाते हैं, कुछ व्यथित करते हैं, कुछ गुदगुदाते हैं, कुछ सोचने पर मजबूर करते हैं.


"मन दर्पण": "नाटक-नींद और मेरा रोज़"

 कभी कभी सताना जरूरी होता है ………

और कहती हूँ क्यूँ सताती है तू मुझे.... रोज़.... 
आती नहीं है आँखों में नखरे हैं तेरे.... रोज़...
फिर मना ही लेती है आखिर नींद मुझे .... रोज़....

कुण्डलिया : प्रेम पात सब झर गये

फिर भी हम बच गये ………तेरे लिये छाँह गहे अब कौन , नहीं रहि छाया शीतल
रहा रात भर खाँस, अब सठिया गया पीपल

सात रास्ते

पहचाने मेरा कौन सा ……कहीं तो होगी मंज़िल

 कागज़ की नाव बना कर उसे पानी में छोड़ दें, और आँख बंद करके सोचें, कि  यह उस तक जाय।
3.मन में सोचें, कि  यदि वह आपको मिल गया तो आप क्या करेंगे, और नहीं मिला तो क्या करेंगे।
4. जानें कि  आपसे मिल कर उसे क्या फायदा या नुकसान होगा।


उपनिषद् सन्देश 4 प्रस्तावना 4

कौन है दृष्टा जो निद्रा में भी देता चेतना ………गूढ प्रश्न का गूढ उत्तर

यह आत्मन प्रकाशों का प्रकाशक है, यह सतत , स्थायी, आलोक है, जो न जीता है न जन्मता है न मरता है । न यह गतिशील है, न स्थावर है , न परिवर्तनशील है न अपरिवर्तनीय है । यह अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी है । यह द्रष्टा भी है और दृश्य भी । यह साक्षी है और साक्ष्य भी ।

इन निगाहों को कोई मंजर दे

ए खुदा मेरा मुकद्दर दे 

शुष्क धरती  की प्यास बुझ जाए 

आज ऐसा सुकून अम्बर दे 

मोहब्बत

बस नाम ही काफ़ी है

 तुम कहते हो कि राख का ढेर है ;
मैं कहता हूँ कि थोडा सा कुरेदो ;



और अब एक खास व्यक्तित्व पर एक नज़र यहाँ जरूर डालें व्यक्तित्व - सदा की कलम से (2)

अपना परिचय आप हैं …………

 क्‍या आप जानते हैं ? इनके बारे में ! साईं मोरे बाबा एक ऐसी पारिवारिक फिल्म , जिसमें आध्यात्मिक आत्मा है . जन्म से लेकर मृत्यु तक - हम जो चाहते हैं , उससे अलग होते हैं रास्ते .. इसकी लेखिका भी रश्मि जी ही हैं यह फिल्‍म आज 7 दिसम्‍बर को रिलीज होने जा रही है यह प्रारंभ जोड़ता है साहित्‍य की साधना में उनके लिये स्‍वर्णिम युग का प्रहला पन्‍ना ...कुछ ऐसा भी होगा अभी निश्चित तौर पर जो मेरे द्वारा अनकहा होगा ... आपके नाम के साथ अनेको सम्‍मान जुड़ चुके हैं द संडे इंडियन द्वारा 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में भी आपका नाम शामिल है ..


"वो पात-पात निकले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘म...

 हम डाल डाल निकले 

 परदेशियों के आगे, घुटने वो टेकते हैं,
वो देश से दलाली, करने की बात निकले।


निर्धन का जो अभी तक, दामन भी सिल न पाये, 
 

हथियाने को वतन का, वो स्वर्णथाल निकले।

नज़्म से प्रेम तक.....

एक ख्याल बन समा गया कोई

दर्द ही दवा है बता गया कोई

दो लफ्ज़ रखे
अधरों पर उसने
मैं गीत हुई....

एक गली संकरी सी

यादें जहाँ महकती हैं ………

एक गली है संकरी सी
कोई नाम पता कहीं नहीं
बस प्रेम की सुगंध है
यादों की ईटों से बनी
दर्द के कोलतार से ढकी
महकती रहती है.


स्त्रियों का पुराण
 एक नया अध्याय आओ शुरु करें ……
बस गुजारिश है
अब तुम भी
खुद को
देवता साबित करने में
लगे रहो...लगे रहो...उम्र भर !!
  

रामकृष्ण परमहंस और फेसबुक

प्रेम का महा मंत्र

"पहला जो 'साधारण' प्रेम है उसमें प्रेमी केवल अपना ही सुख देखता है। वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि दूसरे व्यक्ति को भी उससे सुख है अथवा नहीं। इस प्रकार का प्रेम चन्द्रावली का श्रीकृष्ण के प्रति था। दूसरा प्रेम जो 'सामंजस्य' रूप होता है उसमें दोनों एक-दूसरे के सुख के इच्छुक होते हैं।यह एक ऊँचे दर्जे का प्रेम है। परन्तु तीसरा प्रेम सबसे उच्च है। इस समर्थ प्रेम में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है तुम सुखी रहो ,मुझे चाहे कुछ भी हो। राधा में यह प्रेम विद्यमान था। श्रीकृष्ण के सुख में उन्हें सुख था


भाव की झंकार ही संगीत है

प्रीत की जागी नयी रीत है

शब्द भी है नाद भी है, आत्मा भी
नृत्य करता अहिर्निशि परमात्मा भी
भाव की झंकार ही संगीत है
अब अकेले का जगत ही मीत है

आने वाला समय भारतीय खुदरा बाज़ार के लिए दुश्वारी भरा होगा

झेलने के अलावा चारा ही क्या है :(

आने वाला समय भारतीय खुदरा बाज़ार के लिए दुश्वारी भरा होगा। छोटे व्यापारी जो आज स्वाबलंबी हैं वे कल रिटेल स्टोर के मैनेजर भर होंगे।


पलायन

किसका और किससे ?

कृष्ण रणछोर?

बैक फुट पर आना

मैदान छोड़ना?
या पूर्ण आवेग से?
लौटना लक्ष्य की ओर

एक मुहीम अनुसार

नए छितिज की तलाश?

मोड़ भी हैं बहुत

 मगर मुडना किधर है यही अज्ञात है

मोड़ भी हैं  बहुत ,रास्ते भी बहुत ,
मंजिल  कहाँ   है बताये  किसी ने-


अरुणिमा
एक आगाज़ …………
अरुणिमा यूँ तो उम्र में मुझसे बहुत छोटी थी, मगर बाकी हर चीझ में मुझसे बडी थी, मुझे कोई भी परेशानी हो - छोटी या बडी , उसके पास हर परेशानी का कोई ना कोई हल जरूर होता था।

   

यह जीवन यूँ ही चलेगा

फिर भी कुछ ना कुछ कहेगा

बदल गयी है सभी प्रथाएं बदली बदली सी सभी निगाहें उगने लगी है अब अन्याय की खेती मुट्ठी में बस रह गयी है रेती पर यह जीवन तब भी चलेगा लिखा वक़्त का कैसा ट्लेगा खो गये सब गीत बारहमासी ख़्यालो में रह गये अब पुनू -ससी अर्थ खो रही हैं सब बाते...

डिंपल मिश्र ने बदला मीडिया और फेसबुक का इतिहास 
सोशल मीडिया का ये है सदुपयोग………

उसने महिलाओं के आत्मसम्मान को जगाया है. धन्य हो तुम क्योंकि तुम भारत की नारी हो. डिंपल मिश्र तुम्हें बार बार सलाम, तुम देश के उन लाखों नारियों की प्रेरणा स्रोत हो जो अन्याय और उत्पीड़न का शिकार होकर घर में घुटने को मजबूर हैं.

तेरे मौसम
रोज़ क्यूँ बदलते हैं ………

रीते रंग वाले लब सिकुड्ते हैं ,
सूख जाता है चुप्पी का बांध ,
चूने लगता है नाम तेरा....


गर बच सके तो "कुछ" बचा लो

सब कुछ मिटने से पहले

संस्कृति, संस्कार और सभ्यता 
एक सिक्के के दो पहलू
आज टके भाव भी न बिकते हैं
फिर भी आने वाली पीढ़ी के लिए
ईमान के इस खजाने को
नेस्तनाबूद होने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो

दोस्तों 
अब आज्ञा दीजिये ………अगले शनिवार फिर रु-ब-रु होंगे कुछ नये चेहरों के साथ कुछ नयी बातों के साथ ………तब तक के लिये शुभ विदा!

शुक्रवार, दिसंबर 07, 2012

अन्दर मेल-मिलाप, बना सत्ता का तोता : चर्चा मंच 1086

मुलायम-माया के प्रदेश में प्रवास पर 29 दिसंबर तक -रविकर फैजाबादी  (झारखंडी)

1

बीस बरस का छह दिसंबर : यादों से एक चेहरा

Ashok Kumar Pandey 

2

अक्स दिखाता आइना

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 
3

RISKY SEX DOING US IN

Virendra Kumar Sharma 

Asha Saxena 

वाणी गीत 

7

डिम्पल तुम्हारे साथ पूरा हिंदुस्तान है !

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' 

कौशलेन्द्र 

9

बदलते बच्चे बिखरता बचपन

kanupriya 

10

हिन्‍दु मंदिर मामला - बिल्‍डर जीत गया, मैं हार गई

Kulwant Happy "Unique Man" 

17

यू पी माया विकट, मुलायम मूषक होता -

A

रंगे सियार ..

  ZEAL  
होता पर्दाफाश है, खा खरबूजा खाज ।
 हुक्कू हूँ डट के किया, जोर-शोर का राज ।
जोर-शोर का राज, ऊँट किस करवट बैठे ।
बड़े मतलबी दोस्त, रहे बाहर से ऐंठे ।
अन्दर मेल-मिलाप, बना सत्ता का तोता ।
यू पी माया विकट, मुलायम मूषक होता ।

B

कौड़ियों के मोल जान- मेरा भारत महान !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
 आला अधिकारी लड़ें, नेता भी मशगूल |
शर्मिंदा है मेडिकल, करते ऊल-जुलूल |
करते ऊल-जुलूल, हजारों बन्दे मारो  |
मातु-पिता को जेल, नार्वे में फटकारो |
रविकर यह दुर्दशा, पड़ा सत्ता से पाला |
डायलिसिस पर देश, डाक्टर खोता आला ||

होंगे ख़त्म बिचौलिया, भरे माल में माल ।
खेतिहर मालामाल हो, ग्राहक भी खुशहाल ।
 ग्राहक भी खुशहाल, मिले मामा परदेशी ।
ईस्ट-इंडिया काल, लूट करते क्या वेशी ?
रविकर बड़े दलाल, बटोरेंगे अब ठोंगे ।
दस करोड़ बदहाल, आप भी इनमें होंगे ।।

महेन्द्र श्रीवास्तव  
संसद से चालू सड़क, धड़क धड़क गिरि जाय |
कुत्तों से ही अनगिनत, रविकर झुण्ड दिखाय  |
रविकर झुण्ड दिखाय, इन्हें भी सिंह कहे हैं-
होकर राजा श्रेष्ठ, शेरनी-जुल्म सहे हैं |
रहे बोलती बंद, प्रफुल्लित हम हैं बेहद |
जारी है दृष्टांत, देखनी यह भी संसद ||

गुरुवार, दिसंबर 06, 2012

डायलसिस पर देश ( चर्चा - 1085 )

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है
 
चर्चा मंच के संचालक आदरणीय रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ने अपने सुखद वैवाहिक जीवन के 39 वर्ष पूरे कर लिए है  उन्हें मुबारिकबाद 40 वीं वर्ष गाँठ पर 
अब चलते हैं चर्चा की और 

बधाई निगम जी को 
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मेरा फोटो
अखबार का डर 

इजहारे मुहब्बत 

बाद उसके कोई भाता ही नहीं 

सृजन यात्रा में निमग्न ऋता शेखर 

राम और न्याय 

भारतीय इतिहास और अंग्रेज 

वो सर्द सी ताज़ी हवा 

कोई भूल न हो 

भूल गया खेत खलिहान 

श्रीनिवास वत्स का बाल उपन्यास 
ZEAL
दोहरे मापदंड 
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मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते

श्रद्धांजली महेश अनघ जी को 

गीर अभ्यारण के शेर 
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मां तेरा फोन क्यों नहीं आता..?

गुणकारी पपीता 
"लिंक-लिक्खाड़"
डायलसिस पर देश 

ब्लॉग परिचय - मेरी कलम मेरे जज्बात 

व्यथा नेता जी की 
My Photo
उस चोट ने मुझे शायद बडा कर दिया है,

लहरों पर हस्ताक्षर
आज की चर्चा में बस इतना ही 
धन्यवाद 
दिलबाग विर्क 
*******

बुधवार, दिसंबर 05, 2012

जब जागो, तभी सबेरा (बुधवार की चर्चा-1084)

आज की चर्चा में आप सबका तहेदिल से स्वागत है | कुछ मित्रों के सुझाव के बाद हर लिंक के साथ अपनी तरफ से दो पंक्तियाँ रख रहा हूँ | मेरा यह प्रथम प्रयास कैसा रहा जरूर बताएं |
तो शुरू करते हैं आज की चर्चा:-

जब से जागो तभी से सबेरा
- विशाल चर्चित
@ काव्य का संसार

जब जागो तुम नींद से,
जानो तभी सवेरा है ।
जाग के भी गर आँख बंद,
चारो तरफ अँधेरा है ।।
तुम जो आए
- prritiy
@ PRRITIY .... प्रीति

तुम जो आये है खिला,
मन का ये संसार ।
चहक रहा है अंग-अंग,
आया है बहार ।।
ऑक्टोपस
- धीरेन्द्र अस्थाना
@ अन्तर्गगन


ऑक्टोपस हैं हर जगह,
चूस रहें हैं खून।
मानव बीच हरवक्त छुपे,
अक्टूबर या जून ।।
MAUT KI AAHAT
- Markand Dave
@ M.K.TVFilms - HINDI ARTICLES

आहट है ये मौत की,
बूझ सको तो बूझ ।
जो इसको है बूझ गया,
रहा स्वयं से जूझ ।।
लड़कियां
- रश्मि
@ रूप-अरूप

बेटियाँ महकाती हैं,
घर-आँगन सब एक-सा ।

चंचल मन रिझाता सबको,
हृदय होता नेक-सा ।।
आधी रात
- शांतनु सान्याल
@ अग्निशिखा

झिझक ये कैसी पूछता,
आईना आधी रात ।

आँखे खुद ही बोलती,
हर राज की बात ।।
गोलगप्पे वाला
-Vandana
@ तितली

देखो देखो आया है,
मनभावन गोलगप्पे वाला ।

खट्टा-मीठा स्वाद चखाता,
है इसका अंदाज निराला ।।
रिश्तों की जमींन
- Mamta Bajpai
@ Man ki Dunia

रिश्तों की जमीन को,
सींचों तुम बस प्यार से ।

अटूट-सा रिश्ता बन जाता,
दोस्त से हो या यार से ।।
नारी सर्वत्र पूजिते..
- Anu

@ my dreams 'n' expressions.....याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन..

एक तरफ हैं पूजते,
बना के दुर्गा काली ।
कोख में ही हैं मारते,
मानवता को गाली ।।
माँ -बेटी / सास-बहू
- Archana

@ अपना घर



हैं छुपे कई भाव हैं,
एक ही है तस्वीर ।
प्यार झलकता दूर से,
हंसमुख, नहीं गंभीर ।।
जरूरी तो नहीं देव उठाने की रस्म हमेशा मैं ही निभाऊँ- vandana gupta
@ ज़िन्दगी...एक खामोश सफर

जीवन स्त्री का नहीं, परिचय की मोहताज |
वो समाज का कल है, वो समाज का आज ||
जीवन का अर्थ
(मीनाक्षी पंत)

- रश्मि प्रभा
@ वटवृक्ष

जिंदगी ही पूछ रही,
जीवित हैं क्या हम |
श्वास लेना ही नहीं,
जीवन का है मर्म ||
क्यों न तुम भी गीत गाओ
- Suman
@ Main aur Meri Kavitayen


रे मन गाओ गीत तुम,
कलियों संग मुसकाओ |
दुनिया ही जब डोल रही,
तुम भी संग में डोल जाओ ||
कुछ तैयारियां ...
- उपासना सियाग
@ nayee udaan

देख डायरी के पन्ने,
मन में उठे हिंडोले ।
क्या-क्या था हमने लिखा,
देख के फिर मन डोले ।।

सेहतनामा
- वीरू भाई
@ ram ram bhai

स्वस्थ कैसे रहोगे,
बता रहे हैं भाय |
नुस्खों को आजमा लो,
लाभ ही लाभ मिल जाय ||
फिर तेरी कहानी याद आई
- Amit Chandra
@ ehsas

याद आई है फिर,
तेरी मेरी वही कहानी |
गुजरे हुए वो शाम सुहाने,
रेत पे बनी निशानी ||
उनको शिकायत है
- Rekha Joshi
@ Ocean of Bliss


नोक-झोंक तो अंग हैं,
प्यार का, उद्गार का |
रिश्तों को सुदृढ़ करे,
खुशनुमा संसार का ||
वो सफ़र
- Rajesh Kumari

@ HINDI KAVITAYEN ,AAPKE VICHAAR

सुंदर सफर ये रेल का,
देता मन को हर्ष |
जगह एक-एक गुजर गए,
देख अर्श से फर्श ||
डर मत मन
- Amrita Tanmay
@ Amrita Tanmay



मेरे मन न हार तू,
डरना नहीं तू जान लें |
पीड़ा नहीं है व्यर्थ मिलते,
सत्य को तू पहचान ले ||
Organic Search Results क्या हैं और इसका महत्व
- Vinay Prajapati
@ Tech Prévue Labs

अहम् ज्ञान हैं देते आप, करते मदद भरपूर ।
सीख रहे सब आपसे, पोस्ट आपकी नूर ।।
वक्त का तकाज़ा है
- मन के - मनके
@ मन के - मनके



वक्त का तकाजा है,
रिश्तों का हो आकलन |
बही खाते में लिखे,
कहता है ये आज मन ||
शुभ विवाह
- अरुण कुमार निगम

@ अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)

सुयश व सोनिया को मिले,
सबका नेह-आशीष |
जीवन भर खुशहाल रहे,
कृपा बनाए ईश ||
देखना पहली बार किसी महिला कण्डक्टर को
- विष्णु बैरागी
@ एकोऽहम्

महिलाएं हैं हर जगह, पांव रही पसार ।
हर क्षेत्र में जम रहीं, हर और विस्तार ।।
बेवफा है जिंदगी इसको नहीं ज्यादा पढो अब -
- रविकर
@ "लिंक-लिक्खाड़"



जिंदगी तो है बेवफा, एक दिन ठुकराना है |
रविकर बांधे कुंडलियाँ, टिप्पणियाँ लगाना है ||
अब कांग्रेस को कौन बचा पाएगा?
- IRFAN
@ ITNI SI BAAT


पैसे और शराब से, मिल जाते हैं वोट |
लोकतन्त्र में आज कल, उड़ते नोट पे नोट ||
ब्लोग"दीप":कृपया अपनी राय दें

आज की चर्चा यही पर इति करता हूँ | अब प्रदीप को आज्ञा दीजिये | मिलते हैं अगले बुधवार को कुछ और लिंक्स के साथ |
तब तक के लिए अनंत शुभकामनायें |

आभार |

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.