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रविवार, जून 05, 2016

पर्यावरण बचाओ--चर्चा अंक 2364

जय माँ हाटेश्वरी... 
--     .
आज की रविवारीय चर्चा में..
आप सभी का स्वागत है....
आज 5 जून, यानि विश्व पर्यावरण दिवस है... 
मन -  में  जिजीविषा  हो  पर्यावरण -   बचाओ
जल - वायु स्वच्छ रखो अपना गगन - बचाओ ।
सद्भाव  से  जियो - तुम  यह  है  कवच -  हमारा
वाणी -  मधुर  हो सब  की  पर्यावरण - बचाओ ।
नित यज्ञ करो घर में परि - आवरण का रक्षक
इस  यज्ञ -  होम  से  तुम ओज़ोन  को  बचाओ ।
सत - राह  पर  है चलना सब सीख लें तो बेहतर
गंदी -  गली  से  अपने- अस्तित्व  को  बचाओ ।
तरु  हैं  हमारे  रक्षक  रोपो  'शकुन'  तुम उनको
इस -  वृक्ष  के  कवच  से अपना वतन बचाओ ।
अब देखिये मेरी पसंद के कुछ चुने हुए लिंक... 
-- 
एक साल में एक दिन, होती जय-जयकार।
पर्यावरण दिवस कहाँ, होगा फिर साकार।१।
--
कंकरीट जबसे बना,  जीवन का आधार।
तबसे पर्यावरण की, हुई करारी हार।२।
--
पेड़ कट गये धरा के, बंजर हुई जमीन।
प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।३... 
--

पर्यावरण गीत 

गुज़ारिश पर सरिता भाटिया 
--
बहता तन से बहुत पसीना,
जिसने सारा सुख है छीना,

गर्मी से तन-मन अकुलाता।

नभ में घन का पता न पाता। 

पर 
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 
--
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         हिमालय भारत के लिये यह कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि अगर यह नहीं होता तो आज पूरा क्षेत्र मौसमी कहर से नहीं
बच पाता। यह मध्य एशिया से आने वाली ठण्डी हवाओं को रोक देता है, जिससे भारत कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है। हिमालय मानसूनी हवाओं को भी रोकता है, जिसके कारण
पूरे क्षेत्र में तमाम हिस्सों में बारिश होती है। इसकी ऊंचाई और मानसूनी हवाओं के रास्ते में स्थित होने के कारण ऐसा होता है।
         हिमालय भारत के लिये लम्बे समय से उत्तर का प्रहरी रहा है। यह हमारे देश के लिये एक प्रकार की नैचुरल बाउन्ड्री है। हिमालय के दर्रे काफी ऊंचे हैं
पर 
Kavita Rawat 
--
राजा बन गया था अंग देश का दुर्योधन की मित्रता चाहे जितनी भारी हो पर सम्मान का जीवन तो यहीं से शुरु होता है! कर्ण बैठा था एक पेड़ की छाया में कुछ सुस्ताते
हुए किसी गहन चिंतन में निमग्न युद्ध अवश्यम्भावी है अब लड़ना ही होगा अर्जुन को अब कौन कहेगा ----- तुम नहीं लड़ सकते अर्जुन से तुम राधेय हो, एक सारथी के पुत्र, 
पर 
Dr.Mahesh Parimal 
--
दिल्लगी  ज़ख़्म  ही  न  दे  जाए
खेल  मत  खेलिए  क़ज़ीबों  का
ईद  पर  भी  गले  नहीं  मिलते
हाल  यह  है  मिरे  हबीबों  का
पर 
Suresh Swapnil 
-- 
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पर 
Priti Surana 

--

वाण गाँव से मध्यमहेश्वर केदार यात्रा 

SANDEEP PANWAR 
--

हम भाषा मज़हब में बट गये..... 


मनजीत कौर 


मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
-- 

उन्मादी और हिंसक है हम 

हम उन्मादी है। मथुरा में यही दिखा। एक सनकी और उन्मादी के पीछे हम भी उन्मादी होकर खड़े हो गए। कभी कोई आशाराम, कभी कोई नित्यानद, कभी कोई रामपाल, कभी कोई रामदेव, कभी कोई केजरीवाल, कभी कोई मोदी...के पीछे हम उन्मादित होकर चल देते है। अपनी आँख, कान बंद रखते है। हमारे उन्माद को वे हवा देते है। कभी राष्ट्रबाद के नाम पे, कभी सेकुलरिज्म के नाम पे, कभी धर्म के नाम पे...और मथुरा में एक सनकी सुभाष चंद्र बोस के नाम पे हमें अफीम दी और हम जान ले लिए और जान दे दिए...  
चौथाखंभा पर ARUN SATHI   
--

पुराने ख़त 


वे ख़त जो तुमने कभी लिखे थे, 

मैंने पढ़कर रद्दी में डाल दिए थे, 

कितना नासमझ था मैं, 
ताड़ नहीं पाया प्रगति की रफ़्तार, 
समझ नहीं पाया कि 
धीरे-धीरे बंद हो जाएंगे हथलिखे ख़त. 
जुड़े रहेंगे लोग हर समय, फ़ोन से, 
इन्टरनेट से, देख सकेंगे एक दूसरे को, 
कर सकेंगे चैटिंग. 
अब तुम्हारे ख़त बंद हो गए हैं... 
कविताएँ पर Onkar 
--

व्यंग- सात जन्मों तक यहीं पति मिलें!! 




--

सुप्रभाती दोहे  

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आनत लतिका गुच्छ से, छनकर आती घूप
ज्यों पातें हैं डोलतीं, छाँह बदलती रूप 
खग मानस अरु पौध को, खुशियाँ बाँटे नित्य
कर ले मेघ लाख जतन, चमकेगा आदित्य
दुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कान
प्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहान... 
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर मधु 

रविवार, मई 29, 2016

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के दो साल--चर्चा अंक 2357

जय माँ हाटेश्वरी....

सफलता भी फीकी लगती है,
यदि कोई बधाई देने वाला नहीं हो।
 विफलता भी सुंदर लगती है,
 जब आपके साथ कोई अपना खड़ा हो।
तुम पानी जैसे बनो,
जो अपना रास्ता खुद बनाता है।
पत्थर जैसे ना बनो,
जो दूसरों का रास्ता भी रोक लेता है।
जिसका जैसा " चरित्र " होता है,
उसका वैसा ही " मित्र " होता है। 
अब देखिये आज की रविवारीय चर्चा में मेरी पसंद के कुछ चुने हुए लिंक... 
--

विविध दोहे "वीरों का बलिदान" 

कितने ही दल हैं यहाँ, एक कुटुम से युक्त। 
होते बारम्बार हैं, नेता वही नियुक्त।। 
देश भक्ति का हो रहा, पग-पग पर अवसान। 
भगत सिंह को आज भी, नहीं मिला है मान। 
याद हमेशा कीजिए, वीरों का बलिदान। 
सीमाओं पर देश की, देते जान जवान। 
पर 
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 
--
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प्रेम प्रीत की बात करते, थकते नही व्याख्यान में
जाति धर्म की आड में, व्यवस्था को ही निगल रहा
खो गयी शर्मो हया , सूख गया आँखो का पानी
देख कर सुन्दरी, सुरा, आचरण भी फिसल रहा 
पर 
डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
-----------
बंदिश  नहीं  है  कोई  ग़ज़लगोई  पर  यहां
बस  हमको  मुंतज़िम  की  अदा  रोक  रही  है
मक़्तूल  के  अज़ीज़  परेशां  हैं  दर ब दर
सरकार  क़ातिलों  की  सज़ा  रोक  रही  है 
पर 
Suresh Swapnil 
---------
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शाम गहराने लगती है, कुछ है जो राग अपना गाने लगती है, मैं ढूँढने लगता हूँ ज़िंदगी यहाँ-वहाँ, वह लावारिस, ललचाई निगाहों से - मुझे निहारने लगती है। समझ नहीं
पाता निहितार्थ उसका मैं, आँखें चुरा कर मुक्ति पाता हूँ, मुड़ कर देखता हूँ जो पीछे, आत्मग्लानि से ख़ुद को भरा पाता हूँ। 
पर 
Dr.Mahesh Parimal 
---------- 
हम मांगते ही रह गए,परछाइयों का साथ
हर बार अक्स लेकिन , उनके बदल गए ।।
इक रोज टूट जाएगा  , ये प्यार का महल
विश्वाश के कभी जो ,पत्थर पिघल गए ।।
पर
Manoj Nautiyal 
------
s400/PM-Narendra-Modi
अगर इन सर्वे और हाल ही में हुए चुनावो के आधार पर बात कही जाए तो निश्चित रूप से नतीजे सरकार के पक्ष में ही जायेंगे और मोदी जी का दो साल का कार्य-काल संतोषजनक
ही कहलायेगा । स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं से एक नयी आशा जगी है  और इस तरह की योजनाओं में रोजगार की सम्भावनाएं भी दिखती है जिससे और युवाओं
में एक जोश  आया है।  जनधन योजना , मुद्रा बैंक , प्रधानमंत्री फसल विमा योजना, राष्ट्रीय कृषि बाजार और स्वच्छता अभियान आदि एक अच्छी शुरुआत है ।
पर 
Deepak Chaubey 
---------
अंधेरे में भी मुझे ताकती रहती हैं चिडि़यां
एक द्वीप मेरे भीतर चिडि़यों का
गाता रहता है गीत उजालों के: 
काफी पहले विदा हो गया मेरा घर
नारीयल और केलों के पेड़ो के साथ
सपनों में देखती हूं खिली हुई दोपहर ने
गढ़ दिया है एक स्वच्छंद द्वीप
पर
विजय गौड़ 
--


समालोचन पर arun dev 

--

चाँद कहता है मुझसे 
आदमी क्या अनोखा जीव है 
उलझन खुद पैदा करता है 
फिर न सोता है, 
और मुझसे बाते करता है रात भर... 

aashaye पर garima 

--

गर सोच में तेरी पाकीज़गी है 
इबादत सी तेरी मुहब्बत लगी है 
मेरी बुतपरस्ती का जो नाम दे दो 
मैं क़ाफ़िर नहीं ,वो मेरी बन्दगी है... 

आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 

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शीश झुका कर ज्यों रोये हैं
देवदार के पेड़
बादल के घर ताक-झाँक


करने की उनको डाँट पड़ी है 

भरी हुई पानी की मटकी

सर से टकरा फूट पड़ी है

सूरज भी तो क्षुब्ध हुआ है

उसका रस्ता रुद्ध हुआ है

दिन भर चिंता में खोये हैं
देवदार के पेड़... 
मानसी पर Manoshi Chatterjee 
मानोशी चटर्जी
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दूसरों से शिक्षा लें भूली-बिसरी यादें पर 
राजेंद्र कुमार 
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२८ मई का दिन आज़ादी के परवानों के नाम
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बुरा भला पर शिवम् मिश्रा
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मोहब्‍बत और कुछ नहीं .... 
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एक रोज़
चखा था वर्जित फल का स्‍वाद
उस दि‍न
पेड़ से झड़ी सुनहरी पत्‍ति‍याें ने
सजाया था अनोखा बि‍स्‍तर
चांद पलकें झपकाकर देख रहा था
रूप-अरूप पर रश्मि शर्मा
आज की चर्चा बस यहीं तक...धन्यवाद। 

रविवार, मई 15, 2016

इंडिया कभी सेक्युलर नहीं था........--चर्चा अंक 2343

जय माँ हाटेश्वरी... 

आज की रविवारीय चर्चा में आप का स्वागत है... 
सफ़र की हद है वहां तक की कुछ निशान रहे
चले चलो की जहाँ तक ये आसमान  रहे
ये क्या उठाये कदम और आ गयी मंजिल
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे
अब पेश है मेरी पसंद के कुछ लिंक... 
--
  --


दूभर हो जाता है जीना, 
तन से बहता बहुत पसीना, 
शीतल छाया में सुस्ताने, 
पथिक तुम्हारे नीचे आता। 
लू के गरम थपेड़े खाकर, 
अमलतास खिलता-मुस्काता।। 
पर 
 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 
--
इस  तरफ़  मौज  उस  तरफ़  साहिल 
लुट  गया  आज  नाख़ुदा  मेरा 
बदगुमानी  तबाह  कर  देगी 
मानिए  आप  मश्वरा  मेरा 
पर 
Suresh Swapnil 
-- 
‘वह दो वर्ष भारत से चला गया था, अपने पिता की मृत्यु के बाद. वहीं बस गया. अब लौटा है. वह भी सिर्फ घर को बेचने के लिए.’ 
उसकी बात सुन मुझे थक्का लगा. मुझे लगा कि मेरे हाथ कांप रहे थे. मैंने सहमी आवाज़ में पूछा, ‘उसके पिता की मृत्यु कैसे हुई? कोई जानकारी है तुम्हारे पास?’ 
‘उसके पिता पुलिस अधिकारी थे, कुछ शक्तिशाली लोगों से उनकी शत्रुता हो गयी थी. उन्हीं लोगों ने  उनकी हत्या कर दी.  बहुत ही निर्मम हत्या थी, उन्हें पिघली हुई 
पर 
i b arora 
-- 
s400/Secularism-under-Previous-Pseudo-Secular-UPA-Congress-India-Government
यहां दो अलग कानून है , मुसलमान चार चार शादिया कर सकता है पर हिन्दू दूसरी करे तो उसे जेल में डाल दिया जायेगा जबकि 
एक से ज्यादा शादी दोनों के लिया अवैध होना चाहिए , ये एक ऐसा देश है जहां मेजोरिटी को नेता हमेशा से इग्नोर करते आये है पर माइनॉरिटी को खुश करने के लिए किसी 
भी हद तक गए है  , उदहारण के लिए आप शाहबानो केस ले सकते है, शाहबानो केस में जब सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला सही ठहराया तब तात्कालिक सरकार ने जमा 
मस्जिद के सही इमाम के अनुरुप संविधान बदल दिया | 
कशमीरी पंडितो पर क्या कोई बहस इस कांग्रेस सरकार ने आज तक की ? क्या उत्तर प्रदेश में धर्म आधारित आरक्षण और कैश स्कीम नहीं है 
पर 
Deepak Chaubey 
-- 
एक बड़ा सवाल  यह भी है कि हम कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं ? बाहुबल और रसूख के दम  पर दुनिया को  अपने पैरों तले रखने की सोच वाले बच्चों में संवेदनशीलता कहाँ 
से आएगी ?  महंगी गाड़ियों और बन्दूक को साथी बनाने  वाली इस  नई पीढ़ी की पौध  में मानवीय भाव बचेंगें भी तो कैसे ? जब रसूख का नशा इन घरों की ही नस-नस  में 
बहत हो | नतीजतन यही मद इन बच्चों के के भी सर चढ़कर बोलता है,  तो यह समझना मुश्किल कहाँ कि ये  किसी इंसान के जीवन मोल समझ  ही नहीं सकते | 
s200/ddd
पर 
डॉ. मोनिका शर्मा 
-- 
गुमसुम चुप-चुप कहती मन में 
उन्हीं कणों के वाहक तुम भी 
उन्हीं कणों की वाहक मैं भी 
जिसे तलाशो अंतरिक्ष में 
नींद वहीँ पर, चैन वहीँ 
और वहीँ पर तेरा साकी, तेरा सांप 
रात नहीं वो, बिना स्वप्न जो बीत गयी 
कह देना उस साकी से तुम  
पर 
निहार रंजन 
-- 
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s400/DSC_3251
s400/DSC_3247
पर 
डॉ टी एस दराल 
--
जब जीवन ने बहुत रुलाया 
कदम - कदम पे अड़चनों ने सताया 
तब जाकर कहीं अकल आया 
और ऑखों के द्वार पर लगा हुआ 
स्याह पर्दा हट पाया। 
पर 
Sanjay kumar maurya . 
-- 
कहीं बच्चों के खिलौनों सी हो 
मासूम छुवन ....... 
तपती दुपहरी में अल्हण सी थिरक 
झूमें लरजते बादलों की धड़कन 
बादलों में खिले न खिले इंद्रधनुष 
मन में कहीं कम न पड़े ये रसरंग 
छुम छन्नन्न छुम छन्नन्न ..... निवेदिता 
पर 
निवेदिता श्रीवास्तव 
-- 
वहीँ कहीं बेपरवाही से पड़ा 
एक गुलाब का काँटा 
चुभ गया बच्चे के 
छोटे कोमल पांव में. 
बच्चा रोया, चिल्लाया, 
साथ ही वह काँटा भी रोया. 
पर 
Onkar 
-- 
इनसान के जानवर और जानवर के इंसानियत दिखाने का यह वाकया शहर के कांच मिल स्थित शांति निकेतन शिक्षा समिति के बालिका गृह में हुआ जहां मुरैना के पहाड़ी गांव 
थाना बानमोर की नाबालिग सीमा गुर्जर को कोर्ट के आदेश पर रखा गया था सीमा प्रेम विवाह करना चाहती थी और घरवाले उसके खिलाफ थे  उसके पिता कल्याण सिंह गुर्जर 
और चाचा लाखन बालिकागृह पहुंचे रिजिस्टर में एंट्री के बाद बालिका गृह की कर्मचारी रजनी झा ने सीमा को बुलाया पिता-चाचा दोनों दस मिनट तक सीमा को घर चलने के 
लिए समझाते रहे लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होने सीमा पर हमला बोल दिया सीमा जमीन पर गिर गई और चाचा लाखन उस पर चाकु से ताबड़तोड़ वार करने लगा सीमा के चीखने 
की आवाज सुनकर बालिकागृह के साथ ही बने वृद्ध्‌आश्रम से ६५ वर्षीय बुजुर्ग प्रेमबाबू शिवहरे भागकर आए और लाखन को पीछे से पकड़ लिया छूटने के लिए हमलावर ने उनके 
पेट पर चाकू से वार कर दिए हमले के दौरान सीमा जहां गिरी उससे दो कदम की दूरी पर एक गाय और बछड़ा बंधा हुआ था 
पर 
Vivek Surange 
-- 


--

मैंने छुट्टी उसे नहीं दी थी... 

मुक्ताकाश....पर आनन्द वर्धन ओझा 
--

चौपाल म एक दिन के दफ्तर 

चारीचुगली पर जयंत साहू [ charichugli ] 
--

प्रकृति, पर्यावरण और हम ३: 

आर्थिक विकास का अनर्थ 

Niranjan Welankar 
--

सुप्रभाती दोहे-3 

मधुर गुंजन पर ऋता शेखर मधु 
--

जे.एन.यू विवाद से निकला प्रतिरोध -  

संभावनायें और सीमायें 

Randhir Singh Suman 
--

गीत  

"जमा न ज्यादा दाम करें"  

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

 
पहले काम तमाम करें।
फिर थोड़ा आराम करें।।

आदम-हव्वा की बस्ती में,
जीवन के हैं ढंग निराले।
माना सबकुछ है दुनिया में,
पर न मिलेगा बैठे-ठाले।
नश्वर रूप सलोना पाकर,
काहे का अभिमान करें।
पहले काम तमाम करें।
फिर थोड़ा आराम करें... 
उच्चारण पर रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 

रविवार, मई 08, 2016

मां की ममता--चर्चा अंक 2336

जय मां हाटेश्वरी... 

रविवारीय चर्चा में आप का स्वागत है... 
स्वामी विवेकानंद जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया," माँ की महिमा संसार में किस कारण से गायी जाती है? स्वामी जी मुस्कराए, उस व्यक्ति से बोले, पांच सेर वजन
का एक पत्थर ले आओ | जब व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा, " अब इस पत्थर को किसी कपडे में लपेटकर अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे
पास आओ तो मई तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा |"
स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर बाँध लिया और चला गया | पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा, किन्तु हर छण उसे परेशानी और
थकान महसूस हुई | शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए असह्य हो उठा | थका मांदा वह स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला , " मै इस पत्थर
को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूँगा | एक प्रश्न का उत्तर पाने क लिए मै इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता |"
स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, " पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया और माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है
और ग्रहस्थी का सारा काम करती है | संसार में माँ के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं |
--
अब चलते हैं आज की चयनित रचनाओं की ओर...
--
गीत "माता से अस्तित्व हमारा"  
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')  
ममता से जिसका है नाता।
वो ही कहलाती है माता।।

पाल-पोषकर हमें सँवारा,
माता से अस्तित्व हमारा,
सारा जग जिसके गुण गाता।
वो ही कहलाती है माता।।

जिसने भाषा को सिखलाया,
धरती पर चलना बतलाया,
जिसका रूप हमेशा भाता।
वो ही कहलाती है माता... 
--

मदर्स डे....  

यशोदा 

मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
--
कौन जगाता 
कौन करता चोटी 
जो माँ न होती 

कहती है माँ 
आगे तभी बढूँगी
जो मैं पढ़ूँगी ... 
--
अक्षरहीन हो चाहे माता 
या विद्द्या से हो महान 
करुणा-ममता एक सी होती 
संवेदनायें होती है समान. 
गर्भ में ही अस्तित्व निखरता 
इक-दूजे में बसती है जान 
विलीन होती रहती है 
लहरें सागर में जिस तरह तमाम. 
माँ का मतलब ही होता है... 

-- 

आसमान पर उड़नेवाला,
औंधे मुँह धरती पर आता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।
उससे ही सम्बन्ध बढ़ाओ,
प्रीत-रीत को जो पहचाने।
गिले भुलाकर गले लगाओ,
धर्म मित्रता का जो जाने।
 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 
--



Madhulika Patel 


--

मैं जुटा रहा हूँ लकड़ियाँ, 
सजा रहा हूँ अपनी चिता, 
बचा रहा हूँ उसे बारिश से, 
पर मौत है कि न आती है, 
न बताती है कि कब आएगी... 

कविताएँ पर Onkar 


--
बाधाएँ तो आएंगी ही,
उनसे पार गुजरना है।
ना रुकना है ना थकना है,
बस मंज़िल तक पहुँचना है।
हर आँसू को खुशी में बदलना है,
हर गम को घूंट कर पी जाना है।
एक नयी ऊर्जा का संचार करना है,
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Nitish Tiwary 
-- 

गज़ब का पहचानता है मुझे
मुझसे ज्यादा जानता है मुझे
हमेशा साथ निभाता है
मेरा आइना 
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सरिता भाटिया 
-- 

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फ़र्ज़ करो यह रोह है झूठा झूटी प्रीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में सांस भी हम पे भारी हो
फ़र्ज़ करो यह जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हकीकत बाकी सब कुछ माया हो
Pratibha Katiyar 
-- 
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तुमसे रौशन मेरी राहें, तेरे दम से खुशियां मेरी
तेरी बाँहे, घर है मेरा, मुझमें बसती दुनिया मेरी
चिराग की मद्धिम लौ सी,ज़िया नही हो सकती हूँ
तेरे जैसी बन पाऊँ, कोशिश मै दिन रात करूँ
डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 

-- 

यदि आयोजन यहाँ हो रहा होता तो
प्यासे ,सूखा ग्रस्त लोगों के हिस्से का पानी
पेप्सी और कोक के इशारों पर नाचने बाले
तथाकथित खिलाड़ियों के पैरों तले रौंदने बाली घास को
हरा  भरा रखने में खर्च हो रहा होता
s400/wankhede-1461236598
Madan Mohan Saxena 
-- 
कभी सोचा है  /  धरती अगर सन्यासी हो जाए / तो कैसा हो !
बीज रोपें / तो भी पेड़ ना दे /
कुदाली से खोदें / तो भी पानी ना दे.... 
बहुत  कुछ ऐसा जो अप्रत्याशित है । 
अगर धरती पर होने लगे तो......  
वे  लिखती  हैं कि..
ये सोचते ही / मैं  सुन्न होने लगती हूँ  
s320/sarson%2Bse%2Bamaltas
डॉ. मोनिका शर्मा 
-- 
s400/6.5.2016.Cartoon.KajalKumar
--
वो पुराने पेड़ 
जिन्हें कहीं नहीं जाना होता
किसी भी मोसम में
छुट्टियों के दरमियां भी
सोयी हुई धूप के चहरे को
निहारते रहते हैं अपलक सिरहाने खड़े 
Ravishankar Shrivastava 
-- 
हैं पूछते सवाल पर जवाब नहीं हो ,
आसमाँ तो चाहिए आफताब नहीं हो
ये कोयल की कूकें,और बया की काविश
क्यों हमें भी  ए  खुदा, पायाब नहीं हो
नीलांश
गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की १५५ वीं जंयती
' जन गन मन ' के रचयिता , भारत माता के लाल , गुरुदेव रविंद्रनाथ ठाकुर को उनकी १५५ वीं जंयती पर शत शत नमन |
बुरा भला
शिवम् मिश्रा
काम नहीं नाम बिकता है...
पर हम नहीं जानते  उन्हें
बच्चे भी नहीं पहचानते उन्हें
क्योंकि उनकी लाइव कर्वेज नहीं होती।
 वे   अभिनय भी  नहीं कर रहे हैं।
उनका भाग्य मैदानों में लगने वाले
चौकों छक्कों पर निर्भर नहीं होता।
कहते हैं न,
जो दिखता है, वोही  बिकता है।
मन का मंथन [man ka manthan]
kuldeep thakur
मातृत्‍व दिवस पर विशेष - कविता - माँँ - पं.
 ओम व्‍यास 'ओम
मजबूत कधों का नाम है, माँ…माँ काशी है, काबा है और चारों धाम है, माँ…माँ चिंता है, याद है, हिचकी है, माँ…माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है, माँ…माँ चुल्हा-धुंआ-रोटी
और हाथों का छाला है, माँ…माँ ज़िंदगी की कडवाहट में अमृत का प्याला है, माँ…माँ पृथ्वी है, जगत है, धूरी है, माँ बिना इस सृष्टी की कलप्ना अधूरी है, तो माँ
की ये कथा अनादि है, ये अध्याय नही है… …और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है, और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है, तो माँ का महत्व दुनिया में कम हो नहीं
सकता, और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता, और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
संवेदनाओं के पंख / दिव्य-दृष्टि
Dr.Mahesh Parimal


आज की चर्चा यहीं तक...
अगले रविवार को एक बार फिर...
धन्यवाद।