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चर्चाकारःयशोदा दिग्विजय अग्रवाल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शुक्रवार, सितंबर 13, 2013

महामंत्र क्रमांक तीन - इसे 'माइक्रो कविता' के नाम से जानाः चर्चा मंच 1367

ऐसा कुछ महसूस कर रही हूँ
कि मैं इस चर्चा मंच के साथ न्याय नही कर पा रही हूँ




सूरज की पहली लाली जब इस धरती पर आती है
कहती है उठो शुरुआत हुई संघर्ष की अभी जो बाकी है


मन ,वुद्धि ,विवेक का स्रष्टा हो
ज्ञान विज्ञानं के तुम विधाता हो
ब्रह्मा  रूपेण हो सिरजनहार तुम
शतकोटि प्रणाम तुम्हे , मेरे ज्ञान-गुरु हो।


गले मिलो ना मिलो
देख कर
मुस्काराया तो करो
हर छोटी बड़ी बात का
फसाना मत बनाया करो


रंग अलग
रूप अलग
पसंद अलग
नापसंद अलग
हो सकता है


पूरी एक उम्र मैंने
यूँ ही नहीं गुज़ार दी है
हर लम्हा हर पल
खुद को भी मिटाया है !


सरकशी बढ़ गयी देखो, बगावत को बढ़ जाते हैं ,
हवाओं में नफरतों के गुबार सिर चढ़ जाते हैं
मुहब्बत मुरदार हो गयी,सियासी चालों में फंसकर ,
अब तो इंसान शतरंज की मोहरें नज़र आते हैं.


मंगलमय हो पूर्ण दिन, स्वर्ण कमल सम आज |
शांतिपूर्ण क्षण-क्षण रहे,  सुखमय  रहे समाज |
दुनिया के ऐश्वर्य की,  मिले   आप   को   भेंट,
यही प्रार्थना-कामना,  करता  प्रभु  से  'राज' |


समीकरण ज़िन्दगी का
आसां नहीं सुलझाना,
तमाम योग वियोग के बाद भी
ज़रूरी नहीं, अंत में शून्य आना,


क्या दीवार हमने बनाई है,
न इंट न सीमेंट की चिनाई है ,
पानी नहीं लहू से सिचतें है हम ,
कभी-कभी रेत की जगह,
इंसानों के मांस पिसते है हम। 



तुम्हीं दर्द हो दवा तुम्हीं हो
जीवन पथ पे चला अकेला
छोड़ दुनिया का झूठा मेला
सहम गए क्यों ?



हर शब्द तेरा
मन ही मन मैं
गुनती रही
बार-बार दोहरा के उसे
खुद ही सुनती रही



उसका जरूर पढ़ना पर लिखना खुद अपना
ये नया आईडिया
तेरे दिमाग में किसने
आज घुसा दिया
वैसे भी तू कुछ बुरा
तो नहीं दिखता है


आज बस इतना ही....
आज्ञा दीजिये
यशोदा
जारी है मयंक दा का कोना
--
"फिक्र की खुराक इश्क का ज़ायका खराब किये दे रही है..."
 जब बिस्तर में तुम्हारी जगह एक निरा निश्चल तकिया भर पडा देखती हूं 
तो मालूम होता है कि तुम्हारा नींद में करवट भर बदल लेना भी एक सुकून है..
कभी यूं ही कच्ची नींद मे पूछ लेना कि "सोयी नहीं अब तक" 
और मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना ही 
फिर करवट बदल कर सो जाना भी एक सुख है...
मन के झरोखे से...पर monali 

--
हिंदी की पूर्व-संध्या पर एक विचार मंथन 

आपका ब्लॉग पर DrRaaj saksena

--
जब जीव हरि ते बिलगाना ,
तब ते निज देह गेहा माना , 
माया बस स्वरूप बिसरायो ,
तेहि बरम ते दारुन दुःख पायो।
मित्रों!
आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।
बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।
आपका ब्लॉगपरVirendra Kumar Sharma
--
♥ बिजली कड़की पानी आया ♥ 
बालकृति 
"हँसता गाता बचपन" से
एक बालकविता
काँव-काँव कौआ चिल्लाया।
लू-गरमी का हुआ सफाया।।
 मोटी जल की बूँदें आईं।
आँधी-ओले संग में लाईं।।
हँसता गाता बचपन
--
बिखरे स्वर.

काव्यान्जलि पर धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 

--
अपनी भाषा

Akanksha पर Asha Saxena 

--
काश किसी गुरु की कृपा हम पर भी होती ---
ज़वानों की  जुबानी सुनी, लाख तरकीबें अपनाई,
पर ज़वानी जो गई एक बार, फिर लौट कर ना आई ! 
अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल

--
प्रकृति विकेंद्रीकरण सीख !
हे प्रकृति छोटी धाराओं को तू कब तक यूं ही मिलाते ही चली जायेगी 
लम्बी थकाने वाली दूरी चला चला कर समुद्र में डाल कर के आयेगी 
कुछ सबक आदमी से भी कभी सीखने के लिये 
अगर आ जायेगी तेरी बहुत सी परेशानियां चुटकी में दूर हो जायेंगी...
उल्लूक टाईम्स पर Sushil Kumar Joshi 

--
फूटी किस्मत हाय, तभी दिल रविकर टूटा -
"लिंक-लिक्खाड़"
"लिंक-लिक्खाड़"  पर  रविकर - 

--
नीलिमा होती हैं न हैरानियाँ!!!

Rhythm पर नीलिमा शर्मा

--
अज़ीज़ जौनपुरी : न ज़ले न ख़ाक हो
हाय ये ज़िन्दगी न ज़ले,न ख़ाक हो,न आग़ लगे
 फ़क़ीर  कौम  के आये  हैं न सुर लगे न राग लगे. 
 हाय  ये क़िस्मत , कि  मर्सिया ही  उन्हें  फ़ाग लगे  ख़ाली बोतल सी कहानी के  मुंह पे  जैसे क़ाग लगे ..
Zindagi se muthbhed
--
गुज़र रही है दो ज़िन्दगी

ग़ाफ़िल की अमानत पर

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
--
मेरी ख़ामोशी भी जिक्र तुम्हारा करती है.........!!!

'आहुति' पर sushma 'आहुति'

--
"ग़ज़ल-तमन्नाओं की लहरे हैं"
हँसी भी है-खुशी भी है, तमन्नाओं की लहरे हैं
तभी नमकीन पानी में, बहुत से लोग ठहरे हैं

उमड़ती भावनाएँ जब, तभी तो ज्वार आता है
समन्दर की तलहटी में, पड़े माणिक सुनहरे हैं..
उच्चारण
--
किया कलेजा चाक, आज कहते हो झूठी -
रविकर की कुण्डलियाँ
रविकर की कुण्डलियाँ

--
सुप्रभात मित्रोपत्नी को समर्पित एक मुक्तक आपके दरबार में-
पूर्ण चन्द्र सम अनुपम आनन, कुन्दन रंग समाया है |
टपक रहा है अमिय अधर से,नैनन मृगमद छाया है |
पोर - पोर से टपक रही है, नव-यौवन रस-धार प्रिय,
रक्त-वर्ण  ज्यों मिला दुग्ध में,  रच हर अंग बनाया है |
--डा.राज सक्सेना

शुक्रवार, सितंबर 06, 2013

सुबह सुबह तुम जागती हो: चर्चा मंच 1361 ....शुक्रवारीय अंक....

शुभ प्रभात.....
सितम्बर माह का पहला शुक्रवार....
भूमिका के बगैर चलिये चलते है मंच की ओर.....


सुबह सुबह तुम जागती हो,
धीरे से मेरे बगल से सरक कर
पहनकर चप्पल
किचन में जाती हो


चल चोरी करने की नादानी करते हैं |
उनको उनसे ही चुराने की शैतानी करते हैं||


नए   अहद     नई   वफ़ा     तलाश    करते  हैं
रहे-अज़ल    नया   ख़ुदा     तलाश    करते  हैं
यहां  की   आबो-हवा   अब   हमें  मुफ़ीद  नहीं
नई   सहर     नई   सबा     तलाश     करते  हैं



पर सारे शग़ल भुलावा हैं।
समय कहीं नहीं गया।
वो वहीं खड़ा है। स्थिर, एकाकी, अनन्त, विराट समय। 
यूं कहें, हम खड़े हैं। अनन्त समय के आगे।
और उससे नज़रे मिलाने का हमारे भीतर साहस नहीं है।



आतंक एक जासूसी कुत्ते का
सावधान...होशियार...झब्बू से अपने को बचाएं...घर से बाहर ना निकलें.....
कुत्ते को गिरफ्तार करने वाले को सरकार की तरफ से एक मैडल
और एक हजार का नगद इनाम....”



“ ऊँह गंदी नाली के कीड़े कहीं के ।”
वो चौंका – “ ये तो कल रात वाले साहब है जिन्होने मुझे थप्पड़ मारा था ।”
उसने उनका मुंह घुमाया तो बड़े ज़ोर का भभका उसकी नाक को चीर गया “ ऊँह गंदी नाली के कीड़े कहीं के ।” कहता हुआ वह आगे बढ़ गया ।


चल रही हूँ
बाँध आँचल में सभी साधें अधूरी
मैं अकेली राह पर यूँ चल रही हूँ !


उफ़..देह की टूटन
तपता बदन
कसैली जीभ
और वो पोटला
नीम हकीमों का


हम फ़कीरों की बस्ती से आये हुए हैं
दुआएँ मोहब्बत की लाये हुये हैं
खुशियाँ ज़माने की हों हर को मुबारक
चरागे मोहब्बत जलाये हुए हैं


शब्द
मात्र शब्द ही नहीं
लेखकीय मन का
आइना होते हैं
पढने मात्र से ही
मन के भाव
उजागर कर देते हैं


गर तेरा हो धंधा तो कैसे हो सकता है मंदा !
जिस दिन लिखने
के लिये कहीं कुछ
नजर नहीं आता है
ऊपर वाले तेरा ही
ख्याल आ जाता है
सबसे सही धंधा
तेरा ही चल रहा है
तभी तो तुझे ही बस
भगवान कहा जाता है !



ये खुलती और  बंद
होती खिड़कियाँ
उन पर टंगी
दो आँखें
फैलाती हैं


अंजोरी, आज अन्यमनस्क क्यों हो ?
कजराई-सी आँखों में
'रात्रि' की कनीनिका में
समाया है अब्द का अस्तित्व


मन बावरा थोड़ा पागल सा है
दिशा का इसको कोई ज्ञान नहीं
कभी ये सख्त कभी पिघलता मोम सा है
खुद पर इसका कोई ध्यान नहीं


जीत अभी मिल जायेगी,
इसी भरोसे अड़े रहो|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||१||


तीन वर्ष की सज़ा मिली है,सत्रह साला दानव को !
कुछ तो शिक्षा मिले काश,कानून बनाने वालों को !
अरसे बाद, पड़ोसी दोनों, साथ में  रहना सीखे हैं !
अदब क़ायदा और सिखादें,शेख मोहल्ले वालों को !



जब घबरा जाता था
कठिन शब्दों की इमला से
आँखों से बहने लगते थे आँसू
तब कोई था
जो हौसला बढ़ाता था
लिखना सिखाता था


सूत पर सूत या तांत पर तांत,
यूँ उलझन भरा ज्यों समूचा मकडजाल,
हर तांत पर उकेरा हुआ एक नाता मेरा,
समीप से दूर तलक जाती हर लकीर पर,


वो रोकता मुझे इक बार
मैं पलट आता
मैं उस के जौर ओ सितम
ख़ुशदिली से सह लेता



देखो हम कुछ नहीं बोलेंगे .....देखो हम कुछ नहीं बोलेंगे
आँखों आँखों में तोलेंगे ....पर मुंह से कुछ नहीं बोलेंगे


फिर भी नफ़रत सीख ले!
तुझको जीना है
जख़्म सीना है
रात काली है
और दिवाली है


देख यह विस्तीर्णता यूँ
व्योम में फिरता हुआ मन
नील नभ की नीलिमा से
तीर पर तिरता हुआ मन
लेकिन कविता रूठी है



आइये आज की अंतिम पोस्ट में ....
क्यों न कुछ अच्छा किया जाये !
आज शिक्षक दिवस पर
क्यों ना पुनर्जीवित
होने के सपने देखने
का एक प्रण ही
कर लिया जाये !


आप लोगों की क्षमता की मैं कायल हूँ
जितना भी लिंक्स दूँ....सब पर आप जाते है
भले ही आप अपनी उपस्थिति वहाँ दर्ज न करें
पर मेरी क्षमता यहाँ जवाब दे रही है
आज मयंक दा का कोना शायद नहीं है
आज्ञा दीजिये
यशोदा

आज तो है,
लेकिन कल और परसों नहीं होगा..!
"मयंक का कोना"
--
सोये मत रहिये, असलियत देखिये

लालकिला का का असली नाम लालकोट है---- - जैसे ताजमहल का असली नाम तेजोमहालय है और क़ुतुब मीनार का असली नाम विष्णु स्तम्भ है वैसे ही यह बात भी सत्य है...
ZEAL
--
मुक्तक :  शिक्षा के मंदिर थे....

डॉ. हीरालाल प्रजापति

--
मिले खिलाते गुल गुरू, गुलछर्रे गुट बाल 

"लिंक-लिक्खाड़"

--
हृदय की तरंगो ने गीत गाया है।

हृदय की तरंगो ने गीत गया है 
खुशियों का पैगाम लिए मनमीत आया है 
जीवन में बह रही ठंडी हवा सपनो को पंख मिले 
महकी दुआ मन में उमंगो का शोर छाया है 
भोर की सरगम ने ,मधुर नवगीत गाया है...
sapne(सपने)
--
शिक्षक दिवस पर दो बातें

व्योम के पार

--
आश्रम हित आ श्रम करें, कर ले रविकर धर्म
रविकर की कुण्डलियाँ
रविकर की कुण्डलियाँ
--
"गुरू वन्दना"
ओम् जय शिक्षा दाता, जय-जय शिक्षा दाता।
जो जन तुमको ध्याता, पार उतर जाता।।

तुम शिष्यों के सम्बल, तुम ज्ञानी-ध्यानी।
संस्कार-सद्गुण को गुरु ही सिखलाता।।
उच्चारण
--
"अमृत भी पा सकता हूँ"
काव्य संकलन सुख का सूरज से
एक गीत
"अमृत भी पा सकता हूँ"
अपना माना है जब तुमको,
चाँद-सितारे ला सकता हूँ । 
तीखी-फीकी, जली-भुनी सी,
सब्जी भी खा सकता हूँ।...
सुख का सूरज
--
"स्लेट और तख़्ती"
बालकृति 
"हँसता गाता बचपन" से
एक बालकविता
"स्लेट और तख़्ती"
slate00
सिसक-सिसक कर स्लेट जी रही,
तख्ती ने दम तोड़ दिया है।
सुन्दर लेख-सुलेख नहीं है,
कलम टाट का छोड़ दिया है।।
हँसता गाता बचपन
--
वो वक़्त भी कैसा था

कुछ रंगीन कपडे के टुकड़े ,
कुछ धागे , और कल्पना के रंग ...
इन के मेलजोल से मैंने बनाया है यह भित्ति चित्र...
जब कभी देखती हूँ,अपना गाँव याद आ जाता है.. 
वो वक़्त भी कैसा था...
simte lamhen पर kshama 
--

ज़न्नत की हकीकत....अंकल सैमकी गाथा कथा, आधुनिक बैकुंठ

आपका ब्लॉग

--
नाम काम तरु काल कराला ,
सुमिरनाम काम तरु काल कराला ,
सुमिरत समन सकल जग जाला , 
राम नाम कलि अभिमत दाता ,हित परलोक ,लोक पितु माता।
आपका ब्लॉग
आपका ब्लॉग पर Virendra Kumar Sharma 

--
मृत्तिकाअनगढ़ एक आकार एक पहचान पाने को आतुर पा कुम्हार का स्नेहिल स्पर्श हुई सअनगढ़ एक आकार एक पहचान पाने को आतुर पा कुम्हार का स्नेहिल स्पर्श हुई समर्पित ढली उत्कृष्‍ट प्रतिमा में मृत्तिका अनुगृहीत कुम्हार प्रफ़ुल्लित जग मोहित ...

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वीथी पर sushila

शुक्रवार, अगस्त 30, 2013

राज कोई खुला या खुली बात की : चर्चा मंच 1353

आज ही होनी थी गड़बड़ी
मेरे कम्प्यूटर में
फिर भी कुछ तो हासिल करूँगी ही
चलिये देखें क्या है आज....


बात बिन बात की ,या बात थी बात की |
राज कोई खुला या खुली बात की ||


नन्द दुलारे यशोदा के प्यारे
सांवरे सलोने हे कृष्णा।


तैयार हुआ हिंदू विश्वकोश
दुनिया के सबसे प्रमुख धर्मों में से एक हिंदू धर्म के विश्वकोश का
अगले हफ्ते साउथ कैरोलिना में लोकार्पण होगा।
यह अंग्रेजी में है। हिंदुवाद और इसके अनुशीलन से 
संबंधित इसमें करीब 7000 लेख हैं। 


हदों में रहने वाले सरहदों की हदों से हैरान
हद फिर भी मिटती नहीं सरहदों की हदों पर।



राह में किसी घायल से कतरा के निकल जाने वाले ,
अब नहीं मिलते उन्हें अस्पताल पहुँचाने वाले .


कान्हा - रास नहीं अब समर चाहिये
इस बार सिखाओ कान्हा फिर,
भारत को एक और समर,
भूखों को अब भीख नहीं,
हक़ चहिये इस बार मगर।


धमनियों में बहती
भावनाओं की तरह,
नश्वर जीवन की
श्वास की तरह,


मेरो लड्डू गोपाल
कृष्ण अब लो, तुम अवतार,
मचा फ़िर से है, हाहाकार ।


बरसों की
प्रतीक्षा पूरी हो गयी
आज वकील की
चिट्ठी आ गयी



यदि मूर्खों से पाला पड़ जाए तो क्या करना चाहिये
हुजूर सरकार चुप रहना चाहिये



छलक जाते हैं अब आँसू, ग़ज़ल को गुनगुनाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


तमाम उम्र मेरी ज़िंदगी से कुछ न हुआ
हुआ अगर भी तो मेरी ख़ुशी से कुछ न हुआ


फि‍र बीती एक रात
ध्रुव तारे से आंख मि‍लाते
चांद को बादलों तले
देखते ही देखते छुप जाते


रिश्ते कैसे कैसे
कितने बने कितने बिगड़े
कभी विचार करना
कब कहाँ किससे मिले
उन्हें याद करना 



आज के लिये बस इतना ही
आज्ञा दीजिये यशोदा को

जारी है मयंक दा का कोना
--
नवगीत की पाठशाला की रचनाओं का पहला संकलन

नवगीत की पाठशाला

--
तन्वी श्यामा शिखरि दशना पक्व बिम्बाधरोष्ठी मध्ये 
क्षामा चकित हरिणी प्रेक्षणा निम्ननाभि।

--
जगत मातु पितु सम्भु भवानी , 
तेहिं श्रृंगार न कहहु बखानी।
आपका ब्लॉग पर Virendra Kumar Sharma
--
हुआ यूं कि ---

मनोज

--
"सम्बन्ध" 
काव्य संकलन सुख का सूरज से
एक गीत
"सम्बन्ध"
सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।
अनुबन्ध आज सारे, बाजार हो गये हैं।।

न वो प्यार चाहता है, न दुलार चाहता है,
जीवित पिता से पुत्र, अब अधिकार चाहता है,
सब टूटते बिखरते, परिवार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।।...
सुख का सूरज
--
भक्त और वोट
सरोकार
सरोकार पर अरुण चन्द्र रॉय

--
हां मैं दे रहा हूं "सत्याग्रह" को फुल मार्क्स !

TV स्टेशन ...पर  महेन्द्र श्रीवास्तव 

--
हम आपकी नज़रों में जीते हैं....अस्तित्व "अंकुर"

मेरी धरोहर पर yashoda agrawal

--
उल्लूक की पोटली में कूड़ा ही कूड़ा
हवा में तैरती ही हैं 
हर वक्त कथा कहानी कविताऎं 
जरूरी कहाँ होता है 
सब की नजर में सब के सब ऎसे ही आ ही जायें 
सबको पसंद आ जायें शैतानियाँ ....
उल्लूक टाईम्स पर Sushil Kumar Joshi 

--
अर्चना भैंसारे- कुछ कवितायें, आत्मकथ्य और एक नोट

*हिंदी के लिए इस वर्ष का साहित्य अकादमी युवा सम्मान प्राप्त करने वाली 
कवयित्री अर्चना भैंसारे को इस सम्मान के लिए हार्दिक बधाई देते 
हुए आज असुविधा की यह पोस्ट उन पर केन्द्रित की गयी है.
 आभासीय दुनिया में लोकप्रियता की जद्दोजहद के बीच, 
यह एक सहज काव्‍य यात्रा का ईनाम है ...
असुविधा....
--
शांत रस रौद्र में प्रचंड हो बदल रहा !

WORLD's WOMAN BLOGGERS ASSOCIATION

शुक्रवार, अगस्त 09, 2013

मेरे लिए ईद का मतलब ग़ालिब का यह शेर होता है :चर्चा मंच 1332 ....

पहली पोस्ट सभी को प्यारी होती है..नई जगह नये लोग..
मेरी कोशिश यही रहेगी कि खरी उतरूँ...
कुछ शुरुआती लिंक्स प्रसंगिक है
 आज ईद का दिन है
आइये देखें कुछ प्रासंगिक लिंक्स
  

भाइयो मिलकर मनाओ ईद
दिल में न रह जाए कसक और फिकर
गर गरीबी में दबा हो कोई बन्दा
बाँट फितरा दिखा उसको भी जिगर
 



मेरे लिए ईद का मतलब ग़ालिब का यह शेर होता है.........
हमें क्या वास्ता ग़ालिब, ज़माने भर की ईदों से ।
हमारा चाँद दिख  जाये, हमारी  ईद  हो  जाये ।।


हिन्दू भी रखते हैं रोज़ा......चन्दन भाटी
सरहद पार रह रहे हिंदू-मुस्लिम परिवारों के रीति रिवाजों में भी कोई ज्यादा फर्क नही हैं। इनकी शादी-विवाह, मृत्यु, त्योहार, 

खान-पान पहनावा तथा भाषा भी एक जैसे हैं।
हिंदू परिवारों के छोटे-छोटे बच्चे भी रोजे रखते हैं।



सदा की "सदा"
पाक़ीजा रस्‍म
निभाओ गले मिल
ईद  के दिन



सारी  दुनियाँ  को  मुबारक  हो  रमज़ान का महीना
अल्लाह  की  इबादत  हो, हो खुशिओं का ये महीना
ऐ  ख्वाज़ा सलीम  चिश्ती  तू  दुआओं से हाथ भर दे
तू  दुनियाँ  पे  करम  कर दे,  ले  ख्वाबों का मदीना


खुदा का इनाम है 'ईद-उल फितर'.....प्रस्तुति : बुरहानुद्दीन शकरूवाला
रमजान माह के रोजे को एक फर्ज करार दिया गया है,
ताकि इंसानों को भूख-प्यास का महत्व पता चले।
भौतिक वासनाएं और लालच इंसान के वजूद से
जुदा हो जाए और इंसान कुरआन के अनुसार अपने को ढाल लें।



है आबिदों को त‘अत-ओ-तजरीद की ख़ुशी
और ज़ाहिदों को जुहाद की तमहीद की ख़ुशी
रिन्द आशिकों को है कई उम्मीद की ख़ुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी


 घर-घर को कर रही है मुअत्तर हवा ए ईद
सूझे न आज और तो कुछ भी सिवाए ईद
खुशहाल ज़िन्दगी हो, मुबारक हो हर घड़ी
सौग़ात है यही मेरी सब को बराए ईद 



उपरोक्त लिंक्स प्रासंगिक हैं
इनके अलावा भी कुछ साहित्यिक लिंक्स कुछ हैं
जो आपकी नज़र करती हूँ



रोज सुबह सुबह जब मैं
अपनी अँजुरी में भर लेती हूँ
ओस से भीगे छोटे छोटे
उजली पंखुड़ियों केसरी डंडी वाले
पारिजात के इन फूलों को


परमात्मा ने मनुष्य को दिये हैं
कई रतन,
आत्मा, बुद्धि, तन और मन।


सुनो !!
मैं
आज
जरा भी नही रोई
जानते हो क्यूं???


खूब खटय्या खूब नचय्या
मचर-फचर फींच फिंचय्या
ताथा ताथा ताथा थइय्या
नीला पीला लाल गझीला


 बात करोगी ना मुझसे
" मत करो ना मुझे इतनी रात  को फ़ोन । कहा था न मेरी तबियत ठीक नही हैं  और आपको कोई फर्क नही पढ़ता  रूमानियत का आलम  इस कदर छाया हैं तुम पर के तुम न वक़्त देखते हो न  माहौल . बस सेल फ़ोन मिलाया  और कैसी हो तुम !!!!



दिल डूब रहा इश्क में, ये क्या इश्कियाँ है ?
न कोई ख़तावार,आँखों की गुस्ताखियाँ है॥
कल तलक न जानते पहचानते, थे हम जिसे,
आज उन्हीं से ही, फ़िज़ा की रंगीनियाँ है ॥


ना पर्वत श्रंखलाएं
एक ऊंचाई की होती
ना सारी नदियाँ
एक गति से बहती


ये लड़कियां -सतीश सक्सेना
और आज जब मैं किसी बहिन को,
अपने भाई के ड्राइंग रूम में,
मेहमान की तरह बैठे देखता हूँ
तब मुझे बेहद तकलीफ होती है  !



सोच रही ....
डर जाना कहो
हार जाना कहो
जज़्बात का ह्रास कहो
सुनता कौन है
जिससे कुछ कहूँ



 अमन का चमन है वतन ये हमारा।
नही दानवों का यहाँ है गुजारा।।
खदेड़ा है गोरों को हमने यहाँ से,
लहू दान करके बगीचा सँवारा।
 


 
परीक्षा की घड़ी
उतरती हूँ मैं
देखें कितनी खरी
यशोदा के नमन

"मयंक का कोना" कुछ अद्यतन लिंक
(1)
दिल से जुड़े हुए लोग

तमाशा-ए-जिंदगी पर तुषार राज रस्तोगी

(2)
सभी प्यारे दोस्तों को रमज़ानी ईद मुबारक़

Hasya Kavi Albela Khatri

(3)
आपका ब्लॉग
(क)
जय भगवत गीते ! जय भगवत गीते ! 
हरि हिय कमल विहारिणि सुन्दर सुपुनीते !
(ख)
इन सेकुलरिष्टों को सेकुलैरिटी ही खायेगी
प्रस्तुतकर्ता 
(ग)
"ईद मुबारक"

(घ)
कवि से आह्वान
हे कवि अपनी कलम के आज फिर जौहर  दिखा दो । 
रचो कवितायें नयी एक क्रांति तुम फिर से जगा दो...
प्रस्तुतकर्ता 
(ड.)
(4)
"वेब कैम की शान निराली-
बालकृति-हँसता गाता बचपन से"
"वेबकैम पर हिन्दी में प्रकाशित 
पहली बाल रचना"
-0-0-0-0-0-
 वेबकैम की शान निराली।
करता घर भर की रखवाली।।

दूर देश में छवि पहुँचाता।
यह जीवन्त बात करवाता।।
(5)
पता है तुम टीम बनाने वालों में आते हो 
देश प्रेमियों में भी पहले गिने जाते हो
My Photo
उल्लूक टाईम्स पर सुशील 

(6)
ह्रदय की घाटी

*छू न पायेंगे ह्रदय की घाटियों को*
* ग्रीष्म के उजले फुएं से मेह.* 
*ओ हवाओं इन फुओं को ले** 
*उड़ाओ * 
झलकने दो शांत नभ का नेह...
समय से यूं हूँ परे ..पर Manjula Saxena
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