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शुक्रवार, जनवरी 15, 2021

"सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप"(चर्चा अंक- 3947)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी विज्ञजनों का चर्चा मंच पर हार्दिक स्वागत ! 

15 जनवरी  1949 को के. एम .करियप्पा भारतीय थल सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ बने। तब से 15 जनवरी को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सेना दिवस के अवसर पर सेना में कार्यरत  समस्त सैन्यकर्मियों को सैल्यूट करते हुए आज की चर्चा

का आरम्भ मेरी एक रचना से -


हिम किरीट के रक्षक तुम,तुम में है शक्ति अपार

तुम से रक्षित गौरव राष्ट्र का, तुम्हें वन्दन बारम्बार

हे मातृभूमि के रक्षक तुम्हें प्रणाम !


उतंग गिरि ,बर्फीली राहें, तुम सरहद के पहरेदार

नीरव मरुथल,निर्जन कानन,तुम नैया खेवनहार

हे भारतवर्ष के रक्षक तुम्हें प्रणाम !

              "मीना भारद्वाज"

--

आइए अब बढ़ते हैं आज के चयनित सूत्र  की ओर -

 --

दोहे- उल्लास का उत्तरायणी पर्व (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप।

शस्य-श्यामला भूमि का, निखरेगा अब रूप।।


भुवनभास्कर भी नहीं, लेगा अब अवकाश।

कुहरा सारा छँट गया, चमका भानुप्रकाश।।


आयेंगे अच्छे दिवस, जाड़े का बस अन्त।

धीरे-धीरे चमन में, सजने लगा बसन्त।।

***

किरण और वह

सूरज की पहली किरण 

चुपके से घुसती है 

खिड़की के रास्ते कमरे में,

देखती है, सोई हुई है वह,

मासूमियत छाई है उसके चेहरे पर.

***

सब कुछ उसमें वह सबमें है

झर-झर बरस रहा है बादल 

भर ले कोई खोले आँचल, 


सिक्त हुआ आलम जब सारा 

क्यों प्यासा है मन यह पागल !


सर-सर बहता पवन सुहाना 

जैसे गाये मधुर तराना,

***

अम्मा का निजी प्रेम

आटे के ठोस

और तिली के मुलायम लड्डू

मीठी नीम के तड़के से

लाल मिर्च

और शक्कर भुरका नमकीन

हींग,मैथी,राई से बघरा मठा

और नये चांवल की खिचड़ी

***

समझ अब देर तक राह भूली है

देख रहा है सारा आलम

खेतों में सरसों फूली है

वो देखो ओस से भीगे शजर की शाख़ पर 

नन्ही चिड़िया झूली है 

न परेड की चिंता न समिति की फ़िक्र

असहमत हो गई सत्ता से आज गाजर-मूली है

***

अंदर कुछ और बाहर कुछ - -

मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं

निशाचर, सुदूर बांस वन में

अग्नि रेखा सुलगती सी,

कोई नहीं रखता

यहाँ दीवार

पार की

ख़बर,

***

एक ताज़ा ग़ज़ल- नया शेर सुनाता हूँ कहाँ

अपने बच्चों से कभी सच को बताता हूँ कहाँ

इसलिए ख़्वाब में परियाँ हैं मैं आता हूँ कहाँ


हर किसी दौर में,तू मीर के दीवान में है

तुझको पढ़ता हूँ नया शेर सुनाता हूँ कहाँ


मेरी आँखें हैं मेरी नींद भी सपना भी मेरा

मैं सियासत की तरह ख़्वाब दिखाता हूँ कहाँ

***

बर्ड फ्लू : मुसीबत में हैं हमारे नन्हें साथी 

कोरोना वैक्सीन की ख़ुशख़बरी ने तनिक राहत दी थी कि बर्ड फ्लू की आपदा ने दस्तक दे दी। राज्य-दर-राज्य इसकी चपेट में आते जा रहे हैं। यद्यपि सावधानी रखने पर यह मनुष्यों के लिए प्रत्यक्षतः संकट उत्पन्न करने वाली आपदा नहीं है लेकिन आर्थिक और पर्यावरण के लिए यह ज़रूर मुसीबतें खड़ी कर रही है। आखिर पक्षी मात्र पक्षी नहीं, हमारे नन्हें साथी हैं और आज उन्हें बर्ड फ्लू के संकट ने आ घेरा है। 

***  

बालिका से बनी गृहणी

जिधर देखो यही कहा जाता 

कुछ भी तो आता नहीं

 कैसे घर चला पाएगी 

किस किसके मुंह पर ताला लगाती | 

पर वह हारी नहीं 

धीरे से  कब कुशल गृहणी में बदली

***

चीख कर कहती कलम

छीन हाथों से किताबें

आज भी करते विदाई।

पीर बेटी जब सुनाती

रीति की देते दुहाई ।

चीखकर कहती कलम यह

पीर कब समझे जमाना।

***

संक्रांति

होने लगे बड़े दिन लगने लगी सुहानी धूप,

कर सोलह श्रृंगार ओस से खिला धरा का रूप,

सूर्यनरायण हुए मुग्ध, लख कर वसुधा का मुखड़ा,

सात अश्व के रथ को लेकर उतरे नभ से भूप !

***

आज का सफर यहीं तक…

  फिर मिलेंगें 🙏🙏

"मीना भारद्वाज"

--

शुक्रवार, अप्रैल 24, 2020

"मिलने आना तुम बाबा" (चर्चा अंक-3681)

सादर अभिवादन। 
शुक्रवार की प्रस्तुति में आपका स्वागत है।
***
कुछ लोग भ्रान्तिवश मुझे शान्ति कहते हैं,
निस्तब्ध बताते हैं, कुछ चुप रहते हैं
मैं शांत नहीं निस्तब्ध नहीं, फिर क्या हूँ
मैं मौन नहीं हूँ, मुझमें स्वर बहते हैं।
"भवानीप्रसाद मिश्र"
***
आइए पढ़ते हैं मेरी पसंद की कुछ रचनाऍं-
--

दोहे-धरादिवस  

"धरती का सन्ताप"  

--
गर्मी की छुट्टी होते ही,
अपने घर हम आयेंगे,
जो भी लिखा आपने बाबा,
पढ़कर वो हम गायेंगे,
जब भी हो अवकाश आपको,
मिलने आना तुम बाबा।
पापा की लग गई नौकरी,
दूर नगर में अब बाबा।
**
इसी झील के तट पर पेड़ गगन है वट का ,
काला बादल चमगादड़ - सा उल्टा लटका ;
शंख - सीप नक्षत्र रेत में -
हैं पारे - से |
साँझ - सुबह के मध्य - अवस्थित झील रात की 
भरी हुई है अँधियारे से |
***
बहुत से लोगों में मन में सवाल होगा कि आयुष मंत्रालय के ऐसे कौन से सुझाव हैं।इसकी वजह हे भारतीय खान पान  जिसमे में स्वाद और स्वास्थ्य का सामंजस्य होता है हमारे यहां खाने में प्रयोग होने वाले ज्यादातर मसालों में औषधीय और आयुर्वेदिक गुण होते हैं
***
चलो प्रिये !
गठरी ले 
फिर अपने गाँव चलें |
कुछ 
घोड़ागाड़ी से 
कुछ नंगे पाँव चलें |
***
राष्ट्र की चेतना को जगाते चलें
हम क्रांति के गीत गाते चलें...
अंधेरे को टिकने न दें हम यहाँ
भय को भी छिपने न दें हम यहाँ
मन में किसी के निराशा न हो
आशा का सूरज उगाते चलें ।
***
उड़ने से पहले वो
धीमे से कहती है,
“अन्दर क्यों बैठे हो?
थोड़ा बाहर निकलो न,
तुम्हें पिंजरे में देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता!”
***
चेतन अरु अवचेतना ,रखे भिन्न आयाम ।
जाग्रत चेतन जानिये ,अवचेतन मन धाम।।
पंच तत्व निर्मित जगत,चेतन जीवन सार ।
अवचेतन मन साधना ,पूर्ण सत्य आकार ।।
***
आग चूल्हे  की हो 
या पेट की...
   एक जलती है   
तब दूसरी बुझती है 
 और चूल्हा जलता कब है?
   पूछो उन  मजदूरों से .. ....
***    
माँज रहा था समय,
 दुःख भरे नयनों को,
स्वयं को न माँज पाई, 
एक पल की पीड़ा थी वह,
कल्याण का अंकुर,
उगा था उरभूमि पर,
बिखेर तमन्नाओं का पुँज,
हृदय पर लगी ठेस,
प्रीत ने फैलाया प्रेम का,
दौंगरा था वह।
***
कल वही लोग भूल जायेंगें
चार दिनों में, 
क्या क्या हुआ था
करोना काल में
दो - चार दिन सहम के निकलेंगें
थोड़ा संभल कर निकलेंगें
फिर बेधड़क हो पहले से और ज्यादा
करेंगें दुरुपयोग हवा पानी का
***
नाश से निर्माण का क्रम
चक्र चलता ये निरंतर
बिखरते हैं श्वांस मोती
लगे शून्य जीवन कांतर
सृष्टि का विस्तार होगा
रिक्तपन है फिर जरूरी
चमक जुगनू की सिखाती
हार से हो जीत पूरी।।
***
ऐ मानव, तुमने तो मेरी ही अस्तित्व को
खतरे में डाल दिया ,मेरी समृद्धि भी विपदा में पड़ी
ऐ मानव, दिखावे के पौधारोपण से ना मैं समृद्ध होने वाली ,तुमने तो मेरी जड़ों को ही जहरीला किया।
ऐ मानव , अब मुझ वसुन्धरा को स्वयं ही करना होगा स्वयं का उद्धार..
***
महाभारत में 
युधिष्ठिर से यक्ष-प्रश्न-
"संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है?"
"मृत्यु"
"रोज़ दूसरों को मरता हुआ देखकर भी  
ख़ुद की अमरता के सपने देखता है मानव।"
युधिष्ठिर ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया। 
***
अनुमति चाहती हूँ 🙏 आपका दिन मंगलमय हो ।
"मीना भारद्वाज"

रविवार, फ़रवरी 09, 2020

'हिन्दी भाषा और अशुद्धिकरण की समस्या" ( चर्चा अंक-3606 )

स्नेहाभिवादन 🙏🙏
बसन्तोत्सव.. ऋतुराज का स्वागत ..शीत ऋतु को अलविदा ..।
 मधुमास में प्रकृति के साथ प्राणी 
जगत भी खिल उठता है ।  खेत-खलिहानों में अन्न 
का भंडारण किसानों की आँखों में सतरंगी आभा भर देता है । होली के रंग व गुलाल के संग सुखद आगत के स्वप्न के साथ मानव मन मयूर सा नृत्य करता है । इन्हीं दिनों में शिक्षार्थियों के इम्तिहान उनके पूरे वर्ष का लेखा-जोखा लेने उनकी शाला के द्वार पर आ खड़े होते हैं । 
हम सभी इस दौर से गुजरे हैं ...देश की विभिन्न प्रान्तों के शिक्षा विभागों द्वारा इन्हीं दिनों अधिकांश विद्यालयों में वार्षिक परीक्षा  का आयोजन होता है जिसके लिए असंख्य नौनिहाल सुखद भविष्य के लिए ज्ञान- साधना करते हुए अपने आप को परीक्षा की कसौटी के लिए तैयार करते हैं । राष्ट्र के भावी कर्णधारों के उज्जवल भविष्य की शुभेच्छाओं के साथ  पेश है आज की प्रस्तुति-

जीवन में अँधियारा, लेकिन सपनों में उजियाला है।
आभासी दुनिया में होता, मन कितना मतवाला है।।
--
चहक-महक होती बसन्त सी, नहीं दिखाई देती है,
आहट नहीं मगर फिर भी, पदचाप सुनाई देती है,

सोलह बसंत बीते,
 बाँधे चंचलता का साथ,   
आज सुनी ख़ुशियों की, 
प्रफुल्लित पदचाप,  
घर-आँगन में बिखरी यादें,  
महकाती बसंत बयार, 
 छौना मेरा यौवन की, 
दहलीज़ छूने को तैयार ।

हाल बेहाल था ,
बेबसी का क़दम - ताल था ,
तर हुआ आँसुओं - डूब रुमाल था ,

आप उद्घोष करते रहे ,
किन्तु वे 
पंख आकर कतरते रहे !

ललाट भी विशाल है,गले भुजंग नाग है।
तरंग शीश गंग की,त्रिनेत्र लाल आग है।।

किरीट चंद्र शोभता,शुभा सती समीप है।
गणेश भी बसे वहाँ,जले जहाँ प्रदीप है।।

देखकर उसकी  जिजीविषा
मन आतुर हो उठा भरने को उसे आगोश में
पर हर बार दब जाता था रुदन उसका
लहरों के संग तीव्र शोर में

"आज़ादी के सत्तर बरस गुज़र गये परन्तु यह गाँव आज भी किसी उजाले की प्रतीक्षा में है।" 
"ना जाने वो रात कब आयेगी, जब हर मड़ई और मिट्टी के कच्चे घरों में आशा का वह टिमटिमाटा पीला लाटू  नाचेगा!" 

हसीन ख्वाबों के बिस्तर से उठा गया कोई 
हवा के नर्म झोंकों सा दीवाना बना गया कोई!

 लबों पर मुस्कराहट सलीके से सजा गया कोई 
 सुनहरी  किरणों से अंचल मेरा भर गया कोई!

एक मैं हूँ,
जो कभी गाता हूँ,
तो दरवाज़े-खिड़कियाँ 
बंद कर लेता हूँ,
एक वह चिड़िया है,
जो कहीं से 
उड़ती हुई आती है,
मेरी खिड़की के पास 
मुक्त कंठ से गाती है.

" साहित्य जनता की चित्तवृत्तियों का द्योतक होता है"यह कथन आ.रामचंद्र शुक्ल का है। साहित्य में हित का भाव भी निहित है"हितेन सह सहितम् तस्य भाव साहित्यम्"अर्थात जिसमें हित का भाव निहित हो ,वह साहित्य है ,तो जो भी लिख रहा है,उसके लेखन का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य है।इस उद्देश्य की पूर्ति में भाषा का अहित कदापि नहीं होना चाहिए।भाषा मनुष्य के परस्पर भाव-विनिमय का साधन है।इसका अपना इतिहास है।

व्यक्त‍ि साधारण हो या संत, उसमें ये एक आम सी प्रवृत्त‍ि होती है क‍ि जो वह स्वयं है, वैसा द‍िखना नहीं चाहता और जो वह नहीं है उसी का प्रचार व प्रसार करने में पूरे का पूरा जीवन खपा देता है। और इसी व‍िरोधाभास में वह अपना जीवन तो जी ही नहीं पाता, कुछ अनुच‍ित करने से भी बाज नहीं आता।
कबीर दास ने इसी प्रवृत्ति पर कहा था-
नद‍िया व‍िच मीन प्यासी रे, मोह‍ि सुन सुन आवत हांसी रे।

पता नहीं कैसे यह बात चली और एक बहस शुरू हो गयी, पारले बिस्कुट के रैपर पर छपी बच्ची की पहचान को ले कर ! अधिकतर गूगल ज्ञानियों का दावा था कि यह फोटो सुधा कृष्णमूर्ति जी के पिताजी द्वारा खींची गयी, बचपन की फोटो है, जब वह चार साल की थीं !  कई इसे नीरू देशपांडे की तथा कुछ गुंजन गंडानिया की बता रहे थे। अक्सर कई चीजों को ले कर क्षण भर के लिए ऐसी जिज्ञासाएं उठती रहती हैं और कुछ देर बाद ही वह भूला भी दी जाती हैं ! पर इस बार सोचा कि गहरे पानी पैठ ही लिया जाए।

★★★★★
 आपका दिन मंगलमय हो…
फिर मिलेंगे🙏
मीना भारद्वाज