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रविवार, सितंबर 26, 2010

रविवासरीय चर्चा (२६.०९.२०१०)

नमस्कार मित्रों!
मैं मनोज कुमार एक बर पुनः प्रस्तुत हूं रविवार २६.०९.२०१० की चर्चा के साथ। 

आज कल लोग बात-बात में अपना बल दिखाने लगते हैं। पर जहॉं बुद्धि प्रयोग करने की आवश्‍यकता है, वहॉं बल प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं होता। एक और महत्वपूर्ण बात यह कि बुद्धि के प्रयोग पर आप उचित पुरस्कार से नवाज़े जाते हैं।

पुरस्कार की बात पर ध्यान दिलाते हैं कुमार राधारमण कि शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है। उर्दू के नामचीन शायर और जाने-माने गीतकार अखलाक मुहम्मद खान शहरयार को 44वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। उन्हें यह पुरस्कार वर्ष 2008 के लिए दिया जाएगा। बॉलीवुड की कई हिट हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखने वाले शहरयार को सबसे ज्यादा लोकप्रियता 1981 में आई उमराव जान से मिली। इस वक्त की उर्दू शायरी को गढ़ने में अहम भूमिका निभाने वाले शहरयार को उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार और फिराक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया।


DSC03338 जब हम अपने बुद्धि का सदुपयोग करते हैं तो चंदन सी ख़ुश्बू से हमारे चारो तरफ़ का वातावरण महकने लगता है। अगर हम लोगों की अच्छाई देखें तो सब अच्छा नज़र आने लगेगा। इसलिए अगर आपको देखना ही है तो हर एक की विशेषताएं देखिए। अगर आपको कुछ छोड़ना ही है तो अपनी कमज़ोरियॉं छोडिए। अब देखिए ना राणा प्रताप सिंह कितने अच्छे ख़्याल लेकर आए हैं। कहते हैं,

जब हवाएं उस गली से, इस गली चलने लगी
संदली खुशबू फिजाओं में यूँ ही बहने लगी


राणा जी का कहना है, “बस इतना ही.....अपनी धुन में रहता हूँ/मै भी तेरे जैसा हूँ|” कितना उम्दा ख़्यालात 
पिरोया है उन्होंने इस ग़ज़ल में, बानगी देखिए


जो चली अंडे संजोती चींटियों की इक लड़ी
कोई बूढी अपने टूटे बाम को तकने लगी


या फिर


मेरे दिल से लाख बेहतर, उनके कुरते की सिलन
जब भी टूटी वो हमेशा बैठकर सिलने लगी

मैं तो इस ग़ज़ल को कई बार पढ चुका हूं। आप भी बार-बार पढे बिना न रह पाएंगे मेरा दावा है। मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को हवाओं के चलने के बिम्ब पर प्रवाहित यह ग़ज़ल मन को बहुत झकझोड़ती है।

Picture 280 एक बात, यह तो शाश्‍वत सत्य है कि आप जितना अधिक दूसरों की भलाई करते हैं, उतनी ही स्‍वयं अपनी भलाई करते हैं। इस तरह की सोच से सकारात्मक ऊर्जा की सृष्टि होती है। और तब अनुपमा पाठक के शब्दों में कहें तो “दे जिंदगी, अगर ऐसी कोई सौगात हो !” एक उम्दा ख़्याल को पूरी ऊर्जा के साथ गुंथ कर लाई हैं और कहती हैं,

जिजीविषा से परिपूर्ण
दिवारात हो !
आशा की किरणों से
सजा रहे अम्बर
जीवन में नवप्रभात हो !


इस कविता में जीवन जीने के नज़रिए को पूरी आशा के साथ जोड़ा गया है। जब आप स्‍वयं से प्रेम करना सीख लेंगे तो दूसरे आपसे नफरत करना छोड़ देंगे। मुझे तो यही संदेश मिला। आप पढें और बताएं कि आपने क्या देखा इसे पढने के बाद।


ASHOK BAJAJ हमारी संस्कृति समाज व सृष्टि का ही नही अपितु मानव के मन , बुध्दि , आत्मा और शरीर का समुच्चय है। इसे “ एकात्म मानववाद ” कहने वाली मनीषी पं. दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन २५ सितंबर को उन्हें याद करते हुए अशोक बजाज भारतीय संस्कृति और एकात्म मानव दर्शन आलेख प्रस्तुत करते हैं।
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने 1964 में कहा था कि हमें ” स्व ” का विचार करना आवश्यक है। बिना उसके स्वराज्य का कोई अर्थ नहीं। केवल स्वतन्त्रता ही हमारे विकास और सुख का साधन नहीं बन सकती । जब तक कि हमें अपनी असलियत का पता नहीं होगा तब तक हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता और न उनका विकास ही संभव है। परतंत्रता में समाज का ” स्व ” दब जाता है।

और जब मैं ‘स्व’ का विचार करता हूं तो पाता हूं कि स्‍वराज्य का अर्थ है अपने पर राज्‍य, अपने मन के विकारों पर अंकुश , इन्‍द्रियों पर संयम, दुर्गुणों से दूर रहते हुए शरीर व मन को सुव्‍यवस्थित रखना। ऐसा होने पर सच्‍चे स्‍वराज्‍य की स्‍थापना निश्चित है।


मेरा फोटोकभी-कभी मेरे मन में एक प्रश्‍न आता है कि “जिस देश में हर व्‍यक्ति स्‍वयं को अपने पड़ोसी से श्रेष्‍ठ समझता हो, तो क्‍या ऐसे देश में एकता हो सकती है?” आज जब सुबह-सुबह ओशो रजनीश के विचार “क्यों बाँट रहे है ये छोटे शब्द हमारे समाज को ...” पढा तो मन को थोड़ा सुकून मिला। कहते हैं हमने न जाने कितने शब्द खड़े किये हुए है जो दीवार की तरह एक-दुसरे मनुष्य को अलग कर रहे है। और मनुष्य को अलग ही नहीं कर रहे है, हमारी आँखों को भी अँधा कर रहे है, हमारे प्राणों को भी बहरा कर रहे है, हमारी संवेदनशीलता को तोड़ रहे है। इन शब्दों की दीवारों में जो घिरा है वह आदमी कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता।
शब्दों से मुक्त होना चाहिए। ये एक तो शब्द है, दीवार की तरह मनुष्य-मनुष्य को तोड़ रहे है और साथ ही ये शब्द जीवन के प्रति भी हमारी आखों को नहीं खुलने देते। हम शायद सब तरफ शब्दों को खड़ा कर लेते है। अपने चारो तरफ एक किला बना लेते है शब्दों का, और उसके भीतर छिप जाते है।


आपके विचार अभिप्रेरित करने वाले हैं। मैं तो बस ईश्‍वर से यही चाहता हूं कि “हम मधुमक्‍खी की तरह गुणों रूपी मिठास एकत्र करते रहें।” और अगर शे’र में कहें तो “बस मौला ज्‍यादा नहीं, कर इतनी औकात, सर उँचा कर कह सकूं, मैं मानुष की जात!”


महेन्द्र मिश्रहम देश और समाज की भलाई में अपना जीवन समर्पित करें। क्योंकि “आप जितना प्रेम देंगे, उतना प्रेम पायेंगे। आपके पास प्रेम जितना अधिक होगा, इसे दान करना उतना ही सहज हो जाएगा।” आदरणीय महेन्द्र मिश्र बता रहे हैं “परहित सरिस धर्म नहिं भाई ...”। कहते हैं मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है मनुष्यता का होना है . व्यक्ति की धन्यता और पवित्रता सर्व जन हिताय कार्यों में संलग्न होने में ही होती है . दूसरों की भलाई करना ही सबसे बड़ा धर्म है .
एक प्रेरक कथा के ज़रिए बताते हैं कि परोपकार करने से मनुष्य को चमत्कारी पुण्य लाभ अर्जित होते हैं . ईश्वर ने केवल मनुष्य को ही ऐसी बुद्धि प्रदान की है की वह अपना और दूसरों का दुःख संपादन कर सकता है अतएव मानव शरीर प्राप्त कर सबका हित साधन और हित चिंतन करना ही सबसे बड़ा धर्म है .

हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता।  हम ये भाव मन में लाएं कि “ये न सोचें मिला क्या है हमको, हम ये सोचें किया क्या है अर्पण, बांटें ख़ुशियां सभी को हम तो, सबका जीवन ही बन जाएं मधुवन!” आदरणीय मिश्र जी यह रचना हमें नवचेतना प्रदान करती है और नकारात्मक सोच से दूर सकारात्मक सोच के क़रीब ले जाती है।


My Photoएक बात तो तय है कि किसी भी वस्‍तु की सुन्‍दरता आपकी मूल्‍यांकन करने की योग्‍यता में छिपी हुई है। कुछ लोग हमारी छोटी भूल को भी हमारी चारित्रिक विशेषता मानकर हमारा अवमूल्यन कर देते हैं।  संगीता स्वरुप ( गीत ) कहती हैं

खिंच गयी है 
भीतर तक 
कोई लकीर 
जिसे पारखी नज़रें 
छोड़ देती हैं 
बिना ही कोई 
मोल लगाये ....


संगीता जी आपने अपनी कविताओं में अपने समय को लेकर हमेशा जरूरी सवाल खड़े किए हैं। लोगों द्वारा दिए गए ठेस से आक्रांत मनस्थितियों का आपने प्रभावी चित्रण किया है। आपने यहां अन्‍योक्ति से एक गहरा संकेत किया है।


जीवन को आबाद करना है तो मैं कौन हूँ इस पहेली को हल कीजिये। मैं और मेरे-पन के भान से मुक्‍त हो जाइये। पर यहां तो मैं ही छाया रहता है, मैं शेर हूं तू गीदर है। काम के आधार पर समाज कभी चार वर्ण में बंटा था आज बेकाम के कई वर्गों में। प्रवीण पांडेय जी ऐसे लोगों से जो समाज को बांटते हैं पूछ रहे हैं, आपकी “"जाति क्या है?" मनवता, इंसानियत से बढकर कोई जाति नहीं है, पर इसे कोई अपनाना चहे तब ना! कहते हैं मेरा अनुभव भले ही कमलपत्रवत न रहा हो पर मुझे भी सदैव ही जाति के प्रसंग पर चुप रहना श्रेयस्कर लगा है। पता नहीं आज क्यों लिखने की ऊर्जा जुटा पा रहा हूँ?
जो भी पैराणिक कारण हो पर हर समूह की अपनी स्वस्थ परम्परायें होती हैं और अपने हिस्से की दुर्बलतायें। विकासशील समूह अपनी दुर्बलताओं की निर्मम बलि देकर आगे बढ़ते जाते हैं और मानसिक, बौद्धिक व आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते जाते हैं। जो उन्मत्त रहते हैं अपने इतिहास के महानाद से, उन्हे भविष्य की पदचाप नहीं सुनाई पड़ती है और समय के चक्र में उनके क्षरित शब्द ही गूँजते रहते हैं। हमें यदि आपस में लड़ने का बहाना चाहिये तो दसियों कारण उपस्थित हैं।

मानव तभी तक श्रेष्ठ है, जब तक उसे मनुष्यत्व का दर्जा प्राप्त है। परमात्‍मा से प्रेम करना समस्‍त मानव जाति से प्रेम करना है। क्‍या मेरे विचारों का स्‍तर ऐसा है कि मैं परमात्‍मा का बच्‍चा कहलाने का अधिकारी हूँ?





My Photoऊपर हमने शहरयार के ज्ञानपीठ मिलने की बात की। अब उनकी एक रचना पढी जाए। यह मेरी आज की पसंद की कैटेगरी में है। Jakhira पर Devendra Gehlod सीने में जलन – शहरयार
सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यू है 
इस शहर में हर शख्श परेशां सा क्यू है 
दिल है तो धडकने का बहाना कोई ढूंढे 
पत्थर की तरह बेहिस-बेजान सा क्यू है 
तन्हाई की ये कौन सी मंजिल है रफ़िक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यू है 
हम ने तो कोई बात निकली नहीं ग़म की 
वो जूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यू है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में 
आईना हमें देख के हैरान सा क्यू है 
                                        - शहरयार




दोस्तों चर्चा के इस पड़ाव पर आकर मैं पहुंचा सम्वेदना के स्वर पर। यहां पर के पोस्ट को देख सदमें की स्थिति में पहुंच गया। पराग पढकर हम बड़े हुए। जो भी थोड़ी बहुत अच्छी सोच, और साहित्य लिखने की प्रवृत्ति मन में जमीं वहीं से आया। और उसके आगुआ थे नंदन जी।
आज इस दुखद समाचार से मन व्यथित है।
नंदन जी को कोटि-कोटि नमन।

डॉ. कन्हैया लाल नंदन – एक श्रद्धांजलि


(जन्मः 01 जुलाई 1933 निधनः 25.09.2010)
ज़िंदगी चाहिए मुझको मानी भरी
चाहे कितनी भी हो मुख़्तसर चाहिए.



वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जो रिश्ता उन्होंने हमारे बचपन से जोड़ा था वो शायद एक पत्थर पर बनी लकीर है, जिसे हमारे दिल से मिटाना सम्भव नहीं.

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे!!
एक कविताः
ज़िन्दगी की ये ज़िद है
ख़्वाब बन के
उतरेगी।
नींद अपनी ज़िद पर है
- इस जनम में न आएगी
दो ज़िदों के साहिल पर
मेरा आशियाना है
वो भी ज़िद पे आमादा
-ज़िन्दगी को
कैसे भी
अपने घर
बुलाना है।
-कन्हैया लाल नंदन


आज अब और चर्चा नहीं कर पाऊंगा।

रविवार, अगस्त 22, 2010

रविवासरीय (२२.०८.१०) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर चर्चा मंच पर उपस्थित हूं। आज सुबह सुबह खिड़की से आ रही बरसते पानी की फ़ुहारों से निन्द खुली।

शनिवार है। बड़े फ़ुरसत में हूं। फ़ुरसत में एक स्तंभ लिखता हूं एक ब्लोग पर। कभी-कभार उसकी चर्चा कर दिया करता था, इस मंच पर। पर एक मित्र ने एक प्रश्‍न रख दिया सामने कि अपनी चर्चा में अपने पोस्ट का उल्लेख उचित है? अब उचित अनुचित का मैं नहीं जानता, पर उस दिन से इस पर विराम लगा दिया है। दुर्भाग्य मेरा कि मैं शनिवार को लिखता हूं। और उस दिन के पोस्ट की चर्चा मैं ही करता हूं। तो अपने पोस्ट को न लेने की ठान ली है, और दूसरे दिन कोई अन्य चर्चाकार ले नहीं पाते।

खैर ये हुई मेरे फ़ुरसत की फ़ुरसत से बातें। एक हैं अपने फ़ुरसतिया जी। उन्होंने पूरे किए हैं छह साल, ब्लॉग जगत की यात्रा के। कहते हैं “…..और मजाक-मजाक में छह साल निकल लिये!” इतनी लंबी यात्रा के संस्मरण सुनाते हुए बताते हैं,

“मेरे ब्लॉगजगत के छह साल के अनुभव बहुत मजेदार रहे। फ़ंटास्टिक! सच तो यह है कि दुनिया अद्भुत है। हर तरह का मसाला यहां रेडीमेड उपलब्ध है। अब गुणवत्ता फ़ुणवत्ता को मारिये गोली। अनुभव और लेखन का ताजापन देखिये। जो और कहीं नहीं मिलेगा वो हमीअस्तो,हमीअस्तो,हमीअस्तो।”

शैली तो सदाबहार है ही अनुभव मे बहार, पतझर, गर्मी, बारिस, धूप, नमीं, सब का मज़ेदार मिश्रण है। कहते हैं,

“किसी ने हड़काया संभल जाओ अनूप, किसी ने कहा आप मुझसे जलते हैं, किसी ने कहा मुकदमा कर देंगे। अभी हाल ही में किसी ने बताया कि मैं अपनी घटती लोकप्रियता से परेशान होकर ऊलजलूल पोस्टें लिख रहा हूं।ये छह साल मेरे बड़े मजे में बीते इतनी उदार पाठक मिले कि मुझे अपने बारे में गलतफ़हमी भी हुई कभी-कभी कि हम कोई फ़न्ने खां लेखक हैं। साथ ही ऐसे पाठक भी मिले जो पोस्ट-दर-पोस्ट बताते भी रहे कि ये ये चिरकुटई छोड़ दो।”

और जाते-जाते, उनकी ही शैली में अगर कहूं तो, एक अपनी पसंद की कविता ठेल गए हैं, जिसमें कहते हैं,

कभी सीरियस ही न दिखते,
हर दम हाहा ठीठी करते।
पांच साल से पिले पड़े हैं
ब्लाग बना लफ़्फ़ाजी करते॥

हम तो यही चाहेंगे फ़ुरसतिया जी कि आप कभी सीरियस न दिखें। आपका सीरियस चेहरा नहीं सुहाता है।

हमारे एक मित्र हैं, (आपके भी हैं) जो दुनिया की भीड़ के बीच अपना वजूद तलाशते हैं और तराशते हैं, एक आम आदमी हैं, जिनकी इंसान बनने की कोशिश जारी है .. !  आज कह रहे हैं

हर वक्त ! इश्कियाने को जी चाहता है......अजय कुमार झा

अब ये मौसम का असर है या और कुछ ये तो वही जाने। उनकी ही ज़ुबानी सुन लीजिए,

मुझे फ़िक्र है दस्तूरों ,

और, बंदिशों की, मगर ,

करूं क्या कि जी ,

बस यही ,और यही चाहता है ........

इस कमबख्त दिल की,

फ़ितरत ही कुछ ऐसी है,

जो मिलना हो मुश्किल

अक्सर , ये वही चाहता है ........

क्या – क्या … क्या कहा झा जी आपने … जाते जाते … अरे! पूरा तो बताइए ना प्लीज़ ….!

हा हा हा ...........ये दिल बेइमान ....ये दिल बेलगाम...........ये दिल .......छोडो यार .........हा हा हा ..”

 

 

अब झा जी की वो ही जाने। अगर ये मौसम का असर है तो ये मौसम है ही खतरनाक! कभी तेज़ धूप, कभी झम-झम पानी। कभी गर्मी, तो कभी ठंडक। अब ऐसे में तबियत अगर खराब हो जाए तो … बच के रहिएगा। हां हमारी सहायता के लिए TSALIIM वाले ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ जी पूरी एनसाइक्लोपीडिया ले आए हैं।

स्वास्थ्य का एक ऐसा इंसाइक्लोपीडिया, जो हर किसी की ज़रूरत है।

My Photo565 पृष्ठों की यह वृहद पुस्तक अपने आप में रोग, रोगी और स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारियों का प्रामाणिक भण्डार है। पुस्तक में कुल 27 अध्याय हैं, जिनमें मानव स्वास्थ्य के विभिन्न मुद्दों को बड़े सहज ढ़ंग से समझाया गया है। मूल्य मात्र 290 रू0 है। यह पुस्तक हिन्दी के अतिरिक्त सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में में उपलब्ध है।

ज़ाकिर भाई बहुत ही काम की जानकारी उपलब्ध करवाई है आपने।

मेरा फोटोज़ाकिर भाई का प्रयास वंदनीय है। पर वंदना जी की प्रस्तुति पढकर मन विचलित हो गया। उनकी कविता एक सफ़र ऐसा भी……………………… नारी पराधीनता अथवा उससे संबंधित कड़वे सच को बयान करती है।

भार्या से
प्रेयसी बनने की
संपूर्ण चेष्टाओं
को धूल- धूसरित
करती तुम्हारी
हर चेष्टा जैसे
आंदोलित कर देती
मन को

यह कविता उस पूरी जाति के हालात पर चिंता करने को प्रेरित करती है। एक नारी द्वारा रचित नारी विषयक इस कविता में सीधे साधे सच्‍चे शब्‍दों में स्‍वानुभूति को बेहद ईमानदारी से अभिव्‍यक्‍त किया गया है। इसमें सदियों से मौजूद स्‍त्री विषयक प्रश्‍न ईमानदारी से उठाया गया हैं। अपनी शिकायत दर्ज कराई गई है। स्‍त्री नियति की परतों को उद्घाटित किया गया है।

प्रेयसी को भार्या
बनाया जा सकता है
मगर
भार्या कभी प्रेयसी
नहीं बनाई जाती
उस पर तो
अधिकारों का बोझ
लादा जाता है

यह कविता स्त्रियों के जीवन संघर्ष से हमारा सीधा और सच्‍चा साक्षात्‍कार करवाती है जो इस उम्‍मीद से अपने जीवन को संवारने की कोशिश करती रहती है कि एक दिन उनकी दुनिया संवर जाएगी।

इतना ना
समझ पाता है
प्रेयसी बनने की आग में
जलती भार्या का सफ़र
सिर्फ भार्या पर ही सिमट
जाता है
सिर्फ भार्या पर ही.................

My Photoसमय कोई भी हो, कविता उसमें मौज़ूद जीवन स्थितियों से संभव होती है। वही जीवन- स्थितियां, जिनसे हम रोज़ गुज़रते हैं। एम. वर्मा जी की रचना इसी के चलते हमें अपनी जैसी लगती है। इसमें निहित यथार्थ जैसे हमारे आसपास के जीवन को दोबारा रचता है। ठूस ठूस कर भरी जा रही है रोशनी ~ ~ एक ऐसी ही रचना है जो महानगर के उस यथार्थ को चित्रित करती है जो आने वाले आयोजन को लेकर व्यस्त है।

विदेशी अट्टहास

आयातित करने के लिये

अलिखित समझौते

कर लिये गये है

मुस्कराहट के मुखौटे

बाजार में उतार दिये गये हैं

लोगों को तालीम दी गयी है

दुहराने के लिये

‘अतिथि देवो भव ...

बहुत सही कटाक्ष किया है आपने। लेकिन कौन सुनता है यहाँ। ये तो पत्त्थरों का शहर है!

मेरा फोटोसरोकार पर अरुण सी राय ने सड़क बानाई है। अरुण जी का कहना है अपने देश, समाज, अपने लोगों से सरोकार को बनाये रखने के लिए कविता को माध्यम बनाया है। आपने जीवन और प्रेम को इस कविता में ए़क साथ देखा है और कविता सड़क के माध्यम से सड़क की यात्रा को जीवन में प्रेम की यात्रा के रूप में लेते हुए कहते हैं,

सड़क
बनायी है
मैंने भी ए़क
अपने ह्रदय से
तुम्हारे ह्रदय तक
कई पगडंडियों को साथ ले
चलती है यह सड़क
जिसके दोनों ओर
हैं वृक्ष
भाव के,
संवेदनाओं के
खेत हैं

आपने जीवन को बेहद खूबसूरती से परिभाषित किया है सडक के माध्यम से और साथ ही संवेदनाओ और भावों का समन्वय भी खूब किया है। सरलता और सहजता का अद्भुत सम्मिश्रण बरबस मन को आकृष्ट करता है। चूंकि कविता अनुभव पर आधारित है, इसलिए इसमें अद्भुत ताजगी है।

आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे!!

रविवार, अगस्त 15, 2010

रविवासरीय (१५.०८.२०१०) चर्चा

 

नमस्कार मित्रों!
मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं चर्चा मंच के साथ। आज स्वतंत्रता दिवस है। इस अवस्र पर मैं आपको और आपके परिवार को आर्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूं। अब शुरु करते हैं आज की चर्चा। जैसा कि विदित है ढेर सारी रचनाएं अज़ादी के पर्व  को समर्पित हैं।

My Photoअनामिका जी कह रहीं हैं वीरता को अपरिहार्य करो

खुद ही भैरवी
बन जाओ तुम,
भैरवी संगीत से
रणभूमि में
बिगुल बजाओ तुम !
यह वीर रस की एक ओज से भरी हुई रचना है। सच ही कहा है कि वे ही विजयी हो सकते हैं जिनमें विश्वास है कि वे विजयी होंगे।

संगीता स्वरूप जी ने क्षणिकाओं से आज़ादी के अवसर पर अपना पैग़ाम दिया है। इस जश्ने-ए-आज़ादी पर आज़ादी…… अनेक दृश्य .. के द्वारा जहां वो जहां एक ओर विसंगतियों पर प्रहार करती हैं वहीं दूसरी ओरसंदेश भी देती हैं।

My Photoआम आदमी को
आज़ादी है
कुछ भी बोलने की
कहीं भी , कभी भी
क्यों कि वह
संतप्त है , पीड़ित है
आक्रोशित मन से
बोलना चाहता है 
बहुत कुछ 
पर उसकी 
सुनता कौन है 
इसी लिए 
उसकी जुबां 
मौन है ..

इन क्षणिकाओं में व्‍यवस्‍था की विसंगतियों से आहत कवयित्री ने विषम स्थितियों का प्रभावी चित्रण किया है ।

My PhotoHindi Blog Tips पर आशीष खण्डेलवाल जी बता रहे हैं ब्लॉगर पर कमेंट्स से जुड़ीं दो नई सुविधाएं ! ये बड़े काम की जानकारी है। जिस तरह से आप अपने जीमेल अकाउंट में किसी मेल को स्पैम या नॉट स्पैम के रूप में चिन्हित करते हैं, वही तकनीक अब ब्लॉगर में भी काम करेगी। इसके लिए अब ब्लॉगर के डैशबोर्ड पर आपको “Comments” टैब दिखेगा। इस टैब के तहत आपको तीन तरह की सुविधाएं नजर आएंगी।

बड़े काम की जानकारी देते हुए आशीष जी कहते हैं अब आप ब्लॉगर के डैशबोर्ड पर अपने सभी कमेंट्स एक ही जगह पर पा सकते हैं। Comments में Published नामक सब-टैब दिया गया है, जो बिल्कुल किसी ई-मेल इनबॉक्स की तरह दिखता है। इस सुविधा के जरिए आप पुरानी पोस्ट पर आए नए कमेंट्स को आसानी से ढूंढ़ सकते हैं। यहां भी आप किसी कमेंट को स्पैम के रूप में चिन्हित कर उसे तुरंत अपने ब्लॉग से हटा सकते हैं। आप किसी कमेंट को डिलीट भी कर सकते हैं और चाहें तो किसी कमेंट की सामग्री को निकाल कर (Remove Content) उसे अपने रिकॉर्ड में बरकरार रख सकते हैं।

My Photoस्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर सम्वेदना के स्वर सुनिए, कहते हैं स्वतंत्रता दिवस की डिस्काउंट सेल? बताते हैं
लगता तो यही है कि अब स्वतंत्रता दिवस की पहचान बिग बाज़ार की डिस्काउंट सेल से ही होगी? सच भी है! कॉमनवेल्थ खेलों का भ्रष्टाचार हो, अवैध खनन में लुटती देश की सम्पदा हो, नरेगा-मरेगा के घोटाले हों या विदेशी कम्पनियों का बेहतर रिटर्न के लालच में देश में हो रहा निवेश हो. कुल मिलाकर देश की डिस्काउंट सेल ही तो लगी है...हर रोज़, हर ओर...”

बिग बाजार तो आर्थिक उत्सव मना रहा है। हम ही नहीं निर्धारित कर पा रहे हैं कि पहले स्वतन्त्रता सम्हालें कि घर का खर्च।

छत्तीसगढ़ पर 'उदय' जी कह रहे हैं ए वतन मेरे वतन, क्या करूं मैं अब जतन ! देश के हालात पर चिंता जताते हुए कहते हैं

My Photoए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन
सर जमीं से आसमां तक
तुझको है मेरा नमन
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन
भूख से, मंहगाई से
जीना हुआ दुश्वार है
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन
क्या वतन का हाल है
भ्रष्ट हैं, भ्रष्टाचार है
ए वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन


अपने मन की सच्ची बातें कह रहा है और पाठक को इस तरह उन भावों के साथ तादातम्य अनुभव करने में बड़ी सुगमता हो रही है।

My Photoनुक्कड़ पर और ज्ञान दर्पण पर Ratan Singh Shekhawat बता रहें कि फैशन में पगड़ी खूब आगे होते-होते यहां तक पहुंच गया है कि देखिए ग्लोबल होता राजस्थानी साफा। कहते हैं पगड़ी का इस्तेमाल हमारे देश में सदियों से होता आया है | प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ पगड़ी को व्यक्तित्व,आन,बान,शान और हैसियत का प्रतीक माना जाता रहा है | पगड़ी हमारे देश में चाहे हिन्दू शासक रहें हों या मुस्लिम शासक सभी की प्रिय रही है | आज भी पगड़ी को इज्जत का परिचायक समझा जाता है | पगड़ी को किसी के आगे रख देना सर झुकाना व उसकी अधीनता समझना माना जाता है | महाराणा प्रताप ने वर्षों में जंगल में रहना पसंद किया पर अकबर के आगे अपनी पगड़ी न झुका कर मेवाड़ी पाग (पगड़ी )की हमेशा लाज रखी |

राजस्थान के रंग बिरंगे साफे हर किसी का मन मोह लेते है | आज गाँवों में भी बांधने वाले गिने चुने लोग बचे है | नयी पीढ़ी बाँधना चाहती है लेकिन यह कला सिखाने वाले भी बहुत कम है |

बना रहे बनारस पर शैलेन्द्र नेगी सुना रहे हैं बागी फौजियों का कौमी गीत। सुनिए …

हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा।
पाक  वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा।

ऊपर बर्फीला पर्वत, पहरेदार हमारा।
नीचे  साहिल पर बजता,  सागर का नक्कारा।

इसकी खानें उगल रहीं सोना, हीरा, पारा।
इसकी शानो शौकत का दुनिया में जयकारा।

आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा।
तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा।

ज़ख्म…जो फूलों ने दिये से वन्दना जी का आह्वान है वन्दे मातरम कहते जाओ। सुनाती हैं

मेरा फोटोवन्दे मातरम कहते जाओ
आस्तीनों में साँप पाले जाओ
कल की फिक्र तुम ना करना
बस आज जेबें भरते जाओ
सत्ता के गलियारों में बस
अपनी रोटियां सेंके जाओ
भ्रष्टाचार की जमीन पर तुम
अपनी गोटियाँ बिछाये जाओ 
तिरंगे का अपमान  करके 
वन्दे मातरम कहते जाओ

कड़वा सच बयान कर दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया आपने!

मेरा फोटोशुरुआत हिंदी लेखन से करने वाले अंकुर द्विवेदी कहते हैं नाग पंचमी औऱ सांपो की आफत!! इस दिन सपेरे जंगलों से एक से बढकर एक प्रजाति के साँपों को पकङकर लाते है और भक्तों की भक्ति की आङ में इनका प्रयोग अपने पेट-पालन के लिए करते हैं। ये दिन संपेरों के लिए विशेष कमाई का दिन होता है। संपेरों को इस बात की बिल्कुल भी फिक्र नहीं होती है कि वो जिस जानवर का प्रयोग करके अपना पेट-पालन के लिए कर रहे है, वास्तव में उस जानवर को भी पेट की भूख मिटाने के लिए कुछ मिला है या नहीं।

थोड़े से स्‍वार्थ के लिए जानवरों पर अत्‍याचार किया जाता है और उनके परिणामों के बारे में कोई नहीं सोचता।

सरोकार है arun c roy की पोस्ट में सुख की कल्पना से।

मेरा फोटोस्वप्न सारे
हो गए है गंदले
भविष्य लग गया है
दाव पर
मंत्र जो शक्ति थी
अभिशाप बन
उच्चारित हो रही है
प्रतीत हो रहा है
विष सा यह विश्व
अपना ही विश्वास
मार रहा है डंक


हे मनु !
कैसा है यह सुख ।
श्रद्धा !
क्या मनु है तुम्हारा
अब भी !


अपने मन के विकारों पर अंकुश , इन्‍द्रियों पर संयम, दुर्गुणों से दूर रहते हुए शरीर व मन को सुव्‍यवस्थित रखना। ऐसा होने पर सच्‍चे सुख की स्‍थापना निश्चित है।

काव्य तरंग पर रानीविशाल की प्रस्तुति है चलो ऐसा हिन्दुस्तान बनाए........... और एक वीडियो

My Photoये वक्त नया है
नया साज़ ले
सब मिलकर
नई एक तान बनाए
नफ़रत का हो अब
नाश सदा को
स्वर अमन के
हरसू छा जाएं
नए जोश से
बढकर आगे
हम अपनी मंज़िल को पाएँ

यह रचना हमें नवचेतना प्रदान करती है और नकारात्मक सोच से दूर सकारात्मक सोच के क़रीब ले जाती है।

राजभाषा हिंदी पर संगीता स्वरुप ( गीत ) जी पूछ रहीं हैं आज़ादी के इतने सालों में , क्या खोया क्या पाया हमने

आज़ादी के इतने सालों में

क्या खोया क्या पाया हमने

करें ज़रा हम लेखा जोखा

देश संभाला क्या सच हमने ?

आज़ादी के दीवाने तो

देश की कश्ती थमा गए

अपने स्वर में वो हमको

यह गाना भी सिखा गए थे .

आज़ादी के इन सालों में

बीच भंवर में फंसी हुई

इस कश्ती से हम ये सोचें

तट को क्या पाया हमने

समय के संदर्भ में, और देश की मौज़ादा हलात पर कफ़ी गहरा व्यंग्य है।

महेन्द्र मिश्रसमयचक्र पर महेन्द्र मिश्र जी बता रहे हैं आजादी के साठ वर्षो के बाद भी आमजन मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं ...
आज हमारा देश करोड़ों अरबों रुपयें खर्च कर चाँद पर पहुँचने की तैयारी कर रहा है तो वही दूसरी ओर इस आजाद देश के करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे रहकर गुलामों जैसा जीवन यापन कर रहे हैं और उन्हें आजाद देश के सामान्य नागरिकों की तरह आज भी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है . हर बार मन में प्रश्न उठता है की क्या हम स्वतंत्र हैं ..

शहर का ये हाल है तो गांवों की और कैसी कल्‍पना की जाए .. असंतुलित और अंधाधुध विकास का ऐसा ही फल तो लोगों को भुगतना होगा .. पता नहीं सरकार कब चेतेगी ??

** उत्सव के रंग **उत्सव के रंग पर आकांक्षा जी बता रही हैं नागपंचमी पर भिन्न-भिन्न परम्पराएँ! बताती हैं नागपंचमी का त्योहार यूँ तो हर वर्ष देश के विभिन्न भागों में मनाया जाता है लेकिन उत्तरप्रदेश में इसे मनाने का ढंग कुछ अनूठा है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को इस त्योहार पर राज्य में गुडि़या को पीटने की अनोखी परम्परा है. नागपंचमी को महिलाएँ घर के पुराने कपडों से गुड़िया बनाकर चौराहे पर डालती हैं और बच्चे उन्हें कोड़ो और डंडों से पीटकर खुश होते हैं।

काफ़ी जानकरी से भरी प्रस्तुति।

उच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक की प्रस्तुति है “वन्दना : स्वर-अर्चना चावजी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरा फोटोमेरी गंगा भी तुम, और यमुना भी तुम,
तुम ही मेरे सकल काव्य की धार हो।
जिन्दगी भी हो तुम, बन्दगी भी हो तुम,

गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।
मुझको जब से मिला आपका साथ है,
शह मिली हैं बहुत, बच गईं मात है,
तुम ही मझधार हो, तुम ही पतवार हो।

गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

न दैन्यं न पलायनम् पर प्रवीण पाण्डेय दिखा रहे हैं फूलों का मुस्कराना। कहते हैं जब भी भावों को व्यक्त करने के लिये माध्यमों की बात होती है, फूलों का स्थान वनस्पति जगत से निकल कर मानवीय आलम्बनों की प्रथम पंक्ति में आ जाता है। प्रकृति के अंगों में रंगों की विविधता लिये एक यही उपमान है, शेष सभी या तो श्वेत-श्याम हैं या एकरंगी हैं।
कोई देवालय में, कोई कोट में, कोई गजरे में, कोई पुष्पगुच्छ में और कोई कलाईयों में लपेट कर फूलों के माध्यम से अपने भावों को एक उच्च संवादी-स्वर दे देते हैं। प्रेमीगण रात भर न सो पाने की उलझन, विचारों की व्यग्रता, मन व्यक्त न कर पाने की विवशता और भविष्य की अनिश्चितता आदि के सारे भाव फूलों में समेटकर कह देना चाहते हैं। भावों से संतृप्त फूलों के गाढ़े रंगों को समझ सकने में भी दूसरे पक्ष से आज तक कभी कोई भूल होते नहीं देखी है हमने।

जो भाव और विचार प्रकट करने में होट हिचकिचाते है फूल उन्हें बिना कुछ बोले अभिव्यक्त कर देते है|

काव्य मंजूषा पर 'अदा' जी की प्रस्तुति है आधी रात का सवेरा ...!

My Photoस्वतंत्रता

यूँ अवतरित हुई थी,

जैसे...

धरती पर 
स्वर्ग से गंगोत्री उतर आई हो,

आधी रात को तीन लाख ने

सुर मिलाया था,

'जन-गण-मन', 'वन्दे मातरम्'

का जयघोष लगाया था,

पहली बार...

'शस्य-श्यामला'

'बहुबल-धारिणी'

'रिपुदल-वारिणी'

शब्दों ने...

स्वयं ही पुकार कर

अपना सही अर्थ

इस दुनिया को बताया था

स्वतंत्रता दिवस के प्रथम क्षणों का भावपूर्ण वर्णन ! साथ ही ऐतहासिक चित्रों के बीच मन को जगाती प्रस्तुति।

मेरा फोटोteekha bol है soni garg जी का “आज़ादी या सरकारी छुट्टी ???” कहती हैं आज हमारे भारत  को फिर  से आज़ादी की ज़रूरत  है और वो  आज़ादी हमें भ्रष्टाचार, आतंकवाद , घोटालो , बड़ते  अपराध , बढती  हुई  महगाई  कश्मीर और राम मंदिर जैसी और भी कई समस्याओं  से तो  चाहिए लेकिन उस  सबसे  पहले  हमें अपनी  छोटी  मानसिकता  से आज़ादी चाहिए ! जो इन सियासतदारो को  अपनी गन्दी सोच और अपनी घटिया सियासत चलाने  का मौका देती है तो उठाईये   आज़ादी कि तरफ  कदम  माना  की मुश्किल  है लेकिन नामुमकिन   तो नहीं  ! कब तक बैठे के इन मंत्रियो के सहारे ??

आपकी मान्यता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

My Photoबेचैन आत्मा पर बेचैन आत्मा जी की प्रस्तुति है आगे पंद्रह अगस्त कs लड़ाई हौ....... ! कहते हैं एक दिन, एक गरीब / अनपढ़ रिक्शे वाले से बातचीत के दौरान मुझे अनुभव हुआ कि यह शख्स, १५ अगस्त का शाब्दिक अर्थ आजादी ही समझता है न यह कि इस दिन देश आजाद हुआ था. वह कहता है कि आगे १५ अगस्त कs लड़ाई हौ.. तो वह यह कहना चाहता है कि आजादी के लिए संघर्ष तो आगे है. आजादी का अर्थ उसके लिए वह दिन है जब उसे भूखा न सोना पड़े, जब उसके बच्चों को शिक्षा आसानी से उपलब्ध हो, फीस-ड्रेस के लिए तड़फना न पड़े, पांच साल पहले बरसात में गिरी एक कमरे के घर वाली छत फिर से बन जाय, अपनी पत्नी को अस्पताल ले जाय तो उसका  इलाज उसके द्वारा कमाए जा सकने वाले पैसे में ही हो  जाय, उसे कभी कुत्ता काट ले तो इंजेक्शन के लिए मालिक से लिए गए ऊधार को चुकाने के एवज में, महीनों बेगार रिक्शा न चलाना पड़े।

अबहिन तs                                                                
स्कूल में
लइकन कs
नाम लिखाई हौ
फीस हौ
ड्रेस हौ
कापी-किताब हौ
पढ़ाई हौ
आगे.......
पंद्रह अगस्त कs लड़ाई हौ।

कविता का कथ्य बरछी सी मार करता है..तो भाषा की मधुरता मल्हम लगाती है..रिक्शे वाले की हकीकतबयानी ने आजादी के छै दशकों की सारी प्रगति की कलई खोल कर रखदी है..बस इतनी दूर ही आ पाये हैं हम अब तक..अब तो गद्देदार सरकारी कुर्सियों पे बैठे महापुरुष भी गाँधी जी का मंतर भूल गये होंगे..कोई फैसला लेते वक्त..चीजें बदलती नही ऐसे..किसी रिक्शे वाले का दो वक्त की रोटी और परिवार पालने का संघर्ष ही आजादी की लड़ाई से कम नही रह गया है..

रविवार, अगस्त 08, 2010

रविवासरीय (०८.०८.२०१०) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

रुकते थमते से ये कदम

सप्तरंगी प्रेम पर सप्तरंगी प्रेम

' ब्लॉग पर प्रस्तुत है आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती शिखा वार्ष्णेय जी की कविता 'रुकते थमते से ये कदम'.
रुकते थमते से ये कदम
अनकही कहानी कहते हैं
यूँ ही मन में जो उमड़ रहीं
ख्यालों की रवानी कहते हैं
रुकते थमते.....

My Photoदिल्ली की अदालत में विकलांग बच्चों की मां को दो बरस की छुट्टी

भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र बता रहे हैं कि

दिल्ली की अदालतों में कार्यरत महिलाक र्मियों को केन्द्र सरकार से राहत भरा पैगाम मिला है। सरकार ने विकलांग बच्चों की देखभाल के लिए महिला कर्मचारियों को अधिकतम दो वर्ष तक का अवकाश देने की व्यवस्था की है । केन्द्र के कार्मिक , जनशिकायत व पेंशन(कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) मंत्रालय की अनुशंसा पर डिस्ट्रिक्ट एवं सेशन जज की तरफ से सरकुलर जारी कर संबंधित विभागों को इस बाबत सूचित कर दिया गया है। दरअसल महिला क र्मचारियों को पहले से ही बच्चों की देखभाल के लिए अतिरिक्त अवकाश दिए जाने का प्रावधान रहा है। लेकिन महिला कर्मचारियों के हिसाब से यह अवधि उनके लिए नाकाफी थी। विशेषकर जिन महिला कर्मचारियों के कंधों पर अपने विकलांग बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी है। मंत्रालय ने इन्ही मसलों पर विचार करते हुए अवकाश अवधि 730 दिन की तय की है।

सुदूर संवेदन (Remote Sensing) (संस्मरण)

मनोभूमि पर Manish बता रहें कि

    बहुत साल पहले, जब हम डेढ़-दो फुट के रहे होंगे… तब की बात है  नानी जी के कच्चे घर में इधर उधर लुढ़कता रहता था… सभी ने कोशिश तो बहुत की थी कि मैं चलना सीख जाऊँ लेकिन हम ज़रा आलसी टाइप के थे… जल्दी कैसे सीख सकते हैं… सामान्यतः 9 महीने के 10 दिन आगे पीछे बच्चे जन्म ले ही लेते हैं… लेकिन हमने 10 महीने से भी 10 दिन ज्यादा का समय लिया था… मम्मी जी डर रही थी कि कहीं तुलसीदास फिर से न जन्म ले लें यह तो अच्छा हुआ था कि दाँत नही निकले थे…

साहित्य की थारी

शिल्पकार के मुख से सुनिए ललित शर्मा द्वारा

कवि रामेश्वर शर्मा जी का एक गीत
शिल्पकारसाहित्य की थारी
पुस्तक के पृष्ठों में सजी कविता की फ़ुलवारी है
प्यारे शब्द फ़ूलों जैसे पंक्ति क्यारी-क्यारी है।
गीत-गीतिका, कवित्त, सवैया,मुक्तक,छंद कविता
दोहा,सोरठा,चौपाई,कुंडलियाँ,  काव्य सरिता
अतुकांत छणिकाओं की ये साध्य रचना प्यारी है।

प्रदूषण

राजभाषा हिंदी पर संगीता स्वरुप ( गीत ) की प्रस्तुति

 

                                                         

जीवन के आधार वृक्ष हैं ,

                                                                                                       

जीवन के ये अमृत हैं                                                                              

फिर भी मानव ने देखो,                                                                         

इसमें विष बोया है.                                                                               

स्वार्थ मनुष्य का हर पल                                                                        

उसके आगे आया है                                                                              

अपने हाथों ही उसने                                                                              

अपना गला दबाया है

ताऊ टी वी का "पति पीटो रियलिटी शो": ताऊ पर बरसे ताई के लट्ठ

Gyan Darpan ज्ञान दर्पण पर Ratan Singh Shekhawat बता रहे हैं

आजकल देश के विभिन्न टी वी चेनलों पर रियलिटी शो चल रहे है तो अपने अनोखे प्रोग्रामों के लिए कुख्यात ताऊ टी वी चेनल कैसे पीछे रह सकता है इसीलिए इसी क्रम में ताऊ टी वी ने भी "पति पीटो रियलिटी शो "का आयोजन शुरू कर रखा ,इसके लिए कुछ प्रतिभागी तो ताऊ टी वी हाउस में पहुँच कर पत्नियों से पिट भी चुके थे उन्ही पिटे हुए किसी पति ने हाउस से भागकर ताई को ताऊ टी वी की इस करतूत की जानकारी दे दी ,ताई को जब रियलिटी शो के कार्यक्रम में भाग लेने की पात्रता के लिए लट्ठ चलाने की योग्यता होनी चाहिए पता चला तो यह सोच कर कि अब भला ताई से ज्यादा इस काम में कौन निपुण हो सकता है सो ताई भी अपना जर्मन मेड लट्ठ लेकर हाउस में आ धमकी | ताई को अचानक सामने देख ताऊ ने रमलू सियार को इशारा कर हाउस के सभी केमरे बंद करवा दिए पर ताई को तो केमरों से कोई मतलब ही नहीं था उसे तो बस वहां लट्ठ चला अव्वल आकर सिर्फ ये दर्शाना था कि लट्ठ चलाने में ताई का कोई मुकाबला नहीं |

प्रकाश एक तरंग : वेग, गति समय व अवधि

"हिन्दी भारत" पर डॉ.कविता वाचक्नवी

मौलिक विज्ञानलेखन लेखन के तहत

गतांक से आगे  बता रही हैं

प्रकाश सूर्य से पृथ्वी तक कितने समय में और कैसे पहुँचता है?
विश्वमोहन तिवारी (भू.पू. एयर वाईस मार्शल)

प्रकाश का वेग अनंत नहीं है जैसा कि प्राचीन काल में समझा जाता था। यह सच है कि उसका वेग हमारे लिये अकल्पनीय रूप से अधिक है, सामान्य घटनाओं के लिये अनंत-सा ही है - शून्य में प्रकाश का वेग ३ लाख कि.मी. प्रति सै. है। और प्रकाश का एक गुण बहुत ही विचित्र है। यदि हम एक बहुत तीव्र राकैट में बैठ कर जा रहे हों जिसका वेग १ लाख कि.मी. प्रति सैकैण्ड है, और हम उसमें एक टार्च से प्रकाश सामने की ओर फ़ेंकें तब उस प्रकाश का वेग ४ लाख कि. मी. प्रति सैकैण्ड न होकर ३ लाख कि. मी. प्रति सैकैण्ड ही रहेगा। और यदि उस राकैट से हम प्रकाश पीछे की ओर फ़ेंकें, तब भी उसका वेग २ लाख कि.मी. प्रति सैकैण्ड न होकर वही ३ लाख कि. मी. प्रति सैकैण्ड होगा।

My Photoइफ़ बास इज़ रांग?

अमीर धरती गरीब लोग पर Anil Pusadkar प्रस्तुत कर रहे हैं

एक छोटी सी पोस्ट। यदि आफ़िस मे बास ही गेम खेलने लगे तो वो बाकी लोगों को कैसे मना करेगा?संजीत ने आगे लिखा कि हमको जवाब मांगता है बास!जवाब तो मैं उसे कल ही दे देता मगर रात ज्यादा हो गई थी इसलिये सोचा आज उठते ही गुरू/चेले टू-इन-वन को जवाब दिया जाये,मगर जवाब देते-देते रात हो ही गई।तो संजीत बाबू कभी हमने एक पोस्टर देखा था एक अखबार के दफ़्तर में।उस पर लिखा था दफ़्तर के दो रूल यानी नियम।पहला बास इज़ आलवेज़ राईट और दूसरा इफ़ बास इज़ रांग सी रूल नम्बर वन।तो समझ गये ना संजीत बाबू कि हम अगर गेम भी खेलें तो वो काम की श्रेणी मे आयेगा और अगर बाकी लोग काम भी करें तो वो खेल ही कहलायेगा।ठीक वैसे ही जैसे नेता कर रहे हैं जनता के साथ और जो जनता करती है वो तो खेल ही ना लोकतंत्र के साथ,देश के साथ और तो और खुद के साथ।और नेता जो करते है वो काम है सिर्फ़ काम्।क्यों सही कहा ना!

मेरा फोटो'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में स्थित 'पंच महापुरूष योग'

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर संगीता पुरी बता रहीं हैं

ज्‍योतिष शास्‍त्र की 'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में 'पंच महापुरूष योग' का वर्णन है , जिनके नाम रूचक , भद्र , हंस , मालब्‍य और शश हैं। इन पांचों में कोई एक योग होने पर भी जातक महापुरूष होता है एवं देश विदेश में कीर्ति लाभ कर पाता है। मंगल अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हों , तो रूचक योग , बुध अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में  अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो तो भद्र योग , बृहस्‍पति अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो हंस योग , शुक्र अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो मालब्‍य योग तथा शनि अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण या उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो जन्‍मकुंडली में शश योग बनता है।

My Photoहिन्दू मुस्लिम भाई-भाई??

सम्वेदना के स्वर पर सम्वेदना के स्वर कहते हैं

कितनी आसानी से आए दिन, बहुसंख्यक शब्द का प्रयोग, हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये किया जाता है और अल्प संख्यक शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर मुस्लिम धर्म को मानने वालों के लिये किया जाता है! यह प्रयोग यही दिखाता है कि धार्मिक पहचान हमारे मन-मस्तिष्क में कितनी गहरी पैठी हुई है. वरना हम कहते धार्मिक बहुसंख्यक या धार्मिक अल्पसंख्यक.

अब बढ़ना बन्द

न दैन्यं न पलायनम् पर  प्रवीण पाण्डेय कहते हैं

ज्ञानी कहते हैं कि जीवन में शारीरिक ढलान बाद में आता है, उससे सम्बन्धित मानसिक ढलान पहले ही प्रारम्भ हो जाता है। किसी क्रिकेटर को 35 वर्ष कि उम्र में सन्यास लेते हुये देखते है और मानसिक रूप से उसके साथ स्वयं भी सन्यास ले लेते हैं। ऐसा लगता है कि हमारा शरीर भी अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के लिये ही बना था और अब उसका कोई उपयोग नहीं। घर में एक दो बड़े निर्णय लेकर स्वयं को प्रबुद्ध समझने लगते हैं और मानसिक गुरुता में खेलना या व्यायाम कम कर देते हैं। एक दो समस्यायें आ जायें तो आयु तीव्रतम बढ़ जाती है और स्वयं को प्रौढ़ मानने लगते हैं, खेलना बन्द। यदि बच्चे बड़े होने लगें तो लगता है कि हम वृद्ध हो गये और अब बच्चों के खेलने के दिन हैं, अब परमार्थ कर लिया जायें, पुनः खेलना बन्द। कोई कार्य में व्यस्त, कोई धनोपार्जन में व्यस्त, व्यस्तता हुयी और शारीरिक श्रम बन्द।

मेरा फोटो“आया है चौमास!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

उच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक की प्रस्तुति                                               

खेतों में हरियाली लेकर आया है चौमास!
जीवन में खुशहाली लेकर आया है चौमास!!
सन-सन, सन-सन चलती पुरुवा, जिउरा लेत हिलोर,
इन्द्रधनुष के रंग देखकर, नाचे मनका मोर,
पकवानों की थाली लेकर आया है चौमास!
जीवन में खुशहाली लेकर आया है चौमास!!

My Photoजहाँ ईश्वर को लिखी जाती है पाती

डाकिया डाक लाया पर KK Yadav कहते हैं

आपने वो वाली कहानी तो सुनी ही होगी, जिसमें एक किसान पैसों के लिए भगवान को पत्र लिखता है और उसका विश्वास कायम रखने के लिए पोस्टमास्टर अपने स्टाफ से पैसे एकत्र कर उसे मनीआर्डर करता है। दुर्भाग्यवश, पूरे पैसे एकत्र नहीं हो पाते और अंतत: किसान डाकिये पर ही शक करता है कि उसने ही पैसे निकाल लिए होंगे, क्योंकि भगवान जी कम पैसे कैसे भेज सकते हैं.

किलक उठा मन : रावेंद्रकुमार रवि की एक बालकविता

सरस पायस पर रावेंद्रकुमार रवि की बाल कविता                                           

किलक उठा मन
बादल मशकें
भर-भर लाए
सागर के पानी से नभ में!
लगे छिड़कने
फिर यह पानी
वे धरती के हर उपवन में!

 

रविवार, जुलाई 04, 2010

रविवासरीय (०४.०७.२०१०) चर्चा

नमस्कार मित्रों।

कल जो टूटे थे रिश्ते आज वो लगते झूठे हैं ....

My Photoकाव्य मंजूषा पर 'अदा' जी की ग़ज़ल

                                                            

कल जो टूटे थे रिश्ते आज वो लगते झूठे हैं                                                  

प्रीत डगर के काँटों से मेरे पाँव के छाले फूटे हैं                                           

शिकवों का दस्तूर नहीं ना है गिलों का कोई रिवाज़                                              

नेह की वो सारी कोंपल बस कागज़ के गुल-बूटे हैं

त्रासदियाँ

प्रवीण पाण्डेय जी की प्रस्तुति।

साल-2018...जगह-लखनऊ से 58 किलोमीटर दूर हसनपुर में अमेरिकन न्युक्लियर पावर प्लांट। एक तेज़ धमाका। फिर कुछ और धमाके। उसके बाद क्या, कहां, कैसे, क्यूं जैसे कुछ बेमानी से सवाल...अमेरिकन कंपनी पर 500 करोड़ का जुर्माना। और हां, 40 हज़ार इंसानी मौतें और खरबों की संपत्ति मिट्टी के हवाले। लेकिन, इस बारे में बात करने का कोई फ़ायदा नहीं क्यूंकि इस जान-माल के बदले मिल तो गया 500 करोड़। और क्या चाहते हैं। न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल में यही तय हुआ था न।

झूठ पकड़ने वाला रोबॉट

बस यूँ ही निट्ठल्ला पर डा. अमर कुमार

जब मैं छोटा बच्चा था, कभी शरारत नहीं करता था.. ढँग की जब कोई बात सुने ना, फिर मैं दँगा करता था आज मेरा मन निट्ठल्ला डीप-रेस्ट है, मैंनें दू-दुगो पोस्ट लिक्खड्डाली.. और एक सब्सक्राइबर तक झाँकने न आया...

अनन्त आखाश--

My Photo

वीर बहुटी पर निर्मला कपिला दीदी की

कहानी

अनन्त आकाश--  भाग- 1 पढिए।

मेरे देखते ही बना था ये घोंसला, मेरे आँगन मे आम के पेड पर---चिडिया कितनी खुश रहती थी और चिडा तो हर वक्त जैसी उस पर जाँनिस्सार हुया जाता था। कितना प्यार था दोनो मे! जब भी वो इक्कठे बैठते ,मै उन को गौर से देखती और उनकी चीँ चीँ से बात ,उनके जज़्बात समझने की कोशिश करती।--
"चीँ--चीँ चीँ---ाजी सुनते हो? खुश हो क्या?"
"चीँ चीँ चेँ-- बहुत खुश देखो रानी अब हमारा गुलशन महकेगा जब हमारे नन्हें नन्हें बच्चे चहचहायेंगे।"" चिडा चिडिया की चोंच से चोंच मिला कर कहता ।

ऐसे सीखा बूढ़े तोते ने राम राम कहना!

My Photoधान के देश में! : Hindi Blog पर जी.के. अवधिया बता रहे हैं

बूढ़ा तोता राम राम कहना नहीं सीख सकता"। अब हम भी तो बूढ़े हो गये हैं याने कि अब हम भी कुछ सीख नहीं सकते। पर कोशिश करने में क्या हर्ज है; आखिर कम्प्यूटर चलाना, वर्ड, एक्सेल, पॉवरपाइंट, पेजमेकर आदि हमने सन् 1996 में खुद का कम्प्यूटर खरीदने के बाद ही, याने कि छियालीस साल की उम्र के बाद ही, तो सीखा है, और वह सब भी खुद ही कोशिश करके। बस फोटोशॉप ही तो सीख नहीं पाये क्योंकि उसे सीखने की कभी प्रबल इच्छा ही नहीं हुई हमारी। और अब जब इसे सीखने की इच्छा हो रही है तो लगता है कि कहीं "सिर तो नहीं फिर गया है" हमारा। पर हमने भी ठान लिया कि सीखेंगे और जरूर सीखेंगे। आखिर जब ललित शर्माजी हमारा हेडर बना सकते हैं तो हम खुद क्यों नहीं?

गैरजरूरी प्रार्थनाएं

My Photo बिगुल पर राजकुमार सोनी जी समझा रहें कि कैसी प्रार्थनाएं करनी चहिए।          

आकाश और धरती में
विराजमान करोड़ो देवताओं से
मां करती है प्रार्थना
हे प्रभु टिमटिमाता रहे
लाल तारा माथे पर
सुहाग अमर रहे मेरा

कौव्वे की कांव कांव , जाग उठा सारा गांव

My Photoगठरी पर अजय कुमार कहते हैं

गांव में सुबह से ही हलचल शुरु हो जाती है ।लोग अपने काम में लग जाते हैं । यहां मुम्बई में भी लोग भोर में चहल पहल शुरू कर देते हैं और नौकरी अर्थात दूसरे के काम में लग जाते हैं ।हां तो बात का रुख बदले इससे पहले बता दूं कि आज भी गांव में ग्रामीण-अलार्म की व्यवस्था काम कर रही है । नहीं समझे , अरे भाई ग्रामीण-अलार्म माने काग भुसुण्डी जी । काग भुसुण्डी भी नहीं जानते !!! अच्छा--- कौवा (Crow ) तो समझेंगे । याद आया सुबह की कांव कांव ,बिला नागा सही समय पर ।

गाँव....गोपन.....चाँद की गठरी.....खोज- खुलिहार ...और भरी दुपहरी.......सतीश पंचम

My Photoसफ़ेद घर पर सतीश पंचम की प्रस्तुति।

   गाँवों में कई कहाँनिया...कई बातें....कई गोपन छिपे होते हैं.....आराम कर रहे होते हैं.....जिन्हें यदि खुलिहार दिया जाय तो ढेर सारी बातें उघड़कर सामने आ जांय ..... मानों वह बातें खुलिहारे ( छेड़े) जाने का ही इंतजार कर रही हों।

“.. ..कुछ-कुछ होता है!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरा फोटोउच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक घोषणा कर रहे हैं कि उनके                        

दिल में कुछ-कुछ होता है,
जब याद किसी की आती है।
मन सब सुध-बुध खोता है,
जब याद किसी की आती है।
गुलशन वीराना लगता है,
पागल परवाना लगता है,
भँवरा दीवाना लगता है,
दिल में कुछ-कुछ होता है,
जब याद किसी की आती है।

वो खिड़की उदास रहती है

My PhotoLamhe .... पर Ravi yadav की अभिव्यक्ति।                                                  

वो खिड़की,
जो मेरी खिड़की से दिखती है ,
जिसमे अक्सर तुम दिखते थे ,
अब वो खिड़की उदास रहती है,
ना जाने कब सोती है,
ना जाने कब जगती है,

पहली बारिश और हम तुम....

My Photoकुछ कहानियाँ,कुछ नज्में पर Sonal Rastogi का अहसास।                             

सिमटे सिमटे
सीले सीले
आधे सूखे
आधे गीले
पहली  बारिश
और हम तुम
सुलगे सुलगे
दहके दहके
थोड़े संभले
थोड़े बहके

दोस्तों पर्यावरण पर कुछ विज्ञापन कॉपी

मेरा फोटोstreet light पर RAVINDRA SWAPNIL PRAJAPATI कहते हैं

दोस्तों पर्यावरण पर कुछ विज्ञापन कॉपी
वे आप भी पढियेगा
...
तुमने हमारा पानी छीना
हमारे जंगल जमीन छीनी
ओ मनुष्य तुम सोचते हो
बोलो हम तुमसे क्या कहें

मंजिल के लिए

मेरा फोटोमेरी भावनायें... पर रश्मि प्रभा... की कविता।                                                  

कहीं कोई अंतर ही नहीं,                                                                           

सारे रास्ते दर्द के                                                                                 

तुमने भी सहे                                                                                       

हमने भी सहे                                                                                      

तुमको एक तलाश रही                                                                               

मेरे साथ विश्वास रहा

क्षणिकाएँ...

My Photo.....मेरी कलम से..... पर Avinash Chandra की प्रस्तुति।                          

परी..माँ...
कहती थी बेशकीमती,
होते हैं पँख,
आसमानी परियों के.
और एक साड़ी में,
निकाल देती थी,
वो पूरा साल.

तेरी अनुकंपा से

मनोज पर मनोज कुमार

12012010004---मनोज कुमार

ज़िन्दगी में हमारी चाहत बहुत कुछ-न-कुछ पाने की होती है। हम कुछ पाते हैं कुछ नहीं भी पाते। जो नहीं मिलता उससे मन में असंतोष उपजता है। हमें अपने है और नहीं है के बीच एक संतुलन बिठाने की जरूरत है। यानि संतोष और असंतोष के बीच संतुलन। इससे हमारी जिंदगी के बीच फर्क पड़ेगा। सबसे पहले हमारे पास जो है, उसके लिए संतोष का भाव होना चाहिए, और जो नहीं उसके लिए कोशिश होनी चाहिए । सिर्फ असंतुष्‍ट रहने का कोई मतलब नहीं है।

मान गए मम्‍मी की एस्‍ट्रोलोजी को !!

My Photoगत्‍यात्‍मक चिंतन पर संगीता पुरी की प्रस्तुति।

बात मेरे बेटे के बचपन की है , हमने कभी इस बात पर ध्‍यान नहीं दिया था कि अक्‍सर भविष्‍य की घटनाओं के बारे में लोगों और मेरी बातचीत को वह गौर से सुना करता है। उसे समझ में नहीं आता कि मैं होनेवाली घटनाओं की चर्चा किस प्रकार करती हूं। लोगों से सुना करता कि मम्‍मी ने 'एस्‍ट्रोलोजी' पढा है , इसलिए उसे बाद में घटनेवाली घटनाओं का पता चल जाता है। यह सुनकर उसके बाल मस्तिष्‍क में क्‍या प्रतिक्रिया होती थी , वो तो वही जान सकता है , क्‍यूंकि उसने कभी भी इस बारे में हमसे कुछ नहीं कहा। पर एक दिन वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सका , जब उसे अहसास हुआ कि मेरी मम्‍मी वास्‍तव में बाद में होने वाली घटनाओं को पहले देख पाती है। जबकि वो बात सामान्‍य से अनुमान के आधार पर कही गयी थी और उसका ज्‍योतिष से दूर दूर तक कोई लेना देना न था।

बस।