संदली खुशबू फिजाओं में यूँ ही बहने लगी
राणा जी का कहना है, “बस इतना ही.....अपनी धुन में रहता हूँ/मै भी तेरे जैसा हूँ|” कितना उम्दा ख़्यालात
पिरोया है उन्होंने इस ग़ज़ल में, बानगी देखिए
जो चली अंडे संजोती चींटियों की इक लड़ी
कोई बूढी अपने टूटे बाम को तकने लगी
या फिर
मेरे दिल से लाख बेहतर, उनके कुरते की सिलन
जब भी टूटी वो हमेशा बैठकर सिलने लगी
दिवारात हो !
आशा की किरणों से
सजा रहे अम्बर
जीवन में नवप्रभात हो !
कभी-कभी मेरे मन में एक प्रश्न आता है कि “जिस देश में हर व्यक्ति स्वयं को अपने पड़ोसी से श्रेष्ठ समझता हो, तो क्या ऐसे देश में एकता हो सकती है?” आज जब सुबह-सुबह ओशो रजनीश के विचार “क्यों बाँट रहे है ये छोटे शब्द हमारे समाज को ...” पढा तो मन को थोड़ा सुकून मिला। कहते हैं हमने न जाने कितने शब्द खड़े किये हुए है जो दीवार की तरह एक-दुसरे मनुष्य को अलग कर रहे है। और मनुष्य को अलग ही नहीं कर रहे है, हमारी आँखों को भी अँधा कर रहे है, हमारे प्राणों को भी बहरा कर रहे है, हमारी संवेदनशीलता को तोड़ रहे है। इन शब्दों की दीवारों में जो घिरा है वह आदमी कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता।
हम देश और समाज की भलाई में अपना जीवन समर्पित करें। क्योंकि “आप जितना प्रेम देंगे, उतना प्रेम पायेंगे। आपके पास प्रेम जितना अधिक होगा, इसे दान करना उतना ही सहज हो जाएगा।” आदरणीय महेन्द्र मिश्र बता रहे हैं “परहित सरिस धर्म नहिं भाई ...”। कहते हैं मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है मनुष्यता का होना है . व्यक्ति की धन्यता और पवित्रता सर्व जन हिताय कार्यों में संलग्न होने में ही होती है . दूसरों की भलाई करना ही सबसे बड़ा धर्म है .
एक बात तो तय है कि किसी भी वस्तु की सुन्दरता आपकी मूल्यांकन करने की योग्यता में छिपी हुई है। कुछ लोग हमारी छोटी भूल को भी हमारी चारित्रिक विशेषता मानकर हमारा अवमूल्यन कर देते हैं। संगीता स्वरुप ( गीत ) कहती हैंभीतर तक
कोई लकीर
जिसे पारखी नज़रें
छोड़ देती हैं
बिना ही कोई
मोल लगाये ....
संगीता जी आपने अपनी कविताओं में अपने समय को लेकर हमेशा जरूरी सवाल खड़े किए हैं। लोगों द्वारा दिए गए ठेस से आक्रांत मनस्थितियों का आपने प्रभावी चित्रण किया है। आपने यहां अन्योक्ति से एक गहरा संकेत किया है।
जीवन को आबाद करना है तो मैं कौन हूँ इस पहेली को हल कीजिये। मैं और मेरे-पन के भान से मुक्त हो जाइये। पर यहां तो मैं ही छाया रहता है, मैं शेर हूं तू गीदर है। काम के आधार पर समाज कभी चार वर्ण में बंटा था आज बेकाम के कई वर्गों में। प्रवीण पांडेय जी ऐसे लोगों से जो समाज को बांटते हैं पूछ रहे हैं, आपकी “"जाति क्या है?" मनवता, इंसानियत से बढकर कोई जाति नहीं है, पर इसे कोई अपनाना चहे तब ना! कहते हैं मेरा अनुभव भले ही कमलपत्रवत न रहा हो पर मुझे भी सदैव ही जाति के प्रसंग पर चुप रहना श्रेयस्कर लगा है। पता नहीं आज क्यों लिखने की ऊर्जा जुटा पा रहा हूँ?
ऊपर हमने शहरयार के ज्ञानपीठ मिलने की बात की। अब उनकी एक रचना पढी जाए। यह मेरी आज की पसंद की कैटेगरी में है। Jakhira पर Devendra Gehlod सीने में जलन – शहरयार इस शहर में हर शख्श परेशां सा क्यू है
दिल है तो धडकने का बहाना कोई ढूंढे
पत्थर की तरह बेहिस-बेजान सा क्यू है
तन्हाई की ये कौन सी मंजिल है रफ़िक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यू है
हम ने तो कोई बात निकली नहीं ग़म की
वो जूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यू है
क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यू है
- शहरयार
आज इस दुखद समाचार से मन व्यथित है।
नंदन जी को कोटि-कोटि नमन।
डॉ. कन्हैया लाल नंदन – एक श्रद्धांजलि

एक कविताः
ज़िन्दगी की ये ज़िद है
ख़्वाब बन के
उतरेगी।
नींद अपनी ज़िद पर है
- इस जनम में न आएगी
दो ज़िदों के साहिल पर
मेरा आशियाना है
वो भी ज़िद पे आमादा
-ज़िन्दगी को
कैसे भी
अपने घर
बुलाना है।
-कन्हैया लाल नंदन
आज अब और चर्चा नहीं कर पाऊंगा।
“
565 पृष्ठों की यह वृहद पुस्तक अपने आप में रोग, रोगी और स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारियों का प्रामाणिक भण्डार है। पुस्तक में कुल 27 अध्याय हैं, जिनमें मानव स्वास्थ्य के विभिन्न मुद्दों को बड़े सहज ढ़ंग से समझाया गया है। मूल्य मात्र 290 रू0 है। यह पुस्तक हिन्दी के अतिरिक्त सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में में उपलब्ध है।
ज़ाकिर भाई का प्रयास वंदनीय है। पर वंदना जी की प्रस्तुति पढकर मन विचलित हो गया। उनकी कविता
समय कोई भी हो, कविता उसमें मौज़ूद जीवन स्थितियों से संभव होती है। वही जीवन- स्थितियां, जिनसे हम रोज़ गुज़रते हैं। एम. वर्मा जी की रचना इसी के चलते हमें अपनी जैसी लगती है। इसमें निहित यथार्थ जैसे हमारे आसपास के जीवन को दोबारा रचता है।
सरोकार पर अरुण सी राय ने सड़क बानाई है। अरुण जी का कहना है अपने देश, समाज, अपने लोगों से सरोकार को बनाये रखने के लिए कविता को माध्यम बनाया है। आपने जीवन और प्रेम को इस कविता में ए़क साथ देखा है और कविता
अनामिका जी कह रहीं हैं 
ए वतन मेरे वतन 


मेरी गंगा भी तुम, और यमुना भी तुम,
स्वतंत्रता



साहित्य की थारी 


किलक उठा मन 
प्रवीण पाण्डेय जी की प्रस्तुति। 





