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रविवार, दिसंबर 05, 2010

रविवासरीय चर्चा (०५.१२.२०१०)

 

 

नमस्कार मित्रों!

 

 

 

 


मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ। लीजिए पेश कुछ मेरे चुने हुए लिंक्स और एक लाइना।

१. shikha kaushik कहती हैं

महिला आरक्षण नीति :: का मुख्य लक्ष्य आज ''महिलाओं को राजनैतिक रूप से सशक्त '' करने का है।

 



२. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ का कहना है

...उन्‍होंने टोने-टोटकों, तंत्र-मंत्र और जादुई शक्तियों के द्वारा मुझे हजार बार नष्‍ट किया। :: मैंने बहुत से मानसिक रोगियों को, जिनमें प्रेत आता था, ठीक किया है।

३. डॉ.कुमार गणेश 369 लेकर आए हैं इस बार की रिलीज फ़िल्में ::: खट्टा-मीठा :: यहाँ जो भविष्यवाणी करते हैं,वह सिर्फ़ बॉक्स ऑफिस के सन्दर्भ में ही होती है|



४. Indranil Bhattacharjee ........."सैल" का चैलेंज है

राम को राज दिलाकर देखो ::

छोड़के बात समझदारी की ।

जोश में होश गवांकर देखो ॥

५. शिक्षामित्र बता रहे हैं

गुरमति संगीत को नया जीवन दे रही है पंजाब यूनिवर्सिटी :: भाई रणधीर सिंह ऑन लाइन गुरमति संगीत लाइब्रेरी की वेबसाइट लांच की है जिसके जरिए देश-विदेश में इस संगीत से जुड़े व इच्छुक लोग वेबसाइट का लाभ उठा सकेंगे।

६. Vijai Mathur का क्रांति स्वर पढिए ज्योतिष और अंधविश्वास:: ज्योतिष व्यक्ति क़े जन्मकालीन ग्रह -नक्षत्रों क़े आधार पर भविष्य कथन करने वाला विज्ञान है, यह  कर्मवादी बनाता  है -भाग्यवादी नहीं।

७. (title unknown)  के तहत

सुशील बाकलीवास पूछते हैं

क्या हम ऐसे ही हैं  ? :: हम विपरित स्थिति में होते हैं तो अलग होते हैं और अधिकार वाली स्थिति में होते हैं तो अलग होते हैं ।

८. Anita को बताइए

कैसा है वह :: शशि, दिनकर नक्षत्र गगन के, धरा, वृक्ष, झोंके पवन के!

९. mridula pradhan ने देखा फैशन शो में......... ::

औंधे मुंह गिर गयी शर्म, पल्लू बाहर रोता था, ध्वस्त हया की सिसकी पर जब , 'कैट-वॉक' होता था!!

१०. यह है

सम्वेदना के स्वर

सनसनीखेज भांडिया टेप - एक्स्क्लूसिवली इसी ब्लोग पर :: अरे तू उन टेप्स को लेकर अभी तक परेशान है...ये सब तो कैरियर का पार्ट है!!

११. कुमार राधारमण बताते हैं विपश्यना से खिलता है मन का कमल :: अगर आप शरीर के तल पर, मन के तल पर और हृदय के तल पर, सब प्रकार की भावनाओं के तल पर होश में बने रहे तो आपका साक्षी-भाव परिपक्व हो जाएगा और चौथी भावदशा को उपलब्ध हो जाएंगे।

१२. वन्दना जी क्या कहा आपने, “हाँ , मैंने गुनाह किया” ::

हाँ , मैंने गुनाह किया जो चाहे सजा दे देना!!!



१३. Kirtish Bhatt, Cartoonist लेकर आए हैं

कार्टून: उल्लू का पट्ठा !! :: दिखने में लगता है हट्टा-कट्ठा।

१४. anshumala पूछती हैं

कही अनजाने में आप अपने शब्दों से बलात्कार पीड़ित का दर्द तो नहीं बढ़ा रहे है - - - - - - :: आशा है सभी पाठक सकारात्मक रूप से लेंगे यदि मेरी सोच में कही कोई गलती हो तो मेरा ध्यान अवश्य दिलाइयेगा!

१५. मनोज कुमार का विचार-७९ :: मोनिका तुझे सलाम! :: मोनिका ने आज जो किया, उसका यह साहस अनुकरणीय और वंदनीय है!!

१६. रेखा श्रीवास्तव लेकर आई- चोर चोर मौसेरे भाई ! :: हमें अपनौ काम करन देव और तुम अपनौ करो. हम तुम्हें न पकरहै और न तुम हमें पकरो.

१७. करण समस्तीपुरी हैं आज फ़ुरसत में …. एक समसामयिक पोस्ट .. ऐसे थे राजेंद्र बाबू :: आज फुर्सत में बैठे तो याद आया कि कल देशरत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद का जन्मदिवस था।

१८. देखिए यहां पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) का 

"दामाद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") ::

सास-ससुर की छाती पर, बैठा रहता जामाता है।।

धूर्त भले हो किन्तु मुझे, दामाद बहुत ही भाता है।।



१९. प्रवीण पाण्डेय की खोज

7 लेखक, 36 पुस्तकें, एक सूत्र :: प्रभु। मान लिया कि पढ़ने में रुचि है, पर उसका यह अर्थ तो नहीं कि अब पुस्तकों के माध्यम से वही बात बार बार संप्रेषित करते रहोगे !

२०. तिलक रेलन की प्रस्तुति
खुदीराम बोस :: भारत को कुचल रहे ब्रिटिश पर जो पहला बम था, इस राष्ट्र नायक ने फैंका था!!

२१. त्रिपुरारि कुमार शर्मा लेकर आए हैं
मैथिली कथाकार हरिमोहन झा के पत्र :: सिमरिया में मिलने पर चुपचाप दे दूँगा। बस कोई जाने नहीं। मेरे बाप को पता चलेगा तो खर्चा बंद कर देंगे।



२२.

टॉल्सटॉय,गोर्की और यह नन्हा दिमाग :(

shikha varshney का :: रूस की सबसे बड़ी और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी ….!

अब चाय का क़र्ज़ भी तो निभाना होता है ना .:) बाकी चाय ब्रेक के बाद ...:) 



आज बस इतना ही, अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

    

रविवार, जून 27, 2010

रविवासरीय चर्चा (२७.०६.२०१०)

 

वहुप्रतिक्षित परिकल्पना सम्मान की उद्घोषणा शीघ्र

नुक्कड़ पर रवीन्द्र प्रभात

जैसा कि आप सभी को विदित है कि विगत १५ अप्रैल को परिकल्पना पर ब्लोगोत्सव-२०१० की भव्य शुरुआत हुई थी । उल्लेखनीय है कि पहली बार इंटरनेट पर इसप्रकार का अनोखा प्रयोग हुआ है और यह उत्सव हिंदी ब्लॉग जगत के लिए कामयाबी की एक नयी परिभाषा गढ़ने में समर्थ हुआ है . ब्लोगोत्सव के समूचे परिदृश्य को लोकसंघर्ष पत्रिका द्वारा एक आकर्षक विषेशांक का स्वरुप प्रदान किया जा रहा है ताकि दस्तावेज के रूप में सुरक्षित रखा जा सके और इस उत्सव से जुड़े प्रतिभागियों को एक नया आयाम प्रदान किया जा सके .

नमन

मेरा फोटोएक प्रयास पर  वन्दना की प्रस्तुति                                                             

श्याम मोहन मदन मुरारी
राधे- राधे रटती प्यारी 
कृष्ण केशव कुञ्ज बिहारी
रमता जोगी बहता पानी 
आनंद कंद  मुरली धारी 
जमुना जी की महिमा न्यारी
गोविन्द माधव गिरिवरधारी 
खोजत -खोजत सखियाँ हारी 
आनंदघन अविनाशी त्रिभुवनधारी
कुञ्ज- कुञ्ज में बसे गिरधारी
नटवर नागर छैल बिहारी
रोम- रोम में रमे मुरारी
सुखधाम सुधासम कृष्ण मुरारी
कण -कण में रम रहे रमणबिहारी

माईकल जैक्सन की याद में

 

 

 

कुमाउँनी चेली पर शेफाली पाण्डे की लाजवाब प्रस्तुति                                   

मेरा फोटोमाईकल जैक्सन की याद में .....
दुःख से भरा , देखा जब चेहरा
बोल उठे यमराज
मत हो विकल , बेटा माईकल !
मरने के बाद , कौन सा दुःख
सता रहा है तुझको
सब पता है मुझको
चल !
मिलवाता हूँ ऐसे एक बन्दे से
आया है जो , धरती से आज
तेरी उदासी का, है उसके पास  इलाज
जिसको कहते हैं , अंगरेजी में फार्मर
हिन्दी में किसान
घूम रहा है जो 
गर्व से अपना सीना तान
तेरे गले से हैं गायब
सारे सुर और ताल
देख !
वह बेसुरा है फिर भी
छेड़ रहा है मीठी - मीठी तान

यार जुलाहे!!

 

 

My PhotoSamvedana Ke Swar par सम्वेदना के स्वर

की कबूर जयंती पर एक प्रस्तुति

एक जुलाहा, सूत के पतले धागों से एक चादर बिनता. टुकड़े टुकड़े धागों को ऐसी गाँठ लगाता कि पूरी चादर में गाँठ ढूँढे से भी न मिले. ज़िंदगी का ताना बाना बुनते बुनते कितनी गाँठें लग जाती हैं, जो दिखती भी हैं और खोले से खुलती भी नहीं. ऐसा ही एक जुलाहा तकरीबन सात सौ साल पहले हमारे बीच आया, एक तरकीब बताने, जिससे ज़िंदगी की चादर बिनते हुए कोई गाँठ दिखाई न दे और ये चादर जब उतरे तो मैली न हो, उसपर कोई दाग़ न रहे.

एक अनपढ़ इंसान जिसे वेद, क़ुरान का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन उसकी तकरीबन पाँच सौ वाणियाँ गुरु ग्रंथ साहिब में मौजूद हैं. नमन करते हैं हम कबीर को… आज जेठ माह की पूर्णिमा के दिन, उनकी जयंती पर.

गंगावतरण भाग-चार

12012010005मनोज पर मनोज कुमार

की प्रस्तुति जो गंगावतरण की 

समापन किस्त है, पढिए।

भगीरथ घर छोड़कर हिमालय के क्षेत्र में आए। इन्‍द्र की स्‍तुति की। इन्‍द्र को अपना उद्देश्‍य बताया। इन्‍द्र ने गंगा के अवतरण में अपनी असमर्थता प्रकट की। साथ ही उन्‍होंने सुझाया कि देवाधिदेव की स्‍तुति की जाए। भागीरथ ने देवाधिदेव को स्‍तुति से प्रसन्‍न किया। देवाधिदेव ने उन्‍हें सृष्टिकर्ता की आराधना का सुझाव दिया। क्योंकि गंगा तो उनके ही कमंडल में थी।

स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें

मेरा फोटोशब्द-शिखर पर आकांक्षा कह रही हैं

मादक पदार्थों व नशीली वस्तुओं के निवारण हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसंबर, 1987 को प्रस्ताव संख्या 42/112 पारित कर हर वर्ष 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस मानाने का निर्णय लिया. यह एक तरफ लोगों में चेतना फैलाता है, वहीँ नशे के लती लोगों के उपचार की दिशा में भी सोचता है.इस वर्ष का विषय है- ''स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें."

क्‍या प्राण प्रतिष्‍ठा के बाद ही मूर्तियां पूजा करने योग्‍य होती है ??

My Photo गत्‍यात्‍मक चिंतन पर संगीता पुरी का कहना है कि

पैरों के महत्‍व के बारे में यह जानते हुए कि इसके बिना सही ढंग से जीवन जीया नहीं जा सकता , हम अपने शरीर में पैरों का स्‍थान सबसे निकृष्‍ट समझते हैं। शायद शरीर के सबसे निम्‍न भाग में होने की वजह से गंदा रहने और किटाणुओं को ढोने में इसकी मुख्‍य भूमिका होने के कारण ही पैरो को अछूत माना गया हो। पैरों से लात मारना तो शिष्‍टाचार की दृष्टि से बिल्‍कुल गलत है ही , हमारा पैर गल्‍ती से भी किसी को छू जाए , तो इसके लिए हम अफसोस करते हैं या माफी मांगते हैं। हमारी संस्‍कृति सिर्फ व्‍यक्ति को ही नहीं , किसी वस्‍तु को भी पैरों से छूने की इजाजत नहीं देती। चाहे वह घर के सामान हों , बर्तन हो या खाने पीने की वस्‍तु। यहां तक कि अन्‍न की सफाई करने वाले सूप , अनाज को रखी जानेवाली टोकरियां या फिर घर की सफाई के लिए प्रयुक्‍त होने वाली झाडू।

ब्लॉग पर परिवर्तन की दस्तक

डा. महाराज सिंह परिहार विचार-बिगुल पर डा. महाराज सिंह परिहार की प्रस्तुति पढिए जहां वे बताते हैं कि

चारों ओर परिवर्तन का दौर है। हर क्षेत्र में नित्य-नूतन प्रयोग हो रहे हैं। अनुसंधान हो रहे हैं। विचारों की महत्ता बढ़ गई है। बौद्धिक संपदा प्रगति के सोपान पर है। विचारों की विविधता और परिवर्तन का दौर ब्लॉग पर भी दस्तक दे रहा है। ब्लॉगर्स दिल खोलकर विविध विषयों पर लिख रहे हैं। विचारों का बादल ब्लॉग पर अपनी दस्तक दे रहा है।

वंदे मातरम - बंकिमचन्द्र - स्वतंत्रता का महामन्त्र

Jai Bharat Jay-Jay Bharti पर अरविन्द सिसोदिया

की प्रस्तुति बंकिम चंद्र के बारे में

 
कुछ  तो कहानी छोड़ जा ,
अपनी निसानी छोड़ जा ,
मोशम  बिता जाये ,
जीवन बिता जाये .
यह गीत संभव  दो बीघा जमीन का हे .
मगर सच यही हे की ,
काल चक्र की गती नही रूकती,
एक थे बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय,
उनका निधन हुए भी काफी समय हो गया मगर वे हमारे बीच आज भी जिदा हें .
क्यों की उन्होंने एक अम्र गीत की रचना की जिसने भारत को नई उर्जा दी और देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .

New Blogger Features: ब्लॉगर पर ट्विटर और फेसबुक शेयर बटन

My Photo Hindi Blog Tips पर आशीष खण्डेलवाल का आज का टिप्स है कि

ट्विटर औऱ फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की पहुंच से पूरी दुनिया चकित है। इन साइट्स के इसी असर को देखते हुए ब्लॉगर ने ब्लॉग पोस्ट को ट्विटर और फेसबुक व अन्य नेटवर्क्स पर शेयर करने की सुविधा दी है। आज ज्यादातर साथी ट्विटर और फेसबुक साइट्स पर मौजूद हैं और उनके साथ पोस्ट को शेयर कर ब्लॉग के ट्रेफिक को बढ़ाया जा सकता है। इस बटन के उपयोग से पाठक को हर पोस्ट के नीचे इसे ट्विटर या फेसबुक पर शेयर करने का विकल्प दिया जा सकता है।

हम चमार के बच्चे किसी से डरते नहीं

My Photo गाहे-बगाहे पर विनीत कुमार एक विचारोत्तेजक आलेख प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि

ST,SC एक्ट के तहत जातिसूचक शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। ऐसा करने से जाति विशेष का अपमान होता है। थोड़ी-बहुत ही मशक्कत करने के बाद आपको ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें कि दबंग जातियों ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करके अपमानित करने का काम किया गया और इसके विरोध में बड़ी मुश्किल से  मामले दर्ज किए गए। लेकिन पंजाब की राजधानी लुधियाना के गांवों में इसी जातिसूचक शब्दों के प्रयोग से अपनी पहचान दर्ज कराने की कोशिशें तेज हुई हैं। इस जाति से जुड़े लोगों का मानना है कि उन्हें दलित भी नहीं कहा जाए,इससे उनकी पहचान छिपती है,वो चमार हैं और उन्हें इस बात पर गर्व है। पंजाबी गायक राज ददराल का यहां तक कहना है कि हम चाहते हैं कि हमारी जाति का नाम ज्यादा से ज्यादा लोगों की जुबान पर चढ़ जाए।

“आसमान में छाये बादल!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरा फोटो उच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक लेकर आए हैं                                         

जल से भर कर लाये छागल!  
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!
कुछ भूरे कुछ श्वेत-श्याम हैं, 
लगते ये नयनाभिराम हैं, 
नील गगन की चूनरिया पर, 
शैल-शिखर बन भाये बादल! 

उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!

इंटरनेट और भारत

My Photoधान के देश में! : Hindi Blog पर जी.के. अवधिया बता रहे हैं

इंटरनेट के आविर्भाव ने सम्पूर्ण विश्व में एक नई क्रान्ति उत्पन्न कर दी है। आज हम अपने घर में बैठकर ही अनेकों आवश्यक कार्यों को इंटरनेट की सहायता से निबटा सकते हैं। इंटरनेट ने “वसुधैव कुटुंबकम्” की धारणा को सत्य में परिणित कर दिखाया है। आप किसी भी समय किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति से सम्पर्क कर सकते हैं। ईमेल अथवा एसएमएस के द्वारा कहीं पर भी तत्काल संदेश भेजा जा सकता है।

शादी का लड्डू

मनोभूमि पर Manish प्रस्तुत करते हैं …

बहुत ही गम्भीर मुद्दा है, हमारे जैसे कुँवारे, याने कि बंजारों के लिए… घर गृहस्थी की बेड़ियाँ पहनाने के लिए आजकल बहुत खतरनाक किस्म के आतंकवादी समाज में घूमते फिरते हैं।

पिछली बार, अपनी दूर की मौसी जी के छोटे सुपुत्र की शादी में सपरिवार जाना हुआ था।

“वह हमारी मौसी हैं? कैसे?” इस प्रश्न के उत्तर में हमारी माता श्री न जाने कितने रिश्तो के मकड़जाल को सुलझाती हुई यह सिद्ध कर देती हैं कि रिश्ते में वह मेरी मौसी ही लगती हैं।

इमरजेंसी के ३५ साल बाद एक और इमरजेंसी !

बुरा भलाबुरा भला पर  शिवम् मिश्रा की प्रस्तुति।

अगर अभी तक आप खाद्य उत्पादों की बढ़ती कीमतों की तपिश से ही परेशान थे, तो अब महंगाई के पूरे 'तूफान' को झेलने के लिए तैयार हो जाइए। केंद्र सरकार ने एक झटके में पेट्रोल, डीजल, किरासिन और रसोई गैस की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि का ऐलान कर दिया है। शुक्रवार आधी रात से देश भर में पेट्रोल 3.73 रुपये, डीजल दो रुपये तथा किरासिन तीन रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया है, जबकि रसोई गैस की कीमतों में प्रति सिलेंडर 35 रुपये की बढ़ोतरी कर दी गई है।

मुझे कहानी कहते कहते - माँ तुम क्यों सो गईं?

लावण्यम्` ~अन्तर्मन्` पर लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्`की कविता पढिए                     

मुझे कहानी कहते कहते -

माँ तुम क्यों सो गईं?

जिसकी कथा कही क्या उसके

सपने में खो गईं?

मैं भरता ही रहा हुंकारा, पर तुम मूक हो गईं सहसा

जाग उठा है भाव हृदय में, किसी अजाने भय विस्मय-सा

मन में अदभत उत्कंठा का -

बीज न क्यों बो गईं?

..... मेरी जान !!..जरा बूझिये तो कौन है..??

मेरा फोटोज्ञानवाणी पर वाणी गीत की प्रस्तुति।

ब्लॉग लिखते हुए एक वर्ष से भी ज्यादा का समय हो गया ...और अब तक आप लोगों से अपने सबसे ज्यादा अजीज साथी का परिचय नहीं करवाया ...रुष्ट होंगे ना आप लोग ...साथी ब्लॉगर्स से ऐसी पर्दादारी ....:)
आज ठान ही लिया है अपने इस साथी से आप सबको मिलवाने का ....एक ख़त में लिख दी हैं मैंने अपने दिल की सब बात अपने इस अनोखे साथी को ...
पढ़ लीजिये आप भी और हमें धन्यवाद दे दीजिये ...इस तरह अपने प्रेम-पत्र कौन पढवाता है भला !!

“वो दन्तुरित मुस्कान : नागार्जुन”

बाबा नागार्जुन के

जन्म शताब्दी समारोह प्रारम्भ

जेठ मास की पूर्णिमा को बाबा नागार्जुन के जन्म-दिवस के अवसर पर 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक” के निवास पर 
एक वैचारिक गोष्ठी का आयोजन किया गया।

कबीर जयन्‍ती … पर

मनोज पर मनोज कुमार द्वारा

 

--- --- मनोज कुमार

हमारे देश के हिन्दू समाज में प्राचीन काल से ही वेदों पर आधारित परंपरा मान्य रही है। मध्यकाल तक आते-आते वर्णाश्रम व्यवस्था जटिल हो चुकी थी। जातियों में विभाजित समाज में हर तरह का भेद-भाव विद्यमान था। मनुष्यता स्त्री-पुरुष, ऊंच-नीच एवं अनेक धर्मों में बंटी हुई थी। छुआछूत के कठोर नियम थे। ईश्‍वर की उपासना एवं मोक्ष प्राप्ति में भी भेद-भाव था। वैदिक कर्मकांड तथा ॠढिवादिता से स्थिति बड़ी जटिल थी। समय-समय पर इस व्यवस्था के प्रति प्रतिक्रियाएँ जन्म लेती रहीं। ये प्रतिक्रियाएँ रूढिवादी समाज में परिवर्तन के लिए अल्प प्रयास ही साबित हुईं। किन्तु चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी में आस्था एवं भक्ति के मध्य से व्यापक आंदोलन की एक ऐसी बलवती धारा फूटी जिसने वर्ण-व्यवस्था पर आधारित समाज, कट्टरता एवं रूढिवादिता पर आधारित धर्मांधता को चुनौती दी।

मैं तुम्हे मरने नहीं दूँगा

My Photo न दैन्यं न पलायनम् पर प्रवीण पाण्डेय की प्रस्तुति।

कैंसर ठीक, बीपी ठीक, डायबिटीज़ ठीक, मोटापा ठीक, ऑर्थिराइटिस ठीक, हेपेटाइटिस ठीक............. लाइफ स्टाइल डिसीज़ेज़ ठीक....। मैं आपके क्षयमान अंगों को पुनः ऊर्जान्वित कर दूँगा । तुम बताओ अब मरोगे कैसे ? योग कर लो ना, देखो, मैं तुम्हे मरने नहीं दूँगा ।"

सपने में नहीं सुन रहा था पर सपने देखने के समय सुन रहा था ।

टटोल के देखा था अन्दर कोई ज़िगर कोई गुर्दा हिला नहीं .....

My Photoकाव्य मंजूषा पर 'अदा' की प्रस्तुति।

ख़यालों का आना-जाना था, किसी से किसी का सिला नहीं

ख़ुद पर ही कभी रंज हुए और कभी किसी से गिला नहीं

पत्तों का जब आग़ोश मिला, शबनमी नूर बस दमक उठा  

बदली में चाँद वो छुपा रहा, रौशन अब कोई काफ़िला नहीं

तस्सवुर में उनका आना भी क्या, आना है अब तुम ही कहो ?

पशे हिज़ाब है माहताब और नज़रों में वो गुल खिला नहीं

दिल चीर के हमने ग़ज़ल कही जज़्बात उफ़न कर चौंक गए

टटोल के देखा था अन्दर कोई ज़िगर कोई गुर्दा हिला नहीं

दिल बन जाए निग़ाह मेरा और निग़ाह बने है दिल की जुबाँ

दोनों ही लिपट कर बैठ गए, दोनों का कोई मुकाबिला नहीं

सोचो क्या पाया इनसां होके...खुशदीप

देशनामा पर खुशदीप सहगल की प्रस्तुति।                                                      

पंछी, नदिया, पवन के झोंके,
कोई सरहद न इनको रोके,
सरहदें इनसानों के लिए है,
सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इनसां होके...
ये खूबसूरत गीत जावेद अख्तर साहब ने फिल्म रिफ्यूज़ी के लिए लिखा था...सरहद से बंटने का दर्द क्या होता है, शिद्दत के साथ इस गीत में महसूस किया जा सकता है...भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी बातचीत होती है, सरहद का ख्याल ज़ेहन में आ ही जाता है...लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि इस सरहद के मायने क्या होते हैं...आप एक घर में रहते रहें...फिर अचानक उसी घर के बीच दीवार खड़ी कर दी जाए...आप दीवार के उस पार नहीं जा सकते...दीवार के उस पार वाले इधर नहीं आ सकते...

समाज के माता-पिता --- अपने दत्तक बापों का सम्मान करना सीखो

My Photoरायटोक्रेट कुमारेन्द्र पर डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर



खुशी मनाने के कुछ बिन्दु
1- आपके परिवार के बेटे-बेटी मानने लगें कि उनका जन्म आपके परिवार की अभिलाषा नहीं वरन् उन बच्चों के माता-पिता के शारीरिक सुखों की परिणति है।
2- आपके बच्चे मानते हों कि आपने उनके लिए कभी कुछ किया ही नहीं जो कुछ किया है वो इस कारण से क्योंकि आपने अपने शारीरिक सुखों के एवज में उनको पैदा करने का अपराध जो किया था।

कर्ज कलकत्ता का

मेरा फोटोचला बिहारी ब्लॉगर बनने पर चला बिहारी ब्लॉगर बनने की प्रस्तुति।

बचपने से सोचते थे कि बिहार के पूरब में पश्चिम बंगाल है, त आखिर पूर्वी बंगाल कहाँ है? पता चला पूर्वी बंगाल कहीं नहीं है, जो था आजकल पूर्वी पाकिस्तान कहलाता है. त बेकारे न बंगाल को पश्चिम बंगाल कहते हैं! मगर हमरा बात का त कोनो भैलूए नहीं. खैर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान बन गया बांगला देस. तबो पश्चिम बंगाल का नाम ओही रहा. आखिर में हम हार मान कर मन में बईठा लिए कि एही नाम सही है. लेकिन बोलने से त कोनो हमको रोक नहिंए सकता था, एही से आज तक बंगाल बोलते हैं.

का मालूम था कि इसी देस का राजधानी में हमको छः साल काम करना पड़ेगा. अऊर इहो मालूम नहीं था कि ई सहर हमरे जन्मभूमि के बाद, हमरे जीवन का हिस्सा बनने वाला पहिला सहर हो जाएगा. इतिहास, आजादी का लड़ाई, साहित्य, संगीत, संस्कृति, शिल्प, कला अऊर का बोलें. बंगाल का जोगदान ई देस भुला नहीं सकता है.

अब इज़ाज़त दीजिए। अगले हफ़्ते फिर मिलूंगा।

रविवार, जून 20, 2010

रविवासरीय चर्चा

नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हाज़िर हू रविवार की चर्चा के साथ।

शह और मात

मेरी भावनायें... पर रश्मि प्रभा जी की शह और मात एक कटु यथार्थ का चित्रण है।

मेरा फोटो


अब तो बुद्धिजीवी की परिभाषा भी                                                             

बिल्कुल बदल गई                                                                               

संस्कारों की परिधि से बाहर                                                                       

बड़ों को नगण्य बना देना                                                                          

अंग्रेजी शान बन गई ....                                                                         

अंग्रेजों की शह और मात                                                                         

हमारी किस्मत बन गई !

रश्मि जी आपकी कविताएं गहरे विचारों से परिपूर्ण होती हैं।  यह कविता भी अपवाद नहीं है।

मेरा फोटोदिन वह जल्दी आने वाला है

 

मेरा पक्ष पर नीरज कुमार झा

की प्रस्तुति आधुनिकता के साथ साथ सांस्‍कृतिक परंपरा की झलक है।                                                                                             दिन वह जल्दी आने वाला है                                                                       

जब न होंगी सीमाएँ                                                                               

और न होंगी सेनाएँ                                                                                      

टूटेंगी दीवारें मानवता के बीच                                                                

दरकिनार होंगे लोग वे                                                                              

सधते हैं हित जिनके

मानवता के बटे होने से                                                     

नहीं होगा उद्योग सबसे बड़ा

हत्या                                                                    और नरसंहार के  औजारों का

जो दिख रहा है वह सब कला है

 

मेरा फोटो

 

 

 

 

street light पर RAVINDRA SWAPNIL PRAJAPATI कहते हैं

बीमार शेर जिस तरह से शिकार नहीं कर पाता उसी तरह से बीमार कलाकार कलाकृति की रचना नहीं कर पाता। कला के लिए जीवन को बीमारी से बचाना जरूरी है। जीवन की बीमारियां हैं चापलूसी, रिश्वत, बेईमान होना एक कलाकार तभी बनता है जब वह तप्त हो। उसके पास एक आग हो। वरना वह साधारण होकर बुझ जाता है। साथ ही प्रस्तुत कर रहे हैं प्रख्यात चित्रकार अखिलेश से रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की बातचीत ।

“कौन राक्षस चाट रहा?” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

उच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक प्रस्तुत कर रहे हैं राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति जो पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता है।                                                                                                      

आज देश में उथल-पुथल क्यों,                                                                

क्यों हैं भारतवासी आरत?                                                                      

कहाँ खो गया रामराज्य,                                                                         

और गाँधी के सपनों का भारत?


आओ मिलकर आज विचारें,                                                                    

कैसी यह मजबूरी है?                                                                         

शान्ति वाटिका के सुमनों के, 

उर में कैसी दूरी है?

बिछिलाहटें..

लेटे हुए जमीन परअज़दक पर Pramod Singh कहते हैं कि

खाली तीन दिन की बारिश हुई है, एतने में कंप्‍लीट रामलीला का शो देख लीजिए!

मतलब सोमारु का मंझलका छौंड़ा था, बछिया को जाने कौन उंगली कर रहा था कि डंडी, बछिया का मम्‍मी देखत रही, देखत रही, फिर छिनकके अइसा दौड़ी है छौंड़वा का पीछे, कि अंगना का बिछिलाहट में फिसिल के पिछलका गोड़ तोड़वा ली है! केस नम्‍मर टू: सगीना महतो के खपरे पर तैयार, बतिया जेतनो लवकी था, सब मालूम नहीं केकरा घर का चोर-पाल्‍टी रहा, बरसाती का अंधारा में जाने कब लुकाके कवन जतन कब खपरा पे चढ़ा, खपरे का टोटल लवकी खजाना खलास. नंगा दिन-दहाड़े का डकैती! अब केस नम्‍मर थीरी पूछिये? डेढ़ हफ्ता से जोत्‍सना दीदी जीवन-लीला खतम कै लेंगी का बात सोच-सोच के अपना एक जगह अस्थिर बैठना-ठाड़ा होना तक मोहाल किये थीं, फिर आखिरकार जब तै कर लिया कि शनिच्‍चर की रात फैसले की रात होगी तो बियफे से जो बिजली कड़कना चालू हुआ और मुसलाधारी का खपड़ा और टीना और दुआरी और अंगना में भहरना, जोत्‍सना दीदी सुसैडी का आइडिया पिछवाड़ा का दीवार का पीछे- प्राइबेट कपड़ा का माफिक- फिलहाल के लिए फेंक आई हैं. अइसा कीचर-कादो का बीच अंगना का जमीन पर अपने को जीवन-सून्‍य देखने का खयाल जोत्‍सना दीदी को बेहद अश्‍लील लगता है!

अपना अपना आनंद

मनोज पर मनोज कुमार का एक यात्रा वृतांत पढिए।

My Photo

कोलकाता की उमस भरी तपती-जलती दोपहरी को बड़े साहब का संदेश मिला कि इस बार का राजभाषा सम्‍मेलन हम देहरादून में करेंगे। कोलकाता के 40 डिग्री सेल्सियस का तापमान और लगभग 100 प्रतिशत की आर्द्रता वाले माहौल में भी लगा कि कोई शीतल बयार आकर छूकर चली गई हो।

तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार हम पिछले सप्‍ताहांत (11-12 जून) देहरादून में सम्‍मेलन कर आए। गर्मियों में देहरादून जाना एक सुखद अनुभव रहा। देहरादून उत्तराखण्ड की राजधानी है। हम मैदानी इलाकों में रहने वालों के लिए पहाड़ी स्‍थल तक की यात्रा एवं स्‍थान परिवर्तन से बहुत राहत मिलती है। कईयों के मुंह से देहरादून की जलवायु की प्रशंसा सुन रखी थी। गर्मियों में भी वहां हल्‍की सी ठंड रहती है। लू तो कभी चलती ही नहीं। हरे भरे जंगल चारों ओर फैले हैं। फिर, मसूरी की सैर का आनंद ही अलग है।

पिता का योगदान

मेरा फोटोज़िन्दगी पर वन्दना जी कहती हैं

एक बच्चे के व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास में एक पिता का योगदान माँ से किसी भी तरह कम नहीं होता.माँ तो वात्सल्य की मूर्ति होती है जहाँ अपने बच्चे के लिए प्रेम ही प्रेम होता है  मगर पिता उसकी भूमिका यदि माँ से बढ़कर नहीं तो माँ से कम भी नहीं होती. ज़िन्दगी की कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पिता अपना धैर्य नहीं खोता और उसकी यही शक्ति बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है. बच्चों के जीवन के छोटे -बड़े उतार -चढ़ावों में पिता चट्टान की तरह खड़ा हो जाता है और अपने बच्चों पर आँच भी नहीं आने देता. बेशक ऊपर से कितना भी कठोर क्यूँ ना दिखे पिता का व्यक्तित्व मगर ह्रदय में उसके जो प्यार होता है अपने बच्चों के लिए वो शायद दूसरा समझ ही नहीं सकता.

बेमिसाल दास्ताँ!:2(antim)

पढिए simte lamhen पर जिसे प्रस्तुत कर रही हैं  kshama

मेरा फोटो

यह भित्ती चित्र केवल कढाई से बनाया है... जब कभी इस चित्र को या डाल पे बैठे,या फिर  आसमान में उड़ने वाले परिन्दोको देखती हूँ ,तो मुझे वो  लोग याद आ जाते हैं,जिनके बारे में लिखने जा रही हूँ.
अगले दिन हम दोनों फिर बतियाने बैठ गए.मासी की बहन ने उस डॉक्टर से बात चीत कर ली. इधर उन्हों ने अपनी बहू के सामने प्रस्ताव रखा वह संजीदा हो गयी.कुछ देर खामोश रहकर बोली: " ठीक है माजी, मै इस लड़के को मिलने के तैयार हूँ....पर मेरी भी एक शर्त है.."
मासी:" क्या शर्त है?"
बहू :" उसने मुझे आपके साथ स्वीकार  करना होगा...तभी मै ब्याह के लिए राज़ी हो सकती हूँ.."

ख़्वाबों की लच्छी !

My Photoसजी है

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति पर अनिल कान्त के सौजन्य से। कहते हैं

उसकी आँखों में ढेर सारे ख्वाब थे । सुनहरे सपनीले ख्वाब । रंग बिरंगे खिखिलाते फूलों की तरह, आसमान में जगमगाते सितारों की तरह । हर ख्वाब अपने आप में बेशकीमती था । बिल्कुल सौ फ़ीसदी अनमोल । मैं उसके ख़्वाबों को देखकर-सुनकर मुस्कुरा कर रह जाता था । इतना मासूम भी भला कोई होता है । जानता हूँ वो इस दुनिया का हिस्सा होते हुए भी दुनिया से अलग थी । उसका भोलापन, उसकी मासूमियत और उसकी सादगी सौ प्रतिशत शुद्धता लिये हुए थे । मुझे उससे प्यार हो गया था । "आई एम इन लव" जब मैंने ये शब्द उससे कहे थे तो उसने पास आकर के मेरे गालों को चूमा था और हौले से कान में कहा था "मी टू" । मैंने उसे ऐसे देखा था जैसे खुली आँखों से कोई ख्वाब देखा हो । वो मुझे देखकर मुस्कुरा गयी थी और दूजे ही पल मैं । मैंने उसे गले लगा लिया था । उसका और मेरा प्यार के इजहार का तरीका भी कितना अलग था, नहीं हमारा । मेघा के साथ सब कुछ हमारा सा ही लगता था ।

हमारी साझा संस्कृति में दलित सम्मान

ज्ञान दर्पण पर Ratan Singh Shekhawat एक सारगर्भित आलेख के द्वारा बताते हैं कि

दलित उत्पीडन की ख़बरें अक्सर अख़बारों में सुर्खियाँ बनती है फिल्मो में भी अक्सर दिखाया जाता रहा है कि एक गांव का ठाकुर कैसे गांव के दलितों का उत्पीडन कर शोषण करता है | राजनेता भी अपने चुनावी भाषणों में दलितों को उन पर होने वाला या पूर्व में हुआ कथित उत्पीड़न याद दिलाते रहते है पर सब जगह ऐसा नहीं है गांवों में उच्च जातियों के लोग पहले भी दलितों को सम्मान के साथ संबोधित करते थे और अब भी करते है साथ ही अपने बच्चों को भी संस्कारों में अपने से बड़ी उम्र के लोगों को सम्मान देना सिखाते है चाहे बड़ी उम्र का व्यक्ति दलित हो या उच्च जाति का |

मुआवजे से ज्यादा जरूरी दंड.

शकुनाखर पर hem pandey एक गंभीर मसले पर अपने विचार रखते हुए कहते हैं कि

एक बार फिर भोपाल गैस त्रासदी राजनीति और मुआवजे के चक्रव्यूह में फंसती नजर आ रही है। भाजपा जहां इस त्रासदी के फैसले को मुद्दा बनानेपर तुली है वहीं कांग्रेस योजना आयोग द्वारा गैस पीड़ितों के लिये आनन फानन में दिए गए ९८२ करोड़ रुपये की मदद कोअपने प्रयासों का फल बता रही है। ज्ञातव्य है कि इससे पहले मध्य प्रदेश ने आयोग से ९०० करोड़ की मदद माँगी थी, लेकिन आयोग नेध्यान देने की जरूरत नहीं समझी। हालांकि गैस पीड़ितों के लिये काम करने वाले संगठनों ने भाजपा द्वाराप्रायोजित धरने का विरोध कर यह जताने की कोशिश की कि वे इस राजनीतिक नौटंकी को समझ रहे हैं,किन्तु डर है कि वेभी मुआवजे के भ्रमजाल में फंस कर मुख्य मुद्दे को भूल न जाएँ । गैस त्रासदी के तुरंत बाद भी मुआवजा मुख्य मुद्दा होगया था । स्वयं सेवी संगठनों सहित राजनीतिक पार्टियां और स्वयं पीड़ित भी थोड़ा बहुत मुआवजे के चक्कर में दोषियों को दण्डित करने के मुख्य मुद्दे को भूल गए थे।

लो क सं घ र्ष !: अपसंस्कृति

कबीरा खडा़ बाज़ार में पर Suman प्रस्तुत कर रहे हैं सुनील दत्ता की रचना।


दुनिया की आप़ा धापी में शामिल लोग
भूल चुके है अलाव की संस्कृति
नहीं रहा अब बुजुर्गों की मर्यादा का ख्याल
उलझे धागे की तरह नहीं सुलझाई जाती समस्याएं
संस्कृति , संस्कार ,परम्पराओं की मिठास को
मुंह चिढाने लगी हैं अपसंस्कृति की आधुनिक बालाएं
अब वसंत कहाँ ?

इन्डली .....ब्लॉग वाणी ....

My Photoकाव्य मंजूषा पर  'अदा'

नए ब्लोग्गर्स से कुछ कहना चाहती हैं और कहती हैं कि....बिना मांगे तो माँ भी दूध नहीं देती बच्चों को...उन्हें भी ख़ुद को प्रस्तुत करना चाहिए...संकोच नहीं करना चाहिए....शालीनता से अपनी उपस्थिति को महसूस कराना चाहिए.....याद रखिये किसी को अपने ब्लॉग तक ले जाना और उसे की बोर्ड पर उंगलियाँ फिरवा कर कमेन्ट देने के लिए प्रेरित करना आसन नहीं है....लेकिन आप लोग कर सकते हैं....अगर आप को स्वयं पर विश्वास है तो..आप यह काम कर सकते हैं....

लो बबुआ देव बाबा बनारस पहूंच गये

My Photoमेरी दुनिया मेरा जहां.... पर देव कुमार झा

बता रहे हैं कि लो बबुआ देव बाबा बनारस पहूंच गये। वईसे ट्रेन की यात्रा हमेशा से ही अलग अनुभव लेकर आती है और इस बार की यात्रा भी कोई अपवाद नहीं थी। ममता जी की असीम अनुकम्पा से देव बाबा पूरे चौबीस घंटे की देरी से मुम्बई में ही फ़ंसे थे और यात्रा इस बार स्लीपर की थी सो अपनें मनोभावों को अपनी पिछली पोस्ट से जाहिर भी कर चुका था। तो यह लीजिए दास्तानें रेल.... या कहिए की दास्तानें स्लीपर क्लास.... ट्रेन का नाम.... दादर बनारस एक्सप्रेस.

इन्तहा

Shayari, ghazals, nazms पर पढ़िए  PASHA की एक बेहतरीन ग़ज़ल                  

यू ना मिल मुझ से दुश्मन हो जैसे,
साथ चल मेरे दोस्त हो जैसे.
लोग यू देखर हँस देते है,
तू मुझे भूल गया हो जैसे.
दोस्ती की इन्तहा इतनी ना बढ़ा,
यू ना इतरा खुदा हो जैसे.

किताबें और करियर

My Photoके ऊपर प्रकाश डाला गया है

भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर  शिक्षामित्र द्वारा। बताते हैं कि

भारत में प्रकाशन उद्योग काफी फैला हुआ है। सदियों पुराने इस फील्ड में प्रकाशक अब आधुनिक तौर-तरीके अपना रहे हैं, फिर बात चाहे प्रिंटिंग की हो, मार्केटिंग की या डिलिवरी की। जाहिर है, प्रकाशन जगत करियर की भी अच्छी संभावनाएं सहेजे हुए है।
आज की डिजिटल दुनिया में भी किताबों ने अपनी जगह बरकरार रखी है, बल्कि यह कहना चाहिए कि प्रकाशन उद्योग आज एक रोचक दौर से गुजर रहा है। इस फील्ड में बढ़ती प्रतियोगिता से न सिर्फ किताबों का बाजार फैला है, बल्कि प्रॉडक्ट की क्वॉलिटी भी सुधरी है। साथ ही पाठकों तक किताबों की काफी ज्यादा वैराइटी भी पहुंचने लगी है। रिटेल बाजार के विस्तार, बढ़ते पाठक और डिजिटल मीडिया के सहयोग ने इस इंडस्ट्री के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोले हैं।

रोज रोज की

My Photoबातों का एक आलसी का चिठ्ठा पढिए गिरिजेश राव के पोस्ट पर। कहते हैं

हमारे क्युबिकल्स के बीच एक मौन खिंचा है। कीबोर्ड की किटकिटाहटें, ग्राहकों से की गई बातें और    इंटरकॉम की सौम्य कुनमुनाहटें रूटीन हैं, 'मौन' में शामिल हैं। कितनी बार लगा कि मैं चुप तुमसे कुछ कह जाता हूँ। कितनी बार अनुभव हुआ कि तुमने मुझे सुना है। कितनी बार लगा कि मॉनिटर को बेध तुम्हारी दृष्टि मेरा एक्स रे बिम्ब सोख रही है !पर नज़र मिलते ही वही चिर परिचित औपचारिक मुद्रा और रुक्षता हमें धारण कर कह उठते हैं," यू सी ! बड़ा प्रेसर है। मुझे तो यही कहना है तुम्हारी वज़ह से टार्गेट पूरे नहीं हुए।" हममें होड़ है - कौन इसे पहले कह जाता है। क्या इससे कुछ अन्तर पड़ता है?

पंडिताइन की पूड़ियाँ

खाइए मनोभूमि पर Manish के साथ।

अगर आप ग्रामीण पृष्ठभूमि से ज़रा भी जुड़े हैं, तो आपको यह पता ही होगा कि पेट में ज़रा सी कुलबुलाहट होते ही कैसे बड़े काका या पड़ोस के चाचा, लोटे या फिर इंजन आयल के पुराने डिब्बे में पानी भर कर दूर खेतों की तरफ एक लम्बी दौड़ लगाते हैं…… इस दौड़ के दौरान, रास्ते में अगर कोई सलामी ठोक दे या फिर अभिवादन के लिए चरण छूने का प्रयास करे तो खीझ भरा एक विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है – “भाग यहाँ से……”

सर्वोपरि

My Photoछोटी कविताओं द्वारा बहुत ही सारगर्भित बात पढना हो तो आप Apanatva पर Apanatva जी की कविताएं पढा कीजिए। आज भी वो ऐसा ही प्रस्तुत कर रही हैं।

जिनके लिये
स्वार्थ है
सर्वोपरि
उन्हें त्याग व
परोपकार पर
दूसरों को
भाषण देते
सुना है ।
क्या करे
शिकायत
हम सभी ने
तो इन
नेताओं को
अपना अमूल्य
वोट देकर
सहर्ष चुना है ।

हँसी का कीमत

मेरा फोटोजानना हो तो चलिए चला बिहारी ब्लॉगर बनने पर और चला बिहारी ब्लॉगर बनने से सुनिए क्या कहते हैं वो? कहते हैं

हम त रेडियो के जमाना में पैदा हुए, इसलिए रेडियो पर नाटक करते थे, बचपने से. आकासबानी पटना के तरफ से हर साल होने वाला इस्टेज प्रोग्राम में, पहिला बार आठ साल का उमर में इस्टेज पर नाटक करने का मौका मिला. नाटक बच्चा लोग का था, इसलिए हमरा मुख्य रोल था. साथ में थे स्व. प्यारे मोहन सहाय (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सुरू के बैच के इस्नातक, सई परांजपे से सीनियर, 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' अऊर परकास झा के फिल्म 'दामुल' अऊर 'मृत्युदण्ड' में भी काम किए) अऊर सिराज दानापुरी. प्यारे चचा के बारे में फिर कभी, आज का बात सिराज चचा के बारे में है.

भूली बिसरी ग़ज़ल

My PhotoSamvedana Ke Swar में सम्वेदना के स्वर सुना रहे हैं ग़ज़ल। बताते हैं कि 

कुछ साल पहले, जनाब तुफ़ैल चतुर्वेदी ने उनकी त्रैमासिक पत्रिका ‘लफ्ज़’ में दो लाईनें दीं और उन्हें 'ऊला' या 'सानी' की तरह इस्तेमाल करते हुए, दो अलग-अलग ग़ज़ल लिखने का एक मुक़ाबला रखा. मैंने भी लिखी थी दो गज़लें और आदतन भेजी नहीं. भूल भी गया लिखकर. आज आप लोगों के सामने रख रहा हूँ. ग़ज़ल का मक़्ता नया लिखा है, जो ‘मेरी’ ग़ज़ल का ‘हमारा’ एडिशन है:

नज़रे-आतिश  मेरा  मकान भी  था,

तब लगा सर पे आसमान भी था.

सारी दुनिया ने ज़ख्म मुझको दिए,

इनमें शामिल तुम्हारा नाम भी था.

मुफलिसी    में    जो    बेच    डाले   थे,

उनमें यादों का कुछ सामान भी था.

चर्चा चर्चा में मुझे क्रिकेट मैच देखने का समय ही नहीं मिला। कितना रोमांचक था यह मैच जब एक गेंद रहते हरभजन के छक्के से भारत पाकिस्तान को हरा कर मैच जीता। इसने मेरे चेहरे पर खुशी के रंग बिखेर दिए। आपने तो पूरा मैच देखा ही होगा। तो इस हंसी-खुशी और प्रसन्नता के साथ आज की चर्चा को यहीं विराम देता हूं, राजभाषा हिंदी पर प्रस्तुत विचार से

आज का विचार

राजभाषा हिंदी पर मनोज कुमार द्वारा प्रस्तुत

                        मुस्कान

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होठों पर मुस्कान हर मुश्किल कार्य को आसान कर देती है।