फ़ॉलोअर



यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, नवंबर 06, 2010

“प्रतीक्षा एक दिवाली की…!” (चर्चा मंच-329)

मित्रों!
दीपों का प्रकाश पर्व सदैव प्रकाशित रहने का सन्देश छोड़कर विदा हो गया है! आगामी 365 दिन हम सबके हृदय नव ऊर्जा से प्रकाशित रहें। इसी कामना के साथ आज का चर्चा मंच प्रस्तुत कर रहा हूँ।।
dangal diwali
ज्ञानचंद मर्मज्ञ-:-मैंने साल दर साल दीपक जलाया, कई बार जलकर भी दीपावली का वादा निभा नहीं पाया ! आज भी….. प्रतीक्षा एक दिवाली की
ख़ूब रौशन करें अपना घर लेकिन याद रखें कि दुनिया में करोड़ो घरों में अब भी अंधेरा है…अशिक्षा का, ग़रीबी का…करोड़ो आंखों में कोई सपना नहीं…रौशनी की तलाश में
हर साल, बैकुंठ चतुर्दशी पर .. ममता के लिए तरसती खाली गोद लिए मातृत्व की चाह में, महिलाए जिनकी गोद बर्षो से खाली है...और जो समाज में अज्ञानतावश कटु व्यंग का शिकार भी होती है... वो महिलाये इस मंदिर में सारी रात हाथ में जलता हुवा दिया ले कर ऐसे तटस्थ मौन खड़ी रहती है की मानो कोई मूरत हो ... क्या प्रभू इनकी इच्छाये पूरी करेगा.. पुनः बैकुंठ चतुर्दशी आने वाली है .. इनके साथ मैं भी प्रार्थनारत हूँ ... पर चाहूंगी की अच्छा चिकित्सीय परामर्श भी लें .. तदानुसार इलाज भी.."कैसा रहेगा
दीपावली को दीपों का पर्व कहा जाता है और इस दिन ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक के देवता व विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है।….दीपोत्सव और लक्ष्मी-गणेश की पूजा परंपरा
भाभी के कानों में झूम रही बालियाँ! दीपों से भरी-भरी थिरक रहीं थालियाँ! भाभी मुंडेरों पर दीपक सजाती हैं! दीवाली पर ढेरों ख़ुशियाँ ले आती हैं………मन के कोने में भी
चलो दीप एक ऐसा जलायें ..........ह्रदय के सभी तम मिट जाएँ लौ से लौ ऐसी जगाएं दीप माला नयी बन जाए कुछ तुम्हारे कुछ मेरे ख्वाब साकार हो जाएँ तेरे मेरे की छाया से….
तमसो मा ज्योतिर्गमय साल की सबसे अंधेरी रात में*दीप इक जलता हुआ बस हाथ मेंलेकर चलें करने धरा ज्योतिर्मयी बन्द कर खाते बुरी बातों के हम भूल कर के………..दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!
दीपावली की बधाई--खूब बांटे खील पताशे और मिठाई -----
हम सभी भाग्यवान हैं...जो अंतरजाल जैसी सुविधा मिली है....मंगल दीप जले....!
कई दिनों से मन बनाए हूँ, कि दीवाली पर कुछ ज़रूर लिखूंगी. कम से कम एक संस्मरण का तो हक़ बनता है, छपने का , लेकिन........ धरी रह गई पूरी सोच, और लिखने की तैयारी…..एक बेमानी सी पोस्ट...
बर्फ की परतों के नीचे दबी होती है.. ज्यूँ पतझड़ में गिरी पत्तियां, वैसे ही मन की तहों में दबे होते हैं विचार.. कवितायेँ और अनेकानेक तथ्य;…..ये अब जाने कौन!
जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है... - **** रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर ज़ारी है क़यामत से कब हो सामना, सोच में वो क़हर ज़ारी है !
होली और दीवाली पर तो आते-जाते रहा करें कम से कम त्योहारों पर हम इक दूजे से मिला करें बारह महीनों में इक दिन आता है ये शुभ दिन हम आज तन के, मन के, धन के……..दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
पहले अंडा या मुर्गी , ये फैसला तो आज तक न हो सका है और न हो पाएगा , पर इसी तर्ज पर कुछ दिनों से एक महत्‍वपूर्ण विषय पर मैं चिंतन कर रही थी ,……….पहले जन्‍म या फिर भाग्‍य . . विश्‍लेषण के लिए कम से कम 100 अस्‍पतालों का आंकडा चाहिए !!
लहर लहर पहर पहर कशाकशी,खलबली जो कविता गुँथ रही वही कहीं बिखर गई 2 वो भाव जले सिके हुए गरम थे जब सील गए परोसती कैसे ? 3. तुम्हारी खुली आँखों के सपने मैने...वो कविता जो नहीं लिखी
*मैं वह दीपक नहीं , जो आँधियों में सिर झुका दे ।*** *मैं वह दीपक नहीं , जो खिलखिलाता घर जला दे ।* *मैं वह दीपक नहीं
* हर ओर एक गह्वर है एक खोह एक गुफा जहाँ घात लगाए बैठा है अंधकार का तेंदुआ खूंखार - * * * * * * * * * * * * *उजास*
चरागों से सीखें जलने का सबक़ दिलों के बुझने का भी तो सबब जानें ये जल तो लेते हैं एक दूसरे से अन्धेरा अपनी तली का न पहचानें परवाह करते हैं सिर्फ………मनों अँधेरा खदेड़ते नन्हें से चिराग
तारों से दमकता आकाश , दीपावली की रात , ओर सतत टिमटिमाते , माटी के दीपक , घर रौशनी से चमकने लगे , मंद हवा के स्पर्श से , दिए भी धीरे धीरे , बहकने लगे……ओर तुलना कैसी
अंधेरों में कुछ रोशनी की बात तुम करो नजर और दामन बचा कर चलने की बात करो भाषा भी है ,शब्द भी है पास कलम के हमारे भावों में डुबो कर सही तस्वीर तुम करो………
कुसुम कुसुम से कुसुमित सुमन से तेरे मेरे मधुरिम पल से अधरों की भाषा बोल रहे हैं दिलों के बंधन खोल रहे हैं लम्हों को अब हम जोड़ रहे हैं भावों को अब हम तोल रहे….
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय",
शमशेर बहादुर सिंह, बाबा नागार्जुन,
केदार नाथ अग्रवाल और फैज़ अहमद “फैज़” की
“परिचर्चा”
अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।
आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

शुक्रवार, नवंबर 05, 2010

दीपावली पर शुभकामनायें और चर्चा- डॉ नूतन गैरोला

deewali दिवाली फ़िर से आई – शुभकामनाएँ
“आओ दीवाली मनाएँ प्यार से!” आज दीपावली के इस पावन अवसर पर मैं आपके सम्मुख चर्चा के लिए कुछ लिंक्स ले कर आई हूँ | यूं तो आप सभी मेरी तरह आज त्यौहार की खुशी में घर को विशेष ढंग से फूल मालाओं, रंगोलियो से सजाने में लगे होंगे , रसोई से लजीज पकवानों की  खुशबू आ रही होगी  | रात की पूजा की तैयारी के लिए दीपमाला तैयार किये जा रहे होंगे और बच्चे लोग आतिशबाजी के लिए हर्षोल्लास से खरीदारी के लिए तैयार होंगे | मै भी कुछ दिवाली की रौनक यहाँ ले कर आई हूँ |
सर्वप्रथम लक्ष्मी गणेश जी की पूजा के साथ चर्चा होगी

laxmi-ganesh
माँ लक्ष्मी देवी की स्तुति - आपका घर धनधान्य से परिपूर्ण हो, खुशियों का वास हो  
जय माँ लक्ष्मी


महालक्ष्मी स्त्रोतम
प्रभु गणेश को नमन - हमारा सभी कार्य निर्विघ्न परिपूर्ण हो | विश्व का कल्याण हो
जय गणपति बाप्पा

गणेश स्तुति - ऑडियो वीडियो 

अब बारी है दिवाली पर मुशायरा और कविताओ की -
नवीन जी ने बताया की यहाँ पर दिवाली का मुशायरा चल रहा है
आप भी शरीक होंवें
शस्वरम में नन्हे दीपों से क्या कहा जा रहा है नन्हे दीप - न डरना
दिवाली पर एक संक्षिप्त सुन्दर कविता दिवाली पर शुभकामनायें शन्नो जी मानव की तुलना दीये से करती है और कहती हैं
मानव-दीप
एक प्रेम ऐसा भी जब दीया और अँधेरा कहे हम जीते है एक दूसरे के वास्ते एक प्रेम ऐसा भी - दीया और अँधेरा दीपावली और इंसान पर अनुपमा जी क्या कहती हैं दीप और इंसान 
आज महान कवयित्री महादेवी वर्मा जी की एक कविता यहाँ पर कबाडखाना ब्लॉग से शेयर कर रही हूँ   दीप रे तू जल अकम्पित

अब नंबर है मिठाई का |

लेकिन सावधान - आजकल दूध का ही भरोसा नहीं तो मावे का क्या तो मिठाई भी स्वास्थ के लिए हानिकारक  - सो मिठाई ऐसी लें जो मावे से न बनी हो - बेहतर हो घर की बनी मिठाई ले ..
मिलावट के खेल में अधिकारी हुए फेल  और  पास आयी दिवाली
अब मै आपको दो - तीन  जगह की दिवाली के बारे में बताउंगी
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रो में दीपावली का त्यौहार किस तरह से मनाया जाता है.. और वहाँ की परम्पराएँ देखिये -उत्तराखंड गढवाल की एक दीपावली

  गुजरात में दिवाली कैसे मनाई जाती है .. वहाँ के रीति रिवाज कैसे है देखिये -गुजरात की दिवाली राजस्थान में दीपदान की अपनी ही एक सुन्दर परंपरा है देखिये हर आंगन बिखरे आलोक
और जयपुर की दिवाली
यशवन्त कोठारी का आलेख - गुलाबी नगरी की गुलाबी दीपावली
                        

अब हसियेगा, नहीं तो कैसे खुश होइएगा -
             खुलकर मुस्‍कुराना    जीभ चिढ़ाते हुए मुस्‍कुराना    अभी वापस  उत्साह भरी मुस्‍कान  पलक झपकाकर मुस्‍कुराना  फ़र्श पर लोटते हुए हँसना 
हँसी फुहार के साथ
बे-ईमान लोग    डरिये नहीं आपको नहीं कहा जा रहा |
काजल कुमार जी का कहना है
चलो किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ...
काका हाथरसी क्या कहते है ?
काका हाथरसी
जरा गंभीर मुद्दों पे आजकल चलती चर्चाओं पे एक निगाह डालें | दो पोस्ट अरुंधती जी पर
एक जिद्दी धुन में धीरेश शैनी जी मिडिया के रवैये पर अरुंधती जी के विचार रखते हैं | डॉ दिव्या क्या कहती है अपनी पोस्ट पर काश्मीर को आज़ाद होना चाहिए -- भूखे नंगे हिंदुस्तान से -- अरुंधती रॉय
दिवाली क्यों मनाई जाती है - क्या आप इस के बारे में पूर्ण जानकारी रखते है
लक्ष्मी जी को बचाने वामन रूप
क्या कहते है पंकज त्रिवेदी जी
राम के त्याग का स्मरण - अजित गुप्‍ता जी का कहना है


अब आप दिवाली में फोटो भी खींचना चाहेंगे तो जाहिर है  कि आप आतिशबाजी और रौशनाई के साथ खींचना चाहेंगे - तो फोटोग्राफी के टिप जानिए - खास दिवाली के लिए
पटको की तस्वीर कैसे खीचे 
अब आतिशबाजियों की फोटो खींचनी भी सीख ली होगी चलें दिवाली मनाने
 चलो मनाएं दीवाली रे
और अब पुनः ईश्वर की वंदना करती हूँ
“वीणापाणि का आराधन करते विरले हैं।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

अभी वापसआप सभी को एक सुरक्षित और खुशियों से भरी दीपावली की शुभकामनायें करती हूँ
खास - मिलावटी मिठाइयो से बचे |
मुस्‍कानरंगोली बनायें पूजा करे, दीप प्रज्वलित करे |
गुस्‍से भरी मुस्‍कान बारूद से हवा, आवाज का और माहोल का प्रदुषण न करें |
हताश मुस्‍कानआग से बचे | दिवाली की आतिशबाजी में कपडे अनुकूल पहने | पानी की भी व्यवस्था रखे | आतिशबाजि करते समय बच्चो के साथ एक समझदार व्यस्क का होना भी आवश्यक है |
खुलकर मुस्‍कुरानादीपोत्सव को खूब हर्षोल्लास से मनाइए पर मन में निहित अंधियारे को भी मिटाइए |

पुनः दीपावली पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं  - डॉ नूतन गैरोला 
11t6ctx

गुरुवार, नवंबर 04, 2010

गुरूवासरीय चर्चा( महज चन्द लिंक्स)

नमस्कार/सलाम/सतश्रीअकाल/जयहिन्द !!!

सबके जीवन में प्रकाश हो,व्यवहार एवं कर्म की पवित्रता हो,ह्रदय में मधुरता का वास हो, इस मंगलकामना के साथ चर्चा मंच के सभी पाठकों को दीपोत्सव की अनन्त शुभकामनाऎँ!!!

गुरूवासरीय चर्चा में आप सभी पाठकों का हार्दिक स्वागत है. आज की चर्चा में आपको न तो कोई टीका न टिप्पणी और न ही कोई रामकहानी सुनने को मिलने वाली है……मिलेंगें सिर्फ चन्द लिंक्स…बस!

क्योंकि तुम अरुंधती नहीं हो मेरी बहन

क्या आप इरोम शर्मीला को जानते हैं? नहीं, आप अरुंधती रॉय को जानते होंगे और हाँ आप ऐश्वर्या राय या मल्लिका शेहरावत को भी जानते होंगे, आज(2 नवंबर) शर्मीला के उपवास के १० साल पूरे हो गए उसके नाक में जबरन रबर का पाइप डालकर उसे खाना खिलाया जाता है, उसे जब नहीं तब गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जाता हैं,वो जब जेल से छूटती है तो सीधे दिल्ली राजघाट गांधी जी की समाधि पर पहुँच जाती है और वहां फफक कर रो पड़ती है,कहते हैं कि वो गाँधी का पुनर्जन्म है…..

बेनकाब बेशराब(मनीष जोशी)

उफ़-आह रंग साज़ हैं, लुब्बे लुबाब में
बेलौस बांटते हैं सिफ़र, दो के आब में
नीचे सिफ़र दिया, यही ऊपर की सल्तनत
ऐसा बयाँ इस साल भी, लिक्खा किताब में
कैसा बयान था, वहाँ किसका मकान था
चल बाँट लें बन्दर के नांईं, सब हिसाब में

रौशन हो सबका आंगन भी !(स्वराज्य करूण)

न तरसे कोई दो वक्त की थाली के लिए ,
दुआ करें हम सब की खुशहाली के लिए !
हो गाँव अपने गीतों से गुलज़ार हमेशा ,
खेतों में दूर-दूर तक हरियाली के लिए !
शहरों की भीड़ में भी हर कोई लगे अपना ,
ऐसा तो कोई हो चमन माली के लिए !

संगीत और श्रृंगार(बृजेन्द्र सिँह)

जब मिलती थीं उनसे नज़रें
सातों सुर खिल जाते मन में,
जो अधकच्चे रह जाते थे
वो तड़पाते फिर सपनों में..
इस मन पगले ने ढूँढा है
तुमको हर कवि की कविता में,
संयोग में वो रस मिला नहीं
जो है वियोग की सरिता में..

एक ग़ज़ल(तिलकराज कपूर)

वायदा है मैं तिमिर से हर घड़ी टकराउँगा
स्‍नेह पाया है जगत से रौशनी दे जाउँगा।
कौन हूँ मैं बूझ पाओ तो मुझे तुम बूझ लो
लौ पुराना प्रश्‍न है जो मैं नहीं सुलझाउँगा।
बात जब मेरी हुई तो तेल बाती की हुई
मैं रहा जिस पात्र में गुणगान उसके गाउँगा।

गुल्लक(डॉ वर्तिका नन्दा)

हवा रोज जैसी ही थी
लेकिन उस रोज हुआ कुछ यूं
कि हथेली फैला दी और कर दी झटके से बंद
हवा के चंद अंश आएं होंगे शायद हथेली में
गुदगुदाए
फिर हो गए उड़नछू वहीं, जहां से आए थे

 

1.अबकी दिवाली ना जाए खाली

2.दीवाली और आज के रावण के दस रूप

3.कुछ मोहब्बत के दीये...वक़्त के निशान...और पैगाम.......

4.उत्सव-दर्शन

5.“आओ दीवाली मनाएँ प्यार से!”

6.उल्फ़त के दीप दिल में जलाओ तो बात है-

7.हर आँगन बिखरे आलोक

8.शुभकामनाये आप सभी को----- दुआ हमारे लिए भी करियेगा

9.ये कैसी दीपावली है?

10.मनायें उत्सवों का स्नेह सम्मेलन

11.चलो अपने आँगन मे दिवाली मनाये इस बार !

बुधवार, नवंबर 03, 2010

''जिंदगी क्या है?'' (चर्चा मंच-327)

नमस्कार ! 
मैं हूँ शिखा कौशिक और मै लेकर आई हूँ आज बुधवार को चर्चा मंच पर एक नयी चर्चा.आप सबका स्वागत है!
आज की चर्चा ''जिंदगी क्या है?'' में.अगर मै कहूँ क़ि जिंदगी है ''ख़ुशी के दो चार पल [विख्यात-जिन्दगी क्या है?] तो क्या आप सहमत नहीं है?
चलिए मंच पर मौजूद दीपाली जी से ही पूछते है क़ि आखिर जिन्दगी क्या है?............वाह क्या खूब कहा--उबाऊ थकी सड़ी गली  सी जिन्दगी [मासूम लम्हे] पर ये क्या आप तो इनसे भी सहमत नहीं लगते.
चलिए दीपाली जी से असहमत अर्चना धनवानी जी से ही पूछते है क़ि उनकी नज़र में जिन्दगी क्या है ?......... बहुत ही आशा से युक्त उदगार प्रकट किये है--''ये जिन्दगी'   कितना खूबसूरत सफ़र है जिन्दगी क़ा;कुछ अजनबी चेहरे अपने बना देती है.[
इधर संगीता जी भी कुछ कह रही है ...क्या तुलना क़ि है! 'साप -सीढ़ी ' बचपन में खेलकर सांप -सीढ़ी क़ा खेल सीख लिया जिन्दगी क़ा फलसफा
अरे  भाई संजय भास्कर जी भी कुछ कह रहे है उनकी भी सुनिए ......'.क्या चीज है ये जिन्दगी'......''जिस राह से भी गुजरे एक नाम सुना जिन्दगी''  बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .क्या नहीं?
चलते -चलते अनुपमा जी भी मेरा हाथ पकड़कर धीरे से कुछ कह रही हैं ......यही क़ि .....''बीत जाती है जब तब पता चलता है जिन्दगी क्या चीज है?   
अब कुछ अद्यतन लिंक भी देख लीजिए!  
पल में विधि ने सब बदल दिया, ये कैसी सौगात हुई ?
अच्छा अब अनुमति दीजिये.जिन्दगी के सफ़र में फिर मुलाकात होगी किसी न किसी मोड़ पर.दीपोत्सव की अग्रिम शुभकामनायें !

मंगलवार, नवंबर 02, 2010

पीपल का पेड़, प्रेम कुटी और उन्हें अच्छा नहीं लगता ….साप्ताहिक काव्य मंच ---२३……….चर्चा मंच …..326…

नमस्कार , एक ब्रेक के बाद फिर हाज़िर हूँ सप्ताह भर की काव्य रचनाएँ ले कर ….दीपावली आने में तीन दिन शेष लेकिन मैंने इन रचनाओं से जला दिए हैं दिए हर दिए की रोशनी आप तक पहुंचे यही कामना है ..हर त्योहार आस्था का प्रतीक होता है , समानांतर चलते जीवन में परिवर्तन लाता है . दीपावली के उपलक्ष्य पर मैं यही कामना करती हूँ कि आप सभी का जीवन फूलों की तरह सुरभित हो , खुशियों से अपनी डाली पर झूमता रहे और आप दीपक बन इस संसार में अपने प्रकाश का उजाला भरें …..तो लीजिए बात आस्था की है तो आज का काव्य मंच भी प्रारम्भ करते हैं आस्था के प्रतीक पीपल से ..
मेरा फोटो समीर लाल जी इस बार आस्था का प्रतीक     पीपल का पेड़  के माध्यम से बहुत कुछ कह गए हैं …एक तरफ जहाँ यह पेड़ पूजा का प्रतीक और सम्माननीय है वहीं कहीं एकांतवास का एहसास भी कराता है …कहीं न कहीं उम्र के बढ़ने के साथ मन में छिपी वेदना का भी एहसास कराती है यह रचना ..

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत

उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना
भोग लगाया जाता रहा
मेरा

आखर कलश  पर समीर जी की माँ के प्रति समर्पित रचना पढ़िए माँ मेरी लुटेरी थीं
My Photo श्यामल  सुमन जी अपनी लेखनी की धार सरकार पर चला रहे हैं …और रास्ता बता रहे हैं …
दिल्ली से गाँव तक
अंदाज उनका कैसे बिन्दास हो गया
महफिल में आम कलतक वो खास हो गया
जिसे कैद में होना था संसद चले गए,
क्या चाल सियासत की आभास हो गया
मेरा फोटो
       अनीता जी अपने ब्लॉग को महका रही हैं ..
हरसिंगार के फूल झरे
हौले से उतरे शाखों से
बिछे धरा पर श्वेत केसरी
हरसिंगार के फूल अनूठे !
रूप-रंग, गंध की निधियां
लुटा रहे, मस्त, वैरागी
शेफाली के पुष्प नशीले
अनीता जी की नयी पेशकश
आयी जगमग दीवाली
IMG_0130
मनोज कुमार जी इस बार अपनी गज़ल में रखवालों के साथ साथ बहुत कुछ और भी देखने के लिए बाध्य कर रहे हैं ….

 
ये कैसै रखवाले देख
ये     कैसे   रखवाले    देख
चेहरे     सबके   काले  देख
उठती    क्यों आवाज़ नहीं
मुँह   पर सबके ताले देख.
मां की भाषा जो बोल रहा
घर  से जाए निकाले  देख.
My Photo अख्तर खान “ अकेला “ पत्थर रो रहा है   के माध्यम से कहना चाह रहे हैं कि पत्थर होते हुए भी उसमें संवेदनाएं बाकी हैं …फिर इंसानों को क्यों नहीं कुछ फर्क पड़ता ?
 वोह पत्थर
जो सर से मेरे
टकरा कर
ज़मीं पर
पढ़ा हे
खून का फ्न्व्वारा देख
मेरे सर का
वोह
बेजान
पत्थर भी
रो रहा हे

 अपनी माटी पर अरुण सी० राय की कविता पढ़िए अधूरी रह गयी दीवाली

दीपक
खरीद लाये
बाज़ार से
कर आये मोल भाव
कुम्हार से
ले आये
गुल्लक
सिखाने को
बचत



गिरीश बिल्लौरे जी एक बहुत प्यारी रचना लाये हैं …उसका शीर्षक ही यहाँ देना काफी है …इसे आप महसूस कीजिये ..
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiVxG51nAgF4er-8T6BuY13fYf_5lMqzkgu44NNkCQ-g5PDQX1ghftuXkCAMZ-lZSPVxjsO9v3pX-CdMmKg-J115gW10jZcYYaz-UE5M8SBIWqRBGlTQh5uwDpTc2cU6IdPTJzrFg74ph4r/s200/kuti.bmp
मेरी प्रेम कुटी में आना
प्रिय जब प्रेम कुटी में आना
मन ने संय़म साध लिया है
तुमको भी तो बांच लिया है
अश्रु निवालों के साथी थे
आज नमक ने साथ लिया है
हरियाई है पालक मेंथी-
राह दिखे तो ले ही आना
प्रिय जब प्रेम कुटी में आना
मेरा फोटो क्षमा जी परिंदों की बात कहते हुए बता रही हैं कि परिंदे कभी भी दूसरों से कोई उम्मीद नहीं रखते ..किसी कि गल्ती पर भी कुछ नहीं कहते ..

परिंदे!


 कैसे होते हैं  ये परिंदे!
ना साथी के पंख छाँटते ,
ना उनकी उड़ान रोकते,
ना आसमाँ बँटते इनके,
…साथ ही उनके द्वारा बनाये भित्ति चित्र का भी आनन्द लीजिए
मेरा फोटो
अंजना जी रंग बिरंगी एकता पर लायी हैं एक समसामयिक कविता और अपने विचार …. उनका मनाना है कि सरहदों को बंट लेने से कोई खुशी हासिल नहीं होती ……
अरुंधती जी, और सरहदें?
कब सरहदों से
फ़ायदा हुआ इस ज़मीं को?
अभी भी दिल नहीं भरा,
बार-बार बाँट कर इस ज़मीं को?
मेरा फोटो रश्मि प्रभा जी की लेखनी से कौन वाकिफ नहीं है इस ब्लॉग जगत में ? इस बार वो सुनहरे सपनों को सिरहाने रख सोने ही जा रही थीं की न जाने किसने दरवाज़ा खटखटा दिया …उनकी भावनाओं को पढ़ें ..

फिर से है !

सारे दरवाज़े बन्द कर
चुन लाई थी कुछ मोहक सपने
और सिरहाने छुपा दिया था ...
चमकती आँखों पर
पलकों का इठलाकर झपकना
शुरू हुआ ही था
कि दरवाज़े थरथराने लगे
और हाँ ..ब्लॉग पर जाएँ तो वीडियो ज़रूर सुनियेगा ..
My Photo
       मृदुला प्रधान जी बहुत संवेदनशील रचना लायी हैं …कह रही हैं कि जो दूरियां अनायास बन गयी हैं उनको वो बढ़ाना नहीं चाहतीं …आप भी उनके इन एहसासों में शरीक होईये . नहीं चाहती ...
नहीं चाहती ..........
तुम्हारी तस्वीर को 
माला पहना दूं ,
अगरबत्ती दिखा दूं ,
फूल चढ़ा दूं और
जो दूरी............
तुम्हारे-हमारे बीच
दुर्भाग्यवश,
बन गयी है,
उसे  और बढ़ा दूं.

रचना दीक्षित जी कुछ खास   तरंगें  लायी हैं ..
जिनको भेज रही हैं उनके पास जो किसी कारणवश इनसे दूर हैं ….ऊपर दिया चित्र रचना जी की बेटी ने बनाया है ..

पीछे घूम कर देखती हूँ.
कभी हम पास थे.
इतने, इतने, इतने,
कि सब कुछ साझा था हमारे बीच.
यहाँ तक की हमारी सांसे भी.
दूरी सा कोई शब्द न था, हमारे शब्द कोष में.
  अपर्णा मनोज भटनागर की रचना  सलीब  एक ऐसी रचना है जो सोचने पर मजबूर करती है ..सलीब को नारी के रूप में रख कर जो उन्होंने लिखा है आप स्वयं पढ़ें …

जब भी सलीब देखती हूँ
पूछती हूँ
कुछ दुखता है क्या ?
वह चुप रहती है
ओठ काटकर
बस अपनी पीठ पर देखने देती है
मसीहा ...
तब जी करता है
उसे झिंझोड़कर पूछूं
क्यों तेरी औरत
हर बार चुप रह जाती है सलीब

आपकी नयी रचना  पढ़ें …

राम से पूछना होगा


वंदना शुक्ला जी चिंतन पर लायी हैं बचपन ..आज शिक्षा के लिए बच्चों पर जो बोझ है उसकी ही बात कहते हुए बता रही हैं कि आज के बच्चों का बचपन कैसे छीना जा रहा है ? आप भी पढ़िए ..

देखती हूँ  रोज़ सुबह
घर के सामने से ,
स्कूल  को जाते  हुए
कुछ उदास थके से बच्चे!
अपनी कोमल दुबली
देह पर टांगे बोझिल बस्ते,!

अरविन्द जांगिड जी बहुत कुछ पूछना चाहते  हैं ..गरीबी के बारे में , भ्रष्टाचार के बारे में

आज फिर दिल कुछ पूछना चाहता है

सड़क के किनारे,
पड़ी गरीबी पैर पसारे,
नंगे बच्चे, 
एक अदद रोटी को चिल्लाते,
भूखे पेट ही क्यूँ सो जाते है,
आज फिर दिल कुछ पूछना चाहता है,
मेरा फोटोसाधना वैद जी नींव की मजबूती की बात कह रही हैं कि यदि वह मजबूत नहीं तो काल्पनिक और यथार्थ दोनों के ही महल धराशाही हो जाते हैं …

 
 
टूटे घरौंदे
जब मन की गहनतम
गहराई से फूटती व्याकुल,
सुरीली, भावभीनी आवाज़ को
हवा के पंखों पर सवार कर
मैंने तुम्हारा नाम लेकर
तुम्हें पुकारा था !
मेरा फोटो
सुभाष नीरव जी  का कहना है कि कविता के क्या मायने हैं वो तो सयाने जाने ..पर जो बात दूसरों को अपनी सी लगे वही कविता है …

कविता

कविता की बारीकियाँ
कविता के सयाने ही जाने।
इधर तो
जब भी लगा है कुछ
असंगत, पीड़ादायक
महसूस हुई है जब भी भीतर
कोई कचोट
कोई खरोंच
मचल उठी है कलम
कोरे काग़ज़ के लिए।
 My Photo
अपर्णा त्रिपाठी जी अपने ब्लॉग पलाश पर कह रही हैं कि वह रोज अखबार पढ़ती हैं ..कुछ नयी उम्मीद लिए ..आप भी पढ़ें उनकी उस सोच को …

क्यों पढती हूँ अखबार
हर सुबह इक आस लिये
पढती हूँ अखबार ।
शायद आज ना छपा हो कोई
हत्या लूट का समाचार ॥
हर पेज पर मिल जाता नित्य
दुखद खबरों का अम्बार ।
शेयर से भी तेज बढता जाता
देश में अब व्याभिचार ॥
My Photoएम० के० वर्मा जी एक समसामयिक रचना लाये हैं …किस तरह से नवयुवकों को जो बेरोजगार हैं उनको मजबूर कर दिया जाता है गलत कामो को करने के लिए …और इस तरह एक नया वंश बनाया जा रहा है …

अगला निशाना

वंश के वंश
खड़े किये गये
दंश के कगार पर
या फिर सप्रयास
मजबूर किये गये
चलने को अंगार पर
My Photo
संतोष कुमार जी ज़िंदगी को एक हादसे की तरह देख रहे हैं …

ज़िंदगी
ज़िंदगी को हादसे की तरह देखा
कभी छुआ कभी फेंका
कल्पनाओं की लड़ियाँ सजाता रहा
खुद से दूर जाती चीज़ को बुलाता रहा
My Photo डोरोथी जी एक नयी आशा लिए रोशनी की परम्परा बता रही हैं …अँधेरे और उनका साथ देने वाले कभी तो रौशनी की गिरफ्त में आयेंगे
रोशनी की परंपरा
रोशनी को आखिर
क्या मिलता है यूं
जीवन भर जलकर....
अंधेरों के साजिशों
और षड्यंत्रों के साए तले
थर थर कांपता रहता है
हर पल
रोशनी का नन्हा सा वजूद..
My Photo मुदिता गर्ग अपनी रचना में एक गृहणी के सभी कामों को समेट लायी हैं …भोर की किरण से आधी रात तक के सारे कामों का सिलसिला….जो यह सोचते हैं कि घर में रह कर सारा दिन करती क्या हो ? शायद उनको जवाब मिल जाये …

गृहिणी.

अधमुंदी आँखों से
सूर्य की
प्रथम किरणों के
स्पर्श को
महसूसते हुए
होती है
शुरुआत
एक गृहणी के
दिन की...
मेरा फोटो के० एल० कोरी  जी अपने जज्बातों को बहुत खूबसूरत गज़ल में ढालते हैं …आप भी मुस्कुराते हुए पढ़ें ..

शाम फिर से मुस्कराने लगी

शाम फिर से मुस्कराने लगी
उसकी याद जब यूँ आने लगी
चराग खुद-ब-खुद ही जल उठे
रौशनी उसे ही गुनगुनाने लगी
मेरा फोटो योगेश शर्मा जी का विचार है की भले ही उगते सूरज को सलाम करो लेकिन अस्त होते हुए को भी मत भूलो …वैसे लोंग उन्हीं को पूछते हैं जो उगता हुआ सूरज होता है …

'उगते सूरज को सलाम लाख़ करो'
उगते सूरज को सलाम लाख़ करो
डूबते दिन से  बेरुखी न करो
खिलखिला लो नये  चिरागों संग
पिघली शमों  से दिल्लगी न करो

विश्वगाथा  पर पढ़िए जया केतकी और रेणु सिंह की कविताएँ…

जया केतकी जी ढूँढ रही हैं संवेदनाएं 

बिना दरवाजे, खिडकियों की झोपडी में,

बाहों में बाहें डाले,

मिला करती थी, तेरी-मेरी संवेदनाएं।

सिसक, सिमटकर कह जाती,

एक-दूसरे का दर्द।

खिलखिलाकर बांटती थी,

खुशी के लम्हे, बीते वाकये

रेणु जी लायी हैं साहस जीने का
झँझावतोँ मेँ मन उलझा फटी पतंग सा,
कुछ अनिश्चितताओँ मेँ मगन,
ढेर सी चिँताओँ मेँ मगन
सब कुछ तो करेँ क्या न करेँ,
कुछ असमँजस सा
 कुमार पलाश की कविताएँ उनकी भूमि से जुडी हुई हैं …कोयले खदान की बात करते हुए उनकी दो रचनाओं का ज़िक्र करना चाहूंगी …

काला पत्थर   और ….  झरिया
झरिया एक जगह का नाम है ..जहाँ कोयले की खान हैं …वहाँ के वासियों के दर्द को इन्होने शब्द दिए हैं …
सुना होगा
मुहावरा आपने
आग से खेलना
लेकिन
हम झारियावाले
आग जी रहे हैं
पीढ़ियों से
आग ओढना
बिछौना आग
आग पर चलना
आग से खेलना
हमारा शौक नहीं है
मजबूरी है

        
मेरा फोटो
सुनील कुमार जी बिलकुल दीपावली के मूड में हैं और छोड़ रहे हैं फुलझडियां .
हास्य कवितायेँ ,दीवाली की फुलझड़ी

जलते हुए मकान से
जिन  लोगों ने
दस आदमियों को निकला 
वह तो बस दो हिम्मत बाले थे 
मग़र दोनों को जेल हो गयी .
क्योंकि
मकान के अन्दर तो
फायर ब्रिगेड वाले थे
मेरा फोटो वंदना गुप्ता जी चाहतों के दौर को खत्म करते हुए स्वयं ही सजा सुना रही हैं और कह रही हैं की अब दुनियादारी निभा ली जाए …और थोड़ा कुछ यूँ दुनिया का क़र्ज़ उतारा जाए ..

चलो अच्छा हुआ
बातें ख़त्म हुयीं 
अब दुनियादारी 
निभाई जाये 
तुझे चाहते 
रहने की सज़ा 
एक बार फिर
सुनाई जाये
My Photo डा० ओम् राजपूत की रचना माँ के प्रति उनका समर्पण है …

माँ की बाँहों में
सुबह की अलसाई नींद
बिस्तर से उतरती है
डगमगाते पैरों की मानिंद
लेती है टेक
आँख खुलने की सच्चाई
आईने पर पसर जाती है
मेरा फोटो या मौला यह कैसी क़यामत आई है
खुमार के साथ ख्यालों की बाढ़ चली आई है …
आशीष जी को पढ़िए ..

पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!
अब तो वो भी मुझसे इत्तेफ़ाक रखते हैं,
अपने सभी अलफ़ाज़ बेबाक रखते हैं!
मेरे मौला इस सफ़र में क्या कोई ऐसा उबाल आएगा?
के सोचा करूंगा मैं और उनको ख्याल आएगा
मेरा फोटो
डा० रूप चन्द्र शास्त्री जी की रचना से मैं काव्य मंच का समापन कर रही हूँ …लगता है शास्त्री जी आज की पीढ़ी से त्रस्त हैं और जो कुछ उन्होंने महसूस किया है उसे बहुत संजीदगी से कहा है …सच ही है कि कब सुबह होती है कब रात , ज़िंदगी जीने का कोई अनुशासन नहीं ..अपने आप में ही डूबे रहना … यदि कहीं कोई बड़ा कुछ टोकाटाकी करे तो अच्छा नहीं लगता …आप भी जानिये इस कविता के माध्यम से कि और क्या क्या अच्छा नहीं लगता …

उन्हें अच्छा नहीं लगता!
कहीं जब दीप जलते हैं, उन्हें अच्छा नहीं लगता।
गले जब लोग मिलते हैं, उन्हें अच्छा नहीं लगता।।

समाहित कर लिए कुछ गुण उन्होंने उल्लुओं के हैं,
चमकता गगन पर सूरज, उन्हें अच्छा नहीं लगता
पुन: दीपावली की शुभकामनायें …लिंक पर जाने के लिए चित्र पर भी क्लिक कर सकते हैं ….आपके सुझाव और प्रतिक्रिया हमारा मनोबल बढ़ाने में सहायक होते हैं …आज इतना ही ……फिर मिलते हैं अगले मंगलवार को नयी रचनाओं के साथ ….नमस्कार ……… संगीता स्वरुप
सभी पाठकों से असुविधा के लिए क्षमायाचना है …चर्चामंच का टेम्पलेट बदल जाने के कारण तालिकाएं ठीक से व्यवस्थित नहीं हो पाई हैं ….आशा है इस बार यह चर्चा आप झेल लेंगे …आगे ऐसी शिकायत का अवसर नहीं मिलेगा …आभार ….क्षमाप्रार्थी …संगीता स्वरुप

सोमवार, नवंबर 01, 2010

जरा सा पर्दा उठाइए..............चर्चा मंच-325

दोस्तों 
आ गयी सोमवार की चर्चा .............कुछ हास्य के साथ. चर्चा है चर्चा ..........काफी हैं चर्चा .............चर्चा के पीछे आप ही छुपे हैं जरा सा पर्दा उठाइए और देखिये


हवा में लटका मनुष्य, और हाथ से आती फूलों की खुशबू --यह क्या है ?
जादू के अलावा और क्या होगा ?

पानी का कैनवस
 जिसमे सब बह गया 

लिपस्टिक से छू लो तुम ...........संसार में बबाल कर दो


...वे आँखें आज भी नम है!
आँखों में नामी दिल में तूफ़ान सा है



जया केतकी और रेणु सिंह
जानिए इनकी संवेदनाएं
१) संवेदनाएं
अब कहाँ रहीं ?

२) साहस जीने का……

  सहास से जीने वालों की कभी हार नहीं होती



" क्या करूँ ...छोड़ना चाहते हैं , छूटता नहीं है "
उम्र के निशाँ तो पड़ते ही हैं



भूजा
बूझो तो जाने



फ़िक्शन
इस फिक्शन में तो कुछ और ही पक रहा है

" पल जो हमने साथ गुजारे थे.. "
आज भी यादों की धरोहर हैं

कविता पहले एक सार्थक व्यक्तव्य होती है !
ये तो पता नहीं क्या होती है ..........हमारे लिए तो कविता बस कविता होती है

हर माह नया घोटाला कर
हर माह क्यूँ रोज नया घोटाला कर ............किसमे दम है जो रोक कर दिखा दे ............ये देश है घोटालेबाजों का ,अलबेलों का मस्तानों का ............फिर किसका डर ?


दीपावली के नाम पर दे दे बाबा 

बस अब यही बाकी रह गया था

बचपन के दिन
बचपन के दिन भी क्या दिन थे

बचपन में 'जहां' और भी हैं ....: राजेश उत्‍साही
बिलकुल सही कहा


कविता
सही अर्थों में यही तो है कविता


मैं दिवाली देखना चाहता हूं
जरूर देखिये


२०० उद्योग पतियों लेकर आ रहे हैं ओबामा
एक बार फिर तैयार रहिये गुलाम बनने को ..............बहाने हैं


थोड़ा ठहरने दे
वक्त को मुड़कर देखने तो दे


कसूर !!!!
किसका ?


मर्द घर में खुशी-खुशी बैठने को राजी: महिलाएं दफ्तर का काम संभाल रहीं
बस अब ये दिन यहाँ भी दूर नहीं

बन्द दरवाजे

जो एक बार बंद हो जाएँ तो कहाँ खुलते हैं  


पैसों की परेशानी से निजात पायें

तो ये भी आजमायें
 

शाम फिर से मुस्कराने लगी

शायद किसी की याद फिर से आने लगी
 

राहें मन की

अजब गज़ब होती हैं


आशिक़ को नसीहत
क्या खूब दी है
 

किले में कविता:'कौन खबर ले किले की'

वक्त वक्त की बात है
 

जवाब होने पर भी

एक दिन ये खुशबू जरूर फैलेगी
दीपावली: दीप-अष्टम्
 ऐसा दीप सभी जलायें


बेहतर खुदा..
सबके प्यारे हैं मगर बेजुबान हैं

अब दीजिये इजाज़त ...........अगले सोमवार फिर मिलती हूँ तब तक आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षारत ..........