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गुरुवार, अक्टूबर 28, 2010

गुरूवासरीय चर्चा—(चर्चा मंच-321)

चिट्ठा चर्चा मंच के सभी पाठकों को डी.के.शर्मा वत्स की ओर से नमस्कार, सतश्रीअकाल, सलाम, जयहिन्द.
लीजिए, हाजिर है आज की ये चर्चा…..जिसमें शामिल किए गए हैं-मेरे द्वारा पढी गई कुछ चुनिन्दा ब्लाग पोस्टस के लिंक्स……आप लोग पढिए और आनन्द लीजिए. आशा करता हूँ कि प्रस्तुत पोस्टस आप लोगों की पसन्द पर भी खरा उतर पाने में सफल हो पाएंगी……
जै राम जी की!!!

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

image मैं अकेला हूं, सूनसान हूं, वीरान हूं। यह मुझे मालूम है कि मेरा जीवन बीत चुका। कुछ सांसें शेष हैं- कब रुक जाएं क्या पता?
मैंने हर रंग को छूकर देखा है, चाहें वह कितना उजला, चाहें वह धुंधला हो। उन्हें सिमेटा, जितना मुटठी में भर सका, उतना किया। रंग छिटके भी और उनका अनुभव जीवन में बदलाव लाता रहा। मैं बदलता रहा, माहौल बदलता रहा, लोग भी।
चश्मे में मामूली खरोंच आयी। दिखता अब भी है, मगर उतना साफ नहीं। सुनाई उतना साफ नहीं देता। लोग कहते हैं,‘‘बूढ़ा ऊंचा सुनता है।’’ लोग पता नहीं क्या-क्या कहते हैं।

दीपाक्षर--लाखों रावण गली -गली हैं ,इतने राम कहाँ से लाऊं ?

अचानक वेताल ने जोरों का ठहाका लगाकर मध्यरात्रि के पश्चात् देवी माँ दुर्गा की तन्द्रा को भंग कर दिया. उनके त्रिशूल की नोंक के नीचे त्राहि-माम कहता असुर भी चौंक कर  ठहाके की दिशा में देखने लगा था."क्या बात है वेताल!बहुत दिनों बाद आज दिखाई दिए हो ! और आते ही इस ठहाके का मतलब?"

कविता क्या है !

image लेखन कला एक ऐसा मधुबन है जिसमें हम शब्द बीज बोते हैं, परिश्रम का खाध्य का जुगाड़ करते हैं और सोच से सींचते हैं,तब कहीं जाकर इसमें अनेकों रंग बिरंगे सुमन निखरते और महकते हैं।कविता लिखना एक क्रिया है,एक अनुभूति है जो हृदय में पनपते हुए हर भाव के आधार पर टिकी होती है। एक सत्य यह भी है कि यह हर इन्सान की पूँजी है,शायद इसलिये कि हर बशर में एक कलाकार, एक चित्रकार, शिल्पकार एवं एक कवि छुपा हुआ होता है।

कविताओं में प्रतीक-शब्दों में नए सूक्ष्म अर्थ भरता है

image यर्थाथ के धरातल पर हम अगर चीजों को देखें तो लगता है कि हमारे संप्रेषण में एक जड़ता सी आ गई है। यदि हमारी अनुभूतियां,हमारी संवेदनाएं, यर्थाथपरक भाषा में संप्रेषित हो तो बड़ा ही सपाट लगेगा। शायद वह संवेदना जिसे हम संप्रेषित करना चाहते हैं,संप्रेषित हो भी नहीं।अच्‍छा लगा” और मन भींग गया” में से जो बाद की अभिव्‍यक्ति है, वह हमारी कोमल अनुभूति को दर्शाती है। अतींद्रिय या अगोचर अनुभवों को अभिव्‍यक्ति के लिए भाषा भी सूक्ष्‍म,व्‍यंजनापूर्ण तथा गहन अर्थों का वहन करने वाली होनी चाहिए। भाषा में ये गुण प्रतींकों के माध्‍यम से आते हैं।

आह चाँद, वाह चाँद

image कहते हैं आज के दिन चाँद को देखें तो चोरी का दाग लगता है। जिस चाँद ने इतना दूर होकर भी अपना माना,उसे इस डर से न देखूँ कि मुझ पर चोरी का दाग लगेगा?हा हा हा........।इल्ज़ाम कुछ छोटा नहीं लग रहा है यारों, कोई भारी सा इल्ज़ाम सोचना था?    आज तो जरूर देखूँगा कि आज और बहुत सारों से मुकाबला नहीं करना होगा मुझे।  सिर्फ़ मैं और मेरा चाँद होंगे, बहुत दूर लेकिन बहुत पास। 

कहने को दिल वाले हैं ...

छीने हुवे निवाले हैं
कहने को दिल वाले हैं
जिसने दुर्गम पथ नापे
पग में उन के छाले हैं
अक्षर की सेवा करते
रोटी के फिर लाले हैं
खादी की चादर पीछे
बरछी चाकू भाले हैं

कहाँ गया वो बचपन ...

कहाँ गया वो बचपन,
भोला सा वो मन ...
वो दादी-नानी की कहानियां,
वो मिट्टी का आँगन...
वो घर-घर खेलना
गुड्डे-गुड़ियों की शादी रचाना
वो दोस्तों के साथ लड़ना
किसी से रूठना,
किसी को मनाना

कभी तो मिलो मेरे ख्यालातों के मोड़ पर

हुआ अरसा,
कभी तो मिलो 
मेरे ख्यालातों के मोड़ पर, 
देखूँ, हैं कितना बदला तसब्बुर
जो रखा ख्याबों में जोड़ कर
है इल्म कि कुछ मुश्किल होगी
imageपर खाली हाथ नहीं आना,
इक्का-दुक्का ही सही -
वो तीखी तकरार छिपा लाना
(क्योंकि) बड़ा विराना हो चला है
तुम्हारे बिन इंतजार का ये आलम
थोडा फीका लगने लगा है
मुझे, अपना दागदार दामन

किसान को जितनी चिन्‍ता फसल की है उतनी ही अपनी संतान की भी है, कितना संवेदनशील है हमारा किसान लेकिन हम?-अजित गुप्‍ता

एक किसान मावठ की बरसात से खुश है, नवीन फसल की योजना बना रहा है और अपने परिवार के प्रेम को भी निभा रहा है। पूरी रात बिगाड़कर अपनी बेटी की चिकित्‍सा कराने दूर शहर आता है, शायद डॉक्‍टर अस्‍पताल में भर्ती होने को भी कहे तो उसके लिए भी तैयार होकर आया है। और हमारे सम्‍भ्रान्‍त परिवार घर में भी पैसे का जोड़-भाग कर रहे हैं। कहाँ जा रहा है हमारा समाज?

कश्मीर बचाओ

कुछ लोग ऐसा मानने लगे हैं कि काश्मीर के बहुमत का मानना है कि कश्मीर को भारत से अलग हो जाना चाहिए....शायद कश्मीर के 'वजीर-ए-आज़म' शेख अब्दुल्ला की संतानें भी इसी स्वर को पुख्ता करने की कोशिश में जुटी हुयी हैं.यूँ तो कश्मीर हिन्दुस्तान का अभिन्न अंग सदियों से रहा है,जिसे कल्हण ने 'राज तरंगिणी' में भी लिखा है,लेकिन बात आधुनिक युग की करते हैं....

"मेरे प्रियतम तुम्ही मेरी आराधना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कर रही हूँ प्रभू से यही प्रार्थना। 
imageजिन्दगी भर सलामत रहो साजना।।
चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति की सदा सीढ़ियाँ तुम चढ़ो,
आपकी सहचरी की यही कामना।
जिन्दगी भर सलामत रहो साजना।।

रात...

कुछ अजीब चीज़ मुझे खींचती है ,
और मैं लिखने लगता हूँ |
धुंआ छंटता है सोच का ,
और मैं देखने लगता हूँ |
कुछ शब्द सुनाई देते हैं ,
एक दूसरे से सटे हुए |
खुले आसमां में तारे ,
चाँद से लगे , हटे हुए |

अरुधंति से सावधान

क्या अरुधंति राय जैसी बाइयों से देश को सावधान रहने की आवश्यकता नहीं है?खुद को अतिबुद्धिजीवी मानने वाली अरुधंति का विचार देश को बांटने वाला है, और यह पहला अवसर भी नहीं है कि बाई ने ऐसा कहा हो। समय-समय पर अरुधंति ने आग में घी डालने वाले बयान दिये हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह कत्तई नहीं होता है कि देश के बंटवारे या देश के हिस्से के विरोध में अपने बयान देकर चर्चा में बने रहने का मोह पूर्ण किया जाये। क्योंकि यह देश कोई मज़ाक नहीं है।


कार्टून : अब एशियाई खेलों की तैयारी

image

झारखण्ड में पंचायत चुनाव (कार्टून धमाका)

image

व्यर्थ नहीं हूँ मै


व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।
मैं स्त्री हूँ!
सहती हूँ
तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरूष होने पर
मैं झुकती हूँ!
तभी तो ऊँचा उठ पाता है
तुम्हारे अंहकार का आकाश।

मंगलवार, अक्टूबर 26, 2010

"ये कैसा करवाचौथ था?" (चर्चा मंच-320)

चर्चा मंच में आज प्रस्तुत है-
"शीर्षकों से शायरी"
जब चाँद जमीं पर उतर आया हो
नजाकत आ ही जाती है!
.... जो शमशान-यात्रा से हर्षमस्त लौटा ...,
नफासत छा ही जाती है!!
ऐसे करवाचौथ मनाओ :
नवगीतों से गगन गूँजाओ!
बिज़नेस का तगड़ा अनुभव..
अपने जीवन में अपनाओ!!
नींद की हथेली पर एक ख्वाब रख गए थे तुम! 
या कि मेरी उम्र का हिसाब रख गए थे तुम!!
ऐसे संयोग सबके जीवन में आते है.. ??
धन्यवाद मिहिर --..शुभकामनाएं
जुग- जुग जिए मेरा पिया ..
जब आत्मिक मिलन हो जाए.!
पथरीली राहों पर जैसे है नंगे पाँव सी जिंदगी !
मझधारों में गोते खाए है एक नाव सी जिंदगी !
हो गया मैं भी लखपति...!
..और भी फिल्में हुई हैं 50 की..!
बधाई तो ले ही लीजिए.
आपकी पोस्ट हैं बहुत काम की!!
हजारों समय काल गये बीत,
तब धरा पर सत्य आया है!
ये कैसा करवाचौथ ...था,
जिसने घिनौना चेहरा दिखाया है!!
"भारतीय संस्कृति की विशेषताओं को"
काला धब्बा लगाया है!
.......बलात्कारी से ज्यादा, 
पीड़ित महिला जिम्मेदार !
आपने तो इस रहस्य के प्रति
कर दिया है खबरदार!!
गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका,
जीवन पर पडने वाला प्रभाव!
एक थे पंडित हरि किशन,
मगर यह नहीं हैं उनके भाव!!
क्‍या इस वर्ष आपके सर सेहरा बंधेगा ?? ..
हाथ पीले होंगे ?? 
सचमुच दूल्हे राजा
बहुत रंगीले होंगे!!
फिर छिड़ी बहस......... -,
महिलाओं की बजाए पुरूष ज़्यादा झूठ बोलते हैं!
कुरआन सब के लिए है,
धर्मग्रंथ हमेशा उन्नति का मार्ग खोलते हैं!!
नारदमुनि जी! एक दिन के महाराज!
50000 किलोमीटर की रेल यात्रा,
परख लिया गाँव, नगर और समाज!
कौन किसको गंगा में फेंक रहा है ,
छींटें और बौछारें!
गाँधी को ले आए अपने गाँव,
शायद वो ही देश को सँवारें!!
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला!!
चलते- चलते
वाटेंड और दबंग जैसी फिल्मों में काम करने के अलावा 
फुटपाथ पर सोते हुए लोगों को अपनी कार से कुचलने की वजह से
बजा दिया है बिगुल
हो गई है चर्चा पूरी!
मिटाएँ अब दिलों की दूरी!!

"साप्ताहिक काव्य मंच" (चर्चा मंच-319)

जैसे ही मंगलवार आता है चर्चा मंच पर बहन संगीता स्वरूप के साप्ताहिक काव्य मंच को देखने के लिए सब बेताब हो जाते हैं! ऐसा ही कुछ मेरा भी हाल है! लेकिन साप्ताहिक काव्य मंच का यह इन्तजार शायद अगले सप्ताह पूरा हो जायेगा और संगीता जी फिर से अपने अलग अन्दाज में इसको सजायेंगी! तब तक मैं ही अपने घिसे-पिटे लहज़े में पेश करने की जिम्मेदारी निभाने को आपके बीच आ पहुँचा हूँऔर दिल की हिफ़ाजत मैं करने लगा हूँ.. ! एक श्वेतवसना तरुणी को, जो असंख्य वर्षों की है, पर लगती है षोडशी इस रूपबाला को देखे हुए बहुत दिन हो गए... गुमशुदा ...!  ज्ञानचंद मर्मज्ञ से पानी में मछलियों का पता पूछते हैं लोग,आंसू से सिसकियों का पता पूछते हैं लोग... मनोज जी लेकर आये हैं कि एक कविता - पता पूछते हैं लोग ! कौन सा पोस्ट पढूँ झट से घूंघरारी लटें समरूप दिखें कविता ग़ज़लें लगि झूलन सी...ब्लाग दुआरे सकारे गई, उहाँ पोस्टन देखि के मन हुलसे! मगर बड़ी उलझन है कि- आज उसने ना पूछा हाल मेरा.....! मुसीबत यह है कि ग़ज़लकार कुवंर कुसमेश के स्वर में - हर शाम छलकते हैं पियाले कहीं-कहीं! इस पर अफसोस करनेकी हालत में पहुँचने से पहले  पहले दिनों जैसा प्यार... कहीं नज़र नहीं आता है! साधना वैद्य जी अपनी माताश्री ज्ञानवती सक्सेना "किरण" की रचना से रूबरू करा रही है- यह कोई भगवान नहीं है ! परन्तु प्रीतम तुम लौट आये ! भर ख़ुशियों से चहक उठा मन मेरा भी महक उठा सूरज ने जब डाले पर्दे धूप न जाने कहाँ चली बाँधे गाँठ हवाओं के सँग मौसम महके...! अब रहे न कोई दूरी “… ..मंजिल पूरी!” रूखा रूखा सा चाँद, एक फीकी सी शब् बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब..... मैं औरत..... वो बरदग.... ....तहज़ीब की मिट्टी में गडी हूँ गहरी...बातें...एक रूठा सा रब.... इसीलिए तो- .... , चैट कर लेती है गाहे-बगाहे! किन्तु करवाजौथ के मौके पर भी चाँद है मेरा परदेस में! गीत गाने मचलती रही रागिनी शब्द पर होंठ पर छटपटाता रहा रात के चित्र में रंग भरते हुये चाँद के हाथ से गिर गई तूलिका कोई तारा प्रकाशित नहीं हो सका ...होंठ पर कुछ यूँ ही थरथराता रहा! - .रात की चादर जब उतरने लगी. ...सुबह की तरफ सरकने लगी... ......तारे सारे जगमगा उठे........ ...और ख्वाब सारे धुंधला गए... .रात जाते-जाते....! *सुन्दर ये मुखड़ा** **चाँद का टुकडा** **नयन विशाल है** **अधर कोमल** **————–** **कटिबंध अनुपम** **वलय निरूपम** **कही है हीरक** **कही कंचन....! हो सकता है : ओरहान वेली की कविता का यह अनुवाद तो डॉ. सिद्धेश्वर सिंह का ही है-.. ..पहाड़ी पर बने. ..उस घर की बत्ती...क्यों जली हुई है..आधी रात के बाद भी?...! घड़ी तुमको सुलाती है घड़ी के साथ जगते हो...जरा सी नींद क्या है चीज पूछो इक सिपाही से! तेरा दीदार पूर्णिमा की रात, होगा बेशक तेरा दीदार किसी तरह...! सपने.... होश संभाले तो मां बाप ने सजाये, बचपन से ही घोट घोट के पिलाये, स्कूल में सब से अव्वल ही रहना, ध्यान से पढना किसी से न कहना,...! गीत-ग़ज़ल नहीं इसका नाम ! - ** *हर आहट को समझा उसका पैगाम हर मन्जर को किया मैंने सलाम कितने ही पिये उम्मीद के जाम कैसी है आहट , कैसे अन्जाम अँगना में ठहरी है वो ही शाम ....! राह तीर पनघट पे गागर को धोय माँज, सीस साधि इँडुरी जल धारि पनिहारिया पंथी से पूछि रही कौन गाम तेरो , तोर नाम-काम कौन, कहाँ जात रे बटोहिया ! रात के चेहरे पर रोशनी की लकीर खींचते से आ लगे किनारे तुम्हारे ख़याल आकाश की जाजम पर होने लगी चाँद की ताजपोशी तारों की जयकार घुटने लगी एक पुरानी नदी यादों की....रात की कहानी! याद करूँ बचपन को जब जब बेड़ी लगती पाँव में। जो कुछ मैंने शहर में देखा वो दिखते हैं गाँव में।। घूँघट में सिमटी दुल्हन अब बीते दिन की बात है।..... यही तो है- बदलाव ! 'कमलेश'क्या बदला है जमाने ने अपना रंग , जिनको जाना था 'कल'वो आज ही निकल गए ॥.. वाह जनाब क्या ??जमाना बदल गया ..? सूरज से ज़रा दूर खुले आसमाँ की चमक के मानिंद तुम्हारा ये साफ साफ सा चेहरा मेरे तमाम हौसलों को और बढ़ाता गया है....हमारी तुम्हारी बातें | उर्दू के कुछ शब्द सीखे थे, उन्ही में से एक शब्द था गोर -कब्र , शायद इसे ही प्रयोग करने के लिए एक शेर लिखा था....उम्मीद इन्तज़ार को लंबा किये रही, खत्म इंतज़ार हुआ, जब गोर-ए-दफ्न हुए | जहाँ बैठ कर मैं रोया था. वहां अभी तक. तुम्हारे कंधे नहीं पहुंचे..विवाई भरे पैर...दिख भी जाते हैं...नहीं दिखता...पैरों में लगा हुआ पानी ....चुपचाप लिपटा रहता है पानी.... यही तो हैं "पानी लगे पैर"!
जीवन की राहें. बहुत हैं पथरीली ..तुम्हें गिर कर..फिर संभलना होगा....तुम्हें बदलना होगा ! ज़िंदगी में इम्तहान तो. हर घड़ी चला करते हैं. कुछ स्वयं आ जाते हैं सामने. तो कुछ हम खुद चुन लिया करते हैं. और जो बचते हैं वो. हम पर थोप दिए जाते हैं..........। एक दिन एक व्रत लिया , दिन भर खड़े रहने का , सारे दिन मौन रहने का , सोचा दिन भर चुप रहूंगी , एक भी शब्द ना कहूंगी , पर जैसे ही सुबह हुई , ..............................! इंसान चला जाता है मगर अपने पीछे छोड़ जाता है अनगिनत यादें अपार शून्य असह्य वेदना और अनुपम यात्रा की शुरूआत........एक अंतहीन मौन! शायद यही तो है...सभी की मंजिल!
आखिरी पडाव पर डोली से.. अर्थी तक के सफर मे ...अग्नि के समक्ष लिये सात वचनो को... हमने निभाया... ज़िन्दगी के तीन पडाव तक ...सात वचनो को पूरा करते हुये... आज हम जीवन के आखिरी पडाव पर. .!

सोमवार, अक्टूबर 25, 2010

ये बीमा तो बहुत जरूरी है ……चर्चा मंच-318

एक बार फिर सोमवार आ गया और हम भी आ गए अपनी बातों का पिटारा लेकर ..........अरे हाँ हाँ लिंक्स का ही ..........वो ही कह रही हूँ समझ लिया करिए ना ...........आज काफी नए लिंक्स लिए है जाइएगा जरूर शायद आपके दिल की कोई आवाज़ वहाँ छुपी हो ............



एक बूंद जो बिछड़े सागर से...!
सागर से  जो बिछुड़ी तो कहाँ जायेगी
कहीं राहों में ही फ़ना हो जायेगी

सब वक्त वक्त की बात है
ना तब अपना था ना अब

एक आस था ,विश्वास था
अब ठूंठ रह गया हसरतों का

कब तक बनूँ अमर बेल
कभी तुम भी तो बनो
और उस दर्द को गुनो

 वसीयत पढ़ ले इक बार
फिर ज़िन्दगी में कोई वसीयत नहीं करेगा
शायद इन्सान इन्सान बन जाएगा

ज़िन्दगी भी है , तू भी है और मैं भी
और कुछ तेरे मेरे ख्यालों के फूल
कभी झाँक कर देख तो सही
पृथ्वी के गर्भ में इक बार

आईना दिखा जाएँगी
तुझे तुझसे मिला जायेंगी

 यही तो विडंबना है
स्त्री क्यूँ स्त्री है 

शरीफ दिखने का पाखण्ड

 कब तक करोगे
कब तक खुद को छलोगे


मेरे बिना तुम प्रभु / राइनर मारिया रिल्के

 अधूरे थे और अधूरे रहोगे
जब तक ना एकाकार होगा


रिकॉर्ड मूल्य पर नीलाम हुआ ब्लू डायमंड

अपनी अपनी कीमत होती है
सब नसीबों की बात होती है

वीरान हैं आँगन
दिल के दरीचों का
कभी आना इस दरीचे में
कोई अपना बैठा है 
आस का दीप जलाये

दो नाव की सवारी है
सब पर पड़ी भारी है

चाहतों को पंखों की जरूरत नहीं
एक बार उड़ान भरने तो दो



छूटता सा जाता है

कोई अपना सा
कोई बेगाना सा
दिल के टुकड़ों का
कोई गाना सा 


बदगुमान कहे.

जो चाहे कह लो


कब ? और कहाँ? 
दिल तो आज भी  
तुम्हारी चौखट पर 
बेसुध पड़ा है 
सब तेरी मोहब्बत के सिले  हैं

वजूद ..

मैं कौन और क्या मेरा वजूद
सब तेरी हसरतों के सरमाये हैं 


कच्चा घर....

दिल का नगर
कब पक्का बना है
एक ज़रा सी ठेस लगी
और टूट जाता है 


शोकगीत...

कब तक गायेंगे
ये ना किसी को
समझ आयेंगे


युद्ध-पताका

उठा कर तो देख


भाषा और अखबार-लघु हास्य व्यंग्य (bhasha aur akhabar-hindi short comic satire article)

अब कहाँ जाऊँ
मैं किधर जाऊँ
बेबस हूँ लाचार हूँ
हाथों की कठपुतली हूँ


"नाम उसका इन लबों से कह फ़ना क्यूँ हो गया.."
जो दिल का मेहमाँ बन गया
कहो ,वो कब फ़ना हो गया


एक गज़ल
ग़ज़ल हूँ
पढ़िए
और
गुनिये
क्यूँकि
ग़ज़ल हूँ मैं

“… ..मंजिल पूरी!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


मंजिलें और भी हैं
ये तो सिर्फ पड़ाव हैं
दिल के बहलाव हैं



"करवा चौथ" जीवन बीमा योजना
करवा लो प्यारे
बिना बीमा क्या जीना

चलिए दोस्तों अब दीजिये इजाज़त..........अगले सोमवार फिर मिलती हूँ..........तब तक अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराते रहिये और हौसले बढ़ाते रहिये .............



रविवार, अक्टूबर 24, 2010

रविवासरीय (२४.१०.२०१०) चर्चा में मेरे चुने पांच पोस्ट!

नमस्कार मित्रों!

मै मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं रविवासरीय (२४.१०.२०१०) चर्चा के साथ। आज के मेरे चुने हुए पांच पोस्ट लेकर। आज की बात मैं उस्ताद जी की बात से शुरु करना चहता हूं। पहले उनको नमन तो कर लूं।

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवता किया करत न लागी बार। 

ये गुरु तुल्य हैं। कम-से-कम मेरे लिए। इनका नाम पता ... मुझे मालूम नहीं। पेशा सरकारी और रहने वाले हैं .. जहां के भी हों। एक थैंकलेस जॉब को अंजाम दे रहे हैं। हमारी रचनाओं का मूल्यांकन!


उस्ताद तो आप हैं ही। कहीं मैंने लिखा था कि एक थैंकलेस जॉब कर रहे हैं। 

पर इसका यह मतलब नहीं कि आपकी आवश्यकता नहीं या आपका महत्व नहीं। इसकी बहुत ज़रूरत थी, ब्लॉग जगत को। (ये मेरे विचार हैं। आप असहमत हो सकते हैं)। अपनी एक पोस्ट के उस्ताद क्यों उतारे अपनी नकाब ???  द्वारा ये अब तक किए गए अपने मूल्यांकन पर चहेते पठकों की प्रतिक्रिया पर विचार व्यक्त कर रहे हैं।

आपने ठीक कहा कि, बार्टर सिस्टम वाले इस जगत में, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी वाली ही स्थिति है। सही मूल्यांकन करते ही, असहमति दिखाते ही, या फिर तटस्थ रहते ही, लोग मुंह ऐसे फेरते हैं कि मानों परिचय ही न हो। इस लिए मूल्यांकन की ज़रूरत तो है। एक निष्पक्ष मूल्यांकन की। और थैंकलेस इसलिए कि आप कितना भी तटस्थ रहें, लोग कहेंगे कि आप तो फलाने को फ़ेवर कर रहें हैं, फलाने को आउट! ‘अब ये महाशय भी (मैं) चर्चा में आपको इसलिए लिए है कि आपने इनके एक पोस्ट को ७.५ अंक दे दिए हैं। तो ये आपके कशीदे तो पढेंगे ही।’
अब उन्हें यह थोड़े ही पता कि इसी दिन के उनके दूसरे पोस्ट पर आपने 3/10 अंक दिया और कहा "सामान्य .. कहीं से भी पोस्ट प्रभावित नहीं करती. कविता का भाव भी घिसा-पिटा सा है."
उस्ताद जी, अभी ब्लॉग जगत भले आपके महत्व को न समझे, धीरे-धीरे समझेगा, फिर शायद आपको छ्द्म भेष में रहने की ज़रूरत भी न हो।
अपनी तरफ़ से तो यही कहूंगा कि आपने मेरी जिन रचनाओं का आपने मूल्यांकन किया है, उसमें, उस रचना के पीछे मेरे द्वरा किए गए प्रयास को उजागर कर दिया है। ...  और मैं अपनी टिप्पणी बॉक्स के ऊपर लिखता भी हूं कि आपका मूल्यांकन मेरा मार्गदर्शन करेगा। 

उस्ताद जी के ब्लॉग पर जाने के लिए यहां क्लिक करें। ये हमसे संवाद भी करते हैं और हमारे विचार भी आमंत्रित करते हैं। और इनके निमंत्रण में भी स्पष्टवादिता है। कहते हैं
“माडरेशन ऑन जरूर है लेकिन यकीन मानिए आपकी हर बात यहाँ दिखेगी. इसलिए जो भी मन में है कह डालिए. गालियाँ भी स्वीकार हैं किन्तु शर्त है कि जाहिलों वाला अंदाज न हो ... गालियों में कुछ नयापन हो ... थोड़ी साहित्यिक हों ... कलात्मक हों. तो आईये दिल की बात कहकर सहज हो जाईये. स्वागत है :”


अपनी ताज़ी पोस्ट के ज़रिए कहते हैं 
“हर कोई उस्ताद की नकाब उतारने का खवाहिशमंद है. हर कोई कह रहा है कि मैं अपने असली परिचय के साथ सामने आ जाऊं. इतनी ज्यादा मेल आ चुकी हैं कि जीना हराम हो गया.” 
मैं, इस पोस्ट पर आई एक टिप्पणी को अपनी बात मान कर कोट कर रहा हूं, 

“यह निवेदन अवश्य करुँगी कि आप हिंदी ब्लागरों का ईमानदारी से मार्गदर्शन तथा कृतियों की समालोचना करें ताकि ब्लोगिंग के स्तर को और सुधारा जा सके.. सही है कि नाम के साथ इमानदार कमेन्ट दे पाना हर समय संभव नहीं हो पाता और इस चक्कर में कूड़े करकट भी अच्छे लेखकों द्वारा सराह दिए जाते हैं..... आपके सद्प्रयास के लिए आभार !!!!”

आइए अब एक नए ब्लॉगर से आपका परिचय कराएं – ये लिखते हैं

कोई सन्नाटा तो लाओ, ये शहर अब सो रहा है!
हादसों को मत जगाओ, ये शहर अब सो रहा है ! 

इतनी असरदार बातें कहने वाले इस इंसान का अपने बारे में कहना है 

“मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें, जिन्हें मैं मुक्त कंठ से गाकर जी भर रो सकता था....... !” 

इतने संवेदनशील प्राणी का नाम भी इनकी एक तरह से पहचान ही है -- ज्ञानचंद मर्मज्ञ! शब्दों की साधना करते हैं और अपने ब्लॉग का नाम रखा है --मर्मज्ञ: "शब्द साधक मंच"। बंगलुरू में रहते हैं। बहुत अच्छी, और दिशा, देश-समाज को, देती रचनाएं लिखते हैं। बहुत अच्छा गला है, और अपनी रचनाओं को जब मंच से गाते हैं तो श्रोता झूम उठते हैं। अब अगर पंक्तियों में ऐसे तल्ख़ी हो तो कौन न झूम उठे।

खौफ  के  बाज़ार  में  बेची  गयी  है   हर   ख़ुशी ,
ढूंढ़  लो  इस  ढेर  में  शायद  पड़ी  हो  ज़िन्दगी ,
क्या पता पहचान जाओ,ये शहर अब सो रहा है! 

ये तो बानगी भर है। आने दीजिए कुछ और पोस्ट। फिर देखिए इनके क़लम का कमाल। हमने तो इनको जब पहली बार सुना तब ही इनके मुरीद हो गए थे और “मनोज” ब्लॉग पर इन्हें कई बार आमंत्रित भी कर चुके अपनी रचनाएं पेश करने हेतु।


मौज़ूअ रात भर मैं कई सोचती रही 
मै थक गयी ,समझ न सकी ,सोचती रही 

कुछ बातें मन में आती हैं, आते रहती हैं, हम सोचते रहते हैं। इनके साथ भी ऐसा ही हुआ। कहती हैं, 
“अब देखिये ना - २ october गया ,commonwealth games आये-गए ,नवरात्र गुज़र गयी ,दशहरा बीत गया लेकिन कुछ पोस्ट करने को दिल ही नहीं हुआ । पता नहीं क्यूँ ?” 
जो भी हो, बात दर‍असल ये है कि, इन्हें तो होता ही है, शायद आपको भी होता ही होगा कि 
“यादों के,बचपन के, रिश्तों के,काम के ,महफ़िलों के,तन्हाईयों के,तकलीफों के ,मेहनतों के लेकिन जोश का ,प्रेरणा का ,दिलचस्पी का fuse उड़ जाता है , दिल सब से मुलाक़ात करना चाहता है तो रूह तन्हाई की मांग करने लगती है ,नज़र कई मौज़ुआत पे पड़ना चाहती है तो पलकें आँख पर पर्दा डाल देती हैं ; ज़िन्दगी सच्चाईयों से इश्क़ करना चाहती है तो सोचो - फिक्र ख़ुदकुशी कर लेते हैं और फिर मैं ही ग़ज़ल और शेरों का वरक़ के बीच रस्ते में ही क़त्ल कर देती हूँ --------- ये honor killing-सा मामला क्या है ? कल रात बस मै यही सोचती रही - सोचती रही - सोचती रही .......” 
मतलब ये कि


बादल फ़लक पे आ तो रहा था नज़र मुझे 
बरसेगा कब तलक ? मै यही सोचती रही ।

' हया ' पर लता 'हया' जी कह रही हैं, “सोचती रही” वैसे इसकी सोच बहुत ही संदेशप्रद और सोचने को विवश करने वाली है।

क्या लाज रख सकेंगे "हया" की वो मुस्तक़िल 
उसके क़रीब जब भी गयी ,सोचती रही   


“मेरा मानना है कि जहाँ इन्सान के सामने उसके विचारों के खोखलेपन का प्रश्न तनकर कुतुबमीनार की तरह खडा हो जाता है, वहाँ सोचने और नोचने की शक्ति अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है.” 
अजी ये कथन न तो मेरा है और न ही हया जी रचना पर कोई टिप्पणी। अजी ये सोचने और …. की …. बीमारी पं.डी.के.शर्मा"वत्स" को लगी है। कहते हैं, 
“किसी गधे को भी एक विशेष दृष्टिकोण से देखकर उसके सौन्दर्य की सराहना करने के बारे में सोचते रहने से आप एक दार्शनिक कहला सकते हैं.” 
ये पंडित जी को आज हो क्या गया है? पंडिताई छोड़कर इन्हें कहीं सोचने की बीमारी तो नहीं लग गई? आप क्या सोचते हैं? क्या कहा कुछ नहीं! ये तो सरसर ना-इंसाफ़ी है… हां … भई ज़रा सोच कर देखिए। आप क्यूँ नहीं सोचते ? 

क्या कहा बहुत सोचने से …. 



कभी-कभी लगता है 
फट जाएंगी नसें... 
सिकुड़ जाएगा शरीर, 
खून उतर आएगा आंखों में... 

जी आपको लगता होगा अचानक ये हमें क्या हो गया? बात ऐसी है कि ये बात मेरी नहीं है। जिस ब्लॉग पर यह बात कही गई है उसके स्वामी का आपबीती सुनाने की आदत है और कहना है 
“विचारों की रिटेल मार्केट में मेरी भी छोटी-सी दुकान है...यहां कुछ आउटडेटेड कविताओं का स्टॉक मिलता है जिन्हें ठोंगे में रखकर शेयर किया जा सकता है....और ज़िंदगी के कुछ होलसेल किस्से भी मिल जाएंगे....मीडिया के बड़े मॉल में नौकरी बजाता हूं...वहां से भी कुछ माल उड़ाकर अपनी दुकान चलाता रहूंगा, किसे पता चलेगा.....मेरी दुकान में आज, कल या परसों नकद बिल्कुल नहीं चलेगा, सब कुछ उधार लिया जा सकता है..."
बहुत कम लिखते हैं पर जो भी है वह उम्दा। आक्रोश भरे इनके स्वर और तेवर आज कुछ तल्ख़ हैं,



हमारी चमड़ी से अमेरिका पहनेगा जूते.. 
हमारी आंखों से दुनिया देखेगा चीन... 
किसी प्रयोगशाला में पड़े होंगे अंग 
वैज्ञानिक की जिज्ञासा बनकर... 

ऐसी पोस्ट पर आने वालों की संख्यां कुछ कम ही होती है, यहां भी वही हाल है। उस्ताद जी, ज़रा एक फेरा लगा आइए… "लाशों के शहर में..." भी।   १० से कम दिया तो … ! आप जो भी दें, मैं तो १० में १० देता हूं। 

तो आज की मेरी ये चर्चा कैसी लगी? 
क्या कहा आपने? 
....नो! 
.....नो! 
ये अच्छी बात नहीं … 
आपने पढा ही नहीं इस चर्चा को। 
अच्छा! 
क्या कहा?



आप ने कहा, हाज़िरी लगाने आ गये| 
बज्म में हुजूर की, मुस्कुराने आ गये| 

लग गई हाज़िरी। मुस्कुरा कर लगाए! यह ही तो जीवन का सार है। मिले-मिलाए। हंसे-मुस्कुराए! और क्या चाहिए। अब मैं भी चलता हूं। पर आप कहां चले?
यूं ही  ठाले बैठे ही मत  रहिए। 

क्या कहा?
"ठाले-बैठे नहीं, बैठे-ठाले होता है। "

होता होगा। पर Navin C. Chaturvedi के ब्लॉग का नाम यही है, और जाने से पहले यहां से होकर तो आइए। जाइएगा ना?
हां कहा है। मुकरिएगा मत। क्यों कि

बोलना-निबाहना ये अलग दो इल्म हैं| 
बात बस यही उन्हें हम सुझाने आ गये| 

बस। आज इतना ही। फिर मिलते हैं, अगले सप्ताह!!