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Tuesday, March 09, 2010

“टट्टी की ओट और धोखे की टट्टी” (चर्चा मंच)


“टट्टी की ओट और धोखे की टट्टी” (चर्चा मंच)

TUESDAY, MARCH 9, 2010

"चर्चा मंच" अंक-82 
चर्चाकारः डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" 
आइए आज का 
"चर्चा मंच" सजाते हैं- 
निवेदन यह है कि यदि आप  पल-पल! हर पल!! 
http://palpalhalchal.feedcluster.com/ 
में अपना ब्लॉग शामिल कर लेंगे तो 
मुझे 
चर्चा मंच में आपका लिंक उठाने में सरलता होगी।
 
Author: ताऊ रामपुरिया | Source: ताऊ डॉट इन
 
हाय एवरीवन...कैसे हैं आप लोग? होली निकल गई पर कसक रह गई. वैसे ही जैसे रस्सी जल गई पर बल नही निकले. होली बीत जाने के बाद अक्सर यह समझा जाता है कि पुरानी कडवाहट खत्म हुई. पर यहां तो माजरा ही कुछ अलग है. फ़तवे पर फ़तेवे दिये जारहे हैं..ले फ़तवे...दे फ़तवे...ये फ़तवे..वो फ़तवे..यानि ब्लाग जगत का मूं ... [read more]
 

 

 
 
| Author: अजित वडनेरकर | Source: शब्दों का सफर
 
...हम हिन्दुस्तानी नित्यकर्म को प्रकृति की सोहबत में करने के आदी रहे हैं। फारसी में इसे हाज़त-फ़राग़त कहते हैं और हिन्दी में शंका समाधान... [read more]
 
 
| Author: सूर्य गोयल | Source:समाचार:- एक पहलु यह भी
 
* महिला आरक्षण के विरोध में राजद और सपा ने लिया केंद्र सरकार से समर्थन वापिस * खापो के तुगलकी फरमानों पर लगे रोक: जनवादी महिला समिति * अर्थ व्यवस्था की तेज रफ़्तार के लिए राजकोषीय मजबूती जरुरी : प्रणव * संसद में सभी मुद्दों पर बहस को तैयार है सरकार : मनमोहन * सर्वेक्षण का खुलासा, स्विस बैंक की गो ... [read more]
 
 
| Author: अविनाश वाचस्पति | Source: नुक्कड़
 
वे कह रहे हैं एलान मैं बतला रहा हूं घोषणा पढ़ लीजिए और दे दीजिए उनको शुभकामनाएं जिन्‍होंने है सम्‍मान पाया। [read more]
 
| Author: Tej Pratap Singh | Source: साहित्य योग
 
बनते मकान में चल रही है नंगे पैर  सर पर पत्थर की टोकरी  नाप रही दोपहरी की धूप  बहता पसीना, सूखा जिस्म मन में द्रोपदी सी लज्जा  आँखों में नमक का समुन्दर  है ना कोई आस जिंदगी से ना कोई मंजिल.... बनते मकान में  [read more]
 
 
Author: 'अदा' | Source: काव्य मंजूषा
 
तुम्हारी चोट से मेरा दरकना लाज़मी तो नहीं, मगर कुछ बातें मेरे इख्तियार में भी नहीं मुझे बार-बार तोड़ना, फिर जोड़ना, प्रिय शगल है तुम्हारा, स्वामित्व का बोध कराता है तुम सिर्फ मेरी हो ! पुख्ता  अहसास दिलाता है  मैं तुम्हें खुश होने देती हूँ, इस लिए नहीं, कि मैं निर्बल हूँ अपितु इस लिए ... [read more]
 
Mar 8, 2010 | Author: Tej Pratap Singh | Source: साहित्य योग
 
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आती है ।  दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छा ... [read more]
 
 
Mar 9, 2010 | Author: ललित शर्मा | Source:ललितडॉटकॉम
 
लोटा एक साधारण सा शब्द है लेकिन इसकी महिमा निराली है.........मनुष्य के जीवन से जुड़ा हुआ है...... इसके बिना काम चलना बहुत ही कठिन है........लोटे के लुढ़कने से लोटना शब्द का भी निर्माण हुआ होगा...........मनुष्य जब पी कर मदमस्त हो जाता है तो कहीं पर भी लोट जाता है........चाहे वह सड़क, घुरा, या नाली ... [read more]
 
भला महिलाएं पुरूषों से अपना अधिकार क्‍यूं मांगे ?? - अधिकार और कर्तब्‍यों का आपस में एक दूसरे से अन्‍योनाश्रय संबंध है। चाहे कोई भी स्‍थान हो , कर्तब्‍यों का पालन करने वालों को सारे अधिकार स्‍वयमेव मिल जाते ह..
 
राष्ट्रपति, जो मुख्य मंत्री के चरण स्पर्श किया करता था. - हमारे पहले राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद हालांकि काफी धीर, गंभीर, गुणी इंसान थे। पर मन से बहुत कोमल और परम्पराओं को निभाने में विश्वास रखते थे। उन्हें सा..
 
“नारी-दिवस पर जूती पुत्रों को सलाम” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”) - *प्रश्न- क्या महिला पाँव की जूती है? उत्तर- जी हाँ! प्रश्न- और पुरुष? उत्तर- …… प्रश्नकर्ता- मैं बताऊँ? उत्तरदाता- बताइए! जूती पुत्र- प्रश्नकर्ता ने...
 
देखा रौद्र रूप सुनी जो हुंकार , दुबक गये उमर संग गुरू जमाल - *युगप्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती के अमृत वचनों से वंचित रह जाने वाले अब हमसे क्यों उन तथ्यों को ग्रहण करेंगे ?परन्तु कर्तव्य वश हमें असुरों का मान मर्दन..
 
धन्य हैं ऐसी बेटियां और पूज्य हैं ऐसी नारियां........ - रिटायरमेन्ट के बाद एक गरीब मुनीम को जब एकमुश्त बड़ी रक़म मिली तो शाम हो चुकी थी और बैंक बन्द हो चुके थे इसलिए मजबूरन वह सारा रुपया अपने घर ही लेकर आ गय..
 
 
बनते मकान...बन गए हैं श्रृंगार.... - *बनते मकान में * चल रही है नंगे पैर सर पर पत्थर की टोकरी नाप रही दोपहरी की धूप बहता पसीना, सूखा जिस्म मन में द्रोपदी सी लज्जा आँखों में नमक का समुन्दर ह..
 
Mar 8, 2010 | Author: Tej Pratap Singh | Source: साहित्य योग
 
यार फलाने एक बात बता  क्या? तुने कल अखिलेश और राहुल के बारे में कुछ बोला था. हाँ तो..... अखिलेश तो लोक सभा में है पर राहुल नहीं ....तो राहुल वहां दुल्हन कैसे तलासते  बात तो सही है पर मनमोहन ही कौन से लोक सभा के सदस्य हैं, लेकिन हैं ना संसद में.... तू तो हमेशा ही बकवास करता रहता है... मैं ... [read more]
 
 
Mar 8, 2010 | Author: sangeeta swarup | Source:गीत...............
 
ये  रचना मेरी छोटी बहन  मुदिता  ने आज महिला दिवस पर मुझे भेजी थी ...इसे मैं आप सभी के साथ बाँटना चाहती  हूँ.... [read more]
 
| Author: RaniVishal | Source: Hindi kavya sangrah
 
ओ शीतल मंद पवन तू ही तप्त ह्रदय को शीतल कर नारी ह्रदय दहक उठा भीषण क्रोध की ज्वाला में जल कर [read more]
 
 
Mar 8, 2010 | Author: करण समस्तीपुरी | Source: मनोज
 
-हरीश प्रकाश गुप्त [read more]
 
 
Mar 8, 2010 | Author: वन्दना अवस्थी दुबे | Source: किस्सा-कहानी
 
एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है, [read more]
 
मुक्ति पर इतना विवाद,  
खुलेपन पर इतना हंगामा क्यों ?  
युग बीते, पर 
क्या तुम्हारी लोभ से ललचायी आँखों से  
पूर्व-राग का नशा नहीं उतरा ?  
शाश्वत कुंठा या कायरता 
हो गयी न अभिव्यक्त ! 
संस्कार दुबक गया……. 
Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून 
कार्टून:- महिला आरक्षण पर एक भविष्यवाणी...
 
Mar 8, 2010 | Author: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' | Source: नन्हा मन
 
खिड़की पर बैठी हुई, मीत गुनगुनी धूप. [read more]
  

आज की 

प्रातःकालीन चर्चा में- 

केवल इतना ही….!
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1 comment:

  1. fir se behatreen.. ye author ka naam likhna achchha laga..

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