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Sunday, March 08, 2015

"होली हो ली" { चर्चा अंक-1911 }

मित्रों।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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“नभ में लाल-गुलाल उड़े हैं” 

Holi-group
रंग बिरंगे चेहरे लेकर,
घूम रही है टोली!
गली मुहल्लों चौबारों में,
झूम रही है होली!!... 
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केशर होली 

Akanksha पर Asha Saxena 
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होली हो ली मियाँ 

चलो आओ शुरु करते हैं 

खोदना फिर से 

अपना अपना कुआँ 

उलूक टाइम्स पर सुशील कुमार जोशी 
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तुम्हारी सभी उपलब्धियां निरर्थक है... 

हे पुरुष..  
तुम सदियों से लिखते रहे हो.. 
स्त्रियों की व्यथा को... 
उनके दर्द को... 
तुमने दावा किया है... 
'आहुति' पर sushma 'आहुति' 
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होली का हल्ला है ... 

होली का हल्ला है 
रंगारंग सारा मुहल्ला है 
आदमी बना बागड़बिल्ला है 
गुझिया है रसगुल्ला है... 
बुलबुला पर Vikram Pratap singh 
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रंग बरसे- जब बरसे - रंग बरसे 

उन्नयन पर udaya veer singh
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जीवन के रंगमंच पर 

जीवन के इस रंगमंच पर 
अपनी अपनी भूमिका निभाते निभाते 
अपने अपने पात्रों चरित्रों को जीते जीते 
हम कभी सजाते हैं दीवारों पर तस्वीरें 
और कभी खुद ही कोई तस्वीर बन कर 
कैद हो जाते हैं 
अंधेरे कमरे की किसी दीवार पर... 
Yashwant Yash 
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तुम्हें चाहा सदा अब ज़िंदगी में 

तुम्हें चाहा सदा अब ज़िंदगी में 
न हो हमसे खफा अब ज़िंदगी में... 
Ocean of Bliss पर 
Rekha Joshi 
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सागर अभी तो कारवाँ और भी है 

बस दरिया नहीं आबे-रवाँ और भी है 
सागर अभी तो कारवाँ और भी है 
काशिद बना है कलम,मकाँ पन्ना, 
यारब जीने का गुमाँ और भी है... 
कविता-एक कोशिश पर नीलांश 
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489. इन्द्रधनुषी रंग 

(होली पर 10 हाइकु) 

1.

तन पे चढ़ा
इन्द्रधनुषी रंग 
फगुआ मन ! 
2.

नाचे बहार
इठलाती है मस्ती 
रंग हज़ार ! 
3... 
लम्हों का सफ़र पर डॉ. जेन्नी शबनम 
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होली 

तितली पर 
Vandana Ramasingh 
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क्या होली की प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है 

होली के अवसर पर एक विचार ... 

सृजन मंच ऑनलाइन

पहले होली से हफ़्तों पहले गलियों बाज़ारों में निकलना कठिन हुआ करता था होली के रंगों के कारण | आज सभी होली के दिन आराम से आठ बजे सोकर उठते हैं, चाय-नाश्ता करके, दुकानों आदि पर बिक्री-धंधा करके, दस बजे सोचते हैं की चलो होली का दिन है खेल ही लिया जाय | दो चार दोस्तों –पड़ोसियों को रस्मी गुलाल १२ बजे तक सब फुस्स | वह उल्लास, उमंग कहाँ है, सब कुछ मशीन की भांति... 

डा. श्याम गुप्त

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अब हम चलते है । 

कही कुछ ठिठक गया 
जैसे समय, 
नहीं मैं ।  
नहीं कैसे हो सकता 
जब समय गतिशील है 
फिर कैसे ठिठक गया,... 
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नवाले-यार का मौसम ! 

ख़्याले-यार  का  मौसम
विसाले-यार  का  मौसम

बुरा  हो  रस्मे-हिज्रां  का
मलाले-यार  का  मौसम... 
Suresh Swapnil 

8 comments:

  1. सुप्रभात
    होली के रंगों में सराबोर आज की लिंक्स |
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |

    ReplyDelete
  2. बहुत २ आभार आदरणीय मयंक सर मुझे भी शामिल कने के लिए

    ReplyDelete
  3. सुप्रभात
    मुक्तक को शामिल करने के लिए शुक्रिया ...........साभार!

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  4. सुंदर रविवारीय चर्चा । आभार 'उलूक' का सूत्र 'होली हो ली मियाँ ... ' को स्थान देने के लिये ।

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  5. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति ....
    आभार!

    ReplyDelete
  6. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर चर्चा

    ReplyDelete
  8. सुन्दर, सार्थक, सशक्त सूत्र ! बढ़िया चर्चा !

    ReplyDelete

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