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को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Friday, June 12, 2015

"उलझे हुए शब्द-ज़रूरी तो नहीं" { चर्चा - 2004 }

मित्रों।
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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ये ज़रूरी तो नहीं 

चित्र प्रदर्शित नहीं किया गया
 ज़रूरी तो नहीं कि 
मुझपर रोज़ मेहरबां हो ख़ुदा 
उसके दर पर भी तो 
लाखों सवाली होंगे... 
Lekhika 'Pari M Shlok' 
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एक याद 

कहाँ गए वो दिन 
जब शरमा कर दुपट्टे से मुह छिपा कर 
भाग जाया करते थे 
जरा सी तारीफ गालों को 
गुलाबी कर दिया करती थी... 
रूहानी सुहानी पर Aparna Khare 
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उलझे हुए शब्द ... 

आपस में उलझे हुए शब्द 
सुलझ कर 
ढल कर 
किसी साँचे में 
पाले रहते हैं उम्मीद... 
जो मेरा मन कहे पर Yashwant Yash 
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मुसाफिर हूँ इक मै 

चलता जा रहा यह ज़िंदगी 
थक चुका अब चलते चलते... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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ठहरो! 

इतना आग मत उगलो 

मेरी पलकों से पहले 
खुलती हैं तुम्हारी पलकें 
उठकर देखता हूँ 
फेंक चुके हो 
अंधेरे की चादर 
गिरा चुके हो लाल चोला... 
बेचैन आत्मा पर देवेन्द्र पाण्डेय 
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वो अब हर बात में पैमाना ढूंढते हैं
मंदिर भी जाते हैं तो मयखाना ढूंढते हैं ।
मुहल्ले के लोगों को अब नहीं होती हैरानी
जब शाम होते ही सड़क पर आशियाना ढूंढते हैं.. 
उलूक टाइम्स पर सुशील कुमार जोशी 
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घुसपैठियों से सावधान 

हम, जो दुनिया को खूबसूरत होते हुए देखना चाहते हैं-  किसी भी तरह के शोषण और गैर-बराबरी के विरूद्ध होते हैं, चालाकी और षड़यंत्र की मुनाफाखोर ताकतों का हर तरह से मुक्कमल विरोध करना चाहते हैं । यही कारण है कि अपने कहे के लिए उन्‍हें  ज्‍यादा जिम्मेदार भी माना जाना चाहिए, या उन्‍हें खुद भी इस जिम्मेदारी को महसूस करना चाहिए... 
लिखो यहां वहां पर विजय गौड़ 
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गाल गुलाब छिटकती लाली 
जुल्फ झटक मौका कुछ देती
अँखियाँ भरे निहार सकूँ
कारी बदरी फिर ढंक लेती
छुप-छुप जी भर प्यार करूँ... 
BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN
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इतने दिन तक कहाँ रही 

याद न किया मुझे 
दौड़ कर आ जा तुझे
 अपनी बाहों में झुलाऊँ|
अपनी पलकों में छिपालूं... 
Akanksha पर Asha Saxena 

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