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Sunday, June 14, 2015

"बेवकूफ खुद ही बैल हो जाते हैं" {चर्चा अंक-2006}

मित्रों।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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बारिश हुई तो... 

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए 
मौसम के हाथ भीग के सफ्फाक हो गए... 
आवारगी पर lori ali 
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"बारिश मत धोखा दे जाना" 

सावन सूखा बीत न जाये।
नभ की गागर रीत न जाये।।

कृषक-श्रमिक भी थे चिन्ताकुल।
धान बिना बारिश थे व्याकुल।। 

रूठ न जाये कहीं विधाता।
डर था सबको यही सताता।।

लेकिन बादल है घिर आया। 
घटाटोप अंधियारा छाया... 
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आओ जी लें यहाँ 

हर ऋतु हर मौसम 

क्त की धारा बन 
बहता रहा जीवन यहाँ 
युगों युगों से इस धरा पर 
रात दिन छलते रहे और 
जीवनक्रम यहाँ चलता रहा 
निरंतर... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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चंदा ओ चंदा 

Sudhinama पर sadhana vaid 
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इस दुनिया का 

इस दुनिया का एक लघु आकार दिखा 
जिसमें जीवन का एक बृहद व्यापार दिखा... 
Sanjay kumar maurya 
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ज़िन्दगी का खटराग 

काश कि एक बोहेमियन जैसी ज़िन्दगी होती... 
Bhavana Lalwani 
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मुब्तिला इश्क में वो 

एहसास-ए-अदब भूल गए 

अपनी मंजिल के लिए 
होश-ओ-खबर खो के चले, 
बा-वस्फे शौक़ दुश्मनी... 
वो मगर बो के चले... 
Harash Mahajan 
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अब चोर ही 

चोर की जांच करेगा 

फ़र्ज़ी डिग्री की सरकार 
अपने गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए 
अब आंतरिक लोकपाल बिठाएगी , 
यानी अब चोर ही 
चोर की जांच करेगा... 
Virendra Kumar Sharma 
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उन दीवारो पर 

भीड़ बहुत है 
सबने अपना अपना सामान बाँध लिये हैं 
और जो छूट रहें है 
उनका पता कही खो जायेगा 
गुमराह राहों के बीच... 
हमसफ़र शब्द पर संध्या आर्य 
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उद्देश्य सफल हो जाता है 

आनंद स्रोत बह रहा है 
क्यों उदास होता है ये मन . 
चिर नवीन ये चिर पुराण है 
अमृतमय इसमें स्पंदन . 
प्रकृति करती है... 
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सांसद निधि बढ़ाने का औचित्य ? 

जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में ---- अदम गोंडवी देश की आधी से ज्यादा आबादी फटेहाल है और देश के संसद में पांच करोड़ की सांसद निधि में पांच गुना वृद्दि करके उसे पच्चीस करोड़ किये जाने का प्रस्ताव किया गया है | यह प्रस्ताव सम्भवत: पारित भी हो चूका है | हालाकि सांसदों की मांग इसे पचास करोड़ तक कर देने की रही है... 
शरारती बचपन पर sunil kumar 
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उजालों के दीप ! 

जैसे दीपक के जलने से जलता है अँधेरा , 
और अँधेरे के जलने से जलती है रात... 
अन्तर्गगन पर धीरेन्द्र अस्थाना 
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१७३. छलनी 

मुझमें कुछ डालो, तो ध्यान रखना, 
मैं सब कुछ अपने में समेटकर नहीं रखती... 
कविताएँ पर Onkar 
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