चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Tuesday, May 23, 2017

मैया तो पाला करे, रविकर श्रवण कुमार; चर्चामंच 2635

दोहे 

रविकर 
कर रविकर अहसास तो, बने अजनबी खास।
अपने भी हों अजनबी, मरे अगर अहसास।।

मैया तो पाला करे, रविकर श्रवण कुमार।
पाला बदले किन्तु सुत, बदले जब सरकार।।

मैया है मेरी हँसी, बापू की मुस्कान।
छुटकी की शैतानियाँ, रविकर कुल सम्मान।। 

ब्यापार और ध्यान 

J Sharma 

  जीएसटी यानी एक नए युग में प्रवेश

pramod joshi 


रश्मि शर्मा 

व्यंग्य जुगलबंदी : बिना शीर्षक

Ravishankar Shrivastava 

(संपादकीय) सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोहं रामवल्लभां

ऋषभ देव शर्मा 

आइना संगसार करना था 

नीरज पर नीरज गोस्वामी 
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कार्टून :-  

यलग़ाााार हो ... 

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और हम तैयार हो गये....... 

गौतम कुमार “सागर” 

मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
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भावनाएं आहत होने की 

मूर्खता के पैमाने 

गुस्ताख़ पर Manjit Thakur 
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मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए! 

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'सिलवट के घेरे..' 

 "हिज़्र औ' वस्ल के फ़ेरे.. 
जिस्म समझता.. 
फ़क़त.. 
सिलवट के घेरे.. 
आ किसी रोज़.. 
पिघल जाने को.. 
के बह रहे.. 
अश्क़ सुनहरे..!!"  
Priyanka Jain 
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jio 4g internet speed को 

दुगना करने का तरीका 

Faiyaz Ahmad 
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जिंदगी हो गई है तंगदस्त 

Comic couplet  

डा. गिरिराजशरण अग्रवाल 

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तुम्हारे साथ 

जिनसे मुझे प्यार हो गया... 

चलो इक बार फिर, 
तुम मुझे कॉफी पर बुलाओ, 
और हमेशा की ना करते हुए हाँ कर दूँ.... 
तुम्हारा कॉफी पर बुलाना, 
इक बहाना था, 
गुजरे पलो को दोहराना होता है...  
'आहुति' पर Sushma Verma 
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रेवाड़ी की धाकड़ बेटियों ने 

शिक्षा और सुरक्षा हेतु अनशन कर 

समाज को दी एक नई दिशा 

शब्द-शिखर पर Akanksha Yadav 
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अरुण दोहे - 

पद के मद में चूर है, यारों उनका ब्रेन 
रिश्तों में भी कर रहे, डेकोरम मेन्टेन ।। 
साठ साल की उम्र तक, पद-मद देगा साथ 
बिन रिश्तों के मान्यवर, खाली होंगे हाथ... 
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गंध फूलों की 

sapne(सपने) पर shashi purwar 
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चन्द माहिया :; 

क़िस्त 40 

:1: 
जीवन की निशानी है 
रमता जोगी है 
और बहता पानी है 
;2: ... 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 
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पुस्तक---- 

ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------ 

डा श्याम गुप्त----- 

....मरे जो शादियां करके . 

दर्द गृहस्थी का ,बह रहा आँखों से छलके , 
ये उसके पल्लू बाँधा है ,उसी के अपनों ने बढ़के . ... 
! कौशल ! पर Shalini Kaushik 
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पर्यावरण ले जुरे हमर संस्कृति 

चारीचुगली पर jayant sahu_जयंत 
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व्यंग्य की जुगलबंदी ३२ -  

हवाई चप्पल 

एक राम किशोर हैं | अस्सी साल से ऊपर के रिटायर्ड मास्टर | झुकी हुई कमर | कमज़ोर नज़रें | दुबले इतने कि ज़ीरो फिगर वाली लड़कियां शर्मा जाएं | वे इंसान के खाली बैठने को दुनिया का सबसे बड़ा पाप मानते है | राम किशोर की आवश्यकताएं बेहद सीमित हैं | रोटी, कपड़ा और मकान के बाद सबसे आवश्यक जिसको मानते हैं वह है हवाई चप्पल ... 
कुमाउँनी चेली पर शेफाली पाण्डे 
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माँ को भी जीने का अधिकार दे दो 

इन दिनों सोशल मीडिया में माँ कुछ ज्यादा ही गुणगान पा रही है। हर ओर धूम मची है माँ के हाथ के खाने की। जैसै ही फेसबुक खोलते हैं, एक ना एक पोस्ट माँ पर होती है, उसके खाने पर होती है। मैं भी माँ हूँ, जैसे ही पढ़ती हूँ मेरे ऊपर नेतिक दवाब बढ़ने लगता है, अच्छे होने का... 
smt. Ajit Gupta 
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कुछ संवेदना 

मित्रों ! मंगल प्रभात ! आजकल मैं आँखों में मोतियाबिंद व रेटिना में हुए आघात की वजह से सेहत संबंधी समस्याओं से रूबरू हूँ । सो पठन -पाठन न के बराबर है । कल घर में कुछ सुभचिंतक व सगे संबन्धियों की उपस्थिती थी, कई लोगों की सहानुभूतु व सुंदर सुझाव मिले अच्छा लगा उनका साधुवाद किया । डाक्टरों ने कुछ कमियाँ कुछ नुख्से बताए उनके अनुसार चिकित्सा चल रही है । लाभ भी है.... 
udaya veer singh 
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भाग्यशाली 

तुम्हें शायद नहीं पता 
तुम्हारी आँखों का दुराव 
तुम्हारी बातों का अलगाव 
तुम्हारे व्यवहार का भटकाव 
तुम लाख मुझसे छिपाने की कोशिश कर लो 
मेरी समझ में आ ही जाता है .... 
Sudhinama पर sadhana vaid 
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शीर्षक विहीन 

जनता के बिना किसी नेता की कल्पना करना भी संभव नहीं. नेता होने के लिए जनता का होना जरुरी है. भक्त न भी हों तो भी चलेगा. भक्त नेतागिरी में नया कान्सेप्ट है. इससे पहले इनके बदले पिछ्लग्गु एवं चमचे हुआ करते थे. भक्त भगवान के होते थे. अब पिछ्लग्गु ही भक्त कहलाते हैं या नेता भगवान हो लिए हैं, यह तो ज्ञात नहीं मगर युग बदला जरुर है... 
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......और मैंने शेर भगा दिए 

पत्रकारिता की विश्वसनीयता को लेकर जब लिख रहा था तब, लिखते-लिखते ही मुझे मेरी एक दुस्साहसभरी मूर्खता याद आ रही थी। मेरी यह मूर्खता, पत्रकारिता की विश्वसीनयता से सीधे-सीधे शायद न जुड़ती हो लेकिन मुझे यह अन्ततः जुड़ती हुई ही लगती है... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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मेघालय यात्रा: 

शिलॉंग भ्रमण- 

शिलॉंग व्यू पॉइंट, एलिफेंट फॉल्स, 

और कैथेड्रल ऑफ़ मैरी चर्च 

TRAVEL WITH RD पर RD PRAJAPATI  
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राजपूत स्त्रियों की स्थिति 

और उनके गुण 

गीत  

"घुटता गला सुवास का"  

Sunday, May 21, 2017

"मुद्दा तीन तलाक का, बना नाक का बाल" (चर्चा अंक-2634)

मित्रों 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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Govind Singh(गोविन्द सिंह)  
मैं
धरती माँ की बेटी हूँ
इसीलिए तो
सीता जैसी हूँ
मैं हूँ
कान्हा के अधरों से
गाने वाली मुरलिया,
इसीलिए तो
गीता जैसी हूँ... 
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दो क्षणिकाएँ..... नादिर खान 

तुम अक्सर कहते रहे 
मत लिया करो मेरी बातों को दिल पर 
मज़ाक तो मज़ाक होता है 
ये बातें जहाँ शुरू वहीं ख़त्म .... 
और एक दिन मेरा छोटा सा मज़ाक 
तार –तार कर गया 
हमारे बरसों पुराने रिश्ते को न जाने कैसे... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
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कहां खो गए गीत 

Fulbagiya पर डा0 हेमंत कुमार 
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जानता है मुझे पहचानता नही 

मुझे पहचानता नहीं वो तो 
मुद्दत से जानता है मुझे... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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अनजानी लड़की 

एक लड़की है अनजानी सी , 
थोड़ी पगली थोड़ी दीवानी सी , 
जीवन उसकी है एक कहानी सी , 
कहती है झल्ली खुद को 
पर वो न जाने वो है सयानी सी ... 
प्यार पर Rewa tibrewal  
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मेरी है आज तो कल तेरी भी बारी होगी 

अपने गेसू की तरह तूने सँवारी होगी 
तेरी ही मिस्ल तेरी बात भी न्यारी होगी.... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
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कुछ बिखरी पंखुड़ियां..... 

मुझमे तुम में सिर्फ इतना फर्क है, 
मैंने तुम्हे उम्मीदों से बंधा है, 
तुमने मुझे शर्तो से बांधा है... 
'आहुति' पर Sushma Verma 
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नज़्म की ज़िंदगी ... 

बता कौन तेरी ख़ुशी ले गया 
कि कासा थमा कर ख़ुदी ले गया... 
साझा आसमान पर Suresh Swapnil  
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मैं तुम्हारे काव्य की नायिका नहीं हूँ 

मैं नहीं कोमल कली सी, ना गरजती दामिनी, 
हूं नहीं तितली सी चंचल, ना ही मैं गजगामिनी... 
भारतीय नारी पर shikha kaushik 
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शहर का पुराना पेंटर 

वह वर्षों से 
रंग रहा है 
इस शहर के घर
तब से जब यह शहर 
बस ही रहा था 
नयी कालोनियां बन रही थी 
खेतों को काट काट कर... 
सरोकार पर Arun Roy 
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जिन्दगी मझधार में 

झूठ शामिल कर सका ना आजतक किरदार में 
प्यार महसूसा जहाँ, धोखा मिला उस प्यार में... 
मनोरमा पर श्यामल सुमन 
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कुंठित मन के सवाल.... 

मेरा कुंठित मन पूछता है 
कुछ सवाल कभी कभी 
कि वह क्या है जो मेरे पास नहीं है 
पर जो दूसरों के पास है ... 
जो मेरा मन कहे पर Yashwant Yash 
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पहली बार सुना ऐसा इंकार 

‘हलो!’ ‘हलो।’ ‘प्रियम्वदजी बोल रहे हैं?’ ‘जी हाँ! मैं प्रियम्वद बोल रहा हूँ।’ नमस्कार प्रियम्वदजी। मैं रतलाम से विष्णु बैरागी बोल रहा हूँ।’ ओह! विष्णुजी! नमस्कार! नमस्कार! कहिए।’ ‘आप मुझे अकार 46 की कितनी प्रतियाँ उपलब्ध करा सकते हैं?’ ‘आप कहें उतनी। लेकिन आपको क्यों चाहिए?’ ‘अपने कुछ मित्रों को भेंट देने के लिए... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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आतंकवादी 


भूली-बिसरी यादें पर राजेंद्र कुमार 
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आइना 


Akanksha पर Asha Saxena 
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कृष्ण और यशोदा सम्वाद 

Mera avyakta पर 
राम किशोर उपाध्याय 
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तीन तलाक –  

पुरुषों को पारिवारिक निर्णय से वंचित किया जाए 

आज अपनी बात कहती हूँ – जब मैं नौकरी कर रही थी तब नौकरी का समय ऐसा था कि खाना बनाने के लिये नौकर की आवश्यकता रहती ही थी। परिवार भी उन दिनों भरा-पूरा था, सास-ससुर, देवर-ननद सभी थे। अब यदि घर की बहु की नौकरी ऐसी हो कि वह भोजन के समय घर पर ही ना रहे तब या तो घर के अन्य सदस्यों को भोजन बनाना पड़े या फिर नौकर ही विकल्प था। सास बहुत सीधी थी तो वह नौकरानी के साथ बड़ा अच्छा समय व्यतीत कर लेती थीं। कोई कठिनाई नहीं थी। लेकिन हमारी नौकरानी ऐसी नहीं थी कि हम सब उस पर ही निर्भर हों। घर में सारा काम सभी करते थे। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता था कि यहाँ तो नौकरानी के हाथ का भोजन खाना पड़ता है... 
smt. Ajit Gupta 
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