Sunday, August 18, 2019

"देशप्रेम का दीप जलेगा, एक समान विधान से" (चर्चा अंक- 3431)

स्नेहिल अभिवादन   
रविवार की चर्चा में आप का हार्दिक स्वागत है|  

देखिये मेरी पसन्द की कुछ रचनाओं के लिंक |  
 - अनीता सैनी 
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ऐ ग़मज़दा दिल, तू मेरा अपना है,चा 
हे हिन्दू का है या मुसलमा का है! 
हर मज़हब का खुदा मुहब्बत है,ये 

 अंदाज़-ए -हैवानियत कहाँ का है… 
रंग बिरंगी एकता पर 
Anjana Dayal de Prewitt 
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स्वर्ग होता है कहाँ.....  अरुण 

मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
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मंगल मिशन.... 
मिशन मंगल कुल मिला कर एक अच्छी फिल्म है। इसरो के सफल अंतरिक्ष कार्यक्रम "मार्स ऑर्बिटर मिशन" से जुड़े वैज्ञानिको के जुनून,लक्ष्य के प्रति समर्पण, प्रतिकूल कारको में मध्य दृढ़ इच्छाशक्ति के वास्तविक जादुई यथार्थ का फिल्मांकन और उसे थियेटर के बड़े पर्दे पर देखने का एक अलग ही आनंद है। इसकी सफलता का अनुमान इसके प्रथम प्रयास में सफल होने के साथ - साथ इसके बजट के संकुचन का भी है। तभी तो जहा किसी शहर में ऑटो का किराया प्रति किलोमीटर 10 रुपया पड़ता है, वही मंगलयान प्रति 8 रुपये किमी के दर से अपने लक्ष्य तक पहुच गया… 
अंतर्नाद की थाप पर कौशल 
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सबीर हका को पढ़ते हुए 
सबीर हका 
को पढ़ते हुए लगा 
जब 
एक मज़दूर कवि  बनता है तो वह 
शब्दों की ईंट 
भावों की सीमेंट को 
अपने पसीने  और आंसुओं के गारे से सान के 
कविताओं की जो ईमारत बुलंद करता है 
वो सदियों सदियों तक शान से 
सभ्यता के सीने पे खड़ी रहती हैं … 

एक बोर आदमी का रोजनामचा 
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पहली प्राथमिकता है  जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा 
गढ़ते नयी कहानी साहिब  
फिर करते मनमानी साहिब  
सभी ज्ञान के स्रोत आप हो  
हम जनता अज्ञानी साहिब ... 
हमारे भारत में ‘अभिनय सम्राट’ कहते ही लाखों-करोड़ों के दिलो-दिमाग में एक ही नाम कौंध जाता है, और वो है दिलीप कुमार का. दिलीप कुमार ने फ़िल्म ‘देवदास’ में पारो से बिछड़ने के गम में शराब क्या पी ली, लोगबाग जानबूझ कर अपनी-अपनी प्रेमिकाओं से बिछड़कर उनके गम में शराब पीने लगे. तमाम टैक्सी ड्राइवर्स ने फ़िल्म ‘नया दौर’ देख कर टैक्सी चलाने का धंधा छोड़ कर तांगा चलाना शुरू कर दिया. लेकिन सबसे ज़्यादा नुक्सान तो फ़िल्म ‘गंगा-जमुना’ के उन प्रशंसकों का हुआ जो कि अपना अच्छा-ख़ासा, लगा-लगाया, काम-धंधा छोड़ कर डाकू हो गए. हमारे बुजुर्गों में कई लोग मोतीलाल के अभिनय के दीवाने हुआ करते थे तो कई लोग बलराज साहनी...  
तिरछी नज़र पर गोपेश मोहन जैसवाल 
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(स्मृति आलेख )  
क्या -क्या नहीं थे हरि ठाकुर ? 

गन्दे पापा !

 मन की वीणा - कुसुम कोठारी।
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11 comments:

  1. उपयोगी लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा।
    आपका आभार अनीता सैनी जी।

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  2. बहुत सुन्दर अंक। बढ़िया प्रस्तुति अनीता जी।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  4. बहुत सुन्दर सूत्रों से सुसज्जित आज का चर्चामंच ! मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार अनीता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  5. इतनी सारी बेहतरीन रचनाओं के बीच एक छोटा-सा ही सही पर स्थान देने के लिए बहुत सारा धन्यवाद आपका !

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  6. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति ..

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  7. बहुत सुंदर चर्चा अंक ।
    शानदार सूत्रों का चयन।
    मेरी दो रचनाएं एक ही अंक में देख विस्मित हूं
    बहुत बहुत आभार अंतर हृदय से शुक्रिया।

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  8. बहुत सुंदर संकलन सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई मेरी रचना को स्थान दिया उसके लिए चर्चा मंच और प्रिय अनीता जी का हार्दिक आभार

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