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Monday, January 17, 2011

लकीरें भी बोलती हैं……………चर्चा मंच-401


सोमवार की चर्चा में आप सबका स्वागत है


एक पहेली मगर अपनी सी 

नाम ख़त्म !

फिर कैसे अपने?

जब होंगे नयन चार 
तब होगी तेरी मेरी प्रीत

बेनामियों की क़यामत का काउंटडाउन!

सच में ! वाह क्या बात है फिर तो 

अपेक्षाएँ
तू कर ले कुछ नेककाम
क्या है बताइये

उसके नाम 
तू लिख दे खत
सांवरिया के नाम
वो जान जायेंगे

'खबर
अरे बाप रे!

हाईकु [ hiku]
खुद ही पढिये और जानिये


मेरे मरने के बाद ...- सतीश सक्सेना
अरे ये क्या कह रहे हैं………लोग जीने की बात करते हैं आप क्यूं मरने के बाद की चिन्ता करते हैं

"धूप अब खिलने लगी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")  

दिखाइये दिखाइये

आओ, पतंग उड़ायें
जरूर जी जरूर ………अब तो मौसम आ गया है

आपकी-हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका (किस्त-1)...खुशदीप

हम जब देख भी रहे है और जानते भी है मगर फिर भी खामोश हैं…………हम हैं भारतवासी

लकीरें
देख क्या क्या कह रही हैं

अध्यात्म कविता - १
जीवन के रंग कैसे कैसे ?

याद आते हैं वे लम्हे------------- मिथिलेश
बीते हुये लम्हो की कसक साथ तो होगी

बहुत भीने भीने 

 झगड़े की जड़ है इन्सान

ये तो बिल्कुल सही बात है


मैं कब क्या होता हूँ ?
जानिये और गुनिये





और अब अन्त मे 
दिल से निकली बात दिल तक पहुंच गयी

चलिए दोस्तों अब आज्ञा दीजिये 
और 
अपने विचारों से अवगत कराते रहिये.

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