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Sunday, September 16, 2012

“हिंदी दिवस का एक दिन” (चर्चा मंच-1004)

मित्रों!
हिन्दी दिवस तो बीत गया मगर एक पखवाड़े तक काले अंग्रेज हिन्दी का केवल राग ही अलापेंगे और शान से हिन्दी-डे मनायेंगे।
हां हिंदी,ना हिंदी

आज हिंदी दिवस है। देश-विदेश की अनेक बैठकों और सभाओं में फिल्मों के संदर्भ में हिंदी की बात होगी। बताया जाएगा कि हिंदी के विकास में हिंदी फिल्मों की बड़ी भूमिका है...!
14 सितंबर- हिंदी दिवस का एक दिन
आइये आपनी मातृभाषा और राष्ट्र भाषा को याद करें ...* *आज फिर से 14 सितम्बर का दिन आ है और ये दिन हमने अपनी राष्ट्र भाषा के नाम कर रखा है, हो भी क्यों न......!
बिना माउस के कर्सर चलायें |

अगर आप के कंप्यूटर का माउस ख़राब हो जाये तो आप अपने की-बोर्ड से माउस कर्सर को चला सकते हैं | की-बोर्ड से माउस कर्सर को चलने के लिए आप को एक छोटा सा सॉफ्टवेर डाउनलोड करना होगा जिसका नाम है माउस फाईटर…
भारतीय नारी
संध्या तिवारी
कितना सहेंगी हमारी बेटियां बिहार के सीतामढ़ी की कंचन बाला जब ऊपर भगवान के पास पहुंची होगी तो…
जरुर पूछी होगी कि मुझे लड़की क्यों बनाया ? काश !
मुझे भी लड़का बनाया होता..
अँधेरी कोठारी के अकेले रौशनदान थे 'जयप्रकाश नारायण'
मुक्ताकाश....
बातें हो चुकी थीं.जे.पी. ने फ़ोन उठाकर सच्चिदानंदजी को कुछ आवश्यक निर्देश दिए. एक सेवक चाय-बिस्कुट ले आया.
हमने चाय पी ही थी कि
सच्चिदानंदजी कई पुस्तकें और कुछ मुद्रित सामग्री लेकर कक्ष में...
कोलेज डे'स

आज सुना इंजीनियर्स डे है... हम इंजिनियर तो नहीं , पर इस से मिलता जुलता गणित हमारा विषय था तो कोलेज दिन को याद कर लिया...!
शब्‍दों की गंगा ...

शब्‍दों की गंगा से तुम हर पल अपनी विषम परिस्थितियों का अभिषेक करती हो स्‍वत: ही कभी जटिलतम होता मार्ग तो तुम शिव की जटाओं सा उनका मार्ग प्रशस्‍त करती मनन करना फिर कहना सहना हर शब्‍द को…
.अगीत साहित्य दर्पण (क्रमश:)---प्रथम अध्याय --अगीत : एतिहासिक पृष्ठभूमि व परिदृश्य ....डा श्याम गुप्त

  कविता  की अगीत विधा का प्रचलन भले ही कुछ दशक पुराना हो परन्तु अगीत की अवधारणा मानव द्वारा आनंदातिरेक में लयबद्ध स्वर में बोलना प्रारम्भ करने के साथ ही स्थापित होगई थी| विश्व भर के काव्य ग्रंथों व समृद्धतम संस्कृत भाषा साहित्य में अतुकांत गीत, मुक्त छंद  या अगीत-- मन्त्रों , ऋचाओं व श्लोकों के रूप में सदैव ही विद्यमान रहे हैं| लोकवाणी एवं लोक साहित्य में भी अगीत कविता -भाव सदैव उपस्थित रहा है…|
रक्तिम गुड़हल .....!!

हमारी संस्कृति का प्रतीक ....शक्ति की पूजा में जिसका बहुत प्रयोग होता है ...
कुछ गीत मधुर गुनगुनाएँ
रस की गंगा बहती कल -कल , शब्दों के अनगिन दीप जले| भाव-लहरिया उठती -गिरती जब छंद-घंटिका मधुर बजे | आओ इंडिया वालो अब भारत के रंग में रंग जाएँ मिलकर अपनी भाषा के कुछ गीत मधुर गुनगुनाएँ.. |
वाणी सुन रे भूप, कंस कंगरसिया मामा-

सुवन सातवाँ सिलिंडर, माया लड़की रूप ।
छूट उड़ी आकाश की, वाणी सुन रे भूप ।
वाणी सुन रे भूप, कंस कंगरसिया मामा।
पैदा खुदरा पूत, आठवां कृष्णा नामा…
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पैदा खुदरा पूत, आठवां कृष्णा नामा-रविकर
सुवन सातवाँ सिलिंडर, माया लड़की रूप ।
छूट उड़ी आकाश की, वाणी सुन रे भूप ।
वाणी सुन रे भूप, कंस कंगरसिया मामा।
पैदा खुदरा पूत, आठवां कृष्णा नामा…
मैं कहता आँखन देखी.
प्रार्थना
"हम युही वीराने में अनमने से बैठे हैं,
खबर ये हैं की, बस्ती में हर कोई दौड़ रहा हैं."
आज बेटी के साथ बैठ एक प्रार्थना गानी और सिखानी थी..और क्या याद आता "इतनी शक्ति हमें देना दाता" के सिवा?
कितनी आत्मीय, कितनी प्रेम भरी प्रार्थना!. ऐसा लिखना और सोचना तो दूभर हो ही चूका हैं, क्या हम इस प्रार्थना करने के काबिल भी रह गए हैं?..
चलिए आज हिंदी दिवस पर सुन तो लेते ही हैं.
****************************************************
हम ना सोचे हमें क्या मिला है 
हम यह सोचे किया क्या है अर्पण ,
फूल खुशियों के बाटें सभी को 
सबका जीवन ही बन जाये मधुबन …
"कुछ कहना है"
लेकिन दर्पण अगर, दिखा दो इसको कोई-
बावन शिशु हरदिन मरें, बड़ा भयंकर रोग ।
खाईं में जो बस गिरी, उसमें बासठ लोग ।
उसमें बासठ लोग, नाव गंगा में डूबी ।
दंगे मार हजार, पुलिस नक्सल बाखूबी ।
गिरते कन्या भ्रूण, पड़े अब खूब दिखाई ।
बने नहीं पर न्यूज, लाख मारे मँहगाई ।।
सजा तो इन रहबरों को होनी चाहिए
वीरू भाई आपने जो भी लिखा सब सत्य है..यही होरहा है आजकल...
गज़ल

*खाली बोतल जाम है खाली,बन्द पड़े सारे मयखाने..
डीजल का दाम बढ़ना फायदेमंद भी-डीजल के दाम बढ़ने से हर जगह हाय-तौबा मची हुई है। चारों तरफ सरकार की….
वक़्त और मैं .....
है कोशिश यही कि उसे भी मुझसे हो इश्क़ इतना, ज़रा सा बहकूँ मैं, कि बाँहों में उसके ही है सँभलना। साँसों की डोर से बँधकर ये तेरा हर पल गुजरना, तन्हाई के मौसम में तेरे ही लिखे पल को पढ़ना…
नरक का द्वार Door Of Hell
सितम्बर अक्टूबर की शामे और राते:
यद्यपि अब भी मधु झरती है


सितम्बर -अक्टूबर का महीना मुझे बसंत के महीने से कम रोमांटिक नहीं लगता सुबह की हल्की धुंध और सरगोशियो से भरी हुई शामे मुझे हमेशा ही एक पुरकशिश रूमानियत का अहसास कराती है. ये दिन मुझे मेरे अतीत में ले जाते ...
न दैन्यं न पलायनम्

फ्रस्टियाओ नहीं मूरा

बड़ी दिलासा देते हैं ये शब्द, विशेषकर तब, जब पति जेल में हो, पति अपनी पत्नी को यह गाने को कहता हो और उसकी पत्नी सस्वर गा रही हो। बाहुबली पति का आत्मविश्वास बढ़ा जाता है, यह गीत। उसकी दृष्टि से देखा जाये तो स्वाभाविक ही है, बाहर का विश्व बेतहाशा भागा जा रहा है, उसके प्रतिद्वन्दी उसके अधिकारक्षेत्र में पैर पसार रहे हैं और वह है कि जेल में पड़ा हुआ है। गीत समाप्त होता है, मिलाई का समय समाप्त होता है, दोनों की व्यग्रता शान्त होती है। फिल्म देख रहे दर्शकों को भी आस बँधती है कि अब फैजल बदला लेगा, गीत के माध्यम से उसे तत्व ज्ञान मिल चुका है, ठीक उसी तरह जिस तरह कृष्ण ने व्यग्र हो रहे अर्जुन को जीवन का मूल तत्व समझाया था…।
सरल की डायरी

बाल को बाल ही रहने दो.
जिस दिन पहली बार लगा कि शेव करने के बाद ज़्यादा आकर्षक लगता हूं उसी दिन से घिस-घिसकर दाढ़ी-मूंछ साफ़ करना शुरु कर दिया। दिल्ली आकर भी नयी मित्र-मंडली और दूसरे लोगों से जो परिचय बना, एक क्लीन-शेवन व्यक्ति का बना। कुछ साल व्यवसाय किया। अच्छे दिन थे। एक दुकानदार के रुप में इतना लोकप्रिय और सफ़ल होऊंगा, कल्पना भी न की थी। फ़िर कुछ हुआ कि दाढ़ी-मूंछ बढ़ने लगी। मन नहीं होता था बनाने का…
साफ़ आटा लगे जैसे चोकर मिला - हौसला दिल्लगी का, दिल खोकर मिला, प्यार मेरे गले मुझको, रोकर मिला, सोच समझकर बोले - एक दिन चाणक्य का एक परिचित उनके पास आया और उत्साह से कहने लगा… आ प्रिये कि प्रेम का हो एक नया श्रृंगार अब..
मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी

सात कांड में रची तुलसी ने ' मानस ' ;* *आठवाँ लिखने का क्यों कर न सके साहस ?* ** *आठवे में लिखा जाता सिया का विद्रोह…
मुहब्बत है तुमसे

मुहब्बत हो तो
ऐसी हो ....
कि
कहना न पड़ जाये
मुहब्बत है तुमसे ..
वो भी एक दौर था ..और ये भी....है !

पिछले बीस-तीस साल में लगभग हर क्षेत्र में बहुत अधिक अंतर आ गया है. यूँ तो इस बात को बताने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है . फिर भी एक बार देखें तो कहाँ और कैसे परिवर्तन बच्चों की दिनचर्या /उनकी पसंद...
स्वप्न का स्वर्ग *****
रोज सुबह आती है वो काम पर..
कल्पनाओं का वृक्ष
शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल
बहुत पहले ही सुप्रसिद्ध आचार्य भामह ने ‘शब्दार्थों काव्यम’ कहकर काव्य में शब्द और अर्थ की महत्ता तथा उनके परस्पर सम्बन्ध में प्रकाश डाला था। वास्तव में शब्द और अर्थ भिन्न-भिन्न नहीं हैं। श्रेष्ठ काव्य में शब्द और अर्थ की सत्ता अभिन्न रहती है। महाकवि तुलसीदास ने शब्द और अर्थ की इसी अभीन्नता पर निम्न पंक्तियों में बड़ा सुन्दर संकेत किया है -
‘गिरा अर्थ जल-बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न ।’
गर्वि फिल्म्स के साथ विनोद मौर्य द्वारा बनाये हुए टीवी कमर्शियल एड


और अन्त में..
"मौसम के हैं ढंग निराले"


कहीं धूप है कहीं छाँव है,
कभी उठ रहे बादल काले।
चिड़ियाँ कलरव गान सुनातीं,
मौसम के हैं ढंग निराले।।...

27 comments:

  1. नमस्कार शास्त्री जी
    बहुत ही अच्छी चर्चा पोस्ट की खोज की है. कुछ गुदगुदाती ति कुछ हमारी वास्तविकता को बताती. माउस के विकल्प में 'की' का प्रयोग निश्चित रूप से सभी के लिए उपयोगी है. आभार आपका, एक बार पुनः नमस्कार आपके सरम और लगन को...इस जिजीविषा को ...

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  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति |
    सब कुछ समेटा गया है-
    शुभकामनायें ||

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  3. शुभप्रभात ..!!विशेष लिंक्स हैं आज ...!!उत्कृष्ट प्रस्तुति ....!!बहुत आभार शास्त्री जी इन लिंक्स में से एक मेरा भी चयन करने के लिए ...!!

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  4. सच है लोक संगीत ,लोक साहित्य पहले पैदा हुआ शाष्त्र बद्ध उसे बाद में किया गया .साहित्य स्वत:स्फूर्त होता है ,कविता हो या अकविता ,प्रति -कविता .
    ram ram bhai
    रविवार, 16 सितम्बर 2012
    देश मेरा - हो गया अकविता ,
    लो आज हम भी हुए अँगरेज़वा

    http://veerubhai1947.blogspot.com/

    ReplyDelete
  5. सच है लोक संगीत ,लोक साहित्य पहले पैदा हुआ शाष्त्र बद्ध उसे बाद में किया गया .साहित्य स्वत:स्फूर्त होता है ,कविता हो या अकविता ,प्रति -कविता .

    .अगीत साहित्य दर्पण (क्रमश:)---प्रथम अध्याय --अगीत : एतिहासिक पृष्ठभूमि व परिदृश्य ....डा श्याम गुप्त
    ram ram bhai
    रविवार, 16 सितम्बर 2012
    देश मेरा - हो गया अकविता ,
    लो आज हम भी हुए अँगरेज़वा

    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  6. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति!

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  7. खाली बोतल जाम है खाली,बन्द पड़े सारे मयखाने
    कष्ट बड़ा जीवन में है रब,टूट गये सारे पैमाने।

    सबकी देहरी घूम के देखा,सबके अपने हैं अफ़साने
    दुख की घड़ियां गिनता कोई,कोई बुनता नये ठिकाने।


    हवा यहां कुछ ऐसी बहकी,कोई अपने खून को ना पहचाने(खून ही अपना न पहचाने ?)लय भंग होती है यहाँ .प्रस्तुति बहुत आला दर्जे की है .
    जान चुका था मै भी तब तक,निकले ही थे वो उड़ जाने।

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  8. बिछा हुआ कालीन घास का,
    हरियाली सबको है भाती,
    मेढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
    वर्षा रिम-झिम राग सुनाती,
    आसमान का पानी पीकर,
    उफन रहे हैं नदियाँ-नाले।
    मौसम के हैं ढंग निराले।।
    काव्य सौन्दर्य छंद रस देखते ही बनता है इस गीत(प्रगीत ) का .
    ram ram bhai
    शनिवार, 15 सितम्बर 2012
    देश मेरा - हो गया अकविता ,

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  9. सुन्दर और पठनीय सूत्रों से सजी आज की चर्चा..

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  10. इक उदाहरण श्लेष का भी देखिए -
    मेरी भाव बाधा हरो ,राधा नागर सोय

    जा तन की झाईं परे ,श्याम हरित द्युति होय .

    जिस राधा नागरी की परछाईं पड़ने मात्र से श्याम वर्णी कृष्ण प्रमुदित हो जातें हैं ,वही राधा नागरी (नगर वासिनी ,इटली वासिनी श्री मनमोहन जी की बाधा हरो ).मेरी सांसारिक बाधाओं को दूर करें .

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  11. नारी को लेकर तुलसी का दृष्टि कौन मायोपिक है वैयक्तिक है ,पत्नी पीड़ित तुसली के अवचेतन से संचालित है .तभी तो कह दिया -
    शूद्र ,गंवार ,ढोल ,पशु -नारी ,
    सकल ताड़ना के अधिकारी .
    तुलसी पूजकों ने फिर भी तुलसी का बचाव किया है पशु और नारी के बीच में डंडा डालकर उस इक दिखाते हुए कहा यह पशु नारी फिमेल एनीमल (मादा पशु )के लिए प्रयुक्त है ,
    इस तथा ऐसे ही अन्य प्रसंगों ने -यथा :

    "नारी की झाईं परत ,अंधा होत भुजंग "जैसे प्रयोगों ने समाज का बड़ा अहित किया है .सीता की अग्नि परीक्षा अब कौमार्य परीक्षण के बतौर होती देखी गई है .लाईटस्कर्टटिड वोमेन कहकर उसकी हेटी की जाती है ,कुलटा ,लम्पट यहीं से चल निकलें हैं गलत प्रयोग .

    मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी

    सात कांड में रची तुलसी ने ' मानस ' ;* *आठवाँ लिखने का क्यों कर न सके साहस ?* ** *आठवे में लिखा जाता सिया का विद्रोह…

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  12. बात के बूमरांग करने का भी डर रहता है ज़रा सोचो -मुझे क्या फायदा होगा किसी की चुगली खाने में ,चुगल खोर और कहलाऊंगा ,फायदा हो तो भी आदमी "गू" खाए और खाए तो कमसे कम हाथी का तो खाए ,पेट तो भरे. ,बहुत बढ़िया नीतिपरक वृत्तांत .

    सोच समझकर बोले - एक दिन चाणक्य का एक परिचित उनके पास आया और उत्साह से कहने लगा…

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  13. बात के बूमरांग करने का भी डर रहता है ज़रा सोचो -मुझे क्या फायदा होगा किसी की चुगली खाने में ,चुगल खोर और कहलाऊंगा ,फायदा हो तो भी आदमी "गू" खाए और खाए तो कमसे कम हाथी का तो खाए ,पेट तो भरे. ,बहुत बढ़िया नीतिपरक वृत्तांत .

    इस दौर के दुर्मुख ,वक्र मुखी बिना सोचे समझे कुछ भी अनर्गल प्रलाप कर रहें हैं और खुद को कोंग्रेस का चाणक्य ही समझ रहें हैं ,चाणक्य नीति या त्रिगुण परीक्षण क्या समझेंगे .मुगालता लिए बैठे हैं कोंग्रेस का भविष्य हमारी जेब में हैं मगर क्या करें बे -चारे जेब फटी हुई है ,हाथ काले हैं .
    सोच समझकर बोले - एक दिन चाणक्य का एक परिचित उनके पास आया और उत्साह से कहने लगा…

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  14. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    धन्यवाद !

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  15. बात के बूमरांग करने का भी डर रहता है ज़रा सोचो -मुझे क्या फायदा होगा किसी की चुगली खाने में ,चुगल खोर और कहलाऊंगा ,फायदा हो तो भी आदमी "गू" खाए और खाए तो कमसे कम हाथी का तो खाए ,पेट तो भरे. ,बहुत बढ़िया नीतिपरक वृत्तांत .

    इस दौर के दुर्मुख ,वक्र मुखी बिना सोचे समझे कुछ भी अनर्गल प्रलाप कर रहें हैं और खुद को कोंग्रेस का चाणक्य ही समझ रहें हैं ,चाणक्य नीति या त्रिगुण परीक्षण क्या समझेंगे .मुगालता लिए बैठे हैं कोंग्रेस का भविष्य हमारी जेब में हैं मगर क्या करें बे -चारे जेब फटी हुई है ,हाथ काले हैं .

    इन्हीं के लिए खा गया है -
    शब्द सम्हारे बोलिए,शब्द के हाथ न पाँव ,
    एक शब्द औषध करे ,एक शब्द करे घाव .

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  16. बहुत सुन्दर भाव चित्र है .

    स्वप्न का स्वर्ग *****
    रोज सुबह आती है वो काम पर..

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  17. बहुत अच्छे लिंक्स है आज चर्चा मंच पर!......संजय ग्रोवर जी की सार्थक प्रस्तुति अच्छी लगी!.....माउस कर्सर की जानकारी भी उपयोगी है!...इसके अलावा अन्य चर्चाये भी बहुत पसंद आई, किन्तु थोड़े शब्दों में उनकी तारीफे करना उनके योग्यता और गुणवत्ता के लिए अनुचित है!.....या फिर कह सकते है की उनके लिए लिखने को उचित शब्द ही नहीं मिल रहे!......फिर भी!.....''अवर्णनीय''!!!!!!!!!!!!!!
    अंत में मेरे कमर्शियल एड को चर्चा में शामिल करने के लिए धन्यवाद!!!!!!!!!!!!!!!!!
    http://merasanghrsh.blogspot.in/2012/09/blog-post.html

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  18. आदरणीय शास्त्री जी सुन्दर लिंक्स के सजा हुआ सुन्दर चर्चामंच, मेरी रचना को स्थान दिया आपका आभार.

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  19. बढिया चर्चा
    इतने सारे लिंक्स का चयन और संयोजन
    सच में आसान नहीं..
    बहुत सुंदर

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  20. बहुत रोचक ,सुन्दर सूत्र सजाये हैं बहुत बहुत बधाई

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  21. रंग रंग के फूल है इस बाग मे बाग के माली शास्त्री जी को प्रणाम्

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  22. हिंदी में लेखन ने मुझे देश के अनमोल रत्नों से मिलाया है ! हम देश को एक सूत्र में बाँधने वाली हिंदी भाषा के आभारी हैं !

    हिंदी दिवस-१४ सितम्बर, संस्कृत दिवस-४ सितम्बर

    Zeal

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  23. कैग नहीं ये कागा है ,जिसके सिर पे बैठ गया ,वो अभागा है

    Dr. shyam gupta ने कहा…
    शर्माजी.... ये जो नेता संसद में बैठे हैं ..कहाँ से आये हैं ..क्या इंद्र ने भेजे हैं संसद में या किसी अन्य लोक के हैं....
    ---- ये सब आपके(आप-हम-जनता जनार्दन) बीच से ही आये हुए हैं... आप ही हैं... आप ने ही अपनी बेगैरती या अकार्यकुशलता, अकर्मण्यता, या लालच से पैसे लेकर भेजे हैं संसद में....अतः ये आप की ही भाषा व कर्म अपनाए हुए हैं....
    --- लोकतंत्र में प्रजा ही राजा होती है...राजा बनाने-चुनने वाली ...यथा राजा तथा प्रजा ..अतः मंत्री जैसे हैं प्रजा का ही दोष है, हमारा दोष है, सबका दोष है, आपकी आचरण-संहिता का दोष है .....
    ---- विरोध नेताओं का कीजिये, आचारण हीनता का कीजिये , आप के बीच जो भ्रष्टता, अनाचारिता पल रही है उसका कीजिये ...देश व उसके प्रतीकों का नहीं ....
    ----नियम से ऊपर कोई नहीं है...
    शनिवार, सितम्बर 15, 2012
    Dr. shyam gupta ने कहा…
    "शासन ने देश को स्वाभिमान विहीन कर दिया है .यह बात व्यक्ति के अपने दर्द की बात है व्यभि चारी मंत्री को उसे माननीय कहना पड़ता है..."

    ---शासन तो प्रजातंत्र में जनता के हाथ में है.. अपने लालच में वह स्वयं स्वाभिमान विहीन है...
    ---औपचारिकतावश कहते समय आप मंत्री नाम के व्यक्ति को माननीय नहीं कहते अपितु मंत्री संस्था को, जो देश का गौरवयुक्त पद है, माननीय कहा जाता है.... इसमें कोई अनुचित बात नहीं है...यह मर्यादा है ...
    ---- ६५ सालों में यह सब नेताओं ने नहीं तोड़ा अपितु आपकी अनंत आकांक्षाओं , पाश्चात्य नक़ल की आकांक्षा ...तेजी से अमीर बनाने की आकांक्षा ...ने व्यक्ति मात्र को तोड़ा-मरोड़ा है ..और ये नेता भी व्यक्ति ही हैं....
    ----यह सब पर उपदेश ..वाली बात है ...




    डॉ .श्याम गुप्त जी किसी बात को हम खींच कर उस सीमा तक नहीं ले जाना चाहते जहां पहुँच कर तर्क भी तर्क न रहे .यह इस व्यवस्था की मजबूरी है कि हमें चुनना पड़ता है .हम निगेटिव वोट तो दे नहीं सकते .सरकार जाति के अन्दर भी उपजाति ,वर्ण ,वर्ग भेद के आधार पर समाज को बाँट कर वोट का अधिकार लेती है .वोट कब्ज़ियाती है .

    क्या जनता वोट न दे ?जिनको ये पद दिए जातें हैं ,उनके पद की गरिमा कहती है वह पद के अनुकूल उठें .अतीत चाहे उनका कैसा भी रहा हो .अचानक से भी आप अध्यापक बन गएँ हैं तो अब अध्यापक के कर्म और दायित्व के अनुरूप उठो .

    गुंडे को भी पगड़ी दी ज़ाती है तो वह उसे पहनने के बाद लोक लाज रखता है .आत्म संकल्प लेता है अब मैं ऐसी हरकत नहीं करूंगा .

    डॉ .श्याम गुप्ता हम आत्म निंदा क्यों करें ?सारा दोष खुद पे क्यों मढ़े? आप कहना चाहते हैं जिन लोगों ने इन नेताओं को चुना है उनके सभी के हाथ काले थे .भाई साहब जब कोयला ही सामने रखा हो तो वह हीरा कैसे बन जाएगा .कोयला ही चुना जाएगा .अब तो चुना हुआ कोयला सोचे उसे हीरा कैसे बनना है .

    इस सिस्टम में तो डाकू भी चुने जातें हैं तब क्या वह सांसद बनने के बाद भी डाका डालते रहें .जिसे बड़ा पद मिल जाता है उसे लोक लाज की मर्यादा रखनी चाहिए .

    इस तरह का तर्क जो आप कर रहें हैं वह कुतर्क होता है जनता को ही दोषी ठहरा रहें हैं .

    यकीन मानिए हम असीम के वकील नहीं है .असीम के पीछे पड़ने की बजाय आप ऐसा काम करो कि आपके द्वारा चुना हुआ व्यक्ति कोयला चोर न बने .
    सजा तो इन रहबरों को होनी चाहिए
    वीरू भाई आपने जो भी लिखा सब सत्य है..यही होरहा है आजकल...

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  24. एक से बढ़कर एक लिंक्स सुंदर चर्चा !

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  25. बहुत बढ़िया लिंक्स सजाया है आपने | आभार |

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  26. aabhar ............kitna sahengi betiyan shamil karne ke liye

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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चर्चा - 2817

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है  चलते हैं चर्चा की ओर सबका हाड़ कँपाया है मौत का मंतर न फेंक सरसी छन्द आधारित गीत   ...