Wednesday, August 21, 2019

"जानवर जैसा बनाती है सुरा" (चर्चा अंक- 3434)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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चंद बातें 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
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मन मौसम 

बूँदो का मोक्ष है

बारिश

बादलों के

मिट जाने की चाह की पुष्टि है

बारिश... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक 
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हरसिंगार के फूल झरे 


हौले से उतरे शाखों से 

बिछे धरा पर श्वेत केसरी 
हरसिंगार के प्रसून झरे ! 
रूप-रंगसुगंध की निधियां 

लुटा रहे भोले वैरागी 
शेफाली के पुष्प नशीले... 
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रूठी जुबानी 

अधूरी मोहब्बत का  
अधूरा फ़साना हो तुम 
अधूरे अल्फाजों की 
किताब हो तुम 
अध लिखे खतों की 
ताबीर हो तुम... 
RAAGDEVRAN पर 
MANOJ KAYAL  
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एक दीपक जो रौशन रहा 

घुप अंधेरे को तलाश  
एक सितारे की थी  
पर वह हमेशा टूटता मिला  
एक दीपक जलता है  
रात भर रौशन जमाने में... 
हमसफ़र शब्द पर संध्या आर्य  
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5 comments:

  1. सुप्रभात
    उम्दा सजा चर्चामंच|मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद सर |

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  2. बढ़िया अंक सुन्दर सूत्र संयोजन के साथ। आभार आदरणीय।

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  3. मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  4. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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