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Friday, August 21, 2015

"बेटियाँ होती हैं अनमोल" (चर्चा अंक-2074)

नमस्कार मित्रों, आज की चर्चा में आपका हार्दिक अभिनन्दन है।
 
आज कल बेटियाँ किसी भी रूप में बेटों से पीछे नहीं हैं। बेटा-बेटी में फर्क समझना अज्ञानता है। मेरा मानना है कि बेटा तो एक घर को रोशन करता है, पर बेटियाँ दो घरों का मान बढ़ाती हैं और रौनक बढ़ाती हैं। बेटियों से ही घर में रौनक होती है। बेटियाँ अनमोल हैं। कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ हम सभी को आवाज बुलंद करनी चाहिए। अगर बेटी नहीं बचाएंगे तो बहू कहां से लाएंगे। लड़कियों की संख्या को कम होते देख सभी का कर्तव्य है कि हम सब जागरूक हों। अब लड़कियाँ हर क्षेत्र में लड़कों को पीछे छोड़ती नजर आ रही हैं। पढ़ाई से लेकर हर मुश्किल व्यवसाय में लड़कियाँ बाजी मार रही हैं। इसलिए बेटियों को किसी से कम ना समझें और उन्हें लड़कों से भी बढ़कर प्यार दें। 
रेखा श्रीवास्तव
बड़ी बेटी के नौकरी में जाते ही उससे छोटी वाली बेटी का भी एम सी ए पूरा हो गया और साथ ही उसको कैंपस से ही चुनाव भी हो गया। उसकी नौकरी इनफ़ोसिस कंपनी में लगी।
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प्रीति वाजपेई
 
कुछ ख्वाबों का श्रंगार करने दो
मुझे जिंदगी से प्यार करने दो ......
रखना नहीं है वास्ता बड़ी इन इमारतों से 
कच्ची सड़क पर ही घर की मुझे तो पाँव रखने दो |
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अनीता जी 
वह परम चैतन्य जो इस सम्पूर्ण सृष्टि का नियंता है, जो ऋत है, नियम है, आनन्दमय है, नित है, ज्ञानमय है. सब प्राणियों को जानने वाला है. वह अगोचर है पर उसी के द्वारा देखा जाता है, उसी के द्वारा सुना जाता है,
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Rangraj Iyengar
कल एक शादी के रिसेप्शन पर गया था. वहाँ करीब 9 बजे पहुँचा. देखा सामने मंच पर नयी नवेली दुल्हन के साथ दूल्हा जी विराजमान हैं. पास कोई नहीं है. मौका देखा सोचा चलो पहले तोहफा देने का काम निपट लेते हैं अन्यथा भीड़ की कतार में इंतजार करना पड़ सकता है.
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किरण आर्या
एक थी चिरैया, अरे थी नहीं है एक चिरैया, खुराफाती, मस्तमौला सी, बोलने पे आवे तो अच्छे अच्छों कि धज्जियां उड़ा देवे, बोले तो मुहं के आगे किवाड़ न चिरैया के, जो आया दिल, दिमाग, फेफड़े में सब वमन कर हलकी हो लेना चाहती वो, अब चाहे सेहत से भरी
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नवीन मणि त्रिपाठी
मनुहारों का गीत लिखूंगा ।
मैं भी मन का मीत लिखूंगा ।।

सौंदर्य की सहज कल्पना ।
जीवन की अतृप्त वासना ।
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सुमन जी 
दुनिया से बेखबर
समाज में व्याप्त 
उपेक्षित,निंदित,
भूखी,नंगी गरीबी
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दिग्विजय अग्रवाल 
मैं यादों का किस्सा खोलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
मैं गुजरे पल को सोचूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
ज्योति खरे 
वर्षों से
प्यार के लिए
उपासे हैं
नर्मदा के घाट पर
प्यासे हैं -----
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डॉ दिव्या श्रीवास्तव 
आरोप लगते रहते हैं मुझ पर 
की मैं पाषाणहृदय हूँ 
प्रेम से परे, ह्रदय विहीन 
रुक्ष, शुष्क और नमी के
 अभाव से ग्रस्त ... .
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(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि "समास वह क्रिया है, जिसके द्वारा कम-से-कम शब्दों मे अधिक-से-अधिक अर्थ प्रकट किया जाता है।
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निधि टंडन 
कभी किसी का मान रखने को
तो कभी मन रखने को
अधिकतर इसलिए कि
किसी को खराब न लगे
कोई बुरा न मान जाये
वीरेन्द्र कुमार शर्मा 
अकसर छोटी छोटी बातें बड़ा गहरा सन्देश छिपाए रहतीं हैं अपने अंदर। बहुत ज़ोर से इस एहसास ने तब जोर पकड़ा कुलाचें भरी जब आज के केजुअल को मैं साकार होते देख रहा था और अपस्केलस अपार्टमेंट्स ,डलेस ग्रीन,वर्जीनिया के निकट ग्रेट फाल्स पार्क के गिर्द घूम रहा था। एक सूचना पटल ने बरबस न सिर्फ मेरा ध्यान खींचा मैंने बार बार
विशाल चर्चित 
सुशील कुमार जोशी 
ओ मास्साब 
क्षमा करें 
ओ मास्टरनी 
भी कहा जाये 
सारे पढ़ाने वाले
भावना सक्सेना 
शब्दों और चित्रों के अद्भुत संगम व समायोजन से बने भावों के समंदर में डूबकर निकली हूँ आज। यह समंदर है सुप्रतिष्ठित कवयित्री रेखा रोहतगी जी की नवीनतम काव्यकृति हाइगा वीथि।
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आशा सक्सेना जी 
हताशा जीवन की के लिए चित्र परिणाम
एक दिन और बीता
कुछ भी नया नहीं हुआ
वही सुबह वही शाम
उबाऊ जीवन हो गया
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रश्मि शर्मा
कच्चे धानी खेत सा आसमान
बदलियों से घुमड़े कुछ अरमान
इस रात में मैं तो मोती बिजूँगी
कल जब पावस की बूंदें बरसेंगी
मैं हरसाए हरियल अंकुर सीचूंगी !!
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धन्यवाद, फिर मिलेंगे अगले शुक्रवार को  
"आपका दिन मंगलमय हो" 

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