समर्थक

Monday, January 04, 2016

लुई ब्रेल को नमन और शहीद को सलाम चर्चा अंक 2211

जय माँ हाटेश्वरी...
--
 उन्नीसवीं सदी के सबसे महान आविष्कारों में से एक आविष्कारब्रेल लिपि   का भी हुआ,  जिसने ज्ञान की रोशनी दी मेरे जैसे  असंख्य दृष्टिहीनों  को जो कुदरत के कहर से गुमनामी के अंधेरों में कहीं
खो रहे थे, को आशा की एक कीरण दी कि    वह भी समाज की मुख्य धारा में बहकर अपनी खोई हुई पहचान वापस हासिल कर सकते है। आज उसी महान आविष्कार के जनक    लुई ब्रेल का जन्मदिन है।
आज से तकरीबन 192  वर्ष पहले वह लिपि अस्तित्व में आई थी, जिसने दुनिया भर के दृष्टिहीनों की जिंदगी में ज्ञान का उजियारा भर दिया था। बचपन में हुई एक
दुर्घटना में अपनी आंखों की रोशनी खो चुके फ्रांस के नागरिक लुई ब्रेल ने उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक में ब्रेल लिपि को इजाद कर पूरी दुनिया को चमत्कृत कर दिया
था। आज पूरे विश्व में उसी लुई ब्रेल का जन्म दिवस श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा  है।
मैं वर्ष 2016  की अपनी पहली चर्चा का आरंभ करते हुए इस देवता को कोटी-कोटी नमन करता हूं...
--

उपवन मुस्कायेगाs320/DSCN0058
मन में एक आशा है,
अब बसन्त आयेगा!
खिल जायेंगे नव सुमन,
उपवन मुस्कायेगा!!
 उच्चारणपररूपचन्द्र शास्त्री मयंक
ज्ञात होता यदि
नहीं वाणी बोल पाती,
शब्द भी लड़खड़ा जाते ।
वेदना छिप नहीं पाती,
तर्क शंका बढ़ा जाते
न दैन्यं न पलायनम्
परप्रवीण पाण्डेय
ऐसे करें मुंग-मोठ आदि अनाज अंकुरित (sprout Food
ध्यान दीजिए, गर्मियों में अंकुरण जल्दी होता है। यदि मौसम की वजह से अनाज बराबर अंकुरित नहीं हुए तो 7-8 घंटे और रहने दिजीए। पानी के छींटे नहीं मारना है क्योंकि
कई बार पानी के छींटे मारने से अंकुरित अनाज में महक आ जाती है। इसलिए ही गर्मी में अनाज को हम थोड़ा ज्यादा देर भिगोयेंगे।
आपकी सहेली
परJyoti Dehliwal
धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे
कबाड़खाना
परAshok Pande
चोर-चोर मौसेरे भाई
                                            खिलाफ उनके जो कोई बोले,
                                            सब मिल उस पर करें चढाई !
                                            कमाऊ पूत -सा भ्रष्टाचारी
                                            अफसर, नेता घर जंवाई !
मेरे दिल की बात
परSwarajya karun
जोड़ों के दर्द, घुटनो के दर्द, कंधे की जकड़न, के लिए एक अदभुत तेल
चित्तौड़ ऋणी है व भारत को गर्व है पन्ना गूजरी के त्याग पर 
भारत माता के ऐसे कोटि-कोटि वीर वीरांगनाएं हुई हैं, जिन्होंने स्वयं को शत्रु की कारागृह से भी भयंकर कष्टों की कारा में स्वयं ही डाल लिया, जबकि उनके पास
अवसर उपलब्ध था, जब वे स्वयं को कष्टों में न डालकर संसार के ऐश्वर्यों का भोग कर सकते थे। पन्ना गूजरी के पास भी विकल्प था कि वह उदयसिंह का बलिदान स्वेच्छा
से दिलाकर बनवीर की कृपापात्र बन सकती थी। पर उसने हिंदुस्थान के स्वराज्य और स्वधर्म के मूल सिद्घांत को अपनाकर उसके लिए अपना सर्वस्व होम करना उचित समझा।
Samaadhan
परVivek Surange
इमोशनल फूल
तमाशा-ए-जिंदगी
परTushar Rastogi
शहीद को सलाम
s400/433333-mahadik
आओ करें उनका सम्मान ,
जिसने बचायी हमारी जान ,
भारत माँ के वीर सपूत को ,
हमारा है ये आखिरी सलाम।
iwillrock:nitish tiwary's blog
परNitish Tiwary
अभी कई तीखे मोड़ आएंगे राष्ट्रीय राजनीति में
जिज्ञासा
परpramod joshi
में कहता था ना
आपका-अख्तर खान "अकेला
परAkhtar khan
युद्ध बना अब खेल
शोषण कुदरत का हुआ, ले विकास का नाम।
मौसम बदला इस तरह, भुगत रहे परिणाम।।
क्यों जनता तकलीफ में, गढ़ते अपने तर्क।
संसद को गूँगा किया, किसको पड़ता फर्क।।
मनोरमा
परश्यामल सुमन
इण्डिया नहीं भारत
मेरी सोच !! कलम तक
परअरुणा
बेटी तेरा नसीब
             दोनों उसकी तरफ भागे I उमा भी खड़ी हुई भागकर माँ की छाती से लिपट गई चिल्लाते विलखते रोने लगी I माँ ने भी ममता की लहर दौड़ा दी उमा को कसकर पकड़
लिया रोने लगी I
             मनोहर ने पाँव पीछे खींचे एक झटके में दोनों को अलग कर दिया I
            "ऐसा मत करो पापा मुझे घर ले चलो I मुझे ये लोग तंग करते हैं I शाम को शराब पीकर पीटते हैं I "
            "तेरा यही नसीब हैं I "
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika
परAshutosh Dubey
खैर
तुम्हें ज़रूरत ही क्या है
औरों की विवशता समझने की
क्योंकि तुम्हारी समझ से
एक तुम्हारा दुःख ही प्रबल है !!!
अर्जुन,
मैं भी जानता था कर्ण का सत्य
कुंती को दिए उसके वचन के आगे
उसके रथ से मैंने तुम्हें दूर रखा
उसकी मृत्यु का कारण तुम्हें दिया
मेरी भावनायें...
पररश्मि प्रभा...
कविता की दुकान [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त
लेकिन अब आम आदमी की
कच्ची पगडंडी पर पीड़ा भोगती
चीप संवेदनशीलता की उस
आउटडेटेड शैली की
फैशनहीन पुरानी कविता को
अब कौन पूंछता है
टिप्पणीकार भी बहुधा
अच्छी है पैरोडी कहकर
सड़क से भागने का रास्ता ढूंढ़ता है
साहित्य शिल्पीपर...
सोचो ख़ुद को तराशा क्या....अनुराग सिंह
मन में है ये नफ़रत क्यूँ
इंसान की ऐसी फ़ितरत क्यूँ
छोटा सी ही ये जीवन है
उसमें जीना ज़रा सा क्या
मेरी धरोहर
परyashoda Agrawal
कार्बन
खामोशियाँ..
परMisra Raahul
--

s1600/banasingh
भारतीय बहादुरों के शव भी पड़े दिख रहे थे जिन्होंने यहां पहुँचने के रास्ते में प्राण गँवाए थे। क्यों कि इस से पहले २४ और २५ जून को भी पोस्ट पर कब्जे की ऐसी
ही कोशिशें की गई थी | जैसे-तैसे बाना सिंह अपने साथियों को लेकर ठीक ऊपर तक पहुँचने में कामयाब हो गये। वहाँ पहुँच कर उसने अपने दल को दो हिस्सें में बाँटकर
दो दिशाओं में तैनात किया और फिर उस 'कायद पोस्ट' पर ग्रेनेड फेंकने शुरू किया। वहाँ बने बंकरों में ग्रेनेड ने अपना काम दिखाया। साथ ही दूसरे दल के जवानों
ने दुश्मन के सैनिकों को, जोकि उस चौकी पर थे, बैनेट से मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया। वहां पर पाकिस्तान के स्पेंशल सर्विस ग्रुप (SSG) के कमांडो तैनात थे,
परशिवम् मिश्रा
--
आज की चर्चा का सफर यहीं तक...
धन्यवाद।

No comments:

Post a Comment

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin