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Saturday, January 05, 2019

"साक्षात्कार की समीक्षा" (चर्चा अंक-3207)

मित्रों! 
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
 देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।   
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क्षणिकाएँ.... 

श्वेता सिन्हा 

ख्वाहिशें
रक्तबीज सी
पनपती रहती है
जीवनभर,
मन अतृप्ति में कराहता
बिसूरता रहता है
अंतिम श्वास तक।
yashoda Agrawal  
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आंखों में मछलियां 

आँखों में बसी मछालियां 

चाहती हैं तैरना बहती नदी में 

आँखों के पीछे के अंधेरापन का संगीत 

उन्हें फांस सा लगता है... 
Arun Roy  
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टुकड़ों की जिंदगी कभी ,  

मुकम्मल न हो सकी, 

*मैं भीड़ में भी हूँ, और तन्हाइयाँ भी है । 
आसान नहीं जिंदगी, कठिनाइयाँ भी है... 
मनीष प्रताप 
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खाता-बही यहाँ जिन्दा है 

सुरेश भाई को इस तरह देख कर झटका लगा। विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं इक्कीसवीं सदी में यह देख रहा हूँ। याद नहीं आता कि ऐसा दृष्य इससे पहले कब देखा था। मेरी दशा देख कर सुरेश भाई मुस्कुरा कर बोले - ‘विश्वास नहीं हो रहा न? मुझसे तो कम्प्यूटर पर काम हो नहीं पाता। मैं अब भी इसी तरह काम करता हूँ।’ सुरेश भाई याने रतलाम के चाँदनी चौक स्थित ‘चौधरी ब्रदर्स’ वाले सुरेश चौधरी... 
एकोऽहम् पर  विष्णु बैरागी 
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4 comments:

  1. शुभ प्रभात..
    आभार...
    सादर.....

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  2. सुन्दर शनिवारीय चर्चा।

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  3. ब्लॉग जगत मे गुलाब का फूल है चर्चा मंच
    मेरी पोस्ट को स्थान देने के लिए धन्यवाद आदरणीय श्री

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  4. बहुत सुन्दर चर्चा संकलन 👌
    बेहतरीन रचनाएँ 👌
    सादर

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