चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Friday, September 11, 2015

"सिर्फ कथनी ही नही, करनी भी" (चर्चा अंक-2095)

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है।
प्रिये मित्रों, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो विचार तो अच्छे रखते हैं पर उन पर अमल नही करते या कर नही पाते। यूँ अच्छे विचार रखना अच्छा तो होता है पर जब तक अमल में न लिया जाए तब तक विचार फलित नही होता, निष्काम रहना है। मात्र रोटी का ख्याल करते रहने से भूख मिटती नहीं, बढ़ जाती है। भूख मिटाने के लिए रोटी खाना जरूरी होता है। तैरने की विधि पुस्तक में पढ़ लेने और जान लेने से तैरना नही आ सकता बल्कि तैरने का प्रयत्न करने से ही तैरना आता है। मात्र विचार निष्प्राण है, विचार को अमल में लेना ही फलदायी होता है। -भूली बिसरी यादें
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फ़िरदौस ख़ान
लोग दो तरह के हुआ करते हैं... पहली तरह के लिए लोग परबत की तरह मज़बूत होते हैं... वो बड़ी से बड़ी मुसीबत का मुक़ाबला दिलेरी के साथ करते हैं...
दूसरी तरह के लोग बहुत कमज़ोर होते हैं... वो ज़रा ज़रा सी बात पर मुंह छुपा के बैठ जाते हैं...
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अनुपमा पाठक

आधी अधूरी यह पोस्ट भी उस दिन ही तैयार थी... सोचा था उसी दिन शाम तक पोस्ट भी हो जाएगी... पर टल गयी बात... और रात आ गयी... दो एक दिन मन यूँ ही डूबा रहा...
 
देवेन्द्र दत्ता मिश्रा 
हरे भरे दिखते कितने तुम ,
जो समीप वह छाया पाता। 
मस्त पवन संग मस्त झूमते ,
सावन तुझको अंग लगाता। १।
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श्यामल सुमन 
जिसका जितना शोर मुसाफिर
उतना वो कमजोर मुसाफिर
मुमकिन खुद से अगर निकालो
अपने मन का चोर मुसाफिर
जयकृष्ण राय तुषार
गाद भरी
 झीलों की
 भाप से निकलते हैं |
 ऐसे ही 
 मेघ हमें
 बारिश में छलते हैं |
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डॉ निशा महाराणा 
सहमा-सहमा रहता था वो 
तन्हा-तन्हा रहता था वो 
मुझसे कुछ-कुछ कहता था वो 
रात अमावस की हो या
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प्रतिभा सक्सेना 
 * छुट्टी ! मतलब नियमों- अनुशासनों से खुली छूट , लादी गयी व्यवस्था से मुक्ति , मनमाने मौज से रहने का दिन .सारी चर्या पर ख़ुद का नियंत्रण - नहाने ,खाने
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शशि पुरवार 

हँस कर जीना सीख लिया 
हर पल रोना धोना क्या

धीरे धीरे कदम बढ़ा
डर कर पीछे होना क्या
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संजीव तिवारी 
हमारे देश में नगर रक्षक प्रहरियों का जलवा सदियों से बरकरार रहा है। नगर में शासन व्यवस्था एवं अनुशासन कायम रखने का प्रभार इन्हीं के हाथों रहा है, जिसमें रत्न जड़ित सोने का दण्ड हुआ करता था। मुगलों का जमाना आते आते दण्ड से रत्न ऐसे गायब हुए जैसे रेलवे के टायलेट से आईना और दण्ड का सोना पीतल में बदल गया।
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(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कविता रावत 
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हमिंग बर्ड की फ़रियाद
मुकेश कुमार सिन्हा

 
हम्म हम्म !
इको करती, गुंजायमान
हमिंग बर्ड के तेज फडफडाते
बहुत छोटे छोटे पर !
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हिमकर श्याम 
हम जो गिर-गिर के संभल जाते तो अच्छा होता
वहशत ए दिल से निकल पाते तो अच्छा होता

बदनसीबी ने कई रंग दिखाए अब तक
बिगड़ी तक़दीर बदल पाते तो अच्छा हो
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वन्दना गुप्ता 
चुप्पी खलनायिका सी सोच के कूपे में धरना दिए बैठी है . ..... कहने सुनने को कुछ नहीं बचा , अगर है तो एक विरक्ति सी जहाँ जो है जैसा है ठीक है , जो हो रहा है ठीक हो रहा है ..........
सुशील कुमार जोशी 
रात को सोया कर 
कुछ सपने वपने 
हसीन देखा कर 
सुबह सूर्य को जल
यशोदा अग्रवाल 
मन परिंदा है 
रूठता है 
उड़ता है 
उड़ता चला जाता है 
दूर..कहीं दूर
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ममता जोशी 
*मापदंड क्या है की कौन अपना कौन पराया होता है ,*
 *आँखों से दिखाई दे जो क्या वही रिश्ता सच्चा होता है *
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धन्यवाद, फिर मिलेंगे अगले शुक्रवार 

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