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Monday, July 27, 2015

निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?-चर्चा अंक 2049...

जय माँ हाटेश्वरी...

विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार...
निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ?
इतिहास की पुकार, करे हुंकार,
ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी,
गमग्रोग्रामी,बनाती नहीँ हो क्यूँ ?
अनपढ जन, अक्षरहीन, अनगिन जन,
अज्ञ विहिन नेत्र विहिन दिक` मौन हो क्यूँ ?
व्यक्ति रहे , व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज,
व्यक्तित्व रहित,निष्प्राण समाज को तोड़ती न क्यूँ ?
ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी,
गमग्रोग्रामी,बनाती नहीं हो क्यूँ
---नरेन्द्र शर्मा ?
आज की चर्चा के लिये ये रहे 
मेरी पसंद के चुने हुए लिंक... 
उमीद है पसंद आयेंगे। 

        पर... नवीन मणि त्रिपाठी
अमन   के  वास्ते   घूँघट  में  रहना   लाजिमी  तेरा ।
कयामत   हुश्न  बरपाता  यहॉं  शमसीर  है   चलती ।।
तुम्हारी  हर  तबस्सुम  पर  लिखे  लाखो  ने अफ़साने ।
फना  के  दरमियाँ  मुझको   तेरी  जंजीर  है  खिचती 

पर...Virendra Kumar Sharma
इतने कमज़ोर निकलेंगे ये मज़हबी यकीन नहीं होता। इनसे अच्छे तो अंतिम मुग़ल बादशाह थे जिन्हें एक कमज़ोर शासक समझा जाता था और उन्होंने पूरे भारतीय स्वाभिमान के
साथ अपने पुत्र का कटा सिर देखने के बाद भी यही कहा  था -
गाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की ,
तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की।

 उच्चारण पर... (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
लेकिन...
मन के कोटर में
न कभी धूप आयेगी
और न कभी सवेरा होगा
अंधेरा था
और अंधेरा ही रहेगा  

पर...प्रवीण पाण्डेय , 
एक पुस्तक सी खुली थी, कभी जो दुनिया छिपी थी,
जहाँ व्यक्तित्वों भरे अध्याय बाँटे जोहते थे ।
खोल आँखें, सामने तो, दीखती राहें अनेकों,
दृश्य मुझको रोकते थे, खींचते थे, सोहते थे

पर...सुशील कुमार जोशी
कितनी भी
गहराई हो
आँख तो बस
आँख होती है
तैरना भी हो
सकता है वहीं
डूबना भी हो
सकता है कहीं
बस डूबने मरने
की सोच कर
डरना नहीं चाहिये 



पर.. Roshan Jaswal Vikshipt  
इस पोस्ट को लिखने का उद्वेश्य मात्र आपका मन्तव्य जानना है की इस पर विश्वास किया जाए या नहीं । मैं तो मात्र इतना समझता हूँ की देवी देवता किसी का अहित नहीं
करते तो मेरा भी नहीं करेगें 



पर...Mukesh Kumar Sinha 
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क्या कोई डस्टबिन, तकिए, जूते के लेस या अख़बार पर भी कविता रच सकता है!! मुकेश की संवेदना का कोई ओर - छोर नहीँ....इनकी कविता का आकाश निस्सीम है। एक ओर ये
प्रेम को परिभाषित करते हैं, रिश्ते-नाते , पुल, मकान और शहर को व्याख्यायित करते हैं तो दूसरी ओर चालीस और पचास की वय के बीच की चुहल …चोरी चोरी उमगते और फिर
फुस्स हो जाते अरमानों को सार्वजनिक करने का माद्दा भी रखते हैं। इनकी शब्दयात्रा दैनन्दिन जीवन के हर पड़ाव से गुज़रती है। क़तरा भर ज़िंदगी भी इस सहज कवि के लिए
अस्पृश्य, वर्जित या अनदेखी नही। 

 जी की कलम से... 
हरगोविंद ( Hargobind Khorana )का स्वभाव बचपन से ही सरल था. हरगोविंद की आरंभिक शिक्षा गांव में संपन्न हुई, उसके बाद उन्होंने खानेवाल से मिडिल की परिक्षा
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. सरकार की ओर से उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की गई. मुल्तान के डी.ए.वी. कॉलेज से हरगोविंद ने हाईस्कूल किया. उनके माता-पिता उन्हें
बचपन से ही यह शिक्षा दे रहे थे कि लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और प्यार से पेश आओ. हरगोविंद आजीवन उनकी इन बातों पर अमल करते रहे.

पर...pramod joshi  
विभिन्न
स्तरों पर लटके पड़े हैं। आर्थिक सुधारों से जुड़े तमाम विधायी काम अभी अधूरे पड़े हैं 
और सन 2010 के बाद से अर्थ-व्यवस्था की गाड़ी 
कभी अटकती है और कभी झटकती 
है। 
फिलहाल भूमि अधिग्रहण विधेयक एनडीए सरकार के गले की हड्डी बना है। 

पर...Ravishankar Shrivastava 
के वरिष्ठ साहित्यकार व पूर्व आचार्य डॉ बच्चन पाठक 'सलिल' ने इनके विषय में कहा है कि दूबे जी योग और हिमालय यात्रा के अदभूत समन्वयक हैं। ये योग सुधा पत्रिका
के सम्पादक भी हैं। हिमालय की गोद में उनका यात्रा-वृत्त संग्रह अभी-अभी प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखक ने हिमालय के दुर्गम स्थानों की अपनी यात्राओं का रोमांचक
वर्णन प्रकाशित किया है। लेखक रोमांच और वीरता के साथ अध्यात्म भावना से भी जुड़ा हुआ है। वे हिमालय के प्रति अपनी भावना का उद्गार करते हुए कहते हैं--"भारत
में पुरातन काल से ही हिमालय पृथ्वी पुत्रों का आकर्षण रहा है। गुफाओं में आज भी साधना करते साधक परम तत्व की खोज में लगे हैं। यहाँ अनेक ऐतिहासिक गुफ़ाएँ भी
हैं जो हमारे मनीषियों की कर्म-स्थलियाँ हैं।" प्रस्तुत पुस्तक में कुल चौदह संस्मरण हैं जिनमे से कुछ विशेष उल्लेख्य हैं--अमरनाथ, बौद्ध आस्था का केन्द्र लद्दाख
धन्यवाद...

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