Followers

Wednesday, November 25, 2015

"अपने घर भी रोटी है, बे-शक रूखी-सूखी है" (चर्चा-अंक 2171)


मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दोहे "घटते जंगल-खेत"

घटते जाते धरा सेबरगद-पीपल-नीम।
इसीलिए तो आ रहेघर में रोज हकीम।।
--
रक्षक पर्यावरण केहोते पौधे-पेड़।
लेकिन मानव ने दियेजड़ से पेड़ उखेड़।।
--
पेड़ काटता जा रहाधरती का इंसान।
प्राणवायु कैसे मिलेसोच अरे नादान... 
--
--
--
--
--
--
--
--
--
--

त्रिवेनियाँ 

अगर  जिंदगी  फिर  कभी ऐसे दोराहे पर लाये 
जहाँ तुम्हे कोई लाख चाहकर न पुकार पाये 

तो समझना तुम अपने ही सन्नाटें में खो चुके हो... 
Vandana Singh 
--

मंगलाचार : 

ज्योत्स्ना पाण्डेय 

ज्योत्स्ना अर्से से कविताएँ लिख रही हैं. 
तमाम पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं. 
वैविध्य पूर्ण काव्य- संसार तो है ही 
शिल्प पर भी मेहनत दिखती है... 
समालोचन पर arun dev 
--

जाने कहाँ ? 

गुम जाने की उसकी बुरी आदत थी, 
या फिर मेरे रखने का सलीका ही सही न था, 
चश्‍मा दूर का अक्‍सर पास की 
चीजें पढ़ते वक्‍़त नज़र से हटा देती थी 
एक पल की देरी बिना 
वह हो जाता था मेरी नज़रों से ओझल 
कितनी बार नाम लेती उसका 
जाने कहाँ गया... 
SADA 
--
--

अंतर कल व आज में 

कलम के लिए चित्र परिणाम
एक वह भी लेखनी थी
था वजन जिस में इतना
लिखा हुआ मिटता न था
लाग लपेट न थी जिसमें
वह बिकाऊ कभी न थी 
किसी का दबाव नहीं सहती
थी स्वतंत्र सत्य लेखन को
अटल सदा रहती थी ... 
Akanksha पर Asha Saxena 
--
--
--
--

2 comments:

  1. बहुत ही उम्दा लिखावट , बहुत ही सुंदर और सटीक तरह से जानकारी दी है आपने ,उम्मीद है आगे भी इसी तरह से बेहतरीन article मिलते रहेंगे Best Whatsapp status 2020 (आप सभी के लिए बेहतरीन शायरी और Whatsapp स्टेटस संग्रह) Janvi Pathak

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।