मित्रों!
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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मानवता को रौंदकर
आज कहाँ कानून है, कैसा हुआ समाज?
मारे जाते, जो करे, अब ऊँची आवाज...
मनोरमा पर श्यामल सुमन
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कर्मों के फल
अंतर्नाद का नाद हैं ये
ख़ुद से संघर्ष का
रणभेदी आगाज़ हैं ये...
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL
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सुप्रभातम्! जय भास्करः!
१६ ::
सत्य नारायण पाण्डेय

पापा से बातचीत :: एक अंश
अभी पितृपक्ष चल रहा है! ब्राह्मणों के दान ग्रहण करने और ऐसा करने के परिणाम दुष्परिणाम से सम्बंधित कई कुतर्क एवं भ्रांतियों को लेकर एक सहज सी बातचीत का कुछ अंश. सोचा यहाँ भी संकलित हो जाए...
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शुभ प्रभात
ReplyDeleteआभार,आभार और आभार
सादर
शुभकामनाएं!
ReplyDeleteकिसी भी धर्म को केन्द्र मे रखकर रचनाकार को सत्य से इतर साहित्य विवेचन की इजाजत सत साहित्य नही हो सकता । साहित्य सर्वमान्य हो सर्वग्राह्य और सर्वाधिक कल्याण करने वाला होना सर्वोत्तम , आक्रोश की झलकियां प्रश्न चिन्हों को जन्म देने की भूमिका में खडा कर सकती है।
सुन्दर चर्चा।
ReplyDeleteबहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति ..
ReplyDeletebahut badhiya !
ReplyDeletesundar charcha hamen shamil karne hetu hraday se abhar
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