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Sunday, November 04, 2018

"परिभाषायें बदल देनी चाहियें" (चर्चा अंक-3145)

रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।   
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।   
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')  
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परिभाषायें बदल देनी चाहिये अब  

चोर को शरीफ कह कर  

एक ईमानदार को लात देनी चाहिये 

सुशील कुमार जोशी  
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दोहे  

" बच्चों को अच्छे लगे, चटकीले ही रंग"  

( राधा तिवारी "राधेगोपाल " ) 

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एक छोटा सा मकान हूँ मैं 

Sudhinama पर sadhana vaid  
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बाजार जैसी कुरकुरी भाकरवड़ी  

बनाने का आसान तरीका 

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"मी टू" पर एक विचार 

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हमराज 


Akanksha पर 
Asha Saxena 
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तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक 

हमको हमारा ये चराग मुबारक।  
तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,  
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक... 

धीरेन्द्र अस्थाना 
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शाम हो रही थी .घर से थोड़ा आगे बढ़ी ही थी कि एक घर के लान में खड़ी आकृति बड़ी परिचित-सी लगी, याद नहीं आ रहा था कहाँ देखा है. बरबस उसकी ओर बढ़ती चली गई. चुपचाप खड़ी थी . 'ऐसी चुप-चुप क्या सोच रही हो ? और बिलकुल अकेली! सब लोग कहाँ है?' 'सब घर में हैं. तुम कहाँ जा रहीं थीं?' 'तुम मुझे जानती हो ?' 'रोज पाला पड़ता है तुमसे , जानूँगी नहीं?' 'अरे हाँ, तुम मात्रा हो... 
लालित्यम् पर प्रतिभा सक्सेना 

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माँ है अनुपम.... 

डॉ. कनिका वर्मा 

yashoda Agrawal  
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मेरे अज़ीमतर दोस्त गुरुवत पथ -प्रदर्शक और सहकर्मी  

आदरणीय डॉ. नन्द लाल मेहता 'वागीश' , 

हाल ही में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सम्मानित हुए 

12 comments:

  1. मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद |

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  2. सुन्दर लिंक्स। मेरी रचना शामिल की. शुक्रिया।

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. मेरी रचना को आज की चर्चा में शामिल करने के लिए आभार

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  5. सुन्दर रविवारीय प्रस्तुति में 'उलूक' के सूत्र को शीर्षक पर स्थान देने के लिये आभार आदरणीय।

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति शास्त्री जी ! मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार ! ज्योति पर्व की आप सभीको हार्दिक शुभकामनाएं !

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  8. पुराने ज़ख़्म उघाड़े जा रहे हैं
    कई पापी पछाड़े जा रहे हैं
    कुदाली हाथ मे "मी टू" की लेकर
    गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं
    हौसला मत छीनो यारों #Meetoo से ,

    ये अलाव बरसों से सुलगाये हुए हैं। अच्छी अवधारणा है डॉ.
    कविता किरण जी की।
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    व्यंग्य विनोद को सिरे चढाती बढ़िया रचना सुशील जी की।
    राजा बड़ा या महाराजा ,
    तेली तो फिर तेली है।
    राजा भोज वहीँ पर है ,
    गंगू फिर भी तेली है।
    दुर्भाग्य दिग्भ्रमित सिंह का जिस चर्च की चाची और नवशिवभक्त के कसीदे काढ़ते काढ़ते उम्र गँवा दी वही अब कहते हैं :कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली। अफसोसनाक है राजा भोज को तो राजा भोज भी नहीं रहने दिया ,तेली से बदतर बना दिया माँ बेटों ने। बधाई सुशील जी इस सशक्त विषय पर आपने लिखा।
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  10. भारत धर्मी विचार और स्पंदन की रचना बेहतरीन लाजावाब शास्त्री जी की। बधाई चर्चा मंच उत्सवी सप्ताह की।
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