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Tuesday, May 28, 2019

"प्रतिपल उठती-गिरती साँसें" (चर्चा अंक- 3349)

मित्रों!
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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एक अदद करारी खुशबू 

शर्मा जी अपने काम में मस्त सुबह सुबह मिठाई की दुकान को साफ़ स्वच्छ करके करीने से सजा रहे थे । दुकान में बनते गरमा गरम पोहे जलेबी की खुशबु नथुने में भरकर जिह्वा को ललचा ललचा रही थी। अब खुशबु होती ही है ललचाने के लिए , फिर गरीब हो या अमीर खींचे चले आते है। खाने के शौक़ीन ग्राहकों का हुजूम सुबह सुबह उमड़ने लगता था। खाने के शौक़ीन लोगों के मिजाज भी कुछ अलग ही होते हैं। कुछ गर्मागर्म पकवानों को खाते हैं कुछ करारे करारे नोटों को आजमाते हैं... 
shashi purwar 
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कैसे याद रहे? 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
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सन्नाटा सा पसरा है 

ज़िन्दगी से उठापटक जारी है  
साँस लेना भी जैसे भारी है  
संशयों के झुरमुट में लम्हें बीत रहे हैं  
हम बूँद-बूँद पात्र से रीत रहे हैं... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक  
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तुम हो तो... 

तुम हो तो पल-पल तार 
अन्तर के गीत मधुर गुनगुनाती है  
प्रतिपल उठती,प्रतिपल गिरती साँसें  
बुलबुल-सी फुदक-फुदककर शोर मचाती है... 
Sweta sinha  
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सोशल मीडिया बना एक अहम् किरदार 

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अव्यवस्था के अग्नि कुण्ड में ---  

सूरत अग्नि काण्ड पर 

मौसम आयेंगे  जायेंगे पर 
वे   वापस  ना आयेंगे 
 घर आँगन  में  नौनिहाल
 अब ना खिलखिलाएंगे !

 गर्म हवा से भी  न कभी 
  छूने  दिया था जिन्हें 
सोच ना था  अव्यवस्था के
 अग्नि   कुंड  उन्हें  भस्म  कर  जायेंगे... 
क्षितिज पर रेणु  
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7 comments:

  1. विविधापूर्ण रचनाओं से सजा आज का अंक बेहद सराहनीय है सर..मेरी रचना को स्थान.देने के लिए हृदयतल से आभारी हूँ। सादर शुक्रिया।

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  2. बहुत शानदार संकलन विविध रचनाकारों की सुंदर प्रस्तुति का सुंदर गुल दस्ता।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

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  3. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति शानदार रचनाएँ
    सादर

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  4. अनुपम सूत्रों का संयोजन आज की चर्चा में ! नेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  5. महत्वाकांक्षाओं की भूख से दुखिया यह संसार।

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