चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Sunday, August 24, 2014

"कुज यादां मेरियां सी" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1715

इक याद तेरी ने वर्का फोल्या
इक याद मेरी ने स्याही लिती
कुज कुज यादां तेरियाँ सी
मिठियां मीठियाँ
कुज यादां मेरियां सी
सौंधी जही अलसाई सी
वे रान्झेया
इक बारी वेल्ली रखी
तेरे मेरे विचोड़े ने
अथरू भर भर के
अँखियाँ विच
लिखे ने
पोथियाँ हजार
अज हिज्र ने
तेरे मेनू
कमली कित्ता
अज चाड़ दितियाँ ने खड्डी ते
सारियां यादां
बनन लई
इक दुशाला इश्क विच भिजे हर्फा नाल 
लोड़ मैनू तेरी निग दी
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हिंदी अनुवाद
………………………
एक याद तेरी ने पन्ना खोला
एक याद मेरी ने स्याही ली
कुछ यादें तेरी थी
मीठी मीठी
कुछ यादें मेरी थी
सौंधी सी,अलसाई सी
ओ राँझा (प्रिय)
एक अलमारी खाली रखना
तेरे मेरे विरह ने
आंसू भर भर कर
आँखों में
लिखी हैं
किताबें हजार
तेरे विरह ने
मुझे
पागल किया हैं
आज मैंने खड्डी (कपड़ा बनने की मशीन) पर
चढ़ा दी हैं सारी यादें
बनने के लिये
प्यार से भीगे शब्दों का
शाल
मुझे जरुरत हैं
तेरे प्यार की गर्मी की

(साभार : नीलिमा शर्मा)
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नमस्कार !
रविवारीय चर्चा मंच में आपका स्वागत है.
एक नज़र आज की चर्चा में शामिल लिंक्स पर....
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आज तुम्हारे दरवाजे भी लगते खूब बुहारे से - सतीश सक्सेना


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पूरे से ज़रा सा कम है ..
सु..मन 


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कथांश-15
प्रतिभा सक्सेना 

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काश कि वक्त ठहर जाता ---एक संस्मरण मीठी यादों का !
डॉ. टी. एस. दराल


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माना कि बहुत मुश्किल है …
प्रतिभा वर्मा 
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ग़ज़ल : ख़ुदा सा सर्वव्यापी, दरिंदा हो गया है
सज्जन धर्मेन्द्र 


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१३६. किनारा लहरों से
ओंकार 
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कुछ लोग - 6
यशवंत 'यश' 


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"सबके भय से मेरे साहस को हवा मिलती है"
परी ऍम 'श्लोक'


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गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein
नीरज द्विवेदी


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घरौंदा...
अलका अवस्थी 
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जुड़ाव
रेवा टिबरेवाल 


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ये वक्त देखता रहा सहमा हुआ शजर
नवीन मणि त्रिपाठी 


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"फिर से हरा-भरा हुआ उजड़ा हुआ दयार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मयंक
निन्यानबे के फेर में आया हूँ कई बार
रहमत औ’ करम ने तेरी, मुझको लिया उबार

ऐसे भी हैं कई बशर, अटक गये हैं जो
श्रम करके मैंने अपना, मुकद्दर लिया सँवार

कल तक थी जो कमी, वो पूरी हो गई है आज,
शबनम में आ गया है, मोतियों सा अब निखार

चलता ही रहा जो, वो पा गया है मंजिलें
पतझड़ के बाद आ गई, चमन में फिर बहार

नदियाँ मुकाम पा के, समन्दर सी हो गईं
थे बेकरार जो कभी, उनको मिला क़रार

महताब को दी रौशनी, जब आफताब ने,
बहने लगी है रात में, शीतल-सुखद बयार

चेहरा चमक उठा, दमक उठा है रूप भी
फिर से हरा-भरा हुआ, उजड़ा हुआ दयार
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जब
अनिता 
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घाती है भादो
विभा रानी श्रीवास्तव 


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खुद को भी पता कहाँ कुछ भी होता है कहाँ किस समय कौन क्या किस के लिये इस तरह भी कह देता है
सुशील कुमार जोशी 


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या अनुरागी चित्त की गति समझे न कोय
वीरेंद्र कुमार शर्मा 


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हम जैसे हैं--तेरे हैं एक प्रभु-गीत
मन के - मनके 
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धन्यवाद !

23 comments:

  1. आज की चर्चा में
    बहुत सुन्दर और श्रम के साथ चयनित लिंक।
    आपका आभार भाई राजीव कुमार झा जी।

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  2. उम्दा सूत्र |

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  3. बहुरंगी सूत्र समेटे चुरुचिपूर्ण चर्चा -आभार राजीव जी !

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  4. उम्दा प्रस्तुती चर्चा मंच की .... आभार और बहुत बहुत धन्यवाद

    ReplyDelete
  5. सुंदर सूत्र

    ReplyDelete
  6. एक याद तेरी ने पन्ना खोला
    एक याद मेरी ने स्याही ली
    बहुत सुंदर कविता...पठनीय सूत्रों के लिए आभार !

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    Replies
    1. शुक्रिया अनीता जी मेरी नज़्म को पसंद करने का

      Delete
  7. नीलिमा जी की सुंदर कविता से शुरु आज की सुंदर चर्चा में 'उलूक' के सूत्र 'खुद को भी पता कहाँ कुछ भी होता है कहाँ किस समय कौन क्या किस के लिये इस तरह भी कह देता है' को स्थान देने के लिये आभार राजीव जी ।

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    Replies
    1. शुक्रिया सुशिल जी देरी से यहाँ आने के लिय क्षमा पात्र हूँ ....

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  8. बढ़िया प्रस्तुति व सूत्र , आ. राजीव जी , शास्त्री जी व मंच को धन्यवाद !
    I.A.S.I.H ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

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  9. खूबसूरत सूत्र संजोये हैं ,हार्दिक बधाई जी

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  10. sunder sutr .....meri rachna shamil karne ke liye aabhaar....

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  11. बहुत बढ़िया रविवारीय चर्चा प्रस्तुति ..आभार!

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  12. बहुत बहुत धन्यवाद सर!

    सादर

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  13. बहुत खूब। सुंदर सार्थक सेतु लिए आकर्षक चर्चा सजाई आपने बधाई। हमारे सेतु को शरीक किया आपका शुक्रिया।

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  14. प्रदूषण का असर है, या ए.सी. का करिश्मा
    हमारा खून सारा, लसीका हो गया है

    बहुत खूब कही ग़ज़ल खूब कही।

    ग़ज़ल : ख़ुदा सा सर्वव्यापी, दरिंदा हो गया है
    सज्जन धर्मेन्द्र

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  15. निन्यानबे के फेर में आया हूँ कई बार
    रहमत औ’ करम ने तेरी, मुझको लिया उबार


    सुंदरम मनोहरं

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  16. बहुत अच्छी कड़ियाँ मिलीं। मुझे भी शामिल करने के लिए आभार

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  17. नीलिमा जी कि सुंदर कविता पढ़ने को मिली ..सभी लिंक्स बढ़िया ..मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार |

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    1. सु...मन ...शुक्रिया माय डिअर

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  18. खुब् मनोयोग से आपने सूत्र सजाया है

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  19. सुन्दर चर्चा के लिये आभार .

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  20. आपने मेरी नज़्म से aइस चर्चा की शुरुवात की आपकी आभारी हूँ ......मेरी पसंदीदा नज़्म हैं जो मैंने अमृता प्रीतम जी को याद करते हुए लिखी थी ............आप सभी का तहे दिल से आभार

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