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Monday, November 14, 2016

"कार्तिक पूर्णिमा (गंगा-स्नान), गुरू नानकदेव जयन्ती" {चर्चा अंक- 2526}

मित्रों 
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
सभी पाठकों को
कार्तिक पूर्णिमा (गंगा-स्नान), 
गुरू नानकदेव जयन्ती की
हार्दिक शुभकामनाएँ।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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दोहे 

"कार्तिक पूर्णिमा-गंगास्नान" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

कातिक की है पूर्णिमा, सजे हुए हैं घाट।
सरिताओं के रेत में, मेला लगा विराट।।
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एक साल में एक दिन, आता है त्यौहार।
बहते निर्मल-नीर में, डुबकी लेना मार।।
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गंगा तट पर आज तो, उमड़ी भारी भीड़।
लगे अनेकों हैं यहाँ, छोटे-छोटे नीड़।।
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खिचड़ी गंगा घाट पर, लोग पकाते आज।
जितने भी आये यहाँ, सबका अलग मिजाज।।
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गुरू पूर्णिमा पर्व पर, खुद को करो पवित्र।
सरिताओं के घाट पर, आज नहाओ मित्र।।
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गुरु नानक का जन्मदिन, देता है सन्देश।
जीवन में धारण करो, सन्तों के उपदेश।।
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बुला रहा है आपको, हर-हर का हरद्वार।
मैली मत करना कभी, गंगा जी की धार।।
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गंगा जी के नाम से, भारत की पहचान।
करती तीनों लोक में, गंगा मोक्ष प्रदान।।
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बाल दिवस विशेष कविताएँ -  

कैलाश मंडलोंई 

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गीत खुशी के गाए हम....
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स्कूल हंसते-हंसते जाए,
कभी न रोते जाए हम।
नन्हे मुन्ने प्यारे बच्चे,
गीत खुशी के गाए हम।।
सारे जग से न्यारे हम,
सब की आँखों के तारे हम।
सब के राज दुलारे हम,
मम्मी पापा के प्यारे हम।।
नन्हे-नन्हे हाथों से,
अक्षर खुब जमाए हम।
चाहे कितनी भूलें करें,
फिर भी न घबराए हम।। 
Ravishankar Shrivastava 
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नमक की नमकीनीयत 

प्रभु से बड़ा प्रभु का नाम..वही हालत मुझे नमक की भी लगती है. जितना नमक बतौर नमक खाने में इस्तेमाल होता होगा, उससे कहीं अधिक इसके नाम की उपयोगिता है. वैसे तो नमक अपने आप में ही महान है. भगोना भर दाल में यूँ तो इसका रोल एक चम्मच भर का है मगर दाल में डालने से रह जायें या ज्यादा पड़ जायें, दोनों ही हालातों में इतनी मँहगी दाल की कीमत कौड़ी भर की कर देता है... 
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बिकता हुस्न है बाज़ारों में..  

प्रकाश सिंह 'अर्श' 

इश्क मोहब्बत आवारापन। 
संग हुए जब छूटा बचपन ॥ 
मैं माँ से जब दूर हुआ तो , 
रोया घर, आँचल और आँगन ॥ 
शीशे के किरचे बिखरे हैं , 
उसने देखा होगा दर्पण... 
yashoda Agrawal 
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ज़रूरी है धुएं की लकीर पीटना 

दिल्ली में ज़हरीला कोहला हटने या छंटने के हफ्ते भर बाद मैं अगर इसकी बात करूं, तो आप ज़रूर सोचेंगे कि मैं सांप निकलने के बाद लकीर पीटने जैसा काम कर रहा हूं। लेकिन, यकीन मानिए, प्रदूषण एक ऐसी समस्या है, जिसमें चिड़िया के खेत चुग जाने जैसी कहावत सच भी है, लेकिन देर भी नहीं हुई है। अब जरा गौर कीजिए, दिल्ली में दीवाली की रात के बाद, अगली सुबह से ही घना स्मॉग छाया रहा, लेकिन इस मुद्दे पर दिल्ली सरकार की कैबिनेट बैठक ठीक सातवें दिन हुई... 
गुस्ताख़ पर Manjit Thakur 
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तुम ही तुम हो.. 

जहाँ मेरी सारी शिकायते, 
खत्म हो जाती है, 
वो तुम ही हो...  
जहाँ मेरी ख्वाईशो की बंदिशे,  
नही रहती है, 
वो तुम ही हो...  
Sushma Verma 
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किफायती धन 

मेरे मित्र ठाकुर जी ने अपनी पत्नी को कहा कि यदि तुम्हारे पास कुछ 500-1000 के नोट पड़े हैं तो दे दो उन्हें बदलवा लेते हैं। पत्नी भी राजी हो गयीं पर जब उन्होंने अपनी जमा-पूँजी ठाकुर जी के सामने रखी तो वे बेहोश होते-होते बचे, उनके सामने पूरे तीन लाख रुपये पड़े थे, जो उनकी ठकुराइन ने अपने कला-कौशल से इकट्ठा किए थे... 
गगन शर्मा 
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ये जिन्दगी... 

चलते-चलते ,चलते ही जाना है , 
जाने कितनी दूर तलक कि  
सांसों के घोड़ों पर सवार हो 
सफ़र पर निकल पड़ी ये जिन्दगी...  
बदलते -बदलते आखिर कितना बदल गए हम कि 
अपने जमाने से कोसों आगे निकल गयी ये जिन्दगी...  
अर्चना चावजी 
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कुछ सामयिक दोहे ..... 
मैला है यदि आचरण, नीयत में है खोट 
रावण मिट सकते नहीं, चाहे बदलो नोट । 
नैतिक शिक्षा लुप्त है, सब धन पर आसक्त 
सही फैसला या गलत, बतलायेगा वक्त । 
बचपन बस्ते में दबा, यौवन काँधे भार 
प्रौढ़ दबा दायित्व में, वृद्ध हुए लाचार । 
पद का मद सँभला नहीं, कद पर धन की छाँव 
चौसर होती जिंदगी, नए नए नित दाँव । 
दिशा दशा को देख के, कवि-मन चुभते तीर 
अंधा बाँटे रेवड़ी, गदहा खाये खीर।। 

अरुण कुमार निगम 
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मैं कब नये कपड़े पहनूंगा? 

 70 साल से देश रो रहा है, फटेहाल सा दर-दर की ठोकरे खा रहा है। जब सारे ही देश इकठ्ठा होते हैं तब मैं अपनी फटेहाली छिपाते-छिपाते दूर जा खड़ा होता हूँ। कोई भी अन्य देश मेरे साथ भी खड़ा होना नहीं चाहता क्योंकि मेरे अन्दर गन्दगी की सड़ांध भरी है, टूटी-फूटी सड़कों से मेरा तन उघड़ा पड़ा है। मेरी संतानें भीख मांग रही हैं, मेरे युवा नशे के आदी हो रहे हैं। महिला शारीरिक शोषण की शिकार हो रही हैं। मैं न जाने कितने टुकड़ों में बँटा हूँ, मुझे भी नहीं पता कि मैं कहाँ खड़ा हूँ। सरकारे आती हैं और जाती हैं लेकिन मुझ पर पैबंद लगाने के अलावा कुछ नहीं कर पाती हैं... 
smt. Ajit Gupta 
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बच्चे चाचा उन्हें बुलाते 

इलाहाबाद में जन्म हुआ था थे कश्मीरी ब्राम्हण परिवार पिता मोतीलाल थे उनके स्वरुप रानी से मिला संस्कार. समय की गति के साथ-साथ बने यशस्वी और गुणवान स्वाधीनता संग्राम के योद्धा कहलाए राजनीतिज्ञ महान. देश की दुर्दशा देखकर क्रांति रण में कूद पड़े थे अत्याचार अनेक सहे थे अनगिनत ही जेल गए थे. गाँधी की अनुयायी बनकर कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे विदेश नीति के रखकर नींव लोकप्रिय बेहद हुए थे. प्रत्येक आखों से आंसू पोछूं ऐसा ही प्रण वो लिए थे विषमता का करने को अंत हर संभव प्रयत्न किये थे. आधुनिक भारत के वे निर्माता थे विश्व-शांति के अग्रदूत पंचशील सिद्धांत बनाकर बने चिर-स्मरणीय राष्ट्रपूत... 
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बालकविता 

"चाचा नेहरू तुम्हें नमन" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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चाचा नेहरू जी ने,
प्यारे बच्चों को ईनाम दिया था।
अपने जन्म-दिवस को
तुमने बाल-दिवस के नाम किया था।।
...
माली बनकर लाल जवाहर ने,
सींचा अपना उपवन।
अभिनव भारत के निर्माता
मेरे शत्-शत् तुम्हें नमन।।

2 comments:

  1. बाल दिवस की शुभकामनाएं । सुन्दर चर्चा ।

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  2. बाल दिवस के अवसर पर बेहतरीन चर्चा मेरी रचना 'बच्चे चाचा उन्हें बुलाते'को शामिल करने के लिए धन्यवाद सर

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