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Sunday, November 20, 2016

"देश बदल रहा है" (चर्चा अंक-2532)

मित्रों 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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दोहे  

"करते दिल पर वार"  

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

सीधे-सादे शब्द हैं, दोहों का आधार।
चमत्कार के फेर में, होता बण्टाधार।।
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बड़े-बड़े जो छन्द हैं, उनका केवल नाम।
थोड़े शब्दों में करे, दोहा अपना काम।।
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लेखन अगर सटीक हो, होगी पैनी धार।
दिल से निकले शब्द ही, करते दिल पर वार... 
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आलेख 

"दोहाछन्द" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) 

Image result for दोहा छन्द
दोहा छन्द अर्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में तेरह-तेरह मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। दोहा छन्द ने काव्य साहित्य के प्रत्येक काल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिन्दी काव्य जगत में दोहा छन्द का एक विशेष महत्व है। दोहे के माध्यम से प्राचीन काव्यकारों ने नीतिपरक उद्भावनायें बड़े ही सटीक माध्यम से की हैं। किन्तु दोहा छन्द के भेद पर कभी भी अपना ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहिए।
      सच तो यह है कि दोहे की रचना करते समय पहले इसे लिखकर गाकर लेना चाहिए तत्पश्चात इसकी मात्राएँ जांचनी चाहिए ! इसमें गेयता का होना अनिवार्य है... 
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बेपानी सियासत में पानी की राजनीति 

चुनावी वक्त में पानी की तरह रूपया ज़रूर बहाया जाता है लेकिन पानी को पानी की ही तरह बहाना मुद्दा है। ताजा विवाद पंजाब बनाम हरियाणा का है, जहां मसला सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद गहरा गया। शीर्ष अदालत ने पंजाब सरकार को बड़ा झटका देते हुए सतलज का पानी हरियाणा को देने का आदेश दिया था। लेकिन, गुरूवार यानी 17 नवंबर को उच्चतम न्यायालय पंजाब द्वारा सतलुज-यमुना संपर्क नहर के लिए भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने के शीर्ष अदालत के अंतरिम आदेश का कथित उल्लंघन करने के मामले में हरियाणा की याचिका पर 21 नवंबर को सुनवाई के लिए सहमत हो गया... 
गुस्ताख़ पर Manjit Thakur  
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अपने मुंह में 

खबरिया चैनलों के शब्दों को जगह न दें 

आज "मरीज" खुद भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह किसी भी तरह का कष्ट किसी भी हद तक सहने को राजी है पर उसे भड़काया जा रहा है, अरे ! तुम्हारा आपरेशन होगा, तुम्हें कष्ट होगा, तुम्हें परेशानी होगी। आज कल नहाने का मौसम है तुम नहाओगे कैसे, तुम्हें सोचने -समझने का समय ही नहीं दिया गया इत्यादि, इत्यादि। बजाए मरीज का हौसला बढ़ाने और उसकी मदद करने के उसे भरमाया जा रहा है, जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर कुछ लोग शायद चाहते भी यही हैं ... 
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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तुम और मैं -४ 

सु-मन (Suman Kapoor) 
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देश बदल रहा है ... 

चलिए देश बदल गया विकास हो गया अब और क्या चाहिए भला ? जो जो आप सबने चाहा उन्होंने दिया अब जो भी विरोध करे देशद्रोही गद्दार की श्रेणी का रुख करे आइये गुणगान करें क्योंकि अच्छे दिन की यही है परिभाषा आँख पर लगा काला चश्मा प्रतीक है हमारी निष्ठा और समर्पण का शुभ है लाभ है उसके बाद जो कहा सब बकवास है नतमस्तक होना आदत है हमारी फिर चाहे हर बार रेती जाए गर्दन ही हमारी चलो खुश रहो और उन्हें भी रहने दो देश बदल रहा है ... 
vandana gupta  
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दिलों का मोल 

तलाशा बहुत पर इस टूटे दिल का ख़रीदार मिला ना कोई बिखरें आँसओं की चुभन से भयभीत था हर कोई हर एक पारखी नज़र वाला जोहरी था दिलों के इस बाज़ार में टूटे दिलों का इसलिए कोई मोल ना था सपनों के इस बाज़ार में फिर कोशिश की जोड़ लू इसे फ़िर कोई एक खाब्ब से पर मिला ना इसको भी कोई हमसफ़र क्योंकि सब तलाश रहे थे दिलों को अरमानों की बरसात में अरमानों की बरसात में 
RAAGDEVRAN पर 
MANOJ KAYAL 
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गाँव छोड़ शहर मे 

शहर में बैठकर, गांव के हालात पर- तरस खाता हूँ 
जब फसल लहलहाती है, तो जाकर कटवा लाता हूँ 
माँ-बाबूजी का क्या है ? 
रहे ,रहे न रहे, 
किसी दिन भी निकल पड़े 
कोरे कागजों पर ही अंगूठा लगवा लाता हूँ... 
अर्चना चावजी Archana Chaoji 
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ज़माने तेरी मिह्रबानी नहीं हूँ 

शजर हूँ तिही इत्रदानी नहीं हूँ 
चमन का हूँ गुल मर्तबानी नहीं हूँ 
अरे मुझपे वादाख़िलाफ़ी की तुह्मत? 
मैं हस्ती कोई मानी जानी नहीं हूँ... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
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तीर्थ का पानी अमृत हो गया है 

चलिये आपको 70 के दशक में ले चलती हूँ, जयपुर की घटना थी। रेत के टीलों से पानी बह निकला था और शोर मच गया था कि गंगा निकल आयी है। मैं तब किशोर वय में थी। गंगा जयपुर के तीर्थ गलता जी के पास के रेतीले टीलों से निकली थी और गलताजी जाना हमारा रोज का ही काम था। गलता के मुख्य कुण्ड से यह स्थान तकरीबन एक किलोमीटर रहा होगा... 
smt. Ajit Gupta 
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अनुष्ठान . 

पुराने जर्जर होते नक़्शे से 
एक नई तस्वीर बन रही है -  
चल रहा है 
नवोदय का अनुष्ठान... 
प्रतिभा सक्सेना 
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मछली 

मैं कूद रही थी पानी में, 
तैर रही थी बिना रुके, 
इधर से उधर, 
जहाँ भी मेरा मन किया, 
मुझे लगा कि ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है... 
कविताएँ पर Onkar 
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तुरुपी चाल 

अचूक वार 
किये एक तीर से 
कई शिकार 
फुस्स हो गया 
आतंकी कारोबार... 
Sudhinama पर 
sadhana vaid 
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परदों के पीछे का सफर.. 

आनन्द वर्धन ओझा 
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सम्वेदनाओं की हत्या 

सम्बेदनाओं की हत्या कल दो घटनायें टीवी पर देखीं भारत के एक ही प्रान्त आंध्र से एक में पूर्ब मंत्री ने अपनी बेटी की शादी में पैसा पानी की तरह बहाया इस आयोजन में राज्य के दोनों राजनितिक दलों ( भाजपा और कांग्रेस) के नेताओं ने शिरकत की या कहिये की अपना मौन समर्थन दिया दूसरी तरफ आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले के गुंटकाल के सरकारी अस्पताल जिसमें स्ट्रेचरन मिलने की बजह से पति को घसीट कर ले जाना पड़ा अस्पताल प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में नाकाम नजर आया मानबीय सम्बेदनाएं दम तोड़ती नजर आयीं... 
Madan Mohan Saxena 

4 comments:

  1. सुन्दर राविवारीय अंक ।

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  2. देश बदल रहा है ......
    कहते हैं, बदलाव प्रगति का सूचक है,

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  3. सुन्दर राविवारीय चर्चा।

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  4. विलम्ब के लिए खेद है शास्त्री जी ! चार दिन से ब्रॉड्बैंड कनेक्शन खराब होने के कारण ब्लॉग जगत से दूरी बन गयी थी ! आपने आज की चर्चा में मेरी रचना को स्थान दिया आपका हृदय से धन्यवाद एवं आभार !

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