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Sunday, November 18, 2018

"किसी कच्ची मिट्टी को लपेटिये जनाब" (चर्चा अंक-3159)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।   
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
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ज़िन्दगी में गुजरी इन 

ज़िंदगी में गुजरी 
इन खूबसूरत यादों को ,  
यूँ ही खो नही सकता।  
संजो रखे हैं हमने खजाने इनमें  
खुशियों से भरी इन आँखों से, 
कोई रो नही सकता... 
kamlesh chander verma 
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एक ग़ज़ल :  

वक़्त सब एक सा नहीं---  

वक़्त सब एक सा  नहीं होता
रंज-ओ-ग़म देरपा नहीं होता
आदमी है,गुनाह  लाज़िम है
आदमी तो ख़ुदा  नहीं  होता... 

आपका ब्लॉग पर 

आनन्द पाठक 

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593.  

लौट जाऊँगी... 

कब कहाँ खो आई ख़ुद को   
कब से तलाश रही हूँ ख़ुद को   
बात-बात पर कभी रूठती थी   
अब रूठूँ तो मनाएगा कौन   
बार-बार पुकारेगा कौन... 
डॉ. जेन्नी शबनम 
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11 comments:

  1. शुभ प्रभात आदरणीय
    सुन्दर चर्चा मंच की प्रस्तुति
    सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनायें
    सादर

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छी रचनाओं का संकलन। सुंदर प्रस्तुति।

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  3. लेख पढ़ने एवं अपनी राय देने के लिए शुक्रिया।

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  4. मिलिए भैया इस मसखरे भ्रम -चारि से जिसने कसम खाई है वंशवाद मिटा दूंगा नेहरुपंथी अपशिष्ट का खूंटा उखाड़ फेंकूँगा।
    जैश्रीकृष्णभाई !
    jaishrikrishnabhai.blogspot.com

    ReplyDelete
  5. तत्कालीन समाज की मानव निमित छद्म वर्ण -व्यवस्था को कुरेदता हुआ सशक्त संस्मरण। मनुस्मृति में कहीं भी किसी का तिरस्कार नहीं है।
    जैश्रीकृष्णभाई !
    jaishrikrishnabhai.blogspot.com

    ReplyDelete

  6. शनिवार, 17 नवंबर 2018 at 9:52:00 am | By: kamlesh chander verma
    ज़िन्दगी में गुजरे..!!
    💐💐💐💐💐💐

    ज़िंदगी में गुजरे उन
    हसीन लम्हों को ,
    यूँ ही खो नही सकता।💐
    kabirakhadasaraimen.blogspot.com

    ReplyDelete
  7. एक ग़ज़ल :

    वक़्त सब एक सा नहीं होता
    रंज-ओ-ग़म देरपा नहीं होता

    आदमी है,गुनाह लाज़िम है
    आदमी तो ख़ुदा नहीं होता

    एक ही रास्ते से जाना है
    और फिर लौटना नहीं होता

    किस ज़माने की बात करते हो
    कौन अब बेवफ़ा नहीं होता ?

    हुक्म-ए-ज़ाहिद पे बात क्या करिए
    इश्क़ क्या है - पता नहीं होता

    लाख माना कि इक भरम है मगर
    नक़्श दिल से जुदा नहीं होता

    बेख़ुदी में कहाँ ख़ुदी ’आनन’
    काश , उन से मिला नहीं होता

    -आनन्द.पाठक-
    कभी अच्छा, बुरा कभी होता
    वक्त एक सा नहीं होता।
    संग का रंग चढ़ा करता है ,

    आदमी अच्छा ,बुरा नहीं होता।
    बढ़िया अशआर कहे हैं जनाब आनंद साहब ने।
    जैश्रीकृष्णभाई !
    jaishrikrishnabhai.blogspot.com

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  8. सुन्दर रविवारीय चर्चा अंंक। आभार आदरणीय 'उलूक' के सूत्र की चर्चा के शीर्षक पर चर्चा करने के लिये।

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  9. बहुत सुन्दर रविवारीय चर्चा प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  10. सुन्दर रविवारीय चर्चा अंंक।मेरे ब्लॉग को स्थान देने के लीये आभार आदरणीय श्री

    ReplyDelete

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