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Friday, May 18, 2012

चाहे बड़े लेखक हुए हों,कवि या आज के ब्लॉगर/ व्यक्तिगत आक्षेप या तुच्छ बहस: चर्चा मंच 883

हे अंध निशा, गूंगी-बहरी !

प्रतुल वशिष्ठ
दर्शन-प्राशन  

हे अंध निशा, गूंगी-बहरी ! मत देखों निज पीड़ा गहरी. 
तेरी दृष्टि पड़ते ही खिल उठती है हिय में रत-लहरी. 

न बोलो तुम, मृदु हास करो चन्दा किरणों सह रास करो 
तुम सन्नाटे के साँय-साँय शब्दों पर मत विश्वास करो. 

 हे मंद-मंद चलने वाली, तम-पद-चिह्नों की अनुगामी ! 
पौं फटने से पहले जल्दी प्रिय-तम से मिल लेना, कामी ! 

जला श्मशान में भीषण, खड़े खुश हाथ वो सेंके-


रही है दोस्ती उनसे, गुजारे हैं  हंसीं-लम्हे
उन्हें हरदम बुरा लगता, कभी जो रास्ता छेंके ||

सदा निर्द्वंद घूमें वे, खुला था आसमां सर पर
धरा पर पैर न पड़ते, मिले आखिर छुरा लेके ||


चीनी कडुवी होय, कहाँ अब प्रेम-सेवइयां -

"कड़वी चीनी"

नमक खाय के भी करें, लुच्चे हमें हलाल ।
घूस खाय के ख़ास-जन, खूब बजावें गाल । 
खूब बजावें गाल, चाल टेढ़ी ही चलते।
आम रसीले चूस, भद्र-जनता को छलते ।
कडुआहट भरपूर, भरें जीवन में भैया  ।
चीनी कडुवी होय,  कहाँ अब प्रेम-सेवइयां ।।

रोजगार गहरे जुड़े, हिन्दी का व्यवहार |
जार जार बेजार हो, हिंदी बिन बाजार |

हिंदी बिन बाजार, अर्थ भी जब जुड़ जाता |
रहा विरोधी घोर, शीश खुद चला नवाता |

हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।


अक्षरों का जीवन .....

यशवन्त माथुर
 जो मेरा मन कहे

कभी मैं सोचा करता था
लिखे हुए अक्षर
कभी नहीं मिटते
पर आज
जब देखा
गले हुए पन्नों वाली
एक पुरानी किताब को
 

जाग उठा मुर्दा

 
लंदन। मिस्र में एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार में रोते हुए लोग खुशी से नाच उठे जब वह व्यक्ति अपने ही अंतिम संस्कार के दौरान अचानक से जिंदा होकर उठ बैठा। इस समय इकट्ठे हुए लोगों ने भी संस्कार समारोह को रद्द करने के बजाय मिलकर अपने पारिवारिक सदस्य के फिर से जी उठने का जश्न मनाया। 

तीन बातें

चिड़िया फुदक कर उस शिकारी के बाएं हाथ पर बैठ गई और पहली बात बताते हुए बोली ,'ऐसी बात पर विश्वास मत करना जो असम्भव हो . फिर बात चाहे कोई भी हो .'
इसके बाद तुरंत चिड़िया फुदक कर दीवार पर जा बैठी और दूसरी बात बताते हुए बोली 'कोई चीज तुम्हारे हाथ से निकल जाए , तो फिर पछताने की जरुरत नहीं .'

माना कि धरातल ..

  उन्नयन (UNNAYANA)

माना   कि  धरातल  ये समतल नहीं है  ,
सागर  भी  है , सिर्फ   मरुस्थल  नहीं है

कहीं   शाम   ढलती   कहीं   पर  सवेरा ,
प्रभाकर    कहीं  , चाँद    डाले   है   डेरा
कहीं   नींद   में  पुष्प,  कहीं   मुस्कराए ,
कहीं   नीड़  में  खग , कहीं  नभ को घेरा


मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

जिन्दगी की पहली डगर होती है माँ

कहते है कि  भगवान  से भी  बढ़कर होती है माँ 
जिन्दगी   की   पहली    डगर    होती     है   माँ

चाहत

आमिर दुबई  मोहब्बत नामा 

भूलकर तुझको ना भुला आज तक भी दिल कभी,
दूर तक चलता रहा पर ना मिली मंजिल कभी।
 मै तेरी राहों को आँखों में छुपा कर चल दिया ,
 तू पलटकर देख इन राहों में आके मिल कभी।


कांकेर से जगदलपुर के मार्ग पर ...

कौशलेन्द्र
बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे कोई झरना...

इनकी भाषा बाँची जिसने, ईश्वर के वह निकट हुआ है।
सखा वृक्ष हैं, सखी प्रकृति है, रिश्ता ये ही अमर हुआ है॥ 

 

 भंग भयो ध्यान, अंग गदरायो देख,
तपती दुपहरिया पथिक भरमायो है।
पात-पात रक्षक बन खूब डरवायो किंतु, 
     मिली, नत नयन कर पथिक जो आयो है॥    

संस्‍कारों की हथेली पर ....!!!

  SADA

मैं सोचती रही
शब्‍दों की विरासत
मिली थी तुम्‍हें
या आत्‍ममंथन ने की थी रचना
शब्‍दों की
जब भी तुम भावनाओं के
दीप प्रज्‍जवलित करती तो
उनकी रोशनी से
जगमगा उठती मंदिर की मूर्तियाँ
ईश वंदना में झुके हुए शीष
घंटे की ध्‍वनि से
जो बनते हैं सहारा
लोगों के
देते हैं हिम्मत होंसला उनको
रोते से हंसाते हैं उनको
बांटते हैं मुस्कान ज़माने को
उन्हें खुद का ख्याल नहीं
अकेले  अँधेरे कमरे में रोते हैं
 
हर रोज़ नए लिबास में 
अपनी खूबसूरत आँखों को
 एक नई ज़बान सिखाने के लिए 
तुम्हारी झुकी हुई गर्दन और शाने के दरमियान 
 मुझे अपने दिल के लिए एक नया शिकंजा मिल जाता है 
खिड़की से बाहर देखते हुए तुम्हारी आँखें मेरे चेहरे पर ठहर जाती हैं

तुम गये नहीं अब तक!

my dreams 'n' expressions.....याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन. पुराने किसी गीत को सुन कर
कहीं खो जाना...
किसी फूल के खिलने पर 
यूँ ही मुस्कुराना...
बारिश में भिगो के पलकें 
अश्कों को छिपाना...
बेमौके ही तक-तक,आईना
आँखों में काजल सजाना...
किसी भीनी सी आती खुशबू पर
चौंक कर पलट जाना....

  श्री राम ने सिया को त्याग दिया ?''-एक भ्रान्ति


हे  प्रिय  ! सुनो  इन  महलो  में
अब और  नहीं  मैं  रह  सकती  ;
महारानी  पद पर रह आसीन  
जन जन का क्षोभ  न  सह  सकती .

एक गुप्तचरी को भेजा था 
वो  समाचार ये लाई है 
''सीता '' स्वीकार   नहीं जन को 
घर रावण  के रह  आई   है .

यूँ ही जिए जाता हूँ

Asha Saxena
Akanksha  
दरकते रिश्तों का 
कटु अनुभव ऐसा 
हो कर मजबूर 
उन्हें साथ लिए फिरता हूँ 
है केवल एक दिखावा 
दिन के उजाले में 
अमावस्या की रात का 
आभास लिए फिरता हूँ 
लहरों से बहने के साथ में हर लफ़्ज़ से निकली बात में अँधियारी सी उस रात में कोई तो बात होती है । ख़ामोशी से कह जाने में कुछ छुपने और छुपाने में धड़कनों को बहलाने में कोई तो बात होती है 

क्षणिकाएँ

बेझिझक बोलों के अब
पोल खुले ही रहते हैं
जिसपर बेमानी बुद्धिवाद
चिथड़ों में सजे रहते हैं .

बबूला भी बलबलाकर
बड़ा होने में ही फूटता है
पर इन्द्रधनुषी इठलाहटों का
कोई भ्रम कहाँ टूटता है .

....ताकि ज़हर न बने शहद

कुमार राधारमण
स्वास्थ्य


- चाय, कॉफी में शहद का उपयोग नहीं करना चाहिए। शहद का इनके साथ सेवन जहर के समान काम करता है। 
- अमरूद, गन्ना, अंगूर, खट्टे फलों के साथ शहद अमृत है। 
- इसे आग पर कभी न तपायें। 
- मांस, मछली के साथ शहद का सेवन जहर के समान है।


 

कैसे करता है हिफाज़त नवजात की माँ का दूध

veerubhai
ram ram bhai



कौतुक का विषय यह जान लेना था कि नवजात की आँतों का विकास कैसे होता है और इन यौगिकों की इसके विकास में भूमिका क्या रहती है .उन शिशुओं के मामले में जिनका पोषण स्तन पान से ही होता है .ऐसा इसलिए क्योंकि फार्मूला मिल्क पर पलने वाले शिशुओं की आँतों में जुदा किस्म के जीवाणु मिलते हैं .

धरती की कोख से फूटता अक्षय अंकुर 
मधुमय कोष का प्रतीक ,पर जीवन क्षणभंगुर ।
अथ के साथ रचा इति ,क्या मोह ,क्या विरक्ति 
अंतश्चेतना जो प्रदीप्त होता ,क्यूँ पालता कोई आसक्ति ।


लेखक या ब्लॉगर होने के नाते !

संतोष त्रिवेदी
बैसवारी baiswari  


अकसर ऐसा क्यों होता है कि हम समाज या मौज-मजे के लिए लिखते-लिखते व्यक्तिगत आक्षेपों या तुच्छ बहसों में आकर उलझ जाते हैं ? यह ऐसी संक्रामक बीमारी है कि हम इससे अछूते नहीं रह सकते.चाहे बड़े लेखक हुए हों,कवि या आज के ब्लॉगर ,सभी कभी न कभी इस अवस्था से दो-चार होते हैं.

अहंकार

  ZEAL  
हर किसी को अहंकार से ग्रस्त देखा- किसी को अपने रूप का, किसी को अपनी बुद्धि का, किसी को अपनी शिक्षा का, किसी की इस बात का की मैंने बहुत सी किताबें पढ़ रखी हैं और इतिहास का बहुत बड़ा ज्ञानी हूँ।  रावण हो अथवा परशुराम, विश्वामित्र हों अथवा त्रिशंकु, सभी इस दुर्गुण के शिकार होते हैं। फिर हम लोग कौन होते हैं भला। इससे.


रूहों को जिस्म रोज कहाँ मिलते हैं.........

तुम्हारी सदायें क्यूँ इतना कराह रही हैं क्यूँ तुम्हें करार नहीं आ रहा है सब जानती हूँ मुझ तक पहुँच रही हैं तुम्हारी चीखें तुम्हारा दर्द तुम्हारी बेचैनी तुम्हारी पीड़ा सब सुन रही हूँ मैं जानते हो जब मंदिर में घंटा बजता है उसमे मुझे तुम्हारा चीखता हुआ दर्द आवाज़ देता है

दिल मान जाता है

heart, love, open letters

नैना....

  तुम्हारी आंखें बहुत खूबसूरत हैं। उनमें कोई भी खो सकता है। तुम्हारी मासूमियत का मैं कायल हूं। चश्मों में तुम बिल्कुल बुरी नहीं लगतीं। पता नहीं तुम्हें यह सब उतना सहज लगता भी है।

 मन पाए विश्राम जहाँ
बरस ही रहा है
बस भीगना भर है
सूरज उगा ही है
नजर से देखना भर है
शमा जली है
बस बैठना भर है
धारा बह रही है
अंजुरी भर ओक से पीना भर है


कविताओं के मन से....!!!!

अक्सर सोचता हूँ ,
रिश्ते क्यों जम जाते है ;
बर्फ की तरह !!!

एक ऐसी बर्फ ..
जो सोचने पर मजबूर कर दे..
एक ऐसी बर्फ...
जो जीवन को पत्थर बना दे......
एक ऐसी बर्फ ..
जो पिघलने से इनकार कर दे...


श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (सातवीं-कड़ी)

  Kashish - My Poetry


द्वितीय अध्याय
(सांख्य योग - २.२९-३७)

कुछ आश्चर्य सम देखें आत्मा,
कुछ आश्चर्य सम वर्णन करते.
करते श्रवण मान कुछ आश्चर्य,
कथन श्रवण से कुछ न समझते.

करती जो निवास सब तन में,
नित्य,न उसका वध कर सकते.
व्यर्थ सोचते हो सब के बारे में,
उचित नहीं तुम शोक जो करते.


"देश में हम जहर उगलते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



इन सियासत के जंगलों में अब, लोग परचम नये बदलते हैं
छोड़ उजड़े हुए दयारों को, इक नयी अंजुमन में चलते हैं

कभी पत्तों के रँग में ढल जाते, कभी शाखों के रँग के हो जाते
हम तो गिरगिट की तरह से अपने, रंग पल में यहाँ बदलते हैं

आज खिले कल है मुरझाना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)
Mushayera
जीवन एक मुसाफिरखाना
जो आया है, उसको जाना

झूठी काया, झूठी छाया

माया में मत मन भरमाना

सुख के सपने रिश्ते-नाते

बहुत कठिन है इन्हें निभाना

25 comments:

  1. बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर आने का मौका मिला, चर्चा मंच के सार्थक विषयों पर लिंक पढ़ कर मन खुश हो गया..इस के लिए आप को बहुत बहुत आभार !

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  2. रोज की तरह
    रविकर की
    चटपटी चर्चा
    उसके अपने
    बनाये नमक
    मिर्च के साथ
    स्वादिष्ट यम्म्म्म्म्मी !!!

    आभार कड़वी चीनी भी मिलाने के लिये ।

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  3. रविकर जी!
    आप बहुत परिश्रम करते हैं।
    चर्चा को दमदार रूप से पेश करहने के लिए आपका आभार!

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  4. बहुत अच्छा संयोजन. मेरी कविता को शामिल करने के लिए शुक्रिया .

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  5. बहुत खुबसूरत चर्चा के लिए साधुवाद जी / आपकी लगन व निष्ठा को भी ......

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  6. वाह! एक से बढ़कर एक लिंक्स... बढ़िया चर्चा रही!

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  7. ...फिर से चर्चामंच ने कमाल किया,
    मुझ सहित कइयों को निहाल किया !

    आभार आपका !

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  8. आज का चर्चा मंच बहुरंगी है |रविकर जी मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |
    आशा

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  9. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स चयनित किये हैं आपने ..आभार ।

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  10. इतनी सुन्दर और विस्तृत चर्चा दिनेश रविकर जी बहुत बहुत आभार

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  11. काफी कुछ मिला पढ़ने को.

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  12. सार्थक लिंक्स से सुशोभित रोचक चर्चा...आभार

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  13. बहुत अच्‍छे लिंक्‍स .

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  14. sundar links sanyojan ! meri kavita shamil karne ke liye aabhar ravikar ji !

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  15. अच्छे चयन, अच्छा संकलन... शुक्रिया रविकर जी!!

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  16. ब्लाग पोस्टों की चर्चा प्रभावी है काफी अच्छे लिंक मिले.

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  17. सुन्दर चर्चाहमेशा कि तरह , आभार ...

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  18. बहुत बढिया लिंक्स्……सुन्दर चर्चा।

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  19. रविकर जी , हमेशा की तरह रोचक चर्चा..आपको बधाई...

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  20. बहुत बढ़िया लिंक
    सार्थक चर्चा प्रस्तुति
    आभार!

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  21. रविकर कितना रंग ज़माया ,
    चर्चा में क्या भंग मिलाया .

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  22. रविकर कितना रंग ज़माया ,
    चर्चा में क्या भंग मिलाया .

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  23. बेहतरीन चिट्ठा चर्चा में कई पठनीय लिंक मिले ...
    आभार !

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  24. आपका शुक्रिया बहुत बहुत .

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  25. मोहब्बत नामा
    बहुत अच्छी चर्चा है आज के चर्चा मंच पर ,
    पढ़ कर दिल खुश हो गया वाह ''रविकर ''

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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जानवर पैदा कर ; चर्चामंच 2815

गीत  "वो निष्ठुर उपवन देखे हैं"  (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')     उच्चारण किताबों की दुनिया -15...